नाथ सम्प्रदाय

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नवनाथ

नाथ संप्रदाय भारत का एक धार्मिक पंथ है। इसके आराध्य शिव हैं प्राय इन्हे शिव के वंसज भी कहा जाता है। यह हठ योग की साधना पद्धती पर आधारित पंथ है। इसके संस्थापक गुरु मछँदर नाथ /मत्स्येन्द्र नाथ है। नाथ सम्प्रदाय समस्त देश में बिखरा हुआ था जिसे जगत गुरुश्री श्री १००८ गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। भारत में नाथ संप्रदाय को सन्यासी, योगी, जोगी, नाथ,अवधूत, कौल, गोस्वामी,गोसाई आदि नामों से जाना जाता है।नाथ सम्प्रदाय जिसे अधिकतर जोगी नाम से जाना जाता है इस पंथ के मुख्य माने गए है। जोगी हिन्दुओ के अलावा मुस्लिम ,जैन,सिख व बौद्धिष्ट में पाए जाते है। जिससे सिद्ध होता है की गुरु गोरख नाथ के अनुयाई समस्त विश्व व लगभग सभी धर्म में है।

जीवन शैली[संपादित करें]

नाथ साधु-संत परिव्राजक होते हैं। वे भगवा रंग के बिना सिले कपडे धारण करते हैं। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं। उनके एक हाथ में चिमटा, दुसरे हाथ में कमंडल, दोनों कानों में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यानमग्न रहना और इनकी प्रधान वेश-भूषा भगवा है। वे नाथपंथी भजन गाते हुए घूमते हैं औ्रर भिक्षाटन कर जीवन यापन करते हैं। उम्र के अंतिम चरण में वे किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं। कुछ नाथ साधक हिमालय की गुफाओं में चले जाते हैं।इसके इलावा नाथ सम्प्रदाय में गृहस्थ जोगी भी होते है। जिन्होंने जगह -जगह पे गुरु गोरख नाथ के मंदिर बनाये है और उनकी पूजा अर्चना करते है। ये किसी भी प्रकार के वस्त्र धारण कर सकते है क्योकि इनको आम जन की भलाई के लिए जनता के बिच में रहना होता है। इसलिए जोगी सम्प्रदाय जिसे हम नाथ सम्प्रदाय भी कहते है। एक गृहस्थ जोगी उतना ही जोगी माना गया है जितना एक तपस्या करने वाला साधु। नाथ सम्प्रदाय के सभी महत्वपूर्ण निर्णय में एक गृहस्थ जोगी का होना जरुरी होता है। क्योकि नाथ सम्प्रदाय की पहचान सिर्फ जोगी ही होता है। इसलिए नाथ सम्प्रदाय के हरेक फैसले में गृहस्थ जोगी का होना अति आवश्यक है। हलाकि गृहस्थ जोगी का पे ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है की वो भगवा घारण नहीं कर सकता। अपितु वह किसी भी समय भगवा धारण कर सकता है व जोगी के किसी भी बच्चे के जन्म के समय उसे भगवा कपडे में ही लपेटा जाता है व मृत्यु के बाद भी समाधी या चिता पे भी भगवा वस्त्र होता है। इसीलिए जोगी का कोई भी बच्चा गृहस्थ होते हुए भी भगवा वस्त्र धारण कर सकते है। भगवा वस्त्र ही जोगी /नाथ सम्प्रदाय की मुख्य पहचान है। नाथ को समाज नहीं सम्पृदाय कहा गया है क्योंकि इसमे हर व्यक्ति को शामिल किया जाता है।

साधना-पद्धति[संपादित करें]

इस पंथ के लोगो को प्राय शिव के वंसज माना जाता है । वे शिव को अलख (अलक्ष) नाम से संबोधित करते हैं। ये अभिवादन के लिए 'आदेश' या आदीश शब्द का प्रयोग करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या 'परम पुरुष' होता है। ज्जिनके गुरु शिव के बाद मछँदर नाथ और उसके बाद गोरखनाथ व नो नाथ हुए है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतिधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में जोगी समाज का माना जाता है। जोगी समाज को मुख्यतः कई नमो से जाना जातजा जय जिसमे योगी , गोस्वामी, उपाध्याय, रावल ,गिरी,पूरी, नाथ बाबा जी नमो से जाना जाता है। इन्हें उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है।

इन्हीं से आगे चलकर चौरासी और नवनाथ माने गए जो निम्न हैं:-

प्रारम्भिक दस नाथ[संपादित करें]

आदिनाथ, आनंदिनाथ, करालानाथ, विकरालानाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूतनाथ, वीरनाथ और श्रीकांथनाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ, वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुन नाथ।

नौ नाथ और चौरासी सिद्ध परम्परा[संपादित करें]

आठवी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के महायान के वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे। सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे। उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है।

नौ नाथ गुरु :
1. मच्छेंद्रनाथ
2. गोरखनाथ
3.जालंदरनाथ
4.नागेशनाथ
5.भर्तरीनाथ
6.चर्पटीनाथ
7.कानीफनाथ
8.गहनीनाथ
9.रेवननाथ

इसके अलावा ये भी हैं: 1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3. गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ 8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ 12.रामचंद्रनाथ।

ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ, दादाधूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और साईं बाबा को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। और विशेष इन्हे योगी भी कहते और जोगी भी कहा जाता हैं। देवो के देव महादेव जी स्वयं शिव जी ने नवनाथो को खुद का नाम जोगी दिया हैं। इन्हें तो नाथो के नाथ नवनाथ भी कहा जाता हैं।

सन्यास‌‌‍ दीक्षा[संपादित करें]

नाथ संप्रदाय में किसी भी प्रकार का भेद-भाव आदि काल से नहीं रहा है। इस संप्रदाय को किसी भी जाति, वर्ण व किसी भी उम्र में अपनाया जा सकता है।सन्यासी का अर्थ काम ,क्रोध , मोह ,लोभ आदि बुराईयों का त्याग कर समस्त संसार से मोह छोड़ कर शिव भक्ति में समाधी लगाकर लीन होना बताया जाता है।प्राचीन काल में राजे -महाराजे भी अपना राज-पाठ छोड़ सन्यास इसी लिए लिया करते थे ताकि वे अपना बचा हुआ जीवन सांसारिक परेशानियों को त्याग कर साधुओ की तरह साधारण जीवन बिताते थे। नाथ संप्रदाय को अपनाने के बाद 7 से 12 साल की कठोर तपस्या के बाद ही सन्यासी को दीक्षा दि जाती थी। विशेष परिस्तिथियों में गुरु अनुसार कभी भी दीक्षा दि जा सकती है‍‌‍‍‍‍‍। दीक्षा देने से पहले वा बाद में दीक्षा पाने वाले को उम्र भर कठोर नियमो का पालन करना होता है। वो कभी किसी राजा के दरबार में पद प्राप्त नहीं कर सकता , वो कभी किसी राज दरबार में या राज घराने में भोजन नहीं कर सकता परन्तु राज दरबार वा राजा से भिक्षा जरुर प्राप्त कर सकता है। उसे बिना सिले भगवा वस्त्र धारण करने होते है ।हर साँस के साथ मन में आदेश शब्द का जाप करना होता है था किसी अन्य नाथ का अभिवादन भी आदेश शब्द से ही करना होता है । सन्यासी योग व जड़ी- बूटी से किसी का रोग ठीक कर सकता है पर एवज में वो रोगी या उसके परिवार से भिक्षा में सिर्फ अनाज या भगवा वस्त्र ही ले सकता है। वह रोग को ठीक करने की एवज में किसी भी प्रकार के आभूषण , मुद्रा आदि ना ले सकता हैऔर न इनका संचय कर सकता। सांसारिक मोह को त्यागना पड़ता है दीक्षा देने के बाद सन्यासी ,जोगी , बाबा के दोनों कानों में छेड़ किये जाते है और उनमे गुरु द्वारा ही कुण्डल डाले जाते है । जिन्हें धारण करने के बाद निकला नहीं जा सकता।बिना कुण्डल के किसी को योगी ,जोगी ,बाबा, सन्यासी नहीं माना जा सकता ऐसा सन्यासी जोगी जरुर होता है परन्तु उसे गुरु द्वारा दीक्षा नहीं दि गई होती। इसलिए उन्हें अर्ध सन्यासी के रूप मे माना जाता है।

पूजा -पाठ /योग[संपादित करें]

यदि कोई भी गुरु गोरख नाथ की पूजा करता है तो उसे गोरख चालीसा का पाठ नियमित ४० दिन करना चाहिए। इसके इलावा नाथ सम्प्रदाय में गुरु गोरख नाथ की पूजा के दौरान ६४ योगिनी माता एवं ५६ कलवे भार की आराधना मुख्य तोर पे होती है। सिर्फ गोरखनाथ के उपासक ही ६४ योगिनी माता की सिद्धि प्राप्त कर सकता है। जो मात्र ४० दिन में हो सकती है।

इन चौसठ योगिनियों के नाम क्रम से इस प्रकार है –[संपादित करें]

(1) बहुरूपा

(2) तारा

(3) नर्मदा

(4) यमुना

(5) शांति

(6) वारुणी

(7) क्षेमकरी

(8) ऐन्द्री

(9) वाराही

(10) रणवीरा

(11) वानरमुखी

(12) वैष्णवी

(13) कालरात्रि

(14) वैद्यरूपा

(15) चर्चिका

(16) बेताली

(17) छिन्नमस्तिका

(18) वृषवाहन

(19) ज्वाला कामिनी

(20) घटवारा

(21) करकाली

(22) सरस्वती

(23) बिरूपा

(24) कौवेरी

(25) भालुका

(26) नारसिंही

(27) बिराजा

(28) विकटानन

(29) महालक्ष्मी

(30) कौमारी

(31) महामाया

(32) रति

(33) करकरी

(34) सर्पश्या

(35) यक्षिणी

(36) विनायकी

(37) विंध्यवासिनी

(38) वीरकुमारी

(39) माहेश्वरी

(40) अम्बिका

(41) कामायनी

(42) घटाबरी

(43) स्तुति

(44) काली

(45) उमा

(46) नारायणी

(47) समुद्रा

(48) ब्राह्मी

(49) ज्वालामुखी

(50) आग्नेयी

(51) अदिति

(52) चन्द्रकान्ति

(53) वायुवेगा

(54) चामुण्डा

(55) मूर्ति

(56) गंगा

(57) धूमावती

(58) गांधारी

(59) सर्व मंगला

(60) अजिता

(61) सूर्यपुत्री

(62) वायु वीणा

(63) अघोर

(64) भद्रकाली।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]