बिश्नोई

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बिश्नोई मन्दिर मुक्तिधाम मुकाम नोखा, बिकानेर, राजस्थान

नाम व्युतपत्ति[संपादित करें]

बिश्नोई दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है: बीस + नो यानि जो उनतीस नियमो का पालन करता है। गुरु जम्भेश्वर भगवान को बिश्नोई पंथ का संस्थापक माना जाता है।

श्री गुरु जम्भेश्वर जी का परिचय[संपादित करें]

जन्म: वि. संवत् 1508 भाद्रपद बदी 8 कृष्ण जन्माष्टमी को अर्द्धरात्रि कृतिका नक्षत्र में (सन् 1451) ग्राम: पींपासर जिला नागौर (राज.)

पिताजी: ठाकुर श्री लोहटजी पंवार काकाजीःश्री पुल्होजी पंवार (इनको प्रथम बिश्नोई बनाया था।)

बुआः तांतूदेवी

दादाजीः श्री रावलसिंह सिरदार (रोलोजी) उमट पंवार ये महाराजा विक्रमादित्य के वंश की 42 वीं पीढ़ी में थे।

ननिहालः ग्राम छापर (वर्तमान ताल छापर) जिला चुरू (राज.)

माताजीः हंसा (केसर देवी)

नानाजीः श्री मोहकमसिंह भाटी (खिलेरी)

वि.सं. 1540 में चेत्र सुदी नवमी को पिताजी लोहटजी का स्वर्गवास उसके पांच महीने बाद माताजी केसर देवी का स्वर्गवास। सात वर्ष तक मौन एवं सत्ताईस वर्ष गायें चराने के बाद 34 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर समराथल धोरे पर गमन एवं सन्यास धारण। वि. सं. 1542 में कार्तिक बदी 8 से अमावस्या तक बिश्नोई धर्म स्थापना। 51 वर्ष तक देश-विदेशों में भ्रमण किया। राजा-महाराजा, अमीर -गरीब, साधु-गृहस्थों को विभिन्न चमत्कार दिखाए। उपदेश दिए एवं वि.सं. 1593 मिंगसर बदी नवमी चिलतनवमी के दिन लालासर की साथरी पर निर्वाण को प्राप्त हुए।

                      लालासर की साथरी पंहुच कियो प्रयाण 
                       इल माही अंधियारो हुयो ज्यूं भूमि बरत्यो भाण

आज भगवान जाम्भोजी के उपासक बिश्नोई देश-विदेशों में निवास करते हैं।

(संदीप डेलू मेहराणा)

२९ नियम[संपादित करें]

निम्न है :-

१. तिस दिन सूतक

२. पञ्च दिन का रज्सवला

३. सुबह स्नान करना

४. शील, संतोष, सूचि रखना

५. प्राते:, शाम संध्या करना

६. साँझ आरती विष्णु गुण गाना

७. प्रातःकाल हवन करना

८. पानी छान कर पीना व वाणी शुद बोलना

९. इंधन बीनकर व दूध छानकर पीना

१०. क्षमा सहनशीलता रखे

११. दया-नम्र भाव से रहे

१२. चोरी नहीं करनी

१३. निंदा नहीं करनी

१४. झूठ नहीं बोलना

१५. वाद विवाद नहीं करना

१६. अमावस्या का व्रत रखना

१७. भजन विष्णु का करना

१८. प्राणी मात्र पर दया रखना

१९. हरे वृक्ष नहीं काटना

२०. अजर को जरना

२१. अपने हाथ से रसोई पकाना

२२. थाट अमर रखना

२३. बैल को बंधिया न करना

२४. अमल नहीं खाना

२५. तम्बाको नहीं खाना व पीना

२६. भांग नहीं पीना

२७. मदपान नहीं करना

२८. मांस नहीं खाना

२९ नीले वस्त्र नहीं धारण करना

बिश्नोई समाज की गोत्र-[संपादित करें]

अग्रवाल्, अडींग्, अभीर् / अहीर् / अहैर्, अडोल्, अवतार्, अहोदिया, अत्रि, अतलि, आंजणा, आमरा, आयस्, आसियां, आनणा, आखा, अखिंड्, इहरामईसराम्), ईसरवा, ईसरवाल्, ईनणिया, ईयारं, ईडंग्, उत्कल्, उमराव्, ऊनिया, ऐचरा, ऐरण्, ऐरब्,ओऊ,ओला, ओदिया (अहोदिया), ओटिया, ओरवा, कडवासरा (कुराडा), कसवझ(कावां),करीर्, कणेंटा, कसबी, कबीरा, कलवाणिया, कलेडिया, कमणीगारा, करड्, कमेडिया, कच्छवाया / कच्छवाई, कश्यप, कालीराण (कल्याणा), काकड्, कालडा, कासणिया, कामटा, कांसल्, कांगडा, किरवाला, कीकरं,खदाब्, खडहड्, खेडी,खोखर,खाट्, खाती, खावा, खारा, खिलेरी, खीचड्, खुडखुडीया, खेरा, खोखर्,खोत्, खोजा, खोड्, गर्ग, गावाल्, गायणा, गाट्,गिल्ला, गुरु, गुजेला (उदावत्), गुरुसर्, गुजर्, गुलेचा, गुप्ता, गुरुड्, गुडल्, गेर्, गेहलोत्, गोदारा (सोनगरा, उदाणी, खिरंगिया, धोलिया, बब्निड्), सिसोदिया, देवडा, गेहलोत्, गोरा, गोयत्, गोयल् (गोभिल्, गोविल, गोहिल्),गोगियां, गोला, गौड्, घणघस्, घ्टियाल्, घांगु, चंदेल्, चमण्डा, छींपा (दरजी), ज्वर्(जौहर्), जांगु, जाखड्, जायल्, जाजुदा, जाणी, जांगडा, झांस, झांग्, झाझडा, झाझण्, झाला, झूरिया, झोधकण (जोधकरन्), झाडा,झोरड्, ट्ण्डन्, टाडा, टांडी (तांडी), टुसिया(टुहिया), टोकसिया, ठकरवा, ठोड्, डबोकिया, डारा, डागा, डागर्, डींगल्, डूडी, डेहला, डेलू, डोगिपाल्, ढल्, ढहिया,ढाका, ढाढरवाल्, ढाढ्णिया, ढिड्, ढूंढिया, ढूकिया (डहूकिया), तल्लीवाला, तरड्, तंवर (तीवंर, तुंवर्, तुअर्, तोमर्) तगा (त्यागी), तांडी, तापास, तायल्, तांडा, तुंदल्, तुरका, तेतरवाल्, तेली,तोड्, थलवट्, थालोड्, थापन्, थोरी, दडक (धडक्), दरजी, दासा, दिलोहया (दुलोलिया)दुगसर्, देहडू, दहिया, देवडा (खेडेवाला), टोहरवाला, मोड्, लोडा, दोतड्, धतरवाल्, धधारी, धारणिया, धायल्, धारिया, धूमर्, नरुका, नकोसिया, नफरी, नाडा, नाइया, नागर्, नाथ, नाई, निरबाण्, नीबीबागा, नेहरा, नैण्, परमार (पंवार्, पवार्, पुवार्, पुआर्), पडियाल (पडिहार्),पठान्, पराशर्, प्यारी, पालडिया, पारस्, पाल्, पाटोदिया, पारिक्, पीथरा, पुरवार् (पुरवाल्, पोरवाल्, पैरवाल्), पुइया, पुष्करणझ(पोहकरण्),पूनिया, पोटलिया, फलावर्, बरड्, बदिता, बडोला, बडएड्, ब्रदाई, बनगर्, बटेसर्, बलावत्,बल्ड्किया, बजाज्, बलोईया, बछियाल्, बलाई, बडोला, बसोयाल्, बंसल्, बदिया, बल्हाकिया, बरुडिया, बाबल्, बाणीछु,बागडिया, बाजरिया, बाडेटा, बाणिया (बनिया), बावरी, बांगडवा, बाना, बाजिया, बाडंग्, बासत्, बागेशु, बाकेला, बानरवाल्(अहिर्), बिछु, बिडासर्, बिलाद्, बिडाल्, बिडग्, बिडियारझ (बिडार्,बिलोनिया, बीलोडिया, बूडिया, भवाल्, भट्ट्, भलूंडिया, भांबू, भादू, भारवर्, भोडर्, भाडेर्,भारद्वाज्, भिलूमिया, भीचर्, भोजावत, भोडिसर्, भोछा, भुरटा, भुरन्ट्, भुट्टा, भूल्, भूश्रण्, मण्डा, मतवाला, महिया, मल्ला, मारत्, मांजू, माल्, माचरा, मालपुआ, मालपुरा, मालीवाल्,माहेश्वरी, मातवा, मान्दु, माई, मांगलिया, मिश्र्, मितल्, मील्, मीठातगा, मुरटा, मुंडेल्, मुदगिल्, मुरिया (मावरिया), मूंढ, मेहला, मेवदा, मोहिल्, मोगा, रशा, रंगा, रघुवंशी, राड् (राहड्),रायल, राव्, रावत्, राठौड्, रणोड्, रिणवा, रुबाबल, खोडा, रोहज्, रोझा, रोड्, लटियाल्, लरियाल्, लाम्बा, लागी, लोल्, लोहमरोड्, लुहार्, वरा, व्यास्, वरासर्, वासनेय्, वात्सलय्, विलाला, विसु, सराक्, सरावक्, सहू (साहू,सोहू), सदु, सगर्, साई, सांवक्, सहारण(सारन्), सांखल्(सागर्), सारस्वत्, साबण्(शाबण्), सियाक् (सियाख, सियाग्, सिहाग्), सिसोदिया (सागर्), सिंगल (सिंगला, सिंघल्, सिंहला), सिंवर्, सिंवल् (सिंयोल), सिवरखिया, सिरडक्, सिरोडिया, सिंधल् (राठोड्),सिरडिया, सीलक्, सीगड्, सुथार् (खाती, जांगडा, बढई, तरवान्), सुनार, सूर्, सेरडिया, सेवदा, सेहर् (शेर्), सेधो (सेथो), सेंगडा, सोढा, सोलंकी, सोनक् (सुनार्), शांक, शाह, शाण्ड्लय्, शिव्, श्रीमाली, शिढोला, हरडू, हरीजा, हाडा (उदावत्, बलावत्, भोजावत्), हरिया, हरिवासिया, हुमडा, हुड्डा। गोदारा, बेहनीवाल् (बिणयाल् लोल्, मांजू, बेरवाल्, पंवार्, खोखर्, टोकसिया, जाणी, तेतरवाल्, नैण्, गर्ग्, सहू, पूनिया, चैहान।बांगडिया (बागंडवा), चौहान् (चवाण्), लटियाल्, सिंवल, सियोल्, सिंवर्, गूजर गौड्, बांवरा, अग्रवाल्, दडक्, तंवर् (तीवंर्), पंवार् (पुआर्), सोढा, पण्ड्वालिया (पवाडिया) । चांगडा, पाटोदिया, सीलक् (छटिया), देहिया, भुरटा, जाला, झांस, लूदरिया, लुहार्, धामु, गुजर, पंवार कुलहडिया। चौहान् (शाण्डलय्), थापन् (चौहान्, सहू), बाघेला, राठौड्, देवडा (मोड्, लोडा, खेडेवाला, टोडरवाला), सिसोदिया (सागर्), चन्देल्, हाडा(भोजावत्, उदावत, बलावत्), मोहिल्, पंवार्, गुजेला, सांखला (एयर)। नोटःथापन गोत्र्,गायणा गोत्र्,सुथार गोत्र तथा दनगर पूर्बिया (पुर) गोत्र्-सभी को गोतों की व्रुहद सूची में भी सम्मिलित हुआ है। जाट(८० प्रतिशत्), अग्रवाल् (बनिया), राजपूत्, ब्राम्हण्, कुरमी, अहीर्, सुथार (खाती, जांगडा, बढई, तरखाना), सुनार्, नाई, तेली, गायणा, दनगर पूर्बिया (पुर्), गुजर्, गुप्ता (वंश्), छिंपा (दरजी), तगा (त्यागी), माहेश्वरी, कसबी, बेहडा, जुलाहा (बुनगर्, बेजरा), पुष्पकरणा(पोहकरणा), बजाज्, बाणिया (बनिया), सारस्वत्, श्रीमाली (संदीप डेलू मेहराणा )


समाज की स्थापना[संपादित करें]

बिश्नोई धर्म का प्रवर्तन (सम्वत् 1542)

                        सम्वत् 1542 तक जाम्भोजी की कीर्ति चारों और फेल गई और अनेक लोग उनके पास आने लगे व सत्संग का लाभ उठाने लगे। इसी साल राजस्थान में भयंकर अकाल पड़ा। इस विकट स्थिति में जाम्भोजी महाराज ने अकाल पीडि़तों की अन्न व धन्न से भरपूर सहायता की। जो लोग संभराथल पर सहायत हेतु उनके पास आते, जांभोजी महाराज अपने अखूठ (अकूत) भण्डार से लोगों को अन्न धन्न देते। जितने भी लोग उनके पास आते, वे सब अपनी जरूरत अनुसार अन्न जले जाते। सम्वत् 1542 की कार्तिक बदी 8 को जांभोजी महाराज ने एक विराट यज्ञ का आयोजन सम्भराथल धोरे पर किया, जिसमें सभी जाति व वर्ग के असंख्य लोग शामिल हुए। गुरू जाम्भोजी महाराज ने इसी दिन कार्तिक बदी 8 को सम्भराल पर स्नान कर हाथ में माला औरमुख से जप करते हुए कलश-स्थापन कर पाहल (अभिमंत्रित जल) बनाया और 29 नियमों की दीक्षा एवं पाहल देकर बिश्नोई धर्म की स्थापना की।  इस विषय में कवि सुरजनजी पूनियां लिखते हैं-
                     करिमाला मुख जाप करि, सोह मेटियो कुथानं।
                            पहली कलस परठियौ, सझय ब्रह्मांण सिनान।।

उस समय लोगों ने गुरु महाराज द्वारा स्थापित इस नवीन सम्प्रदाय के प्रति विशेष उत्साह दिखाया था। लोगों के समूह के समूह आकर पाहल ग्रहण करके दीक्षित होने लगे थे। हजूरी कवि समसदीन ने एक साखी में संभराथल पर दीक्षित होने आते हुए लोगों का वर्णन इस प्रकार किया है-

                     हंसातो हंदीवीरां टोली रे आवै, सरवर करण सनेहा।
                     जारी तो पाहलि वीरा पातिक रे नासे, लहियो मोमण एहा।

कवि उदोजी नैण के अनुसार यह उत्तम पंथ है। यदि जांभोजी बिश्नोई पंथ नहीं चलाते तो पृथ्वी पाप में डूब जाती-

                     नीच थका उत्तिम किया, न्यानं खडग़ नाव अती।
                     उत्तिम पंथ चलावियो उदा, प्रथी पातिंगा डूबती।।

एक अज्ञात साखीकार ने इसे 'सहज पंथÓ कहा है-

                     कलिकाल वेद अर्थवण, सहज पंथ चलावियो।
                     संभराथल जोत जागी, जग विणण आवियो।ÓÓ

जाम्भोजी से पाहल लेकर सर्वप्रथम बिश्नोई बनने वालों में पूल्होजी पंवार थे। ये 29 नियम बिश्नोई समाज की आचार संहिता है। बिश्नोई समाज आज तक इन नियमों का पूरी दृढ़ता से पालन करता आ रहा है। बिश्नोई बनाने का यह कार्य अष्टमी से लेकर कार्तिक अमावस (दीपावली) तक निरंतर चलता रहा। महात्मा साहबरामजी ने जम्भसार के आठवें प्रकरण में लिखा है-

                     आदि अष्टमी अंत अमावस च्यार वरण को किया तपावस।
                     दीपावली कै प्रात: ही काला बारहि कोड़ कटे जमजाला।।

इस प्रकार सभी जाति, वर्ण व धर्म के लोगों द्वारा पाहल लेकर बिश्नोई बनने की प्रक्रिया शुरू हुई और बिश्नोई धर्म का प्रवर्तन हुआ। जाम्भोजी महाराज का भ्रमण व्यापक था। उन्होनें भारत के लगभग सभी प्रदेशों का भ्रमण किया। भारत के बाहर भी लंका, काबुल, कंधार, ईरान व मक्का तक जाने की बात भी कही जाती है। उन्होनें अपने एक सबद (शुक्ल हंस संख्या 63) में कई स्थानों पर जाने का वर्णन किया है। उनकी वाणी व उनके महान व्यक्तितत्व का प्रभाव सभी लोगों पर पड़ा, जिनमें राज वर्ग, साधु संत और गृहस्थी भी थे। बिश्नोई धर्म में लोगों के शामिल होने के कई प्रधान कारण थे जैसे- 1. जाम्भोजी का महिमामय व्यक्तित्व 2. परोपकारी वृति 3. ज्ञानोपदेश 4. जिज्ञासा और शंका का समाधान 5. सम्प्रदाय की श्रेष्ठता 6. कार्य विशेष की सिद्धि 7. जीव दया (अंहिसा) एवं हरे वृक्षों को न काटना,आदि-आदि। (संदीप डेलू मेहराणा)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]