बंजारा

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तिब्बत की लगभग ४०% आबादी खानाबदोश है।

बंजारा या 'खानाबदोश' (Nomadic people) मानवों का ऐसा समुदाय है जो एक ही स्थान पर बसकर जीवन-यापन करने के बजाय एक स्थान से दूसरे स्थान पर निरन्तर भ्रमणशील रहता है। एक आकलन के अनुसार विश्व में कोई ३-४ करोड़ बंजारे हैं। कई बंजारा समाजों ने बड़े-बड़े साम्राज्य तक स्थापित में सफलता पायी।

संजय चौहान_के अनुसार "बंजारा" जाति भारतीय चार वर्ण ( ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र ) में से वैश्य वर्ण में आते थे । जिनका मुख्य व्यवसाय "आयात निर्यात" का व्यापार था । जिसमे शक्कर, मसाले, कीमती धातु, जानवर आदि का व्यापार शामिल था । प्राचीन का में बंजारा जाति के लोग बहुत धनी हुआ करते थे । विश्व का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त था । जब इन्टरनेट नहीं था जब गूगल मैप का बंजारा जाति के लोग कार्य करते थे । मुग़ल शासक के आने के बंजारा समाज के लोगों से लूटपाट होने के कारण सिक्ख धर्म की उत्पति बंजारा समाज से हुई है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • African Pygmies Nomadic and semi-nomadic peoples in the Central African rainforestबंजारा समाज हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है।क्योंकि बंजारा जैन बोध धर्म के पहले एवम सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुवा है।इनमे संत सेवालाल बापू का गोर समाज के उच्च शिखर पर ले जाने में अमूल्य भूमिका निभाई।गोर बंजारा में सरनेम जैसे राठौड़,चौहान, पवार,जाधव,।के साथ साथ उनके गोत्र पहाडा भी समिलित है