महाराणा कुम्भा
| कुम्भा | |
|---|---|
| महाराणा राज्यगुरु [1] धनुर्गुरु[1] चित्रगुरु[1] शैलगुरु[1] अभिनवभृताचार्य हिंदू सुल्तान [1] | |
महाराणा कुम्भा | |
| शासनावधि | 1433 - 1468 |
| राज्याभिषेक | 1433 |
| पूर्ववर्ती | मोकल |
| उत्तरवर्ती | ऊदा सिंह (उदयसिंह प्रथम) |
| जन्म | 1423 |
| संतान | ऊदा सिंह, राणा रायमल, रमाबाई (वागीश्वरी) |
| राजवंश | सिसोदिया राजवंश |
| पिता | राणा मोकल, मेवाड़ |
| माता | सौभाग्यवती परमार |
| मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के शासक (1326–1948 ईस्वी) | ||
|---|---|---|
| राणा हम्मीर सिंह | (1326–1364) | |
| राणा क्षेत्र सिंह | (1364–1382) | |
| राणा लखा | (1382–1421) | |
| राणा मोकल | (1421–1433) | |
| राणा कुम्भ | (1433–1468) | |
| उदयसिंह प्रथम | (1468–1473) | |
| राणा रायमल | (1473–1508) | |
| राणा सांगा | (1508–1527) | |
| रतन सिंह द्वितीय | (1528–1531) | |
| राणा विक्रमादित्य सिंह | (1531–1536) | |
| बनवीर सिंह | (1536–1540) | |
| उदयसिंह द्वितीय | (1540–1572) | |
| महाराणा प्रताप | (1572–1597) | |
| अमर सिंह प्रथम | (1597–1620) | |
| करण सिंह द्वितीय | (1620–1628) | |
| जगत सिंह प्रथम | (1628–1652) | |
| राज सिंह प्रथम | (1652–1680) | |
| जय सिंह | (1680–1698) | |
| अमर सिंह द्वितीय | (1698–1710) | |
| संग्राम सिंह द्वितीय | (1710–1734) | |
| जगत सिंह द्वितीय | (1734–1751) | |
| प्रताप सिंह द्वितीय | (1751–1754) | |
| राज सिंह द्वितीय | (1754–1762) | |
| अरी सिंह द्वितीय | (1762–1772) | |
| हम्मीर सिंह द्वितीय | (1772–1778) | |
| भीम सिंह | (1778–1828) | |
| जवान सिंह | (1828–1838) | |
| सरदार सिंह | (1838–1842) | |
| स्वरूप सिंह | (1842–1861) | |
| शम्भू सिंह | (1861–1874) | |
| उदयपुर के सज्जन सिंह | (1874–1884) | |
| फतेह सिंह | (1884–1930) | |
| भूपाल सिंह | (1930–1948) | |
| नाममात्र के शासक (महाराणा) | ||
| भूपाल सिंह | (1948–1955) | |
| भागवत सिंह | (1955–1984) | |
महाराणा कुम्भा या महाराणा कुम्भकर्ण (मृत्यु 1468 ई.) सन 1433 से 1468 तक मेवाड़ के राजा रहे थे। भारत के राजाओं में उनका बहुत ऊँचा स्थान है। उनसे पूर्व राजपूत केवल अपनी स्वतंत्रता की जहाँ-तहाँ रक्षा कर सके थे। कुंभकर्ण ने मुसलमानों को अपने-अपने स्थानों पर हराकर राजपूती राजनीति को एक दोहरा रूप दिया। इतिहास में ये 'राणा कुंभा' के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। महाराणा कुुुम्भा को चित्तौड़ दुर्ग का आधुुुनिक निर्माता भी कहते हैं क्योंकि इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग के अधिकांश वर्तमान भाग का निर्माण कराया।
महाराणा कुंभा राजस्थान के शासकों में सर्वश्रेष्ठ थे। मेवाड़ के आसपास जो उद्धत राज्य थे, उन पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित किया। 35 वर्ष की अल्पायु में उनके द्वारा बनवाए गए 32 दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं, वहीं इन पर्वत-दुर्गों में चमत्कृत करने वाले देवालय भी हैं।[2][3] उनकी विजयों का गुणगान करता विश्वविख्यात विजय स्तंभ भारत की अमूल्य धरोहर है। कुंभा का इतिहास केवल युद्धों में विजय तक सीमित नहीं थी बल्कि उनकी शक्ति और संगठन क्षमता के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता भी आश्चर्यजनक थी। ‘संगीत राज’ उनकी महान रचना है जिसे साहित्य का कीर्ति स्तंभ माना जाता है।
महाराणा कुम्भा की उपाधियाँ :- अभिनवभृताचार्य, राणेराय, रावराय, हालगुरू, शैलगुरु, दानगुरु, छापगुरु, नरपति, परपति, गजपति, अश्वपति, हिन्दू सुरतान, नन्दीकेश्वर, परम भागवत, आदि वराह।
परिचय
[संपादित करें]महाराणा कुम्भकर्ण, महाराणा मोकल के पुत्र थे और उनकी मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठे। उन्होंने अपने पिता के मामा रणमल राठौड़ की सहायता से शीघ्र ही अपने पिता के हत्यारों से बदला लिया। इनके तीन संताने थी जिसमें दो पुत्र उदा सिंह , राणा रायमल तथा राणा एक पुुत्री रमाबाई (वागीश्वरी) थे |[उद्धरण चाहिए] 1437 ई. में मालवा के सुलतान महमूद खिलजी को भी उन्होंने उसी साल सारंगपुर के पास बुरी तरह से हराया और इस विजय के स्मारक स्वरूप चित्तौड़ का विख्यात विजय स्तम्भ बनवाया। राठौडों के बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप से आशंकित होकर चुण्डा को वापस बुलवाया गया, जिसने रणमल को मरवा दिया और फिर कुछ समय के लिए मंडोर का राज्य भी मेवाड़ के अधिकार में आ गया। राज्यारूढ़ होने के सात वर्षों के भीतर ही उन्होंने सारंगपुर, नागौर, नराणा, अजमेर, मंडोर, मांडलगढ़, बूंदी, खाटू, चाटूस आदि के सुदृढ़ किलों को जीत लिया और दिल्ली के सुलतान सैयद मुहम्मद शाह और गुजरात के सुलतान अहमदशाह को भी परास्त किया। उनके शत्रुओं ने अपनी पराजयों का बदला लेने का बार-बार प्रयत्न किया, किंतु उन्हें सफलता न मिली। मालवा के सुलतान ने पांच बार मेवाड़ पर आक्रमण किया। नागौर के स्वामी शम्स खाँ ने गुजरात की सहायता से स्वतंत्र होने का विफल प्रयत्न किया। यही दशा आबू के देवड़ों की भी हुई। मालवा और गुजरात के सुलतानों ने मिलकर महाराणा पर आक्रमण किया किंतु मुसलमानी सेनाएँ फिर परास्त हुई। महाराणा ने अन्य अनेक विजय भी प्राप्त किए। उसने डीडवाना(नागौर) की नमक की खान से कर लिया और खंडेला, आमेर, रणथंभोर, डूँगरपुर, सीहारे आदि स्थानों को जीता। इस प्रकार राजस्थान का अधिकांश और गुजरात, मालवा और दिल्ली के कुछ भाग जीतकर उसने मेवाड़ को महाराज्य बना दिया।
किंतु महाराणा कुंभकर्ण की महत्ता विजय से अधिक उनके सांस्कृतिक कार्यों के कारण है। उन्होंने अनेक दुर्ग, मंदिर और तालाब बनवाए तथा चित्तौड़ को अनेक प्रकार से सुसंस्कृत किया। कुंभलगढ़ का प्रसिद्ध किला उनकी कृति है। बंसतपुर को उन्होंने पुनः बसाया और श्री एकलिंग के मंदिर का जीर्णोंद्वार किया। चित्तौड़ का कीर्तिस्तम्भ तो संसार की अद्वितीय कृतियों में एक है। इसके एक-एक पत्थर पर उनके शिल्पानुराग, वैदुष्य और व्यक्तित्व की छाप है। अपनी पुत्री रमाबाई ( वागीश्वरी ) के विवाह स्थल के लिए चित्तौड़ दुर्ग मेंं श्रृंगार चंवरी का निर्माण कराया तथा चित्तौड़ दुर्ग में ही विष्णु को समर्पित कुम्भश्याम जी मन्दिर का निर्माण कराया।
मेवाड़ के राणा कुुुम्भा का स्थापत्य युग स्वर्णकाल के नाम से जाना जाता है, क्योंकि कुुुम्भा ने अपने शासनकाल में अनेक दुर्गों, मन्दिरों एंव विशाल राजप्रसादों का निर्माण कराया, कुम्भा ने अपनी विजयों के लिए भी अनेक ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण कराया, वीर-विनोद के लेखक श्यामलदस के अनुसार कुुुम्भा ने कुल 32 दुर्गों का निर्माण कराया था जिसमें कुभलगढ़, अलचगढ़, मचान दुर्ग, भौसठ दुर्ग, बसन्तगढ़ आदि मुख्य माने जाते हैं तथा कुुुम्भा के काल में धरणशाह नामक व्यापारी ने देपाक नामक शिल्पी के निर्देशन मे रणकपुर के जैन मदिंरो का निर्माण करवाया था।
राणा कुम्भा बड़े विद्यानुरागी थे। संगीत के अनेक ग्रंथों की उन्होंने रचना की और चंडीशतक एवं गीतगोविन्द आदि ग्रंथों की व्याख्या की। वे नाट्यशास्त्र के ज्ञाता और वीणावादन में भी कुशल थे। कीर्तिस्तम्भों की रचना पर उन्होंने स्वयं एक ग्रंथ लिखा और मंडन आदि सूत्रधारों से शिल्पशास्त्र के ग्रंथ लिखवाए। इस महान राणा की मृत्यु अपने ही पुत्र उदयसिंह के हाथों हुई।
- रचित ग्रन्थ
संगीत राज, संगीत मीमांसा, संगीत सुधा प्रबंध, संगीतक्रम दीपिका, वाद्य प्रबंध, सद्प्रबंध (संगीत से संबंधित), संगीत रत्नाकर, हरिवर्तिका, रसिक प्रिया की टीका, कामराज रतिसार, चंडीशतक टीका
युद्ध एवं सैन्य अभियान
[संपादित करें]नागौर का युद्ध
[संपादित करें]वर्ष 1455 ई. में नागौर के सुल्तान फिरोज़ ख़ान की मृत्यु हो गई। वे गुजरात के राजाओं के परिवार से थे और दिल्ली के सुल्तानों के अधीन नागौर के गवर्नर रह चुके थे, लेकिन बाद में स्वतंत्र शासक बन गए थे। उनकी मृत्यु के बाद, उनके बड़े पुत्र शम्स ख़ान ने नागौर की गद्दी संभाली, परंतु छोटे भाई मुजाहिद ख़ान ने उन्हें हटा दिया और उनके जीवन पर भी खतरा मंडराने लगा। शम्स ख़ान शरण लेने के लिए मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के पास पहुँचे। महाराणा कुम्भा, जो पहले से ही नागौर को अपने नियंत्रण में लेने का विचार रखते थे, ने शम्स ख़ान को शर्तों पर सहायता देने का प्रस्ताव दिया, शम्स ख़ान महाराणा की आधिपत्य स्वीकार करें और नागौर दुर्ग की किलेबंदी का एक हिस्सा गिराएँ। शम्स ख़ान ने ये शर्तें स्वीकार कर लीं।[4] महाराणा कुम्भा ने अपनी सेना के साथ नागौर पर चढ़ाई की, मुजाहिद ख़ान को हराया (जो गुजरात की ओर भाग गया) और शम्स ख़ान को गद्दी पर बैठाया। महाराणा ने शम्स ख़ान से शर्तें पूरी करने की माँग की, परंतु शम्स ख़ान ने विनती की कि तुरंत किलेबंदी न गिराई जाए, क्योंकि उनके दरबारी उन्हें मार सकते हैं। महाराणा कुम्भा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और मेवाड़ लौट गए। लेकिन जैसे ही महाराणा कुम्भा कुम्भलगढ़ पहुँचे, उन्हें ज्ञात हुआ कि शम्स ख़ान ने किलेबंदी गिराने के बजाय, उसे और मजबूत बनाना शुरू कर दिया है। इस घटना के बाद जब महाराणा कुम्भा कुम्भलगढ़ लौटे, शम्स ख़ान ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते हुए नागौर दुर्ग की किलेबंदी गिराने के स्थान पर उसको और अधिक मज़बूत करना शुरू कर दिया। इससे महाराणा कुम्भा पुनः विशाल सेना के साथ नागौर पहुंचे। शम्स ख़ान को बाहर निकाल दिया गया और नागौर का नियंत्रण महाराणा के हाथ में आ गया।[4]

महाराणा कुम्भा ने नागौर दुर्ग की किलेबंदी को ध्वस्त कर अपनी दीर्घकालिक योजना को सफलतापूर्वक पूरा किया। उन्होंने शम्स ख़ान के खज़ाने से बहुमूल्य रत्न, आभूषण और अन्य संपत्तियों को अपने अधिकार में ले लिया।
'एकलिंग महात्म्य' के अनुसार, महाराणा कुम्भा ने शकों (मुसलमान शासक) को हराया, मसीती (संभवत: मुजाहिद) को भागने पर मजबूर किया, नागौर के वीरों को पराजित किया, किला ध्वस्त कर उसकी खाई भर दी, हाथियों को बंदी बनाया, शका महिलाओं को कैद किया और अनगिनत मुसलमानों को दंडित किया। उन्होंने गुजरात के राजा पर भी विजय प्राप्त की, पूरे नागौर नगर को (मस्जिदों सहित) जला दिया, बारह लाख गायों को मुक्त कराया, भूमि को गौचर भूमि बनाकर कुछ समय के लिए नागौर ब्राह्मणों को दे दिया।[5]
महाराणा कुम्भा ने नागौर दुर्ग के द्वार और हनुमानजी की मूर्ति को अपने कुम्भलगढ़ के मुख्य द्वार पर स्थापित किया, जिसे 'हनुमान पोल' कहा जाता है।[6]


सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
[संपादित करें]महाराणा कुम्भा एक वीर योद्धा ही नहीं अपितु कलाप्रेमी और विद्यानुरागी शासक भी थे। इस कारण उन्हें ‘युद्ध में स्थिर बुद्धि’ कहा गया है। एकलिंगमाहात्म्य के अनुसार वह वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य में बड़े निपुण थे। संगीत के महान ज्ञाता होने के कारण उन्हें ‘अभिनव भरताचार्य’ तथा ‘वीणावादन प्रवीणेन’ कहा जाता है। कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति के अनुसार वह वीणा बजाने में निपुण थे। संगीत राज, संगीत मीमांसा, संगीत क्रम दीपिका व सूड प्रबन्ध उसके द्वारा लिखे प्रमुख ग्रन्थ हैं। 'संगीतराज' के पाँच भाग – पाठ रत्नकोश, गीत रत्नकोश, वाद्य रत्नकोश, नृत्य रत्नकोश और रस रत्नकोश हैं। उनने चण्डीशतक की व्याख्या, जयदेव के संगीत ग्रन्थ गीतगोविन्द और शारंगदेव के संगीत रत्नाकर की टीकाएँ भी लिखीं। कुम्भ ने महाराष्ट्री (मराठी), कर्णाटी (कन्नड) तथा मेवाड़ी भाषा में चार नाटकों की रचना की। उनने कीर्ति-स्तम्भों के विषय पर एक ग्रन्थ रचना की और उसको शिलाओं पर खुदवाकर विजय स्तम्भ पर लगवाया। इसके अनुसार उनने जय और अपराजित के मतों को देखकर इस ग्रन्थ की रचना की थी। उनका ‘कामराज रतिसार’ नामक ग्रन्थ सात अंगों में विभक्त है।
कुम्भा को ‘राणौ रासो’ (विद्वानों का संरक्षक) कहा गया है। उसके दरबार में ‘एकलिंग माहात्म्य’ का लेखक कान्ह व्यास तथा प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री ‘मण्डन’ रहते थे। मण्डन ने देवमूर्ति प्रकरण (रूपावतार), प्रासाद मण्डन, राजवल्लभ (भूपतिवल्लभ), रूपमण्डन, वास्तुमण्डन, वास्तुशास्त्र और वास्तुकार नामक वास्तु ग्रन्थ लिखे। मण्डन के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी और पुत्र गोविन्द ने उद्दारधोरिणी, कलानिधि’ की रचना की जो देवालयों के शिखर विधान पर केन्द्रित है जिसे शिखर रचना व शिखर के अंग – उपांगों के सम्बन्ध में कदाचित् एकमात्र स्वतन्त्र ग्रन्थ कहा जा सकता है। आयुर्वेदज्ञ के रूप में गोविन्द की रचना ‘सार समुच्चय’ में विभिन्न व्याधियों के निदान व उपचार की विधियाँ दी गई हैं। कुम्भा की पुत्री रमाबाई को ‘वागीश्वरी’ कहा गया है। वह भी अपने संगीत प्रेम के कारण प्रसिद्ध रही।
कवि ‘मेहा’ महाराणा कुम्भा के समय का एक प्रतिष्ठित कवि थे। मेहा की रचनाओं में ‘तीर्थमाला’ प्रसिद्ध है जिसमें 120 तीर्थों का वर्णन है। मेहा कुम्भा के समय के दो सबसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों कुम्भलगढ़ और रणकपुर जैन मन्दिर के समय उपस्थित था। उसने बताया है कि हनुमान की जो मूर्तियाँ सोजत और नागौर से लाई गई थी, उन्हें कुम्भलगढ़ और रणकपुर में स्थापित किया गया। रणकपुर जैन मन्दिर के प्रतिष्ठा समारोह में भी मेहा स्वयं उपस्थित हुआ था। हीरानन्द मुनि को कुम्भा अपना गुरु मानते थे और उन्हें ‘कविराज’ की उपाधि दी। कविराज श्यामलदास की रचना ‘वीर विनोद’ के अनुसार मेवाड़ के कुल 84 दुर्गों में से अकेले महाराणा कुम्भा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया। अपने राज्य की पश्चिमी सीमा के तंग रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए नाकाबन्दी की और सिरोही के निकट बसन्ती का दुर्ग बनवाया। मेरों के प्रभाव रोकने के लिए मचान के दुर्ग का निर्माण करवाया।
केन्द्रीय शक्ति को पश्चिमी क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली बनाने व सीमान्त भागों को सैनिक सहायता पहुँचाने के लिए 1452 ई. में परमारों के प्राचीन दुर्ग के अवशेषों पर अचलगढ़ का पुनर्निर्माण करवाया। कुम्भा द्वारा निर्मित कुम्भलगढ़ दुर्ग का परकोटा 36 किलोमीटर लम्बा है जो चीन की दीवार के बाद विश्व की सबे लम्बी दीवार मानी जाती है। रणकपुर (पाली) का प्रसिद्ध जैन मन्दिर महाराणा कुम्भा के समय में ही धारणकशाह द्वारा बनवाया गया था।
कुम्भलगढ़ शिलालेख में राणा कुम्भा को धर्म और पवित्रता का ‘अवतार’ तथा दानी राजा भोज व कर्ण से बढ़कर बताया गया है। वह निष्ठावान वैष्णव थे और यशस्वी गुप्त सम्राटों के समान स्वयं को ‘परम भागवत’ कहा करते था। उनने ‘आदिवाराह’ की उपाधि भी अंगीकार की थी-‘वसन्धुररोद्धरणादिवराहेण’ विष्णु के प्राथमिक अवतार ‘वाराह’ के समान वैदिक व्यवस्था का पुनर्स्थापक था।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]- महाराणा कुम्भा (लेखक-रामवल्लभ सोमानी)
- महाराणा कुंभा ने किया था बारुदी आग्नेयास्त्रों का प्रयोग (प्रेसनोट)
- महाराणा कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
- महाराना कुम्भा : व्यक्तित्व एवं कृतित्व (राष्ट्रीय संगोष्ठी)
सन्दर्भ
[संपादित करें]- 1 2 3 4 5 Sarda, Har Bilas (1917). Maharana Kumbha. Ajmer, Rajputana Agency, British India: Ajmer; 1917. p. 69. ISBN 978-9-38060-734-4.
{{cite book}}: ISBN / Date incompatibility (help) - ↑ इस राजा ने अपने राज में बनवाए थे 32 दुर्ग
- ↑ मेवाड़ का एक ऐसा शासक जो कभी युद्ध में नहीं हारा, 35 साल में ही बनवा लिए थे 32 दुर्ग
- 1 2 Sarda, Har Bilas (1917). Maharana Kumbha: sovereign, soldier, scholar. University of California Libraries. Ajmer, Scottish Mission Industries co. pp. 53–55.
- ↑ Sarda, Har Bilas (1917). Maharana Kumbha: sovereign, soldier, scholar. University of California Libraries. Ajmer, Scottish Mission Industries co. p. 55.
- ↑ Sarda, Har Bilas (1917). Maharana Kumbha: sovereign, soldier, scholar. University of California Libraries. Ajmer, Scottish Mission Industries co. p. 55.
- सन्दर्भ ग्रन्थ
- गौरीशंकर हीराचंद ओझा : वीरविनोद; उदयपुर का इतिहास; नेणसी की ख्यात;
- महाराणा के शिलालेख