आज़ाद हिन्द फ़ौज

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'ina आज़ाद हिन्द फ़ौज' सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान में बनायी थी। मूलत: यह 'आजाद हिन्द सरकार' की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी। किन्तु इस लेख में जिसे 'आजाद हिन्द फौज' कहा गया है उससे इस सेना का कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ, नाम और उद्देश्य दोनों के ही समान थे। रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया अर्थात् आज़ाद हिन्द फ़ौज। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी।

इतिहास hamare desh ka[संपादित करें]

तोयामा मित्सुरु, रासबिहारी बोस का स्वागत करते हुए
'बृहद पूर्वी एशिया' सम्मेलन के समय नेताजी (नवम्बर, १९४३)
आजाद हिन्द फौज का एक सैनिक MG34 चलाते हुए

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया। इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।

आरम्भ में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। बाद में इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किये गये। एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा। इससे गद्गद होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को इसका नेतृत्व सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।

6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से गाँधी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ठ की और आज़ाद हिन्द फौज़ द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये उनकी शुभकामनाएँ माँगीं।[1] 21 मार्च 1944 को 'चलो दिल्ली' के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्थान की धरती पर आगमन हुआ।

22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुये सुभाष बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा -

हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।

किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े। ऐसे में सुभाष को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका सैनिक अभियान असफल हो गया, किन्तु इस असफलता में भी उनकी जीत छिपी थी। निस्सन्देह सुभाष उग्र राष्ट्रवादी थे। उनके मन में फासीवादी अधिनायकों के सबल तरीकों के प्रति भावनात्मक झुकाव भी था और वे भारत को शीघ्रातिशीघ्र स्वतन्त्रता दिलाने हेतु हिंसात्मक उपायों में आस्था भी रखते थे। इसीलिये उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया था।

यद्यपि आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों की संख्या के बारे में थोड़े बहुत मतभेद रहे हैं परन्तु ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि इस सेना में लगभग चालीस हजार सेनानी थे। इस संख्या का अनुमोदन ब्रिटिश गुप्तचर रहे कर्नल जीडी एण्डरसन ने भी किया है।

जब जापानियों ने सिंगापुर पर कब्जा किया था तो लगभग 45 हजार भारतीय सेनानियों को पकड़ा गया था।

पुनर्गठन[संपादित करें]

मोहनसिंह की पहल पर एक जापानी अधिकारी के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया गया था. मोहन सिंह के हाथों में इसकी कमान दी गई थी. मगर नेतृत्व क्षमता में कुशलता की कमी तथा संगठन को सुचारू रूप से नही चला पाने के कारण कुछ ही समय में आजाद हिन्द फौज का संगठन मृतप्रायः हो गया.

जब नेताजी साउथ एशिया में आए और संगठन की प्रगति के बारे में जाना तो उन्हें लगा कि अब फिर से आजाद हिन्द फौज को उठाकर भारत की आजादी का संग्राम लड़ना होगा. 4 जुलाई 1943 को इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के प्रवासी भारतीयों की बैठक बुलाई गई, सभी ने सर्वसम्मति से नेताजी को अपना नेता बनाया तथा सुभाष जी ने नेतृत्व अपने हाथ में लेकर संगठन को फिर से खड़ा किया.

सिंगापुर में आईएनए का स्मारक[संपादित करें]

सिंगापुर के एस्प्लेनेड पार्क में लगी आईएनए की भूमिका का उल्लेख करती हुई स्मृति पट्टिका

आज़ाद हिन्द फौज़ के गुमनाम शहीदों की याद में सिंगापुर के एस्प्लेनेड पार्क में आईएनए वार मेमोरियल बनाया गया था। आज़ाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमाण्डर सुभाष चन्द्र बोस ने 8 जुलाई 1945 को इस स्मारक पर जाकर उन अनाम सैनिकों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी।[2] बाद में इस स्मारक को माउण्टबेटन के आदेश पर ब्रिटिश साम्राज्य की सेनाओं ने ध्वस्त करके सिंगापुर शहर पर कब्जा कर लिया था। इस स्मारक पर आज़ाद हिन्द फौज़ के तीन ध्येयवाचक शब्द - इत्तेफाक़ (एकता), एतमाद (विश्वास) और कुर्बानी (बलिदान) लिखे हुए थे।

सन् 1995 में सिंगापुर की राष्ट्रीय धरोहर परिषद (नेशनल हैरिटेज बोर्ड) ने वहाँ निवास कर रहे भारतीय समुदाय के लोगों के आर्थिक सहयोग से इण्डियन नेशनल आर्मी की बेहद खूबसूरत स्मृति पट्टिका उसी ऐतिहासिक स्थल पर फिर से स्थापित कर दी। इसकी देखरेख का काम सिंगापुर की सरकार करती है।[3]

द्रुत प्रयाण गीत[संपादित करें]

कदम कदम बढाये जा - आजाद हिन्द फौज का प्रयाण गीत (क्विक मार्च) था जिसकी रचना राम सिंह ठकुरि ने की थी। इस ट्यून का आज भी भारतीय सेना के प्रयाण गीत के रूप में इसका प्रयोग होता है। पूरा गीत इस प्रकार है-

कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा
तू शेर-ए-हिन्द आगे बढ़
मरने से तू कभी न डर
उड़ा के दुश्मनों का सर
जोश-ए-वतन बढ़ाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा
हिम्मत तेरी बढ़ती रहे
खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे खड़े
तू खाक में मिलाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा
चलो दिल्ली पुकार के
ग़म-ए-निशाँ संभाल के
लाल क़िले पे गाड़ के
लहराये जा लहराये जा
कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा

आज़ाद हिन्द फौज के तमगे[संपादित करें]

(वरीयता के क्रम में)

  • शेरे-हिन्द
  • सरदारे-जंग
  • वीरे-हिन्द
  • शहीदे-भारत

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. क्रान्त, मदनलाल वर्मा (2006). स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास. 2 (1 संस्करण). नई दिल्ली: प्रवीण प्रकाशन. पृ॰ 512. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7783-120-8. मैं जानता हूँ कि ब्रिटिश सरकार भारत की स्वाधीनता की माँग कभी स्वीकार नहीं करेगी। मैं इस बात का कायल हो चुका हूँ कि यदि हमें आज़ादी चाहिये तो हमें खून के दरिया से गुजरने को तैयार रहना चाहिये। अगर मुझे उम्मीद होती कि आज़ादी पाने का एक और सुनहरा मौका अपनी जिन्दगी में हमें मिलेगा तो मैं शायद घर छोड़ता ही नहीं। मैंने जो कुछ किया है अपने देश के लिये किया है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और भारत की स्वाधीनता के लक्ष्य के निकट पहुँचने के लिये किया है। भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है। आज़ाद हिन्द फौज़ के सैनिक भारत की भूमि पर सफलतापूर्वक लड़ रहे हैं। हे राष्ट्रपिता! भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभ कामनायें चाहते हैं।
  2. "INA War Memorial in Singapore". National Archives of Singapore (S1942.org.sg). अभिगमन तिथि 14 अक्टूबर 2013.
  3. "Heritage Sites and Trails in Singapore". National Heritage Board of Singapore. मूल से 2007-09-28 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2007-07-07.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]