बद्रीनाथ मन्दिर

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(बद्रीनाथ से अनुप्रेषित)
Jump to navigation Jump to search
बद्रीनाथ मन्दिर

बद्रीनाथ मन्दिर का प्रवेश द्वार
बद्रीनाथ मन्दिर स्थित है उत्तराखंड
बद्रीनाथ मन्दिर
बद्रीनाथ मन्दिर
उत्तराखण्ड में स्थिति
नाम
मुख्य नाम: बद्रीनाथ
स्थान
देश: भारत
राज्य: उत्तराखण्ड
जिला: चमोली
स्थिति: बद्रीनाथ
निर्देशांक: 30°44′41″N 79°29′28″E / 30.744695°N 79.491175°E / 30.744695; 79.491175निर्देशांक: 30°44′41″N 79°29′28″E / 30.744695°N 79.491175°E / 30.744695; 79.491175
इतिहास
सृजनकर्त्ता: आदि शंकराचार्य

बद्रीनाथ मन्दिर , जिसे बद्रीनारायण मन्दिर भी कहा जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित एक हिन्दू मन्दिर है। यह उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जनपद में अलकनन्दा नदी के तट पर स्थित है। मन्दिर के नाम पर ही इसके इर्द-गिर्द बसे नगर को भी बद्रीनाथ ही कहा जाता है। बद्रीनाथ मन्दिर गढ़वाल क्षेत्र की ऊँची पहाड़ियों में समुद्र तल से ३,१३३ मीटर (१०,२७९ फ़ीट) की ऊंचाई पर स्थित है। हिमालयी क्षेत्र के अत्यधिक कठोर मौसम की वजह से यह मन्दिर प्रत्येक वर्ष केवल छह महीने (अप्रैल के अंत से लेकर नवम्बर की शुरुआत तक) के लिए ही खुला रहता है। बद्रीनाथ भारत के सबसे व्यस्त तीर्थस्थानों में एक है; २०१२ में यहाँ लगभग १०,६०,००० तीर्थयात्री दर्ज किये गए थे।

मन्दिर में भगवान विष्णु के एक रूप "बद्रीनारायण" की पूजा होती है। यहाँ उनकी १ मीटर (३.३ फीट) लंबी शालिग्राम की मूर्ति है, जिसे कि, मान्यतानुसार, आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में नारद कुण्ड से निकालकर स्थापित किया था। इस मूर्ति को कई हिंदुओं द्वारा विष्णु के आठ स्वयं व्यक्त क्षेत्रों (स्वयं प्रकट हुई प्रतिमाओं) में से एक माना जाता है। बद्रीनाथ मंदिर को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार अधिनियम संख्या ३०/१९४८ में मन्दिर अधिनियम संख्या १६/१९३९ के तहत शामिल किया गया था, जिसे बाद में "श्री बद्रीनाथ तथा श्री केदारनाथ मंदिर अधिनियम" के नाम से जाना जाने लगा। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा नामित एक सत्रह सदस्यीय समिति इन दोनों मन्दिरों को प्रशासित करती है।

विष्णु पुराण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण जैसे कई प्राचीन ग्रन्थों में इस मन्दिर का उल्लेख मिलता है। आठवीं शती से पहले आलवार सन्तों द्वारा रचित नालयिर दिव्य प्रबन्ध में भी इसकी महिमा का वर्णन है।

बद्रीनाथ हिन्दुओं के चार धाम में से एक धाम भी है। ऋषिकेश से यह २९४ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।[1]

नामकरण[संपादित करें]

हिमालय में स्थित बद्रीनाथ क्षेत्र भिन्न-भिन्न कालों में अलग नामों से प्रचलित रहा है। स्कन्दपुराण में बद्री क्षेत्र को "मुक्तिप्रदा" के नाम से उल्लेखित किया गया है,[2] जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सत युग में यही इस क्षेत्र का नाम था। त्रेता युग में भगवान नारायण के इस क्षेत्र को "योग सिद्ध", और फिर द्वापर युग में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के कारण इसे "मणिभद्र आश्रम" या "विशाला तीर्थ" कहा गया है।[2] कलियुग में इस धाम को "बद्रिकाश्रम" अथवा "बद्रीनाथ" के नाम से जाना जाता है। स्थान का यह नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले बद्री (बेर) के वृक्षों के कारण पड़ा था।[2] एडविन टी॰ एटकिंसन ने अपनी पुस्तक, "द हिमालयन गजेटियर" में इस बात का उल्लेख किया है कि इस स्थान पर पहले बद्री के घने वन पाए जाते थे, हालाँकि अब उनका कोई निशान तक नहीं बचा है।[3]

बद्रीनाथ नाम की उत्पत्ति पर एक कथा भी प्रचलित है, जो इस प्रकार है - जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं।[4] माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि

"हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ-बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा।"[5]

इस तरह से भगवान विष्णु का, तथा उनके नाम पर ही इस मन्दिर का भी नाम बद्रीनाथ पड़ा।

पौराणिक कथाएं[संपादित करें]

इस संदूक को: देखें  संवाद  संपादन

वैदिक धर्म
पर एक श्रेणी का भाग

Om
इतिहास · ईश्वर
वैदिक ऋषि  · बुद्ध
दर्शनशास्त्र
पुनर्जन्म · आत्मा

मोक्ष

कर्मयोग  · ज्ञानयोग  · [[ ]] आर्यसत्य
दर्शन · धर्म
आत्मा  ·योग
मानवता  · आयुर्वेद
 ·
भजन
ग्रंन्थ
वेदसंहिता · सत्यार्थ
सम्बन्धित विषय
धर्म ·
विश्व में हिन्दू धर्म
गुरु · मन्दिर देवस्थान
यज्ञ  · भजन

ध्यान योग

शब्दकोष · हिन्दू पर्व
विग्रह
प्रवेशद्वार: हिन्दू धर्म

HinduSwastika.svg

हिन्दू मापन प्रणाली

शिव धाम[संपादित करें]

पौराणिक कथाओं और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार यहाँ नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था। भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया। उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के समीप) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे। उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा।[6] फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से सर्वविदित है।

नर तथा नारायण[संपादित करें]

नर और नारायण ने यहां कई वर्षों तक तपस्या की थी। यह भी माना जाता है कि उन्होंने अगले जन्म में क्रमशः अर्जुन तथा कृष्ण के रूप में जन्म लिया था।[7]

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह बारह धाराओं में बंट गई।[8] इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मन्दिर ३,१३३ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में २७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बदरीनाथ शिखर कि ऊँचाई ७,१३८ मीटर है। बदरीनाथ में एक मन्दिर है, जिसमें बदरीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह २,००० वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।

बदरीनाथ उत्तर दिशा में हिमालय की उपत्यका में अवस्थित हिन्दुओं का मुख्य यात्राधाम माना जाता है। मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ-स्थल है। प्रत्येक हिन्दू की यह कामना होती है कि वह बदरीनाथ का दर्शन एक बार अवश्य ही करे। यहाँ पर शीत के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त ही कठिन है। अलकनन्दा के तो दर्शन ही किये जाते हैं। यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं। यहाँ वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

मान्यता है कि इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा का शांति के लिए पिंडदान करते हैं।[9] यह भी माना जाता है कि व्यास जी ने महाभारत इसी जगह पर लिखी थी।[10]

बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।[11]

इतिहास[संपादित करें]

मन्दिर के बारे में कोई ऐतिहासिक अभिलेख तो प्राप्त नहीं होते हैं, किन्तु वैदिक ग्रंथों में (लगभग १७५०-५०० ईपू) यहाँ के प्रधान देवता, बद्रीनाथ का उल्लेख अवश्य मिलता है।[12] कुछ स्त्रोतों के अनुसार, यह मन्दिर आठवीं शताब्दी तक एक बौद्ध मठ था, जिसे आदि शंकराचार्य ने एक हिन्दू मन्दिर में परिवर्तित कर दिया।[13][14] इस तर्क के पीछे मन्दिर की वास्तुकला एक प्रमुख कारण है, जो किसी बौद्ध विहार (मन्दिर) के सामान है; इसका चमकीला तथा चित्रित मुख-भाग भी किसी बौद्ध मन्दिर के समान ही प्रतीत होता है।[15] अन्य स्त्रोत बताते हैं कि इस मन्दिर को नौवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा एक तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया गया था। एक अन्य मान्यता यह भी है कि शंकराचार्य छः वर्षों तक (८१४ से ८२० तक) इसी स्थान पर रहे थे। इस स्थान में अपने निवास के दौरान वह छह महीने के लिए बद्रीनाथ में, और फिर शेष वर्ष केदारनाथ में रहते थे। हिंदू अनुयायियों का कहना है कि उन्होंने ही अलकनंदा नदी में से बद्रीनाथ की एक मूर्ति की खोज की, और इसे तप्त कुंड नामक गर्म चश्मे के पास स्थित एक गुफा में स्थापित किया।[16][17]

एक पारंपरिक कहानी के अनुसार शंकराचार्य ने परमार शासक राजा कनक पाल की सहायता से इस क्षेत्र से सभी बौद्धों को निष्कासित कर दिया था।[18] इसके बाद कनकपाल, और उनके उत्तराधिकारियों ने ही इस मन्दिर की प्रबन्ध व्यवस्था संभाली। गढ़वाल के राजाओं ने मन्दिर प्रबन्धन के खर्चों को पूरा करने के लिए ग्रामों के एक समूह (गूंठ) की स्थापना की। इसके अतिरिक्त मन्दिर की ओर आने वाले रास्ते पर भी कई ग्राम बसाये गए, जिनसे हुई आय का उपयोग तीर्थयात्रियों के खाने और ठहरने की व्यवस्था करने के लिए किया जाता था।[18] समय के साथ-साथ, परमार शासकों ने "बोलांद बद्रीनाथ" नाम अपना लिया, जिसका अर्थ बोलते हुए बद्रीनाथ है। उनका एक अन्य नाम "श्री १०८ बद्रीश्चारायपरायण गढ़राज महिमहेन्द्र, धर्मवैभव, धर्मरक्षक शिरोमणि" भी था।[18] इस समय तक गढ़वाल राज्य के सिंहासन को "बद्रीनाथ की गद्दी" कहा जाने लगा था, और मन्दिर में जाने से पहले भक्त राजा को श्रद्धा अर्पित करते थे। यह प्रथा उन्नीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध तक जारी रही।[18] सोलहवीं शताब्दी में गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने बद्रीनाथ मूर्ति को गुफा से लाकर वर्तमान मन्दिर में स्थापित किया।[16] मंदिर के बन जाने के बाद इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई ने यहां स्वर्ण कलश छत्री चढ़ाई थी।[19] बीसवीं शताब्दी में जब गढ़वाल राज्य को दो भागों में बांटा गया, तो बद्रीनाथ मन्दिर ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया; हालाँकि मन्दिर की प्रबंधन समिति का अध्यक्ष तब भी गढ़वाल का राजा ही होता था।[18]

मन्दिर की आयु, और क्षेत्र में निरन्तर आने वाले हिमस्खलनों के कारण होने वाली क्षति के फलस्वरूप मंदिर का कई बार नवीनीकरण हुआ है। सत्रहवीं शताब्दी में गढ़वाल के राजाओं द्वारा मन्दिर का विस्तार करवाया गया था। १८०३ में इस हिमालयी क्षेत्र में आये एक भूकम्प ने मन्दिर को भारी क्षति पहुंचाई थी, जिसके बाद यह मन्दिर जयपुर के राजा द्वारा पुनर्निर्मित करवाया गया था।[15] निर्माण कार्य १८७० के दशक के अंत तक चल ही रहे थे,[20] हालाँकि यह मन्दिर प्रथम विश्व युद्ध के समय तक बनकर पूरी तरह से तैयार हो गया था।[21] इस समय तक मन्दिर के आस पास एक छोटा सा नगर भी बसने लगा था, जिसमें मंदिर के कर्मचारियों के आवास के रूप में २० झोपड़ियां थी।[21] तब तीर्थयात्रियों की संख्या आमतौर पर सात से दस हजार के बीच रहती थी, हालाँकि प्रत्येक बारह वर्षों में आने वाले कुम्भ मेल्डे त्यौहार के समय इन आगंतुकों की संख्या ५०,००० तक बढ़ जाती थी।[20] मन्दिर को विभिन्न राजाओं द्वारा दान दिए गए कई ग्रामों से भी राजस्व प्राप्ति होती थी। २००६ में राज्य सरकार ने अवैध अतिक्रमण पर रोक लगाने के लिए बद्रीनाथ के आसपास के क्षेत्र को नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित कर दिया।[22]

स्थिति[संपादित करें]

बद्रीनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे गढ़वाल पहाड़ियों में स्थित है। समुद्र तल से इसकी औसत ऊंचाई ३,१३३ मीटर (१०,२७९ फीट) है।[23][24] मंदिर के ठीक सामने नर पर्वत, जबकि नीलाकण्ठ शिखर के पीछे नारायण पर्वत स्थित है।[12]

मंदिर के ठीक नीचे तप्त कुण्ड नामक गर्म चश्मा है। सल्फर युक्त पानी के इस चश्मे को औषधीय माना जाता है; कई तीर्थयात्री मंदिर में जाने से पहले इस चश्मे में स्नान करना आवश्यक मानते हैं। इन चश्मों में सालाना तापमान ५५ डिग्री सेल्सियस (११३ डिग्री फ़ारेनहाइट) होता है, जबकि बाहरी तापमान आमतौर पर पूरे वर्ष १७ डिग्री सेल्सियस (६३ डिग्री फ़ारेनहाइट) से भी नीचे होता है।[23] तप्त कुण्ड का तापमान १३० डिग्री सेल्सियस तक भी दर्ज किया जा चुका है।[25] मंदिर में पानी के दो तालाब भी हैं, जिन्हें क्रमशः नारद कुंड और सूर्य कुंड कहा जाता है।[26]

स्थापत्य शैली[संपादित करें]

मन्दिर का प्रवेश द्वार

बद्रीनाथ मन्दिर अलकनन्दा नदी से लगभग ५० मीटर ऊंचे धरातल पर निर्मित है, और इसका प्रवेश द्वार नदी की ओर देखता हुआ है। मंदिर में तीन संरचनाएं हैं: गर्भगृह, दर्शन मंडप, और सभा मंडप।[23][12][13] गर्भगृह की छत शंकुधारी आकार की है, और लगभग १५ मीटर (४९ फीट) लंबी है। छत के शीर्ष पर एक छोटा कपोला भी है, जिस पर सोने का पानी चढ़ा हुआ है।[12][16] मन्दिर का मुख पत्थर से बना है, और इसमें धनुषाकार खिड़कियाँ हैं। चौड़ी सीढ़ियों के माध्यम से मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंचा जा सकता है, जिसे सिंह द्वार कहा जाता है। यह एक लंबा धनुषाकार द्वार है। इस द्वार के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश लगे हुए हैं, और छत के मध्य में एक विशाल घंटी लटकी हुई है। अंदर प्रवेश करते ही मंडप है: एक बड़ा, स्तम्भों से भरा हॉल जो गर्भगृह या मुख्य मंदिर क्षेत्र की ओर जाता है। हॉल की दीवारों और स्तंभों को जटिल नक्काशी के साथ सजाया गया है।[15] इस मंडप में बैठ कर श्रद्धालु विशेष पूजाएँ तथा आरती आदि करते हैं। सभा मंडप में ही मंदिर के धर्माधिकारी, नायब रावल एवं वेदपाठी विद्वानों के बैठने का स्थान है।

मुख्य मंदिर में बद्रीनारायण की १ मीटर (३.३ फीट) लम्बी शालीग्राम की मूर्ति है,[27] जिसे बद्री वृक्ष के नीचे सोने की चंदवा में रखा गया है। बद्रीनारायण की इस मूर्ति में भगवान के चार हाथ हैं। दो हाथ ऊपर उठे हुए हैं: एक में शंख, और दूसरे में चक्र है, जबकि अन्य दो हाथ योगमुद्रा (पद्मासन की मुद्रा) में भगवान की गोद में उपस्थित हैं।[23][13][28] गर्भगृह में धन के देवता कुबेर, देवर्षि नारद, उद्धव, नर और नारायण की मूर्तियां भी हैं।[29] मंदिर के चारों ओर पंद्रह और मूर्तियों की भी पूजा की जाती हैं। इनमें लक्ष्मी (विष्णु की पत्नी), गरुड़ (नारायण का वाहन), और नवदुर्गा (नौ अलग-अलग रूपों में दुर्गा) की मूर्तियां शामिल हैं। इनके अतिरिक्त मंदिर परिसर में गर्भगृह के बाहर लक्ष्मी-नृसिंह और संत आदि शंकराचार्य (७८८–८२० ईसा पश्चात), नर और नारायण, वेदान्त देशिक, रामानुजाचार्य और पांडुकेश्वर क्षेत्र के एक स्थानीय लोकदेवता घण्टाकर्ण की मूर्तियां भी हैं। बद्रीनाथ मंदिर में स्थित सभी मूर्तियां शालीग्राम से बनी हैं।[15][23][12]

तीर्थाटन[संपादित करें]

चार धाम

Badrinath temple.jpgRameswaram Gopuram.jpgDwarkadheesh temple.jpgTemple-Jagannath.jpg

बद्रीनाथरामेश्वरम
द्वारकापुरी
छोटा चार धाम

Kedarnathji-mandir.JPGBadrinathji temple.JPGGangotri temple.jpgYamunotri temple and ashram.jpg

केदारनाथ बद्रीनाथ
गंगोत्रीयमुनोत्री

हिंदू धर्म के सभी मतों और सम्प्रदायों के अनुयायी बद्रीनाथ मंदिर के दर्शन हेतु आते हैं।[31][32] यहाँ काशी मठ,[33] जीयर मठ (आंध्र मठ),[34] उडुपी श्री कृष्ण मठ[35] और मंथ्रालयम श्री राघवेंद्र स्वामी मठ[36] जैसे लगभग सभी प्रमुख मठवासी संस्थानों की शाखाएं और अतिथि विश्राम गृह हैं।

बद्रीनाथ मंदिर भगवन विष्णु को समर्पित पांच संबंधित मंदिरों में से एक है, जिन्हें पंच बद्री के रूप में एक साथ पूजा जाता है।[37] ये पांच मंदिर हैं - बद्रीनाथ में स्थित बद्री-विशाल (बद्रीनाथ मंदिर), पांडुकेश्वर में स्थित योगध्यान-बद्री, ज्योतिर्मठ से १७ किमी (१०.६ मील) दूर सुबेन में स्थित भविष्य-बद्री, ज्योतिर्मठ से ७ किमी (४.३ मील) दूर अणिमठ में स्थित वृद्ध-बद्री और रानीखेत रोड कर्णप्रयाग से १७ किमी (१०.६ मील) दूर स्थित आदि बद्री। इन पांच मंदिरों के साथ जब दो अन्य मंदिरों को भी जोड़ा जाता है, तो इन सात मंदिरों को संयुक्त रूप से सप्त-बद्री कहा जाता है। सप्त बद्री में इन पांच मंदिरों के अतिरिक्त कल्पेश्वर के निकट स्थित ध्यान-बद्री तथा ज्योतिर्मठ-तपोवन के समीप स्थित अर्ध-बद्री भी शामिल हैं। ज्योतिर्मठ के नृसिंह बद्री को भी कभी कभी पंच-बद्री (योगध्यान बद्री के स्थान पर) या सप्त-बद्री (अर्ध बद्री के स्थान पर) में स्थान दिया जाता है।

बद्रीनाथ भारत के सबसे लोकप्रिय तथा पवित्र मन्दिर माने जाने वाले चार धामों में से एक है; अन्य धाम रामेश्वरम, पुरी और द्वारका हैं।[38] यद्यपि इन धामों की उत्पत्ति स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, परन्तु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित हिंदू धर्म के अद्वैत सम्प्रदाय ने इनकी उत्पत्ति का श्रेय शंकराचार्य को ही दिया है। भारत के चार कोनों में स्थित इन धामों की यात्रा हिंदुओं द्वारा पवित्र मानी जाती है, और हिन्दू धर्म से सम्बन्धित प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम एक बार तो इन धामों का दौरा करने की इच्छा रखता है।[39] परंपरागत रूप से, यह तीर्थयात्रा पूर्वी छोर पर स्थित पुरी से शुरू होती है, और फिर दक्षिणावर्त (घडी की दिशा में) आगे बढ़ती है।[39] इन धामों के अतिरिक्त भारत के चार कोनों में चार मठ भी स्थित हैं और उनके समीप ही उनके परिचारक मंदिर भी हैं। ये मन्दिर हैं: उत्तर में बद्रीनाथ में स्थित बद्रीनाथ मन्दिर, पूर्व में उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मन्दिर, पश्चिम में गुजरात के द्वारका में स्थित द्वारकाधीश मन्दिर, और दक्षिण में कर्नाटक के शृंगेरी में स्थित श्री शारदा पीठम शृंगेरी[38][40]

यद्यपि विचारधारा के आधार पर हिंदू धर्म मुख्यतः दो संप्रदायों, अर्थात् शैवों (भगवान शिव के उपासक) और वैष्णवों (भगवान विष्णु के उपासक), में विभाजित हैं, परन्तु फिर भी चार धाम तीर्थयात्रा में दोनों ही सम्प्रदायों के लोग खुलकर भाग लेते हैं।[41] चार धाम की तर्ज पर ही उत्तराखण्ड में भी चार प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं, जिन्हें संयुक्त रूप से छोटा चार धाम कहा जाता है: बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री- ये सभी हिमालय की तलहटी में स्थित हैं।[40] इनके नाम के आगे "छोटा" शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य में जोड़ा गया था, ताकि इन्हें मूल चार धामों से अलग किया जा सके। चूंकि आधुनिक समय में इन स्थलों के तीर्थयात्रियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, इसलिए अब इन्हें "हिमालय के चार धाम" भी कहा जाने लगा है।[42]

पर्व तथा धार्मिक परम्पराएं[संपादित करें]

बद्रीनाथ मंदिर में आयोजित सबसे प्रमुख पर्व माता मूर्ति का मेला है, जो मां पृथ्वी पर गंगा नदी के आगमन की ख़ुशी में मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान बद्रीनाथ की माता की पूजा की जाती है, जिन्होंने, माना जाता है कि, पृथ्वी के प्राणियों के कल्याण के लिए नदी को बारह धाराओं में विभाजित कर दिया था। जिस स्थान पर यह नदी तब बही थी, वही आज बद्रीनाथ की पवित्र भूमि बन गई है। बद्री केदार यहाँ का एक अन्य प्रसिद्ध त्यौहार है, जो जून के महीने में बद्रीनाथ और केदारनाथ, दोनों मन्दिरों में मनाया जाता है। यह त्यौहार आठ दिनों तक चलता है, और इसमें आयोजित समारोह के दौरान देश-भर से आये कलाकार यहाँ प्रदर्शन करते हैं।[43]

रात्रिकाल के समय हरी रौशनी से सजे मन्दिर का चित्र
रात्रिकाल में बद्रीनाथ मन्दिर

मन्दिर में प्रातःकाल होने वाली प्रमुख धार्मिक गतिविधियों में महाअभिषेक, अभिषेक, गीतापाठ और भागवत पूजा शामिल हैं, जबकि शाम को पूजा में गीत गोविन्द और आरती होती है। सभी अनुष्ठानों के दौरान अष्टोत्रम और सहस्रनाम जैसे वैदिक ग्रन्थों का उच्चारण किया जाता है। आरती के बाद, बद्रीनाथ की मूर्ति से सजावट हटा दी जाती है, और पूरी मूर्ति पर चन्दन का लेप लगाया जाता है। मूर्ति पर लगा ये चन्दन अगले दिन भक्तों को निर्मल्य दर्शन के दौरान प्रसाद के रूप में दिया जाता है। मन्दिर के लगभग सभी धार्मिक अनुष्ठान भक्तों के सामने ही किए जाते हैं, कुछ अन्य हिन्दू मन्दिरों के विपरीत, जहां ऐसे कुछ अभ्यास गुप्त रखे जाते हैं।[12] आम तौर पर भक्तों को प्रसाद में चीनी की गेंदें तथा शुष्क पत्तियां प्रदान की जाती हैं। मई २००६ से पंचमृत भी प्रसाद के रूप में दिया जाने लगा है। यह पंचामृत स्थानीय रूप से तैयार किया जाता है, और बांस की टोकरी में रखकर दिया जाता है।[22]

मन्दिर के कपाट भ्रातृ द्वितीया के दिन (या उसके बाद) अक्टूबर-नवंबर के आसपास सर्दियों के दौरान बन्द रहते हैं। जिस दिन मन्दिर के कपाट बन्द होते हैं, उस दिन एक दीपक में छह महीने के लिए पर्याप्त घी भरकर अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती है।[44] तीर्थयात्रियों और मन्दिर के अधिकारियों की उपस्थिति में मुख्य पुजारी द्वारा उस दिन विशेष पूजा भी की जाती है।[45] इसके बाद बद्रीनाथ की मूर्ति को मन्दिर से ४० मील (६४ किमी) दूर स्थित ज्योतिर्मठ के नरसिंह मंदिर में स्थानांतरित कर दिया जाता है। लगभग छह महीनों तक बन्द रहने के बाद मन्दिर के कपाट अक्षय तृतीया के अवसर पर अप्रैल-मई के आसपास फिर से खोल दिये जाते हैं।[46] कपाट खुलने के दिन बड़ी संख्या में तीर्थयात्री अखण्ड ज्योति को देखने के लिए इकट्ठा होते हैं।[44] बद्रीनाथ मंदिर भारत के उन कुछ पवित्र स्थलों में से एक है, जहां हिंदू लोग पुजारियों की सहायता से अपने पूर्वजों के लिए बलि चढ़ाते हैं।[47] भक्त मंदिर में बद्रीनाथ की मूर्ति के सामने पूजा करने के साथ-साथ अलकनंदा नदी के एक कुण्ड में भी डुबकी लगाते हैं। प्रचलित धारणा यह है कि इस कुण्ड में डुबकी लगाने से व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है।[48]

प्रबन्धन[संपादित करें]

बद्रीनाथ मंदिर को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार अधिनियम संख्या ३०/१९४८ में मन्दिर अधिनियम संख्या १६/१९३९[49] के तहत शामिल किया गया था, जिसे बाद में "श्री बद्रीनाथ तथा श्री केदारनाथ मंदिर अधिनियम" के नाम से जाना जाने लगा। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार राज्य सरकार द्वारा नामित एक समिति दोनों मंदिरों का प्रबन्धन करती है। समिति के सदस्यों में बढ़ोतरी करने हेतु इस अधिनियम को २००२ में संशोधित किया गया, जिसके बाद कई सरकारी अधिकारियों और एक उपाध्यक्ष की नियुक्ति की जाने लगी। वर्तमान में परिषद् में सत्रह सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन उत्तराखण्ड विधानसभा द्वारा चुने जाते हैं, दस सदस्य राज्य सरकार द्वारा नामित होते हैं, और चार सदस्य गढ़वाल, टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी की जिला परिषदों द्वारा (सब में से एक-एक) नामित होते हैं।[50]

जैसा कि मंदिर के अभिलेखों में दर्ज है, मंदिर के पारम्परिक पुजारी शिव की तपस्या करने वाले होते थे, जिन्हें दण्डी सन्यासी कहा जाता था। ये आधुनिक केरल में एक धार्मिक समूह नंबुदिरी समुदाय से संबंधित थे। जब १७७६ ईस्वी में इस समुदाय के आखिरी सदस्य की बिना किसी के उत्तराधिकारी के ही मृत्यु हो गई, तो गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने केरल से नंबूदिरि समाज के ही गैर-सन्यासी ब्राह्मणों को पूजा करने के लिए आमंत्रित किया- एक अभ्यास जो आधुनिक समय में भी जारी है। १९३९ तक, भक्तों द्वारा मंदिर में चढ़ाए गए सभी चढ़ावे रावल (मुख्य पुजारी) को ही दिए जाते थे, परन्तु १९३९ के बाद उनका अधिकार क्षेत्र केवल धार्मिक मामलों तक ही सीमित कर दिया गया। मंदिर की प्रशासनिक संरचना में शीर्ष पर एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है, जो राज्य सरकार आदेश निष्पादित करता है। उसके अतिरिक्त मन्दिर में एक उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी, दो ओएसडी, एक कार्यकारी अधिकारी, खाता अधिकारी, एक मंदिर अधिकारी और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की सहायता के लिए एक प्रचार अधिकारी भी होता है।

image showing Badrinath temple with mountain in the background
गर्मियों में मन्दिर का दृश्य

हालांकि बद्रीनाथ उत्तर भारत में स्थित है, परन्तु फिर भी मन्दिर के रावल या मुख्य पुजारी परंपरागत रूप से दक्षिण भारतीय राज्य केरल से चुने गए नंबुदिरी ब्राह्मण ही होते हैं।[51] माना जाता है कि यह परंपरा आदि शंकराचार्य द्वारा शुरू की गई थी, जो दक्षिण भारतीय दार्शनिक थे। उत्तराखण्ड सरकार (राज्य के गठन से पहले उत्तर प्रदेश सरकार) द्वारा केरल सरकार के पास रावल (मुख्य पुजारी) के लिए अनुरोध किया जाता है। उम्मीदवार के लिए कई आवश्यक अहर्ताएं होती हैं: वह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला होना चाहिए, उसके पास संस्कृत में आचार्य की डिग्री होनी चाहिए, वह मंत्रोच्चारण और पवित्र ग्रंथों को पढ़ने आदि में प्रवीण होना चाहिए, और साथ ही, वह हिंदू धर्म के वैष्णव पंथ से भी होना चाहिए। इसके बाद बद्रीनाथ के रक्षक के तौर पर गढ़वाल नरेश केरल सरकार द्वारा भेजे गए उम्मीदवार को मंजूरी देते हैं। उम्मीदवार को रावल की पदवी देने के लिए एक तिलक समारोह आयोजित किया जाता है, और अप्रैल से नवंबर तक जब मंदिर खुला रहता है तो उसे वहां नियुक्त किया जाता है।

रावल को गढ़वाल राइफल्स और उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों द्वारा हाई होलीनेस (सबसे पवित्र) की उपाधि प्रदान की जाती है। उन्हें नेपाल के राजघराने में भी काफी उच्च सम्मान प्राप्त होता है। अप्रैल से नवंबर तक रावल मंदिर के पुजारी के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करता है, और इसके बाद वह या तो ज्योतिर्मठ में रहता है, या वापस केरल में अपने मूल गांव को लौट जाता है। रावल की दिनचर्या अभिषेक के साथ ही प्रत्येक दिन प्रातःकाल ४ बजे से शुरू हो जाती है। वे वामन द्वादशी तक अलकनन्दा नदी पार नहीं कर सकते, और उन्हें पूरे समय ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। रावल की सहायता के लिए ग्राम दीमर से संबंधित गढ़वाली दीमरी पंडित, नायब रावल, धर्मदीकरी, वेदपति, पुजारियों का समूह, पंडा समाधनी, भंडारी, रसोइये, भजन गायक, देवाश्रम का एक क्लर्क, जल भरिया (जलापूर्ति सुनिश्चित करने वाला) और मंदिर गार्डों की तैनाती की जाती है। बद्रीनाथ उत्तर भारत के उन कुछ मंदिरों में से एक है, जो मुख्यतः दक्षिण में प्रचलित श्रौतसूत्र परंपरा की प्राचीन तंत्र-विधि का पालन करता है।[47] [52][53]

आवागमन[संपादित करें]

बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते कर्णप्रयाग में मिल जाते है। राष्ट्रीय राजमार्ग ७ बद्रीनाथ से होकर गुजरता है। यह राजमार्ग पंजाब के फाजिल्का नगर से शुरू होकर भटिण्डा और पटियाला से होता हुआ हरियाणा के पंचकुला, हिमाचल प्रदेश के पाओंटा साहिब और उत्तराखण्ड के देहरादून, ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली तथा जोशीमठ इत्यादि नगरों से होते हुए बद्रीनाथ पहुँचता है, और यहां से आगे बढ़ते हुए भारत-चीन सीमा पर स्थित ग्राम माणा में पहुंचकर समाप्त हो जाता है।[54] केदारनाथ की ओर से भी गौरीकुंड से गुप्तकाशी, चोक्ता (चोटवा), गोपेश्वर और जोशीमठ होते हुए सड़क मार्ग को लगभग २२१ किमी की दूरी तय कर बद्रीनाथ मन्दिर तक पहुंचा जा सकता है।[12][55]

कभी हरिद्वार से इस यात्रा में महीनों लग जाते थे, परन्तु अब बेहतर सड़क मार्ग बन जाने के कारण हफ्ते-भर से भी कम समय में ही यह यात्रा हो जाती है।

२०१२ में, मंदिर प्रशासन ने मंदिर के आगंतुकों के लिए एक टोकन प्रणाली की शुरुआत की। टोकन स्टैंड में लगे तीन स्टालों से यात्रा के समय को इंगित करने वाले टोकन प्रदान किए जाते हैं। प्रत्येक भक्त को गर्भगृह का दौरा करने के लिए १०-२० सेकंड आवंटित किया जाता है। मंदिर में प्रवेश करने के लिए पहचान का प्रमाण साथ होना अनिवार्य है।[56]

दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

बदरीनाथ में तथा इसके समीप अन्य दर्शनीय स्थल हैं-

  • अलकनंदा के तट पर स्थित तप्त-कुंड
  • धार्मिक अनुष्टानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक समतल चबूतरा- ब्रह्म कपाल
  • पौराणिक कथाओं में उल्लिखित सांप (साँपों का जोड़ा)
  • शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड– शेषनेत्र
  • चरणपादुका :- जिसके बारे में कहा जाता है कि यह भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं; (यहीं भगवान विष्णु ने बालरूप में अवतरण किया था।)
  • बदरीनाथ से दिखने वाला बर्फ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ
  • माता मूर्ति मन्दिर :- जिन्हें बदरीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है।
  • माणा गाँव- इसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है।
  • वेद व्यास गुफा, गणेश गुफा: यहीं वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ था।
  • भीम पुल :- भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था, जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है।
  • वसु धारा :- यहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। ये जगह माणा से ८ किलोमीटर दूर है। कहते हैं कि जिसके ऊपर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वो पापी नहीं होता है।
  • लक्ष्मी वन :- यह वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है।
  • सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) :- कहा जाता है कि इसी स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।
  • अलकापुरी :- अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान। इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
  • सरस्वती नदी :- पूरे भारत में केवल माणा गाँव में ही यह नदी प्रकट रूप में है।
  • उर्वशी मन्दिर : भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई। बदरीनाथ कस्बे के समीप ही बामणी गाँव में उनका मन्दिर है।

एक विचित्र सी बात यह है कि जब भी कोई बदरीनाथ के दर्शन करता है और वह उस पर्वत (नारायण पर्वत) की चोटी की और देखता है तो पाता है की मन्दिर के ऊपर पर्वत की चोटी शीषनाग के रूप में अवस्थित है। शीष नाग के प्राकृतिक फन स्पष्ट देखे जा सकते हैं।

ग्रन्थों में वर्णन[संपादित करें]

बहुनि सन्ति तीर्थानी दिव्य भूमि रसातले।
बद्री सदृश्य तीर्थं न भूतो न भविष्यतिः।।

स्कन्दपुराण के अनुसार -

कृते मुक्तिप्रदाप्रोक्ता, त्रेतायां योग सिद्धिदा।
विशाला द्वापरे प्रोक्ता,कलौ बद्रिकाश्रम।

महाभारत के अनुसार अन्य तीर्थों में स्वधर्म का विधिपूर्वक पालन करते हुए मृत्यु होने से मनुष्य की मुक्ति होती है किन्तु बद्री विशाल के दर्शन मात्र से ही मुक्ति उसके हाथ में आ जाती है, यथा -

अन्यत्र मरणामुक्ति: स्वधर्म विधिपूर्वकात।
बदरीदर्शनादेव मुक्ति: पुंसाम करे स्थिता।।

वराहपुराण के अनुसार मनुष्य कंही से भी बदरी आश्रम का स्मरण करता रहे तो वह पुनरावृत्तिवर्जित वैष्णव धाम को प्राप्त होता है, यथा -

श्री बदर्याश्रमं पुण्यं यत्र यत्र स्थित: स्मरेत।
स याति वैष्णवम स्थानं पुनरावृत्ति वर्जित:।।

सन्दर्भ[संपादित करें]

उद्धरण[संपादित करें]

  1. "भारी बारिश से बदरीनाथ यात्रा बाधित, यात्री फंसे". पत्रिका समाचार समूह. ३० जुलाई २०१४. http://www.patrika.com/news/heavy-rain-interrupts-badrinath-yatra/1020720. अभिगमन तिथि: ३१ जुलाई २०१४. 
  2. घोष १९३४, पृ॰ ७२.
  3. एटकिन्सन, एडविन टी॰ (१९७३) (अंग्रेजी में). The Himalayan gazetteer, Volume 3, Part 2 [हिमालयी गजेटियर, खण्ड ३, भाग २]. दिल्ली: काॅस्मो प्रकाशन. https://books.google.co.in/books/about/The_Himalayan_gazetteer.html?id=GL-1AAAAIAAJ. 
  4. योगेन्द्र नाथ, शर्मा (२८ अप्रैल २०१८). "तप-त्याग और भक्ति के चारधाम". दैनिक ट्रिब्यून. https://www.dainiktribuneonline.com/2018/04/%E0%A4%A4%E0%A4%AA-%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%BE/. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  5. मौली, सेठ (२५ जनवरी २०१८). "जानें कैसे पड़ा विष्‍णु जी के इस मंदिर का नाम बद्रीनाथ". दैनिक जागरण. https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-badrinath-a-famous-temple-of-lord-vishnu-17410091.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  6. "विष्णु की निवास भूमि – बद्रीनाथ". दैनिक जागरण. ६ सितम्बर २०१४. https://www.jagran.com/spiritual/sadguru-vishnu-ki-nivas-bhumi-badrinath-11589571.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  7. [1]
  8. "यहीं लिखी थी गई थी महाभारत, जानें बद्रीनाथ से जुड़ीं ७ बातें". दैनिक भास्कर. ९ फरवरी २०१६. https://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-place-where-veda-vyasa-wrote-mahabharat-know-7-facts-about-badrinath-temple-in-h-5243706-PHO.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  9. "भगवान राम, इंद्र और पांडवों ने किया था इन स्थानों पर पिंडदान". नई दिल्ली: दैनिक भास्कर. १६ सितम्बर २०१७. https://www.bhaskarhindi.com/news/pind-daan-or-post-death-ritual-in-allahabad-badrinath-ujjain-12090. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  10. प्रभापुंज, मिश्रा (२ नवम्बर २०१७). "यहां लिखा गया था ५वां वेद, हमेशा गर्म रहता है इस कुंड का पानी". दैनिक जागरण. https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-holy-place-where-vedvyas-ji-and-lord-ganesh-were-written-mahabharat-16958796.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  11. "बदरीनाथ धाम में पूजा के समय रावल को बनना पड़ता है स्त्री, जानिए इसके पीछे की रोचक कहानी". देहरादून: अमर उजाला. १७ नवम्बर २०१७. https://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/badrinath-dham-priest-become-women-during-puja. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  12. नायर २००७, पृ॰ ६७–६८.
  13. त्यागी १९९१, पृ॰ ७०.
  14. सदासिवन् २०००, पृ॰ २११.
  15. सेनगुप्ता २००२, पृ॰ ३२.
  16. नौटियाल १९६२, पृ॰ ११०.
  17. स्वामी २००४, पृ॰ १००–१०१.
  18. गुहा २०००, पृ॰ ६४.
  19. ललित, भट्‌ट (९ अगस्त २०१८). "देवभूमि उत्तराखंड स्थित पंचबद्री, पंचकेदार, पंचप्रयागों का जानें महात्म्य". वेबदुनिया. http://hindi.webdunia.com/religious-places/uttarakhand-dev-bhoomi-badrinath-devprayag-pancpryag-116091900001_1.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  20. बेन्स १८७८.
  21. चिशोल्म १९११.
  22. "Uttaranchal declares Badrinath as no construction zone [उत्तरांचल ने बद्रीनाथ को नो कंस्ट्रक्शन जोन घोषित किया]" (अंग्रेजी में). हिन्दुस्तान टाइम्स (बद्रीनाथ). ९ मई २००६. http://www.highbeam.com/doc/1P3-1034737141.html. अभिगमन तिथि: १ जनवरी २०१४. (सब्सक्रिप्शन आवश्यक)
  23. "About the temple". Shri Badrinath - Shri Kedarnath Temples Committee. 2006. http://www.badarikedar.org/badrinath.aspx. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 
  24. Gopal, Madan (1990). K.S. Gautam. ed. India through the ages. Publication Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India. प॰ 174. 
  25. [2]
  26. भल्ला २००६, पृ॰ ११०.
  27. "क्यों बनाए गए चार धाम?". हिन्दुस्तान. २७ फरवरी २०१७. https://www.livehindustan.com/astrology/highlights/article1-why-chardham-created-718099.amp.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  28. शशिभूषण, मैठानी (१५ मई २०१३). "बद्रीनाथ धाम में पद्मासन मुद्रा में हैं भगवान विष्णु". बद्रीनाथ: आज तक. https://aajtak.intoday.in/story/special-report-on-badrinath-dham-1-730636.html. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  29. वन्दना, शर्मा (६ जून २०१८). "बद्रीनाथ कैसे बना लक्ष्मी-नारायण का धाम जानें यह रोचक घटनाक्रम". दैनिक जागरण (बद्रीनाथ: आईनेक्सटलाइव). https://inextlive.jagran.com/interesting-facts-must-know-about-badrinath-dham-201806060011. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  30. "Number of pilgrims the temple". Shri Badrinath - Shri Kedarnath Temples Committee. 2006. Archived from the original on 29 October 2013. https://web.archive.org/web/20131029195018/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=9. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 
  31. राव २००८, पृ॰ ४७४.
  32. ऐक २०१२, पृ॰ ३४३–३४४.
  33. "Kashi Math at Badrinath". Shree Kashi Math Samasthanam. http://www.kashimath.org/branches/. अभिगमन तिथि: 10 September 2014. 
  34. "Badari Ashtakshari Kshethriya Annadana Sakha Sangham, (BAKASS)". Chinna Jeeyar Mutt. http://www.chinnajeeyar.org/main/content/badari-ashtakshari-kshethriya-annadana-sakha-sangham-bakass/. अभिगमन तिथि: 10 September 2014. 
  35. "Udupi Mutt at Badrinath". Pejavara Adhokshaja Matha, Udupi. http://www.vishveshavani.com/contact/. अभिगमन तिथि: 10 September 2014. 
  36. "Raghavendra Mutt Branches". Raghavendra Mutt. http://www.raghavendramutt.org/node/38. अभिगमन तिथि: 10 September 2014. 
  37. बंसल २००५, पृ॰ ३५.
  38. चक्रवर्ती १९९४, पृ॰ १४०.
  39. ग्वेन २००९.
  40. मित्तल २००४, पृ॰ ४८२–४८३.
  41. ब्रॉकमैन २०११, पृ॰ ९४–९६.
  42. मेलटन & बाउमान २०१०, पृ॰ ५४०.
  43. "Festivals celebrated in the temple". Shri Badrinath - Shri Kedarnath Temples Committee. 2006. Archived from the original on 17 February 2012. https://web.archive.org/web/20120217172228/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=11. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 
  44. भल्ला २००६, पृ॰ २५८.
  45. "Badrinath shrine closes marking end of Chardham Yatra". Dehradun: Zeenews. 17 November 2011. http://zeenews.india.com/news/uttarakhand/badrinath-shrine-closes-marking-end-of-chardham-yatra_742346.html. अभिगमन तिथि: 28 April 2014. 
  46. "Badrinath shrine closed for winter". TNN (Dehradun: The Times of India). 18 November 2008. http://timesofindia.indiatimes.com/india/Badrinath-shrine-closed-for-winter/articleshow/3724410.cms. अभिगमन तिथि: 28 April 2014. 
  47. स्वामी २००४, पृ॰ १०२.
  48. डैविडसन & गिटलिट्ज़ २००२, पृ॰ ४८.
  49. "तो रावल के 'कारनामे' के बाद बदरीनाथ में लागू होगा एक्ट". कर्णप्रयाग: अमर उजाला. ९ फरवरी २०१४. https://www.amarujala.com/dehradun/temple-act-1939-on-badrinath-temple. अभिगमन तिथि: ८ अगस्त २०१८. 
  50. "Committee members of the temple". Shri Badrinath - Shri Kedarnath Temples Committee. 2006. Archived from the original on 29 October 2013. https://web.archive.org/web/20131029184513/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=3. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 
  51. शालिनी, जोशी (२४ मई २००५). "बद्रीनाथ मंदिर में दक्षिण के पुजारी". बीबीसी. https://www.bbc.com/hindi/regionalnews/story/2005/05/050524_badrinath_priest.shtml. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  52. Outlook Traveller. "Badrinath". Traveller.outlookindia.com. Archived from the original on 29 October 2013. https://web.archive.org/web/20131029201558/http://traveller.outlookindia.com/fulltravelogue.aspx?id=216. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 
  53. "Badrinath Temple". The Hindu. 18 July 2005. http://www.hinduonnet.com/thehindu/fr/2008/07/18/stories/2008071851520400.htm. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 
  54. "Rationalisation of Numbering Systems of National Highways". नई दिल्ली: सड़क परिवहन और राजमार्ग मन्त्रालय, भारत सरकार. http://dorth.gov.in/writereaddata/sublinkimages/finaldoc6143316640.pdf. अभिगमन तिथि: ३ अप्रैल २०१२. 
  55. नियति, भण्डारी (२७ अप्रैल २०१८). "चारधाम यात्रा पर जाने वालों के लिए खास जानकारी". पंजाब केसरी. https://www.punjabkesari.in/dharm/news/char-dham-yatra-792601. अभिगमन तिथि: ९ अगस्त २०१८. 
  56. "News about the temple". Shri Badrinath - Shri Kedarnath Temples Committee. 2006. Archived from the original on 29 October 2013. https://web.archive.org/web/20131029195444/http://www.badarikedar.org/content-badari.aspx?id=29. अभिगमन तिथि: 1 January 2014. 

आधार ग्रन्थ[संपादित करें]

विस्तृत पठन[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]