आजाद हिन्द फौज पर अभियोग

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आजाद हिन्द फौज के अभियोग से तात्पर्य नवम्बर १९४५ से लेकर मई १९४६ तक आजाद हिन्द फौज के अनेकों अधिकारियों पर चले कोर्ट-मार्शल से है। कुल लगभग दस मुकदमे चले। इनमें पहला और सबसे प्रसिद्ध मुकद्दमा दिल्ली के लाल किले में चला जिसमें कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरुबख्श सिंह तथा मेजर जनरल शाहनवाज खान पर संयुक्त रूप से चला।

द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने पर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक नाटकीय बदलाव आया। 15 अगस्त 1947 भारत को आजादी मिलने तक, भारतीय राजनैतिक मंच विविध जनान्दोलनों का गवाह रहा। इनमें से सबसे अहम् आन्दोलन, आजाद हिन्द फौज के 17 हजार जवानों के खिलाफ चलने वाले मुकदमे के विरोध में जनाक्रोश के सामूहिक प्रदर्शन थे।

मेजर जनरल शहनवाज को मुस्लिम लीग और ले. कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन को अकाली दल ने अपनी ओर से मुकदमा लड़ने की पेशकश की, लेकिन इन देशभक्त सिपाहियों ने कांग्रेस द्वारा जो डिफेंस टीम बनाई गई थी, उसी टीम को ही अपना मुकदमा पैरवी करने की मंजूरी दी। मजहबी भावनाओं से ऊपर उठकर सहगल, ढिल्लन, शहनवाज का यह फैसला सचमुच प्रशंसा के योग्य था।

परिचय[संपादित करें]

हिन्दुस्तानी तारीख में 'लाल किला ट्रायल' का अहम् स्थान है। लाल किला ट्रायल के नाम से प्रसिध्द आजाद हिन्द फौज के ऐतिहासिक मुकदमे के दौरान उठे इस नारे 'लाल किले से आई आवाज-सहगल, ढिल्लन, शहनवाा' ने उस समय हिन्दुस्तान की आजादी के हक के लिए लड रहे लाखों नौजवानों को एक सूत्र में बांध दिया था। वकील भूलाभाई देसाई इस मुकदमे के दौरान जब लाल किले में बहस करते, तो सड़कों पर हजारों नौजवान नारे लगा रहे होते। पूरे देश में देशभक्ति का एक वार सा उठता। 15 नवम्बर 1945 से 31 दिसम्बर 1945 यानी, 57 हिन्दुस्तान की आजादी के संघर्ष में टर्निंग पॉइंट था। यह मुकदमा कई मोर्चों पर हिन्दुस्तानी एकता को मजबूत करने वाला साबित हुआ।

कांग्रेस की डिफेंस टीम में सर तेज बहादुर सप्रू के नेतृत्व में मुल्क के उस समय के कई नामी-गिरामी वकील भूलाभाई देसाई, सर दिलीपसिंह, आसफ अली, पं॰ जवाहरलाल नेहरू, बख्शी सर टेकचंद, कैलाशनाथ काटजू, जुगलकिशोर खन्ना, सुल्तान यार खान, राय बहादुर बद्रीदास, पी.एस. सेन, रघुनंदन सरन आदि शामिल थे जो खुद इन सेनानियों का मुकदमा लड़ने के लिए आगे आए थे। सर तेज बहादुर सप्रू की अस्वस्थता के कारण वकील भूलाभाई देसाई ने आजाद हिन्द फौज के तीनों वीरों सिपाहियों की तरफ से वकालत की। अभियोग की कार्रवाई संवाददाताओं और जनता के लिए खुली हुई थी। मुकदमे के दौरान पूरे मुल्क में देशभक्ति का माहौल पैदा हो गया। लोग अपने मुल्क के लिए मर मिटने को तैयार हो गए। सारे मुल्क में सरकार के खिलाफ धरने प्रदर्शन हुए, एकता की सभाएं हुईं, जिसमें मुकदमे के मुख्य आरोपी कर्नल प्रेम कुमार सहगल, कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन, मेजर जनरल शहनवाज की लम्बी उम्र की दुआएं की गर्इं।

अंग्रेज हुकूमत ने सहगल-ढिल्लन-शहनवाज पर ब्रिटिश सम्राट के खिलाफ बगावत करने का इल्जाम लगाया। लेकिन सीनियर एडव्होकेट भूलाभाई देसाई की शानदार दलीलों ने इस मुकदमे को आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के हक में कर दिया। भूलाभाई ने मुकदमे की शुरुआत इस बात से की, 'इस समय न्यायालय के समक्ष, किसी परतंत्र जाति द्वारा अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने का अधिकार कसौटी पर है।' भूलाभाई देसाई की पहली दलील थी-

'जापान से पराजय के बाद अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल हंट ने जब खुद आजाद हिन्द फौज के जवानों को जापानी सेना के सुपुर्द कर दिया और उनसे कहा, आज से आप हमारे मुलाजिम नहीं और मैं अंग्रेजी सरकार की ओर से आप लोगों को जापान सरकार को सौंपता हूं, आप लोग जिस प्रकार अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादार रहे, उसी प्रकार अब जापानी सरकार के प्रति वफादार रहें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो आप दण्ड के भागी होंगे। कर्नल हंट का जापानी सेना के सम्मुख समर्पण और भारतीय सेना को जापानियों को सौंपने के बाद, इन जवानों पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने का मुकदमा नहीं बनता।'

इसके अलावा भूलाभाई देसाई की दूसरी अहम् दलील थी-

'अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक हर आदमी को अपनी आजादी हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ने का अधिकार है। आजाद हिन्द फौज एक आजाद और अपनी इच्छा से शामिल हुए लोगों की फौज थी और उनकी निष्ठा अपने देश से थी। जिसको आजाद कराने के लिए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने देश से बाहर एक अस्थायी सरकार बनाई थी और अपना एक संविधान था। इस सरकार को विश्व के नौ देशों की मान्यता प्राप्त थी।'

अपनी दलील को साबित करने के लिए उन्होंने मशहूर कानूनविद् बीटन के कथन को उध्दृत किया -

'अपने मुल्क की आजादी को हासिल करने के लिए, हर गुलाम कौम को लड़ने का अधिकार है। क्योंकि, अगर उनसे यह हक छीन लिया जाए, तो इसका मतलब यह होगा कि एक बार यदि कोई कौम गुलाम हो जाए, तो वह हमेशा गुलाम होगी।'

विचारणा (ट्रायल) के परिणाम[संपादित करें]

इस ट्रायल ने पूरी दुनिया में अपनी आजादी के लिए लड़ रहे लाखों लोगों के अधिकारों को जागृत किया। सहगल, ढिल्लन और शाहनवाज के अलावा आजाद हिन्द फौज के अनेक सैनिक जो जगह-जगह गिरफ्तार हुए थे और जिन पर सैकड़ों मुकदमे चल रहे थे, वे सभी रिहा हो गए। 3 जनवरी 1946 को आजाद हिन्द फौज के जांबाज सिपाहियों की रिहाई पर 'राईटर एसोसिएशन ऑफ अमेरिका' तथा ब्रिटेन के अनेक पत्रकारों ने अपने अखबारों में मुकदमे के विषय में जमकर लिखा। इस तरह यह मुकदमा अंतर्राष्ट्रीय रूप से चर्चित हो गया। अंग्रेजी सरकार के कमाण्डर-इन-चीफ सर क्लॉड अक्लनिक ने इन जवानों की उम्र कैद सजा माफ कर दी। हवा का रुख भांपकर वे समझ गए, कि अगर इनको सजा दी गई तो हिन्दुस्तानी फौज में बगावत हो जाएगी।

विचारणा के दौरान ही भारतीय जलसेना में विद्रोह शुरू हो गया। मुम्बई, कराची, कोलकाता, विशाखापत्तनम आदि सब जगह विद्रोह की ज्वाला फैलते देर न लगी। इस विद्रोह को जनता का भी भरपूर समर्थन मिला।

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