गुरु जम्भेश्वर

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Report by= Ramniwas bishnoiबड़ा पाठ

गुरु जम्भेश्वर
जन्म १४५१
पीपासर ,राजस्थान भारत
मृत्यु १५३६
व्यवसाय धर्मगुरु ,पर्यावरणवादी
प्रसिद्धि कारण बिश्नोई समुदाय के स्थापक
मार्बल से बना गुरु जम्भेश्वर का मन्दिर मुकाम ,राजस्थान ,भारत

श्री जम्भेश्वर गुरु जिनका जन्म राजस्थान के पीपासर गांव में १४५१ में हुआ था। ये जाम्भोजी के नाम से भी जाने जाते है साथ ही बिश्नोई संप्रदाय के स्थापक भी है। जाम्भोजी हरी नाम का वाचन किया करते थे हरी जो कि भगवान विष्णु का एक नाम हैं। गुरु जम्भेश्वर ये मानते थे कि हर जगह भगवान है तथा ये हमेशा पेड़ पौधों की तथा जानवरों की रक्षा करते थे।

गुरु जम्भेश्वर भगवान के बारे में[संपादित करें]

जाम्भोजी बिश्नोई संप्रदाय के निर्मात्री थे , इन्होंने समराथल धोरा पर भारतीय पंचाग के हिसाब से कार्तिक माह में ८ दिन तक बैठ कर तपस्या की थी। जाम्भोजी का जन्म एक [1] राजपूत वंश के पंवार जाति के परिवार में १४५१ में हुआ था , इनके पिताजी का नाम लोहट जी पंवार था तथा माता का नाम हंसा देवी था ये अपने माता-पिता की अकेली संतान थे। जाम्भोजी अपने जीवन के शुरुआती ७ वर्षों तक कुछ भी नहीं बोले थे तथा न ही उनके चेहरे पर हंसी रहती थीं। इन्होंने अपने २७ वर्ष तक गायें चराते रहे। गुरु जम्भेश्वर भगवान ने ३४ वर्षों की आयु में [2]बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना की थी। इन्होंने अपनी शिक्षा में शब्दवाणी सीखी थी , इन्होंने अपने अगले ५१ सालों में पूरे देश में भ्रमण कर लिया था। वर्तमान में शब्दवाणी में सिर्फ १२० शबद ही है। बिश्नोई समाज के लोग २९ धर्मादेश (नियमों) का पालन करते है [3] समाज के लोगों के अनुसार ये धर्मादेश गुरु जम्भेश्वर ने ही बनाये थे। इन २९ नियमों में से ८ नियम जैविकवैविध्य तथा जानवरों की रक्षा के लिए है , ७ धर्मादेश समाज कि रक्षा के लिए है। इनके अलावा १० उपदेश खुद की सलामती और अच्छा स्वास्थ्य के लिए है और बाकी के चार धर्मादेश रोजाना [4]भगवान को याद करना और पूजा-पाठ करना। बिश्नोई समाज के लिए हर साल मुकाम या मुक्तिधाम मुकाम में मेला भरता है जहां हज़ारों की संख्या में बिश्नोई समुदाय के लोग आते हैं। गुरु जी ने जिस बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना की थी उस 'बिश' का मतलब २० और 'नोई' का [5] मतलब ९ होता है इनको मिलाने पर २९ होते है बिश-नोई+बिश्नोई/२९। बिश्नोई संप्रदाय के लोग खेजड़ी (Prosopic cineraria) को अपनी पवित्र पेड़ मानते हैं।

जीवन[संपादित करें]

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान (जाम्भोजी) का जन्म राजस्थान के नागौर ज़िले के पीपासर गांव में १४५१ कृष्ण पक्ष के आठवें दिन एक राजपूत क्षत्रिय परिवार में हुआ था। भगवान कृष्ण का भी जन्म उसी तिथि को हुआ था। इनके बूढ़े पिता लोहट जी की ५० वर्षों तक कोई संतान नहीं थीं इस कारण वे दुखी थे। जाम्भोजी ने अपने जन्म के बाद अपनी माँ का दूध भी नहीं पिया था। साथ ही ७ सालों तक कुछ नहीं बोल पाये थे। जाम्भोजी ने अपना पहला शब्द (गुरु चिंहो गुरु चिन्ह पुरोहित) बोला था और अपनी मूकता तोड़ी थी। जम्भ देव सादा जीवन वाले थे लेकिन काफी प्रतिभाशाली थे साथ अकेला रहना पसंद करते थे। इन्हें शादी करना पसंद नहीं था अपितु गायों का [6] चराना अच्छा लगता था। ३४ वर्ष की आयु में समराथल धोरा नामक जगह पर उपदेश देने शुरू किये थे। ये समाज कल्याण की हमेशा अच्छी सोच रखते थे तथा हर दुःखी की मदद किया करते थे। मालवा में १४८५ में अकाल पड़ने के कारण वहां के लोगों को तथा अपने जानवरों को लेकर जाना पड़ा था , इससे जाम्भोजी बहुत दुःखी हुए। फिर जाम्भोजी ने उन दुःखी किसानों को वहीं पर रुकने को कहा ; और कहा मैं आप कइ सहायता करूँगा। इसी बीच गुरु जम्भदेव ने दैवीय शक्ति से सभी को खाने पीने तथा कृषि करने के यंत्रों की सहायता की। हिन्दू धर्म के अनुसार वो काल निराशाजनक काल कहलाया था। उस वक़्त यहां पर आम जनों को बाहरी आक्रमणकारियों का बहुत डर था साथ ही ये हिन्दू लोग विभिन्न देवी देवताओं की पूजा करते थे। दुःखी लोगों की सहायता हेतु गुरु जम्भेश्वर ने १४८५ में बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना की।

शिक्षा[संपादित करें]

जाम्भोजी ने अपनी शिक्षा में काव्य शब्दवाणी सीखी थीं जिसमें वर्तमान में सिर्फ़ १२० शब्दों का ज्ञान है। शब्दवाणी में सम्पूर्ण बिश्नोई के बारे में ज्ञान है। गुरु जम्भेश्वर ने २९ धर्मोपदेश दिए थे।

बिश्नोई समुदाय[संपादित करें]

बिश्नोई हिन्दू धर्म का एक व्यवहारिक एवं सादे विचार वाला समुदाय है ; इसकी स्थापना गुरु जम्भेश्वर भगवान ने १४८५ में की थी। बिश्नोई जो २९ (बिश+नोई) धर्मादेशों पर आधारित है। बिश्नोई समाज के लोग हिरण को अपना सगा संबधी जैसा मानते है तथा उनकी रक्षा करते है रक्षा करते-करते कई शहिद भी हुए है। इनके अलावा प्रकृति प्रेमी भी है।

खेजड़ली का बलिदान[संपादित करें]

खेजड़ली एक गांव है जो राजस्थान के जोधपुर ज़िले में स्थित है यह दक्षिण-पूर्व से जोधपुर शहर से २६ किलोमीटर दूर है। खेजड़ली गांव का नाम खेजड़ी (Prosopic cineraria) पर रखा गया। सन १७३० में इस गांव में खेजड़ी को बचाने के लिए अमृता देवी तथा कुल ३६३ बिश्नोई लोगों ने बलिदान दिया था। यह चिपको आंदोलन की पहली घटना थीं जिसमें पेड़ों की रक्षा के लिए अपना बलिदान देना पड़ा था।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

श्री जम्भेश्वर जी परिचय

बिश्नोई समाज की स्थापना

खेजड़ली शहादत

बिश्नोई समाज का जालघर