चित्तौड़गढ़ का दुर्ग

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चित्तौड़गढ़ का दुर्ग

चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत का सबसे विशाल दुर्ग है। यह राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है जो भीलवाड़ा से कुछ किमी दक्षिण में है। यह एक विश्व विरासत स्थल है। चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी थी।

इस किले ने इतिहास के उतार-चढाव देखे हैं। यह इतिहास की सबसे खूनी लड़ाईयों का गवाह है। इसने तीन महान आख्यान और पराक्रम के कुछ सर्वाधिक वीरोचित कार्य देखे हैं जो अभी भी स्थानीय गायकों द्वारा गाए जाते हैं।

अनुक्रम

ऐतिहासिकता तथा निर्माण[संपादित करें]

काल के बारे में निश्चत तौर पर कुछ कहना थोड़ा मुश्किल है। एक किंवदन्मत के अनुसार पाण्डवों के दूसरे भाई भीम ने इसे करीब ५००० वर्ष पूर्व बनवाया था। इस संबंध में प्रचलित कहानी यह है कि एक बार भीम जब संपत्ति की खोज में निकला तो उसे रास्ते में एक योगी निर्भयनाथ व एक यति कुकड़ेश्वर से भेंट होती है। भीम ने योगी से पारस पत्थर मांगा, जिसे योगी इस शर्त पर देने को राजी हुआ कि वह इस पहाड़ी स्थान पर रातों-रात एक दुर्ग का निर्माण करवा दे। भीम ने अपने शौर्य और देवरुप भाइयों की सहायता से यह कार्य करीब-करीब समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ दक्षिणी हिस्से का थोड़ा-सा कार्य शेष था। योगी के ऋदय में कपट ने स्थान ले लिया और उसने यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा, जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी, जिससे वहाँ एक बड़ा सा गड्ढ़ा बन गया, जिसे लोग भी-लत तालाब के नाम से जानते है। वह स्थान जहाँ भीम के घुटने ने विश्राम किया, भीम-घोड़ी कहलाता है। जिस तालाब पर यति ने मुर्गे की बाँग की थी, वह कुकड़ेश्वर कहलाता है।

इतिहासकारों के अनुसार इस किले का निर्माण मौर्यवंशीय राजा चित्रांगद ने सातवीं शताब्दी में करवाया था और इसे अपने नाम पर चित्रकूट के रुप में बसाया। मेवाड़ के प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम अंकित मिलता है। बाद में यह चित्तौड़ कहा जाने लगा। सन् ७३८ में गुहिलवंशी राजा बाप्पा रावल ने राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोरी को हराकर यह किला अपने अधिकार में कर लिया। फिर मालवा के परमार राजा मुंज ने इसे गुहिलवंशियों से छीनकर अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार ९ वीं -१० वीं शताब्दी में इस पर परमारों का आधिपत्य रहा। सन् ११३३ में गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह (सिद्धराज) ने यशोवर्मन को हराकर परमारों से मालवा छीन लिया, जिसके कारण चित्तौड़गढ़ का दुर्ग भी सोलंकियों के अधिकार में आ गया। तदनंतर जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के भतीजे अजयपाल को परास्त कर मेवाड़ के राजा सामंत सिंह ने सन् ११७४ के आसपास पुनः गुहिलवंशियों का आधिपत्य स्थापित कर दिया। सन् १२१३ से १२५२ तक नागदा के पतन के बाद यहाँ जेत्रसिंह ने इसे राजधानी बनाकर शासन चलाया। सन् १३०३ में यहाँ के रावल रतनसिंह की अल्लाउद्दीन खिलजी से लड़ाई हुई। लड़ाई चितौड़ का प्रथम शाका के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस लड़ाई में अलाउद्दीन खिलजी की विजय हुई और उसने अपने पुत्र खिज्र खाँ को यह राज्य सौंप दिया। खिज्र खाँ ने वापसी पर चित्तौड़ का राजकाज कान्हादेव के भाई मालदेव को सौंप दिया।

बाप्पा रावल के वंशल हमीर ने पुनः मालदेव से यह किला हस्तगत किया। हमीर बड़ा पराक्रमी और दूरदर्शी था। उसने यहाँ ५० वर्षों तक बड़ी योग्यता से शासन करते हुए अपने राज्य का विस्तार किया। उसी के प्रयत्नों से चित्तौड़ का गौरव पुनः स्थापित हो सका। सन् १५३८ में चित्तौड़ पर गुजरात के बहादुरशाह ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध को मेवाड़ का दूसरा शाका के रुप में जाना जाता है। सन् १५६७ में मेवाड़ का तीसरा शाका हुआ, जिसमें अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी थी। ये सब मुस्लिम आक्रमण चित्तौड़गढ़ की सांस्कृतिक विनाश का मुख्य कारणों में से एक है। तीसरे शाके के बाद ही सन् १५५९ में महाराणा उदयसिंह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ से हटाकर अरावली के मध्य पिछोला झील के पास स्थापित कर दी, जो आज उदयपुर के नाम से जाना जाता है।

रणनीति के दृष्टिकोण से चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रुप में महत्व[संपादित करें]

चित्तौड़गढ़ का किला राजपूताने में हमेशा एक विशेष महत्व रखता है। इसे मेवाड़ के गुहिलवंशियों की पहली राजधानी के रुप में सम्मान प्राप्त है, जिसे उन्होंने मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोनी को हराकर अपने अधिकार में कर लिया था। यह दुर्ग अरावली की पहाड़ी पर उत्तर से दक्षिण की ओर लंबाई में बना है, जिसमें बीच में समतल भूमि आ जाने के कारण एक कुंड, तालाब, मंदिर, महल आदि सभी एक निश्चित निर्माण-योजना के तहत समय-समय पर बनते रहे हैं। कुछ जलाशय तो ऐसे हैं जो निरन्तर जलापूर्ति के साधन के रुप में काम आते रहे हैं। इस गढ़ के सम्बन्ध में प्रचलित एक कहावत है जो इस दुर्ग के महत्व को बताता है।

गढ़ तो चित्तौड़गढ़ और सब गढ़ैया[संपादित करें]

वास्तव में इस दुर्ग का निर्माण अभी भी हमें विस्मय व रोमांच से भर देता है। लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि अपने भौगोलिक कारणों से यह दुर्ग युद्ध के लिए रणथंभौर और कुभलगढ़ जैसे दुर्गों की तरह उपयुक्त नहीं था। नि:संदेह किला सुदृढ़ था। पहाड़ी के किनारे-किनारे उदग्र खड़े चट्टानों की पंक्ति थी जिसके ऊपर एक ऊँचा और सुदृढ़ प्रकार बना हुआ था। साथ ही साथ दुर्ग में प्रवेश करने के लिए लगातार सात दरवाजे कुछ अन्तराल पर बनाए गये थे। इन सब कारणों से किले में प्रवेश कर पाना तो शत्रुओं के लिए बहुत ही मुश्किल था। परन्तु यह विस्तृत मैदान के बीच एक लम्बी पहाड़ी पर बना है जो अन्य पर्वत श्रेणियों से पृथक हो गया है। अतएव शत्रुओं द्वारा उसका घेरा डालकर किले में इस्तेमाल होने वाला रसद पहुँचाना सुगमता से रोक दिया जाता था। इस दुर्ग का जब-जब घेरा डाला गया तब-तब गढ़ में भोजन-सामग्री विद्यमान रहने तक ही गढ़ सुरक्षित रहा। भोजनादि सामग्री खत्म होते ही राजपूतों को विवश होकर युद्ध के लिए किले का द्वार खोल देना पड़ता था। लेकिन प्रायः शत्रुओं की बड़ी सेना होने की स्थिति में उन्हें हार का सामना करना पड़ता था। इस प्रकार हम देखते हैं कि चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रुप में चयन रणनीति की दृष्टि से उचित नहीं था और यही कारण था कि महाराणा उदय सिंह ने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाई, जो चारों तरफ पर्वतों से घिरे होने के कारण ज्यादा सुरक्षित था।

वर्तमान में चित्तौड़गढ़ जंक्शन से किले के ऊपर तक पक्की सड़क बनी हुई है। करीब सवा मील जाने पर गम्भीरी नदी आती है, जिसपर अलाउद्दीन खिलजी के शाहजादे खिज्र खाँ का सन् १३०३ (वि. सं. १३६०) में बनवाया हुआ पत्थर का एक सुदृढ़ पुल है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पुल राणा लक्ष्मण सिंह के पुत्र अरिसिंह ने, जो अलाउद्दीन के साथ लड़ाई में मारा गया था, ने बनवाया था, लेकिन ज्यादातर विद्वान इससे सहमत नहीं हैं, क्योंकि इस पुल के निर्माण में कई हिन्दु और जैन मंदिरों को गिराकर उसके पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही इसकी निर्माण शैली भी मुसलमान (सारसेनिक) है। नदी के जल प्रवाह के लिए दस मेहरावें बनी हैं, जिसमें नौ के ऊपर के सिरे नुकीले हैं। नदी के पश्चिमी तट से छठे का अग्रभाग अर्धवृत्ताकार है। पुल से थोड़ी दूर जाने पर कोट से घिरा हुआ चित्तौड़ का कस्बा आता है जिसको तलहटी (तलहट्टिका) कहते हैं। कस्बे में जिले की कचहरी है, जिस के पास से किले की चढ़ाई प्रारम्भ हो जाती है। दुर्ग के अंतिम प्रवेश तक कुल सात दरवाजे बनाये गये हैं। इसमें प्रवेश के रास्ते से लेकर अन्दर के परिसर तक कई एक इमारतें हैं, जिनका संक्षिप्त उल्लेख इस प्रकार है-

पाडन पोल[संपादित करें]

यह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहाँ तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।

रावत बाघसिंह का स्मारक[संपादित करें]

दुर्ग के प्रथम द्वार पाडन पोल के बाहर के चबूतरे पर ही रावत बाघसिंह का स्मारक बना हुआ है। महाराणा विक्रमादित्य के राज्यकाल में, सन् १५३५ (वि. सं. १५९१) में यहाँ की अव्यवस्था से प्रेरित हो गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। उस समय बालक होने के कारण हाड़ी रानी कर्मवती ने विक्रमादित्य व उदयसिंह को बूंदी भेजकर मेवाड़ के सरदारों को किले की रक्षा का कार्यभार सौंप दिया। प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह ने मेवाड़ का राज्य चिन्ह धारण कर महाराणा विक्रमादित्य का प्रतिनिधित्व किया तथा लड़ता हुआ इसी दरवाजे के पास वीरगति को प्राप्त हुआ। उसी वीर की स्मृति में यह स्मारक बनाया गया है।

भैरव पोल (भैरों पोल)[संपादित करें]

पाडन पोल से थोड़ा उत्तर की तरफ चलने पर दूसरा दरवाजा आता है, जिसे भैरव पोल के रुप में जाना जाता है। इसका नाम देसूरी के सोलंकी भैरोंदास के नाम पर रखा गया है, जो सन् १५३४ में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से युद्ध में मारे गये थे। मूल द्वार टूट जाने के कारण महाराणा फतहसिंह जी ने इसका पुनर्निर्माण कराया था।

जयमल व कल्ला की छतरियाँ[संपादित करें]

भैरव पोल के पास ही दाहिनी ओर दो छतरियाँ बनी हुई है। प्रथम चार स्तम्भों वाली छत्री प्रसिद्ध राठौड़ जैमल( जयमल बदनोर के राजा) के कुटुंबी कल्ला की है तथा दूसरी, छः स्तम्भों वाली छत्री स्वयं जैमल की है, जिसके पास ही दोनों राठौड़ मारे गये थे। सन् १५६७ (वि. सं. १६२४) में जब बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई की, उस समय सीसोदिया पता तथा मेड़तिया राठौर जैमल, दोनों महाराणा, उदयसिंह की अनुपस्थिति में दूर्ग के रक्षक नियुक्त हुए थे। इसी तीसरे शाके की लड़ाई के दिनों में एक रात्रि जब जैमल एक टूटी दीवार की मरम्मत करा रहे थे, उस समय अकबर की गोली से उनकी एक टांग बेकार हो गयी। लंगड़े जैमल को कल्ला ने अपने कंधों पर बिठाकर दूसरे दिन के युद्ध में उतारा था। उन दोनों ने मिलकर शत्रु सेना पर कहर ढा दिया। अन्त में दोनों भिन्न-भिन्न स्थानों पर वीरगति को प्राप्त हो गये। ये छतरियाँ उन्हीं की गौरवगाथाओं की याद दिलाती हैं।

हनुमान पोल[संपादित करें]

दुर्ग के तृतीय प्रवेश द्वार को हनुमान पोल कहा जाता है। क्योंकि पास ही हनुमान जी का मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक एवं दर्शनीय हैं।

गणेश पोल[संपादित करें]

हनुमान पोल से कुछ आगे बढ़कर दक्षिण की ओर मुड़ने पर गणेश पोल आता है, जो दुर्ग का चौथा द्वार है। इसके पास ही गणपति जी का मंदिर है।

जोड़ला पोल[संपादित करें]

यह दुर्ग का पाँचवां द्वार है और छठे द्वार के बिल्कुल पास होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहा जाता है।

लक्ष्मण पोल[संपादित करें]

दुर्ग के इस छठे द्वार के पास ही एक छोटा सा लक्ष्मण जी का मंदिर है जिसके कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल है।

राम पोल[संपादित करें]

लक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार मिलता है, जिससे होकर किले के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। यह दरवाजा किला का सातवां तथा अन्तिम प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है। इसके निकट ही महाराणाओं के पूर्वज माने जाने वाले सूर्यवंशी भगवान श्री रामचन्द्र जी का मंदिर है। यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला एवं हिन्दू संस्कृति का उत्कृष्ट प्रतीक है। दरवाजे से प्रवेश करने के बाद उत्तर वाले मार्ग की ओर बस्ती है तथा दक्षिण की ओर जाने वाले मार्ग से किले के कई दर्शनीय स्थल दिखते हैं।

पत्ता का स्मारक[संपादित करें]

रामपोल में प्रवेश करते ही सामने की तरफ लगभग ५० कदम की दूरी पर स्थित चबूतरे पर सीसोदिया पत्ता के स्मारक का पत्थर है। आमेर के रावतों के पूर्वज पत्ता सन् १५६८ में अकबर की सेना से लड़ते हुए इसी स्थान पर वीरगति को प्राप्त हुए थे। कहा जाता है कि युद्ध भूमि में एक पागल हाथी ने युद्धरत पत्ता को सूंड में पकड़कर जमीन पर पटक दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी।

कुकड़ेश्वर का कुण्ड तथा कुकड़ेश्वर का मंदिर[संपादित करें]

रामपोल से प्रवेश करने के बाद सड़क उत्तर की ओर मुड़ती है। उससे थोड़ी ही दूर पर दाहिनी ओर कुकड़ेश्वर का कुंड है, जिसके ऊपर के भाग में कुकड़ेश्वर का मंदिर है। किंवदन्तियों के अनुसार ये दोनों रचनाएं महाभारत कालीन है तथा पाण्डव पुत्र भीम से जुड़ी हैं।

हिंगलू आहाड़ा के महल तथा रत्नेश्वर तालाब[संपादित करें]

कुकड़ेश्वर मंदिर से आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ सड़क से कुछ दूर हिंगलू आहाड़ा के महल हैं। आहाड़ में रहने के कारण मेवाड़ के राजाओं का उपनाम आहाड़ा हुआ। डूंगरपुर तथा बांसवाड़े के राजा भी आहाड़ा कहलाते रहे। हिंगलू, डूंगरपुर का आहाड़ा सरदार था और इन महलों में रहता था, जिससे ये महल हिंगलू आहाड़ा के महल कहलाये। बूंदीवालों का हाड़ा के रुप में नाम प्रसिद्ध हो जाने से लोग इन महलों कोहिंगलू हाड़ा के महल कहने लगे।

इन महलों में महाराणा रत्नसिंह रहते थे। इसके पास बना तालाब महाराणा ने खुद बनवाया था, जो रत्नेश्वर का कुंड (रत्नेश्वर तालाब) के नाम से जानी जाती है। तालाब के पश्चिमी किनारे पर रत्नेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है।

लाखोटा की बारी[संपादित करें]

रत्नेश्वर कुंड से थोड़ी दूर पर पहाड़ी के पूर्वी किनारे के समीप लाखोटा की बारी है। यह एक छोटा सा दरवाजा है, जिससे दुर्ग के नीचे जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी द्वार के पास अकबर की गोली से जयमल लंगड़ा हो गया था।

जैन कीर्ति स्तम्भ[संपादित करें]

जैन कीर्ति स्तम्भ

लाखोटा की बारी से राज टीले तक सड़क सीधी दक्षिण में मुड़ जाती है, उसी स्थान पर बायीं ओर ७५ फीट ऊँचा, सात मंजिलों वाला एक स्तम्भ बना है, जिसका निर्माण चौदहवीं शताब्दी में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के बघेरवाल महाजन सा नांय के पुत्र जीजा ने करवाया था। यह स्तम्भ नीचे से ३० फुट तथा ऊपरी हिस्से पर १५ फुट चौड़ा है तथा ऊपर की ओर जाने के लिए तंग नाल बनी हुई हैं।

जैन कीर्ति स्तम्भ वास्तव में आदिनाथ का स्मारक है, जिसके चारों पार्श्व पर आदिनाथ की ५ फुट ऊँची दिगम्बर (नग्न) जैन मूर्ति खड़ी है तथा बाकी के भाग पर छोटी-छोटी जैन मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। इस स्तम्भ के ऊपर की छत्री बिजली गिरने से टूट गई थी तथा इससे इमारत को बड़ी हानि पहुँची थी। महाराणा फतह सिंह जी ने इस स्तम्भ की मरम्मत करवाई।

महावीर स्वामी का मंदिर[संपादित करें]

जैन कीर्ति स्तम्भ के निकट ही महावीर स्वामी का मन्दिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में ओसवाल महाजन गुणराज ने करवाया थ। हाल ही में जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग ने किया है। इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है।

नीलकंठ महादेव का मंदिर[संपादित करें]

महावीर स्वामी के मंदिर से थोड़ा आगे बढ़ने पर नीकण्ठ महादेव का मंदिर आता है। कहा जाता है कि महादेव की इस विशाल मूर्ति को पाण्डव भीम अपने बाजूओं में बांधे रखते थे।

सूरजपोल तथा चूड़ावत साँई दास का स्मारक[संपादित करें]

नीलकंठ महादेव के मंदिर के बाद किले के पूरब की तरफ एक दरवाजा है, जो सूरज पोल के नाम से जाना जाता है। यहाँ से दुर्ग के नीचे मैदान में जाने के लिए एक रास्ता बना हुआ है। इस दरवाजे के पास ही एक चबूतरा बना है, जो संलूबर के चंडावत सरदार रावत साईदास जी का स्मारक है। वे सन् १५६८ में अकबर की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

अद्बद्जी का मंदिर[संपादित करें]

रावत साँईदास के स्मारक से दक्षिण की तरफ जाने पर दाहिनी ओर अद्बद् (अद्भुतजी) का मंदिर है, जिसे महाराणा रायमल ने सन् १३९४ में बनवाया था। जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर की स्थापत्य कला दर्शनीय है। मंदिर में शिवलिंग है तथा उसके पीछे दीवार पर महादेव की विशाल त्रिमूर्ति है, जो देखने में समीधेश्वर मंदिर की प्रतिमा से मिलती है। अद्भुत प्रतिमा के कारण ही इस मंदिर को अद्बद् जी का मंदिर कहा जाता है।

राजटीला तथा चत्रंग तालाब[संपादित करें]

अद्बद्जी के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर राजटीला नामक एक ऊँचा स्थान है। कहा जाता है कि यहीं पहले मौर्यवंशी शासक मान के महल थे। कुछ लोगों का मानना है कि प्राचीन काल में राजाओं का राज्याभिषेक इसी स्थान पर हुआ करता था। इस स्थान के पास से सड़क पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। सड़क के पश्चिमी सिरे के पास चित्रांगद मौर्य का निर्माण कराया हुआ तालाब है, जिसको चत्रंग कहते हैं। यहाँ से अनुमानतः पौने मील दक्षिण मं। चित्तौड़ की पहाड़ी समाप्त हो जाती है और उसके नीचे कुछ ही दूरी पर चित्तोड़ी नाम की एक छोटी पहाड़ी है।

चित्तौड़ी बूर्ज व मोहर मगरी[संपादित करें]

दुर्ग का अंतिम दक्षिणी बूर्ज चित्तौड़ी बूर्ज कहलाता है और इस बूर्ज के १५० फीट नीचे एक छोटी-सी पहाड़ी (मिट्टी का टीला) दिखाई पड़ती है। यह टीला कृत्रिम है और कहा जाता है कि सन् १५६७ ई. में अकबर ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब अधिक उपयुक्त मोर्चा इसी स्थान को माना और उस मगरी पर मिट्टी डलवा कर उसे ऊँचा उठवाया, ताकि किले पर आक्रमण कर सके। प्रत्येक मजदूर को प्रत्येक मिट्टी की टोकरी हेतु एक-एक मोहर दी गई थी। अतः इसे मोहर मगरी कहा जाता है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]