गुहिल राजवंश

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मेवाड़ का शक्तिशाली राजवंंश गुुहिल के नाम से जाना जाता है इसका प्रारंभिक संंस्थापक राजा गुहादित्य थेे, जिन्होंने 566 ई. में मेवाड़ राज्य पर गुहिल वंंश की नींव रखी | गुुुहादित्य के पश्चात् 734 ई. में सम्राट बप्पा रावल को गुहिल वंश का वास्तविक संंस्थापक माना जाता है।

मेवाड़ का प्राचीन नाम शिवि था जिसकी राजधानी मध्यमिका (जिसे वर्तमान में नगरी कहते हैं) थी यहां पर मेहर जनजाति का अधिकार था और वह हमेशा मलेच्छों से संघर्ष करते रहे इसलिए इस क्षेत्र को मैद अर्थात मलेच्छों को मारने वाला की संज्ञा दी गई है । मैदपाट को धीरे धीरे मेवाड़ कहा जाने लगा । मेवाड़ की राजधानी उदयपुर बनी ।

मेवाड़ के राजा स्वयं को राम के वंशज बताते हैं, इसी कारण भक्तों एवं चरणों ने मेवाड़ के शासकों को रघुवंशी तथा हिंदुआ सूरज कहने लगे गुहिल राज्य के चिन्ह में जो दृढ़ राखे धर्म को ताहि राखे करतार अंकित है ।

मेवाड़ का गुहिल वंश राजस्थान का ही नहीं अपितु संसार के प्राचीनतम राजवंशों में से एक है जीसने सबसे लंबे समय तक एक प्रदेश पर शासन किया  

सूर्यवंशी महाराजा कनक सेन की 8वी पीढी में शिलादित्य नामक एक राजा हुवे । जो वल्लभीपुर में राज करते थे वहां पर मलेच्छों ने आक्रमण कर वल्लभीपुर को तहस-नहस कर दिया व शिलादित्य वीरगति को प्राप्त हुए शिलादित्य की सभी रानियां उनके साथ सती हो गई। शिलादित्य की एक रानी पुष्पावती गर्भवती थी तथा पुत्र की मन्नत मांगने के लिए वह अपने परमार वंश के पिता के राज्य चंद्रावती आबू में जगदंबा देवी के दर्शन करने गई थी पुष्पावती अपने पिता के घर से जब वापस वल्लभीपुर जा रही थी तो रास्ते में वल्लभीपुर के विनाश का समाचार मिला पुष्पावती यह सुनकर वहां पर सती होना चाहती थी परंतु गर्भावस्था के कारण यह संभव नहीं था पुष्पावती ने अपनी सहेलियों के साथ मल्लिया नामक गुफा में शरण ली जहां उसने अपने पुत्र का को जन्म दिया गुफा के पास वीरनगर नामक गांव था जिसमें कमलावती नाम की ब्राह्मणी रहती थी । रानी पुष्पावती ने उसे अपने पास बुलाकर अपने पुत्र के लालन-पालन का दायित्व सौंपकर सती हो गई । कमलावती ने रानी के पुत्र को अपने पुत्र की भांति रखा । वह बालक गुफा में पैदा हुआ था और उस प्रदेश के लोग गुफा को गोह कहते थे अतः कमलावती ने उस बच्चे का नाम गोह रखा जो आगे चलकर गुहिल के नाम से विख्यात हुआ । कमलावती ने बालक गुहिल को इडर के भील राजा मांडलिक को सौंप दिया । बालक गूहिल राजा मांडलिक के राजमहल में रहता और भील बालकों के साथ घुड़सवारी करता , भील कुमार नल और गुहिल का साथ रहा , कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार गुहील ने इडर के राजा मांडलिक भील की हत्या कर दी और 566 ई में गुहील वंश की नींव रखी ।

गोहिलादित्य का नाम उसके वंशधरों का गोत्र हो गया । गुहिल के वंशज गोहिल अथवा गुहिलोत के नाम से विख्यात हुए।

इसी गुहिलादित्य ने 566 ई के आस-पास मेवाड़ में इस वंश की नींव रखकर नागदा को गुहिल वंश की राजधानी बनाई । गोहिल की आठवीं पीढ़ी में नगादित्य नामक एक राजा हुआ जिसके व्यवहार से वहां के भील उससे नाराज हो गए एक दिन जब नागादित्य जंगल में शिकार खेलने गया तो भीलों ने उसे घेरकर वही मार डाला और इडर राज्य पर पुनःअपना अधिकार जमा लिया नागादित्य की हत्या भीलों ने कर दी तो राजपूतों को उसके 3 वर्षीय पुत्र बप्पा के जीवन को बचाने की चिंता सताने लगी। इसी समय वीरनगर की कमलावती के वंशज जो कि गोहिल राजवंश के कुल पुरोहित थे उन्होंने बप्पा को लेकर पांडेय नामक दुर्ग में गए इस जगह को बप्पा के लिए सुरक्षित ना मानकर बप्पा को लेकर लेकर पराशर नामक स्थान पर पहुंचे इसी स्थान के पास त्रिकूट पर्वत है इसकी तलहटी में नागेंद्र नामक नगर वर्तमान नागदा बसा हुआ था । वहां पर शिव की उपासना करने वाले बहुत से ब्राह्मण निवास करते थे उन्हें ब्राह्मणों ने बप्पा का लालन पालन करके करने का भार उठाया। बप्पा उन ब्राह्मणों के पशुओं को चराते थे उन पशुओं में से एक गाय जो कि सुबह बहुत ज्यादा दूध देती थी परंतु संध्या के समय आश्रम में वापस आती तो उसके थनों में दूध नहीं मिलता था ब्राह्मणों को संदेह हुआ कि बप्पा एकांत में उस गाय का दूध पी जाता है बप्पा को जब इस बात का पता चला तो वह वास्तविकता जानने के लिए दूसरे दिन जब गायों को लेकर जंगल में गया तो उसी गाय पर अपनी नजर रखी ।

बप्पा ने देखा कि वह गाय एक निर्जन गुफा में घुस गई बप्पा भी उसके पीछे गया और उसने वहां देखा की बेल पत्तों के ढेर पर वह गाय अपने दूध की धार छोड़ रही थी बप्पा ने उसके पास जाकर उन पत्तों को हटाया तो उसके नीचे एक शिवलिंग था । जिसके ऊपर दूध की धार गिर रही थी बप्पा ने उसी सीलिंग के पास एक समाधि लगाए हुए योगी को देखा उस योगी का ध्यान टूट गया परंतु उसने बप्पा से कुछ नहीं कहा बप्पा उस योगी हरित ऋषि की सेवा करने लगा हरित ऋषि ने उसकी सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर शिव मंत्र की दीक्षा देकर उसे एकलिंग के दीवान की उपाधि दी । हरित ऋषि के शिवलोक जाने का समय आया तो उसने बप्पा को निश्चित समय पर आने को कहा बप्पा निश्चित समय पर आने में लेट हो गया तब तक हरित ऋषि रथ पर सवार होकर शिवलोक की तरफ चल पड़े उन्होंने बप्पा को आते देखकर रथ की चाल धीमी करवाकर बप्पा को अपना मुंह खोलने को कहा हारित  ने उसके मुंह में थूॅकने का प्रयास किया तो बप्पा ने घृणा व अवज्ञा से अपना मुंह बंद कर लिया जिससे वह तो बप्पा के पैर के अंगूठे पर पड़ा हरित ऋषि ने उसे कहा कि यदि यह पान तुम्हारे मुंह में गिरता तो तुम अमर हो जाते फिर भी तुम्हारे पैर के अंगूठे पर गिरने से भी जहां तक तुम्हारा पाव जाएगा वहां तक तुम्हारा राज्य रहेगा हरित ऋषि ने बप्पा को मेवाड़ का राज्य वरदान में दे दिया । बप्पा रावल का मूल नाम कालभोज था । बप्पा रावल ने हरित ऋषि के आशीर्वाद से 734 ईसवी में चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया और चित्तौड़ के राजा मान मौर्य को पराजित कर 734 ईसवी से 800 ईसवी में चित्तौड़गढ़ में गुहिल वंश के साम्राज्य की स्थापना की । बप्पा रावल ने उदयपुर के समीप कैलाशपुरी नामक स्थान पर एकलिंग जी का मंदिर बनवाया ।

बप्पा रावल प्रथम गोहिल शासक थे जिसने मेवाड़ में सोने के सिक्के चलाए । बप्पा रावल की मृत्यु नागदा में हुई जहां उसकी समाधि बनी हुई है। जिसे वर्तमान में बप्पा रावल के नाम से जानते हैं। बप्पा रावल के बारे में कहा जाता है कि वह एक झटके में दो भैंसों की बलि देते थे । वह 33 हाथ की धोती और 16 हाथ का दुपट्टा पहनते थे । उनकी खड़ग 32 मन की थी । वह 4 बकरों का भोजन करते थे और उनकी सेना में 12 लाख 72000हजार सैनिक थे । आम्र कवि द्वारा लिखित एकलिंग प्रशस्ति में बप्पा रावल के सन्यास लेने की घटना की पुष्टि होती है ।

काल भोज के बाद उनके पुत्र खुमाण मेवाड़ के शासक बने । खुम्माण प्रथम के बाद मत्तट, भृतभट्ट सिंह, खुम्माण द्वितीय और खुमाण तृतीय मेवाड़ के क्रमशः शासक बने खुमान तृतीय के बाद भृतभट्ट द्वितीय इसके बारे में हमें आहड़ लेख 977 ईसवी से जानकारी मिलती है। 942 ईसवी के प्रतापगढ़ अभिलेख में उसे महाराजाधिराज की उपाधि से पुकारा गया । भृतभट्ट द्वितीय के बाद उसकी रानी राष्ट्रकूट राठौड़ वंश की रानी महालक्ष्मी से उत्पन्न हुए पुत्र अलहट मेवाड़ के शासक बने । जिसे आलू रावत कहा जाता है । अल्हट ने हूण राजकुमारी हरिया देवी के साथ विवाह कर हूणों कि वह अपने ननिहाल पक्ष राष्ट्रकूटों की सहायता से अपने साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया । अल्हट ने पहली बार नौकरशाही की शुरुआत की जो वर्तमान में भी पूरे देश में चल रही है ।

अल्हट ने नागदा से राजधानी बदलकर अपनी नई राजधानी आहड़ को बनाई और वहां पर वराह मंदिर का निर्माण करवाया ।अल्हट के बाद उसका पुत्र नरवाहन मेवाड़ का शासक बना । नरवाहन ने चौहानों के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए चौहान राजा जेजय की पुत्री से विवाह किया ।फिर क्रमशः शक्तिकुमार 977 - 993 ई,नरवर्म,शुचिवर्म,कीर्तिवर्मा,योगराज, वैरट,हंसपाल, वैरिसिह, विजयसिंह, अरिसिंह, चोङसिंह, विक्रम सिंह, रणसिंह (1158 ई ) रण सिंह विक्रम सिंह के पुत्र थे, इन्होंने आहोर के पर्वत पर एक किला बनवाया । इन्हीं के शासनकाल में गुहिल वंश दो शाखाओं में बट गया । प्रथम (रावल शाखा)- रण सिंह के पुत्र क्षेमसिंह रावल शाखा का निर्माण कर मेवाड़ पर शासन किया । द्वितीय (राणा शाखा) रणसिंह के दूसरे पुत्र राहप ने सिसोदा ठिकानों की स्थापना कर राणा शाखा की शुरुआत की । ये राणा सिसोदा ठिकाने में रहने के कारण आगे चलकर सिसोदिया कहलाए। क्षेमसिंह रावल शाखा की शुरुआत कर मेवाड़ के शासक बने। इसके सामंत सिंह हैं और कुशल सिंह नाम के दो पुत्र हुए। सामंत सिंह 1172 ई में मेवाड़ के शासक बने सामंत सिंह का विवाह अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज द्वितीय की बहन पृथ्वी बाई के साथ हुआ । नाडोल के चौहान शासक कीर्तिपाल व पृथ्वीराज द्वितीय के मध्य अनबन हो गई इसी कारण कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर आक्रमण कर सामंत सिंह को पराजित कर मेवाड़ राज्य छीन लिया सामंत सिंह ने 1178 ईस्वी में लगभग वागड़ में जाकर अपना नया राज्य बनाया जिसकी नई राजधानी वट पदक बड़ौदा थी । क्षेमसिंह के छोटे पुत्र कुमार सैनी 1179 ईस्वी में कीर्तिपाल को पराजित कर मेवाड़ के पुनः शासक बने ।

         जैत्र सिंह 1213 -1250 

तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मेवाड़ के शासक जैत्र सिंह बने ।उनके शासनकाल से पूर्व नाडोल के चौहान वंश के कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर अधिकार स्थापित किया था ।इस बेर के बदले में जेत्र सिंह ने समकालीन चौहान वंश के शासक उदय सिंह के विरुद्ध नाडोल पर चढ़ाई कर दी । नाडोल को बचाने के उद्देश्य से उदय सिंह ने अपनी पोत्री रूपा देवी का विवाह जत्र सिंह के पुत्र तेज सिंह के साथ कर मेवाड़ और नाडोल के बेर को समाप्त किया । जैत्र सिंह के समय दिल्ली सल्तनत पर गुलाम वंश के बादशाह इल्तुतमिश का शासन था । इल्तुतमिश ने जेत्र सिंह के बढ़ते हुए प्रभाव को दबाने के लिए मेवाड़ की राजधानी नागदा पर 1222 से 1229 ईस्वी में आक्रमण किया और इसे तहस-नहस कर दिया । इसी कारण जैत्र सिंह ने पहली बार अपने राज्य की राजधानी चित्तौड़गढ़ को बनाया । उसके बाद जेत्र सिंह व इल्तुतमिश के मध्य 1227 ईस्वी में भुताला का युद्ध हुआ, जिसमें जैत्र सिंह ने इल्तुतमिश को बुरी तरह पराजित किया, जिसके बारे में जयसिंह सूरी कृत हमीर हद मर्दन नामक पुस्तक से जानकारी मिलती है । डॉक्टर ओझा ने जैत्र सिंह की प्रशंसा में लिखा है कि दिल्ली के गुलाम सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी और बलवान राजा जैत्रसिंह ही हुआ जिसकी वीरता की प्रशंसा उसके विपक्षियों ने भी की है । तेजसिंह ( 1250 - 1273 ) जैत्र सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र तेज सिंह मेवाड़ के शासक बने। तेजसिंह एक प्रतिभा संपन्न शक्तिशाली शासक थे तेज सिंह ने परम भट्ठारक/ महाराजाधिराज/ परमेश्वर तथा चालूक्यों के समान उभावती/ वल्लभ प्रताप का विरुद्ध धारण किया था । तेजसिंह के शासनकाल में दिल्ली के शासक गयासुद्दीन बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया । तेज सिंह की रानी जयतल्लदेवी ने चित्तौड़ में श्याम पार्श्वनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया । तेज सिंह के शासनकाल में 1267 ईस्वी में आहङ नामक स्थान पर मेवाड़ चित्रकला शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी का चित्रण किया गया था ।

      समरसिंह ( 1273 - 1301 )

समर सिंह को कुंभलगढ़ प्रशस्ति में शत्रुओं की शक्ति का अपहरण करता लिखा गया है, जबकि आबू शिलालेख में उसे तुर्कों से गुजरात का उद्धारक लिखा गया है । चिरवे के लेख में उसे शत्रुओं का संहार करने में सिंह के समान सुर कहा गया है । अचलगच्छ की पट्टावली से स्पष्ट होता है कि आचार्य अमितसिंह सूरी के प्रभाव में समर सिंह ने अपने राज्य में जीव हिंसा पर रोक लगा दी थी ।समर सिंह के दो पुत्र रतन सिंह व कुंभकरण हुए । कुंभकरण अपने पिता की आज्ञा प्राप्त कर नेपाल चले गए और वहां पर अपने नए गुहिल वंश की स्थापना की । समर सिंह के दूसरे पुत्र रतन सिंह चित्तौड़ के शासक बने । इसकी जानकारी हमें कुंभलगढ़ प्रशस्ति तथा एकलिंग महात्म्य ग्रंथ में मिलती है।

     रतन सिंह 1301 से 1303 ईस्वी 

रतन सिंह ज्यों ही मेवाड़ की गद्दी पर बैठे तो उन्हें अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा । अल्लाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर किए जाने वाले आक्रमण में खिलजी के साथ प्रसिद्ध लेखक अमीर खुसरो था । अमीर खुसरो ने इस युद्ध का सजीव चित्रण करते हुए अपनी पुस्तक खजाइनुल फुतूह मैं लिखा है कि अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए 28 जनवरी 1303 ईस्वी को अपनी सेना सहित दिल्ली से रवाना हुआ । चित्तौड़ पहुंचकर गंभीरी और बैङच नदी के मध्य शाही शिविर लगाया । स्वयं खिलजी ने अपना शिविर चित्तौड़ी नामक डूंगरी पर लगवाया । 6 महीने तक यह घेरा चलता रहा । कुंभलगढ़ शिलालेख से पता चलता है कि इन छह माह के मध्य हुए छोटे-मोटे की युद्धो में सिसोदा का सामंत लक्ष्मण सिंह अपने सात पुत्रों सहित किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गए । जब चारों और सर्वनाश दिखाई दे रहा था । और शत्रु से बचने का कोई उपाय नहीं मिल रहा था । रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी ने 16000 राजपूत महिलाओं के साथ जोहर किया तथा रतन सिंह के दो सेनापति गोरा और बादल के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर किले के फाटक खोल कर शत्रुओं की सेना पर टूट पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए । यह चित्तौड़गढ़ का प्रथम साका था ।

इस प्रकार 26 अगस्त 1303 ईस्वीो को चित्तौड़गढ़ किला अलाउद्दीन खिलजी के अधीन हुआ । अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी शाही सेना का विनाश देख कर बहुत क्रोधित हुआ और उसने शाही सेना को चित्तौड़गढ़ की आम जनता के कत्लेआम करने का आदेश दे दिया ।अल्लाउद्दीन खिलजी कुछ दिन चित्तौड़ रुक कर अपने बेटे खिज्रखां को चित्तौड़गढ़ का शासन देकर दिल्ली लौट गया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खां के नाम पर चित्तौड़ का नाम बदलकर खिजराबाद रखा । खिज्रखाॅ ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग व उसके आसपास के मंदिरों तथा भवनों को तुड़वाकर किला पर पहुंचने के लिए गंभीरी नदी पर पुल बनवाया । चित्तौड़गढ़ की तलहटी में एक मकबरा बनाया गया, जिसमें 1310 ईस्वी में एक फारसी लेख में अलाउद्दीन खिलजी को उस समय का सुय ईश्वर की छाया व संसार का रक्षक बताया । 22 दिसंबर 1316 में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई इस कारण खिज्र खा चित्तौड़ से वापस दिल्ली गया । पीछे मेवाड़ राज्य मालदेव सोनगरा को सौंप गया ।

   राणा हमीर (1326 ईस्वी से 1364 )

राणा हमीर सिसोदा जागीर के सरदार लक्ष्मण सिंह का पोता था । लक्ष्मण सिंह अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करते हुए अपने साथ पुत्रों के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए। लक्ष्मण सिंह का एक लड़का अरिसिंह/अजय सिंह था जो कि भाग्य वास उस युद्ध में बच गया था । अजय सिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राणा हमीर सिसोदा जागीर का सरदार बना । राणा हमीर ने देखा कि अलाउद्दीन खिलजी के मरने के बाद दिल्ली सल्तनत की हालत सोचनीय है । उसने 1326 ईस्वी के आसपास दिल्ली सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के समय चित्तौड़ पर आक्रमण कर मालदेव के पुत्र जैसा/जयसिंह को मारकर जबकि (ङा.ओझा के अनुसार) मालदेव पुत्र बनवीर को मारकर चित्तौड़ पर पुनः अपना अधिकार स्थापित किया । ध्यातव्य रहे - राणा हमीर से पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश शासक रावल कहलाते थे और बाद में मेवाड़ का राजवंश सिसोदिया राजवंश के नाम से विख्यात हुआ हम राणा हमीर सिसोदिया को 'सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक' भी कहते हैं । मोहम्मद बिन तुगलक ने चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए हम्मीर पर आक्रमण किया । राणा हम्मीर ने पहाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए खेरवाड़ा को अपना केंद्र बनाया । राणा हम्मीर वह मोहम्मद बिन तुगलक के मध्य युद्ध हुआ, जिससे हम सिंगोली का युद्ध कहते हैं । राणा हम्मीर ने मेवाड़ की आपातकालीन स्थिति में पुन: अधिकार कर अच्छी स्थिति में पहुंचाया इसलिए उसे 'मेवाड़ का उद्धारक' कहते हैं । राणा हमीर विपरीत परिस्थिति में भी अपना हौसला नहीं खोया अतः उसे कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में 'विषम घाटी पंचानन/ विकेट आक्रमणों में सिंह के समान' कहा गया । कुंभा के द्वारा 'गीत गोविंद' पर लिखी गई रसिक प्रिया नामक टीका में राणा हम्मीर को 'वीर राजा' की उपाधि दी गई । राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग में अन्नपूर्णा माता का मंदिर बनवाया जिसकी जानकारी मोकल जी के शिलालेख से मिलती है । कर्नल जेम्स टॉड ने राणा हम्मीर को अपने समय का प्रबल हिंदू राजा माना है

मेवाड़ का महान सिसोदिया वंश (गुहिल)

राणा हम्मीर की मृत्यु के बाद उनके पुत्र क्षेत्र सिंह जिसे खेता के नाम से भी जानते हैं, मेवाड़ के शासक बने । क्षैत्र सिंह ने मालवा के दिलावर खान गौरी को परास्त कर मेवाड़ - मालवा संघर्ष का सूत्रपात किया । हाडोती के हाडा शासकों को दबाने का श्रेय भी खेता को ही जाता है। 1382 ईस्वी में जब क्षेत्र सिंह ने आक्रमण किया तो उस युद्ध में क्षेत्र सिंह वह बूंदी का लाल सिंह हाडा भी मारा गया ।

राणा लाखा /लक्ष सिंह (1382 - 1421 )

महाराणा हम्मीर के पुत्र व खेता के पुत्र लक्ष सिंह हैं लाखा 1382 इश्वी में मेवाड़ के शासक बने ।लाखा के शासनकाल में भाग्यवश जावर उदयपुर में चांदी की खान निकली ।उस खान की आय से उसने कई किलो व मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया । लाखा के शासनकाल में एक पिचू नामक चिड़ीमार बंजारे के बेल की स्मृति में पिछोला झील का निर्माण करवाया ।

    पिछोला झील 

पिछोला झील बेङच नदी पर स्थित है इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में राणा लक्खा के शासनकाल में हुआ । महाराणा उदय सिंह ने इसकी पाल को पक्का करवाया ।इसमें सीसारमा व बूजड़ा नदी आकर गिरती है ।इस झील में जग मंदिर( करण सिंह ने 1620 ईस्वी में शुरू तथा जगत सिंह प्रथम ने 1651 ईस्वीें में पूर्ण करवाया) जगनिवास जगत सिंह द्वितीय ने 1746 ईस्वी में पूर्ण करवाया ।महाराणा प्रताप और मानसिंह की मुलाकात इसकी पाल पर हुई थी। लाखा के दरबार में संस्कृत के प्रज्ञात विद्वान झोटिंग भट्ट और धनेश्वर भट्ट रहते थे ।

लाखा के शासनकाल में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। लखा ने दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन द्वितीय को बदनोर के समीप हुए युद्ध में पराजित करके हिंदुओं से लिए जाने वाले तीर्थ कर को समाप्त करने का वचन लिया । 1396 ई में गुजरात के जफर खान ने मांडलगङ पर आक्रमण किया लेकिन लाखा ने इस आक्रमण को विफल कर दिया ।लाखा ने बूंदी के राव बर सिंह हाड़ा को मेवाड़ का प्रभुत्व मानने के लिए विवश किया। मारवाड़ के शासक रणमल ने अपनी बहन हँसा बाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा के पुत्र चूंडा से करने का सोचा । रणमल ने चुंडा के लिए सगाइ का नारियल मेवाड़ दरबार में भेजा, उस समय राणा लाखा का पुत्र चुंडा दरबार में नहीं थे । सगाई के नारियल को देखकर महाराणा लाखा ने मजाक करते हुए कहा कि यह बुढ़ापे में मेरे साथ किस ने मजाक किया। चुंडा को दरबार में न देखकर रणमल का दास वापस रणमल के पास पहुॅचा ।

दास ने सारी बात रणमल को कहीं तो रणमल ने दास को वापस लाखा के पास सशर्त सगाई का नारियल देकर भेजा शादी की शर्त रखी कि मेरी बहन के होने वाले पुत्र को राणा अपना उत्तराधिकारी बनाए तो मैं अपनी बहन की शादी राणा लाखा के साथ कर दूंगा महाराणा लाखा इस शर्त को स्वीकार कर लेते हैं तो मैं अपनी बहन हंसा की शादी महाराणा लाखा के साथ करने को तैयार था लेकिन उसे इस बात का पता था कि उनकी बहन महाराणा लाखा की रानी तो बनेगी लेकिन उसकी कोख से जन्म लेने वाला बालक मेवाड़ का शासक कभी नहीं बन पायेगा। आखिर मेवाड़ की राजगद्दी पर तो महाराणा लाखा के बाद चूंडा का ही अधिकार है। राव रणमल की इस बात का जवाब देते हुए चूंडा ने भरे दरबार में भीष्म प्रतिज्ञा की कि मैं आजन्म मेवाड़ के महाराणा का सेवक बनकर रहुंगा और मेरे वंशज कभी भी मेवाड़ की राजगद्दी पर हक नहीं जतायेंगे। इस भीष्म प्रतिज्ञा के बाद महाराणा लाखा का हंसाकंवर के साथ विवाह कर दिया गया। चूंडा द्वारा सत्ता त्याग के बारे में राजस्थानी गीतों, बड़वों व राणीमंगों की पोथियों में कुछ अलग-अलग रूप में मिलता है। सभी में चूंडा की प्रशंसा की गई,  बहन हनसा भाई की शादी महाराणा लाखा से कर देते हैं।

      मेवाड़ के भीष्म पितामह 
इसी कारण चूंडा को मेवाड़ का भीष्म पितामह कहते हैं  ।

लाखा वह हंसा बाई के विवाह के 13 महीने बाद हंसाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम मोकल रखा गया। राणा लाखा जब मृत्यु की शैय्या पर थे तो उन्होने अपने बड़े पुत्र चूंडा को अपने पास बुलाकर अपने छोटे पुत्र मोकल का संरक्षक बनाया ।


मेवाड़ का महान सिसोदिया वंश (गुहिल) राणा मोकल (1421-1433 ) जिस समय लाखा की मृत्यु हुई तो मोकल मात्र 12 वर्ष के थे । राणा लाखा के कहे अनुसार उनके बड़े भाई चूंडा राज्य के सभी कार्यों को बड़ी कुशलता से कर रहे थे । हंसा बाई ( मोकल की मां व चूंडा की सौतेली मां ) हमेशा चूंडा को शक की दृष्टि से देखती थी । चूंडा परेशान होकर मेवाड़ छोड़कर मालवा चले गए ।हंसा बाई ने अपने भाई रणमल को मोकल के संरक्षक का कार्य करने के लिए मारवाड़ से मेवाड़ बुला लिया । रणमल ने शीघ्र ही मेवाड़ में ऊंचे पदों पर राठौड़ों की नियुक्ति कर दी । इसी कारण सिसोदिया सरदार रणमल से नाराज हो गए। रणमल मारवाड़ का ही स्वामी नहीं रहा बल्कि मेवाड़ का भी सर्वे सर्वा बन गया ।

सिसोदिया सरदारों को रणमल सत्ता से वंचित कर उन्हें अपमानित कर रहा था । 1 दिन रणमल आवेश में आकर मेवाड़ सरदार राघव देव ( राणा चुंडा के भाई ) जैसे योग्य व्यक्ति की हत्या करवा दी इससे राठौड़ों वह सिसोदिया में वैमनस्य की कई गहरी होती गई।

  मोर्कल ने 1428 ईसवी के लगभग नागौर के फिरोज खान को रामपुरा के युद्ध में परास्त किया । फिरोज खान का साथ देने आई गुजरात की सेना को भी हार का मुंह देखना पड़ा गुजरात के शासक अहमद शाह ने मेवाड़ पर 1433 ईस्वी को आक्रमण कर दिया। मोकल को इस आक्रमण का पता चला तो वह भी उस से युद्ध करने के लिए रवाना हुआ और झीलवाड़ा नामक स्थान पर पहुंचा । युद्ध के मैदान में ही मोकल के सिसोदिया सरदार जो कि रणमल के हार के कारणों कल से नाराज थे। माहपा पवार के कहने पर माहाराणा  क्षेत्र सिंह  (खेता) की खातिन जाति की दासी से उत्पन्न हुए 2 पुत्र चाचा वह मेरा ( एक बार मोकल ने जंगल में चाचा वह मेरा से प्रसंग में किसी वृक्ष का नाम पूछ लिया तो वह इसे ताना समझ गए क्योंकि उनकी माता खातिन  थी । इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने मोकल को मार दिया) ने अवसर पाकर उसकी हत्या कर दी । 

उस दिन से मेवाड़ में कहावत प्रचलित हुई की दीवार में आला खेत में नाला और घर में साला बर्बाद करके ही जाता है राणा मोकल ने हिंदू परंपरा को स्थापित करने के लिए तुलादान पद्धति को लागू किया । इस परंपरा के तहत मंदिरों के लिए सोना चांदी दान के रूप में दिया जाता था । महाराणा मोकल ने एकलिंग जी के मंदिर के परकोटे का निर्माण कराया । मोकल ने चित्तौड़ दुर्ग में परमार वंश के द्वारा बनवाए गए त्रिभुवन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाकर समद्वेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्धि दिलाई ।

              सौभाग्यदेवी 

सौभाग्य देवी परमार वंश की राजकुमारी थी । जिसका विवाह मेवाड़ के शासक राणा लाखा के पुत्र मोकल के साथ हुआ । इस सौभाग्य देवी की कोख से 1423 ईस्वी में महाराणा कुंभा का जन्म हुआ ।

            कमलावती 

कमलावती मेवाड़ के शासक राणा मोकल की रानी थी। 1433 ईस्वी में गुजरात के शासक अहमद शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया । अहमद शाह एवं मोकल के मध्य जिलवाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ । इसी समय जंहा क्षेत्र सिंह के दासी पुत्र चाचा और मेरा ने मिलकर मोकल की हत्या कर दी ।उस समय रानी कमलावती ने मात्र 500 सैनिकों के साथ मुस्लिम सेना का सामना किया। वह अधिक समय तक मुस्लिम सेना के सामने टिक न सकी ओर अंत में वह जलती चिता में कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त की ।


महाराणा कुंभा (1433 - 1468 ) महाराणा कुम्भा एक ऐसा वीर योद्धा जिसने 30 साल के अपने शासन में कभी कोई युद्ध नही हारा। महाराणा कुंभा का जन्म 1423 ईस्वी को महाराणा मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी के गर्भ से हुआ । मोकल की हत्या के समय कुंभा जिलवाड़ा के उसी शिविर में उपस्थित थे । उन हत्यारों ने कुंभा पर भी हमला किया किंतु उनके शुभचिंतकों ने उन्हें वहां से बचाकर सकुशल चित्तौड़ ले गए। चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभा को मात्र 10 वर्ष की आयु में 1433 ईस्वी में मेवाड़ का महाराणा बनाया गया ।

                                  कुंभा मेवाड़ का महाराणा तो बने उनके सामने बहुत भयंकर दो समस्याएं थी ---

पहली -- अपने पिता के हत्यारों चाचा व मेरा को सजा देना ।

दूसरी -- अपने पिता के मामा रणमल राठौड़ के मेवाड़ में बढ़ रहे प्रभाव को समाप्त करना ।

महाराणा कुंभा एक अच्छे शासक ही नहीं अपितु राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने दिमाग का प्रयोग करते हुए रणमल राठौड़ को मारवाड़ से अपने पिता के हत्यारों का दमन करने के लिए सैनिकों सहित बुलाया। रणमल मेवाड़ पहुंचा तो कुंभा ने अपने पिता के हत्यारों पर आक्रमण किया और चाचा वह मेरा की हत्या कर दी । इस प्रकार कुंभा की पहली समस्या का हल हुआ।

             कुंभा के सामने दूसरी समस्या रणमल की थी। मेवाड़ी सिसोदिया सरदारों ने अपने वैमनस्य  को दूर करने के लिए षड्यंत्र रचकर सन 1438 ईस्वी में रणमल की हत्या करवा दी।

एक जन श्रुति के अनुसार रणमल मेवा राठौड़ की हत्या इस प्रकार हुई कि हनसा बाई की एक दासी डावरी प्राचीन काल में राजा लोग अपनी पुत्री के साथ दहेज के रूप में कुछ लड़कियां भेजते थे उन्हें दासिया डावरिया कहा जाता था । दासी जिसका नाम भारमली था । भारमली को रणमल राठौड़ दिलो जान से चाहता था।भारमली कुंभा को अपने पुत्र के समान चाहती थी। रणमल राठौड़ ने बार भारमली द्वारा कुंभा को जहर देने के लिए कई बार कहा किंतु 1 दिन कुंभा ने भारमली से रणमल को जहर देने को कहा बार भारमली ने 1438 ईस्वी में शराब में जहर देकर रणमल की हत्या कर दी। इस प्रकार कुंभा की दोनों समस्याओं का हल हो गया । राव जोधा को जब अपने पिता रणमल की हत्या करने का पता चला तब वह मेवाड़ में ही था । मेवाड़ से जोधा अपनी जान बचाकर मारवाड़ की तरफ भागा, कुंभा की सेना ने उसका पीछा कर उसको वहां से भगा दिया । राव जोधा वहां से वापस मेवाड़ अपनी बुआ हनसाबाई के पास पहुंचा राव जोधा की बुआ व कुंभा की दादी हनसाबाई ने इन दोनों के मध्य मध्यस्था कराते हुए संधि करवाई जो 'आवल बावल' के नाम से जानी जाती है। आवल बावल की संधि के तहत मेवाड़ में मारवाड़ की सीमा का निर्धारण हुआ मेवाड़ में मारवाड़ की सीमा निर्धारण का मुख्य बिंदु सोजत था।

    राव जोधा ने कुंभा से अधिक मेलजोल बनाने व विश्वास प्राप्त करने के लिए अपनी पुत्री श्रंगार देवी का विवाह कुंभा के छोटे पुत्र रायमल से करवा दिया । जिसकी जानकारी हमें श्रंगार देवी द्वारा बनाई गई 'घोसुंडी की बावड़ी' पर लगी प्रशस्ति से मिलती है।


   मेवाड़-मालवा (माॅङू संबंध)

चाचा वह मेरा का साथी महपा पवार व चाचा का पुत्र अक्का मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम के पास चला गया। कुंभा ने मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी को पत्र लिखकर उसके विद्रोहियों को वापस लौटाने को कहा। महमूद खिलजी ने शरण में आए हुए व्यक्तियों को भेजने से इंकार कर दिया, प्रत्युत्तर मैं महाराणा कुंभा ने मांडू पर चढ़ाई कर दी ।

 इस आक्रमण का दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि मालवा के दिवंगत सुल्तान होशंग शाह के बाद वहां उत्तराधिकारी युद्ध हुआ। जिसके  तहत महमूद खिलजी ने होशंग शाह के पुत्र उमर खान को मालवा की गद्दी से हटाकर स्वयं मालवा का सुल्तान बन गया। उमर खान मेवाड़ के कुंभा से सैनिक सहायता मांगने के लिए गया तो कुंभाे ने मालवा के राजा महमूद खिलजी पर आक्रमण कर दिया ।इन दोनों के मध्य 1437 ईसवी में सारंगपुर नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें  महाराणा कुंभा की विजय  हुई। 
मालवा विजय के उपलक्ष्य में कुंभा ने चित्तौडग़ढ़ में ( 1440 - 1448 ) में कीर्ति स्तंभ का निर्माण करवाया ।

महाराणा कुंभा महमूद खिलजी को बंदी बनाकर अपने साथ ले आए जिसे 6 महीने तक कैद रखने के बाद महमूद खिलजी को रिहा कर दिया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी रिया होकर गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन के पास पहुंचा ।

        1456 ईस्वी में नागौर के स्वामी फिरोज खान के मरने के बाद उसका पुत्र शम्स खान नागौर का स्वामी हुआ।  गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने उसे हटाकर उसके छोटे भाई मुजाहिद खान को नागौर का शासक बनाया । शम्स खान ने कुंभा की सहायता से सशर्त पुन: नागौर का शासक बना । जब शम्स  खान ने कुंभा की शर्त नहीं मानी तो कुंभा  ने नागौर पर आक्रमण किया । शम्स खान ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन की सहायता से कुंभा का मुकाबला किया। शम्स खान की इस युद्ध में  पराजय हुई ।  कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति के अनुसार महाराणा कुंभा ने नागौर की मस्जिद को जलाया, किले को तुड़वाकर खाई भरवाई, हाथियों को छीनकर यवनियों को कैद करके उसने गायों को छुड़वाया और नागौर को चारागाह में बदल दिया ।


मेवाड़ के महान शासक सिसोदिया

महाराणा कुंभा के समय गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन शाह मेवाड़ पर आक्रमण करने की सोच रहा था । मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम का दूत ताज खान उसके पास पहुंचा। ताज खा ने मांडू और गुजरात की संयुक्त शक्ति को मिलाकर मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार बनाया। मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी व गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह के मध्य 1456 ईस्वी में 'चंपानेर' नामक स्थान पर सशर्त संधि हुई की 'मेवाड़' को जीतने के बाद दोनों मेवाड़ का आधा आधा हिस्सा बांट लेंगे। इस संधि को चंपानेर की संधि कहते हैं। संधि के तहत दोनों ने 1457 इश्वी में मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया । कुतुबुद्दीन तो पहले ही कुंभलगढ़ दुर्ग में पराजित होकर गुजरात वापस लौट गया । कुंभा महमूद खिलजी की ओर बढ़े बैराठगढ़ (बदनोर) के युद्ध में 1457 ईस्वी में महमूद खिलजी को पराजित कर इस विजय के उपलक्ष्य में बदनोर (भीलवाड़ा) में 'कुशाल माता' का भव्य मंदिर बनवाया ।


कुंभा की उपाधियां

कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति तथा कुंभलगढ़ प्रशस्ति से हमें महाराणा कुंभा की उपाधियों की जानकारी मिलती है कुंभा को साहित्य ग्रंथों व प्रशस्तियों में - अभिनव व भरताचार्य महाराजाधिराज' रावराय, राय रायन" (1) महाराजाधिराज - राजाओं का राजा होने के कारण । (2) महाराजा - अनेक राज्यों को अपने अधिकार में रखने के कारण । (3) राणा - रासो विद्वानों का आश्रय दाता होने के कारण । (4) राजगुरु - राजनीतिक सिद्धांतों में दक्ष होने तथा विभिन्न राजाओं, सामंतों व जागीरदारों का हितेषी होने के कारण। (5) दानगुरु - विद्वानों कलाकारों व निर्धनों को दान देने के कारण । (6) परमगुरु - विभिन्न विद्याओं का ज्ञाता तथा अपने समय का सर्वोच्च शासक होने के कारण । प्रसिद्ध गीत गोविंद नामक पुस्तक पर लिखी टीका 'रसिकप्रिया' में भी कुंभा की निम्न उपाधियों का वर्णन मिलता है । (7) नरपति- सामान्य मानव से श्रेष्ठ होने के कारण । (8) अश्वपति- कुशल घुढ़सवार होने के कारण । (9) गणपति - गण का अर्थ राज्य होता था अर्थात राज्य का राजा होने के कारण। (10) छापगुरु - छापामार युद्ध पद्धति में निपुण होने के कारण। (11) हिंदू सुरताण - समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा हिंदुओं की रक्षा करने वाला विभूषित किया गया है। (12) नंदीकेश्वर अवतार - नंदीकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण। (13) नाटकराज - नृत्यशास्त्र के ज्ञाता होने के कारण। (14) शेलगुरु - युद्ध में निपुण होने के कारण । (15) चापगुरु - धनुर्विद्या का ज्ञाता होने के कारण। (16) धीमान बुद्धिमत्ता पूर्वक निर्माण कार्य करवाने के कारण अभिनव भरता चार्य श्रेष्ठ वीणा वादक एवं संगीत के छेत्र में कुंभा के विपुल ज्ञान के कारण संगीत प्रेम के कारण प्रजा पालक जनता का हितैषी होने के कारण।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]