जैत्र सिंह
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जैत्र सिंह, 1213 ई. में मेवाड़ शासक बने। जैत्र सिंह ने मौर्यों को पराजित करके चित्तौड़ पर अधिकार किया था।[1]
दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने इनके शासनकाल में मेवाड़ राज्य पर आक्रमण किया, क्योंकि इल्तुतमिश मेवाड़ को अपने अधिकार में लाना चाहता था, नागदा को लेकर इल्तुतमिश व जैत्र सिंह के बीच 1227 ई. में भूताला का युद्ध लड़ा गया,[2] हालाँकि इस युद्ध में जैत्र सिंह को विजय प्राप्त हुई, लेकिन इस युद्ध में नागदा पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया।[3] इस कारण जैत्र सिंह ने नागदा व आहड़ के स्थान पर चित्तौड़गढ़ को अपनी नवीन राजधानी के रूप में स्थापित किया,[4] इनके शासनकाल में मंगोल आक्रमणकारी चंगेज खाँ का आक्रमण हुआ। जैत्र सिंह के अन्तिम शासनकाल में 1248 ई. में दिल्ली के सुल्तान नसरूद्दीन महमूद का आक्रमण हुआ। इस कारण जैत्र सिंह मेेेवाड़ के लिए विशेष योगदान नही देे सका, क्योंकि इसे अपने शासनकाल में आक्रमणों से सामना करना पड़ा, फिर भी जैत्र सिंह ने आहड़ को चालुक्योंं की शक्ति से आजाद करानेे में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। डॉ दशरथ शर्मा ने जेत्रसिंह के शासनकाल को मध्यकालीन मेवाड का स्वर्ण काल कहां गया है।[5]
मेवाड़ राजा जैत्रसिंह
[संपादित करें]महारावल रनसिंह या करणसिंह के दो पुत्र सामंत सिंह एवं कुमारसिंह थे, उसके बाद, मथनसिंह, फिर पदमसिंह के पुत्र जैत्रसिंह थे. [6]
जैत्रसिंह को मेवाड़ की प्रतिष्ठा का पुनर्स्थापक भी कहा गया ।
मुख्यधारा के इतिहास में मेवाड़ की राजधानी के रूप में चित्तौड़गढ़ के चयन को अक्सर एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय के रूप में दर्शाया जाता है। हालांकि, समकालीन प्राथमिक अभिलेखों और पांडुलिपियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि चित्तौड़गढ़ का राजधानी बनना 1227 ई. में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा के विनाश का एक सीधा रणनीतिक परिणाम था। यह शोध पत्र 'चीरवा के शिलालेख (1273 ई.)' तथा जयसिंह सूरि कृत 'हम्मीरमदमर्दन' के आधार पर भूताला के युद्ध की सैन्य और कूटनीतिक घटनाओं को पुनर्गठित करता है।
प्राथमिक अभिलेखीय एवं साहित्यिक स्रोत इतिहास का प्रामाणिक पुनर्गठन केवल समकालीन अभिलेखों के आधार पर ही संभव है। इस घटनाक्रम के दो प्रमुख अकाट्य आधार हैं:
चीरवा का शिलालेख (1273 ई. / विक्रम संवत 1330):
रावल समरसिंह के शासनकाल में नागदा के समीप उत्कीर्ण यह अभिलेख मेवाड़ के इतिहास की सर्वाधिक प्रामाणिक कड़ी है। यह शिलालेख इल्तुतमिश (तुर्क सेना) द्वारा नागदा पर किए गए आक्रमण, नगर के दहन तथा उसकी रक्षा में मेवाड़ी योद्धाओं के बलिदान का स्पष्ट विवरण देता है।
'हम्मीरमदमर्दन' (जयसिंह सूरि, रचनाकाल: 1220–1230 ई.):
यह संस्कृत नाटक इस युद्ध का सबसे निकटतम समकालीन साहित्यिक प्रमाण है। इसमें 'हम्मीर' (अमीर का अपभ्रंश) शब्द सुल्तान इल्तुतमिश के लिए और 'मदमर्दन' का अर्थ उसके सैन्य अहंकार के विनाश के लिए प्रयुक्त हुआ है. मदन एवं बालक का बलिदान:
चीरवा शिलालेख के अनुसार, नागदा के 'तलारक्ष' (कोतवाल/नगर रक्षक) योगराज के पुत्र मदन तथा उनके वीर पुत्र बालक (बालाक) ने तुर्क सेना के विरुद्ध नागदा के मुख्य फाटकों पर अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।
सत्ता के केंद्र का स्थानांतरण:
नागदा के समतल क्षेत्र में स्थित होने के कारण वह भविष्य के भारी घुड़सवार आक्रमणों के लिए असुरक्षित था। इसी रणनीतिक विफलता को देखते हुए रावल जैत्रसिंह ने सत्ता का केंद्र अरावली की पर्वतमाला पर स्थित सुदृढ़ दुर्ग चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) में स्थाई रूप से स्थानांतरित कर दिया। भूताला का 'गुरिल्ला ट्रैप' एवं सैन्य रणनीति नागदा के विनाश के पश्चात रावल जैत्रसिंह ने सीधे मैदानी युद्ध के स्थान पर सामरिक रूप से पीछे हटने (Feigned Retreat) का मार्ग चुना।
"सच्ची सैन्य कुशलता शत्रु को उसकी इच्छा के विपरीत प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों में खींचकर पराजित करने में निहित है।"
अरावली का दर्रा:जीत के नशे में चूर सुल्तानी सेना मेवाड़ी बलों का पीछा करते हुए नागदा और गोगुंदा के मध्य स्थित 'भूताला की संकरी घाटी' में प्रवेश कर गई।
छापामार प्रहार:
भूताला का दर्रा अत्यंत संकरा था, जहाँ तुर्कों की भारी अश्वसेना के लिए मुड़ना या युवरचना बनाना असंभव था। पहाड़ियों पर पहले से तैनात मेवाड़ी छापामार टुकड़ियों एवं स्थानीय भील धनुर्धरों ने ऊपर से पत्थरों व बाणों की भीषण बौछार की, जिससे सुल्तानी सेना में भगदड़ मच गई और वे आपस में ही कुचलकर नष्ट होने लगे।
वाघेला कूटनीति एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध 'हम्मीरमदमर्दन' के अनुसार, रावल जैत्रसिंह ने इस युद्ध में केवल सैन्य बल का प्रयोग नहीं किया, बल्कि गुजरात के वाघेला शासक वीरधवल तथा उनके चतुर मंत्रियों—वस्तुपाल एवं तेजपाल के साथ मिलकर एक कूटनीतिक चक्रव्यूह रचा। इल्तुतमिश के शिविर में यह गुप्त सूचना पहुँचाई गई कि गुजरात की चालुक्य-वाघेला सेना एक विशाल दल के साथ मेवाड़ की सहायता हेतु पीछे से आक्रमण करने आ रही है। आगे अरावली की घाटी में फँसने और पीछे से घिरने के मनोवैज्ञानिक खौफ ने तुर्क सेना के मनोबल को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
सुल्तान का पलायन एवं रसद संकट द्विपक्षीय दबाव और घाटी में हुए भीषण संहार के कारण सुल्तान इल्तुतमिश अपनी बची-कुची सेना के साथ दिल्ली की ओर भाग खड़ा हुआ। पर्वतीय क्षेत्र में रसद सामग्री ) समाप्त हो जाने के कारण, भूख से बेहाल भागती हुई सुल्तानी सेना ने अपने ही नियंत्रण वाले क्षेत्रों (आहड़ व आसपास के गांवों) में लूटपाट की.
1248 में इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी नसीकदीन महमूद ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और बहुत बुरी तरह से हारा । 1223 में चंगेज खान का जब भारत पर आक्रमण हुआ । उस समय मेवाड़ में राजा जैत्र सिंह का शासन था
इनका शासन काल 1213 से 1253 तक रहा।[7] इनके बाद तेज सिंह (जैत्र सिंह का पुत्र) मेवाड़ का शासक बना (1253 से 1273)।[8]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ रवींद्र, शर्मा. Rajasthan Lok Seva Ayog Ras/Rts (Prarambhik Pariksha) Paper-I Samanya Gyan Evam Samanya Vigyan (35 Din) - Competitive Exam Book 2021. प्रभात प्रकाशन. अभिगमन तिथि: 19 जनवरी 2021.
- ↑ देवेश, गुप्ता 'सर'. Rajasthan Adhyayan : NTSE - Stage -1 ( Rajasthan State ) Question Answer Series. अथर्व प्रकाशन.
- ↑ "मेवाड़ के रावल जैत्रसिंह (भाग – 2)". मूल से से 15 जून 2022 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 मार्च 2022.
- ↑ "राजस्थान के इतिहास के प्रमुख युद्ध". मूल से से 30 सितंबर 2020 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 14 सितंबर 2020.
- ↑ कुंवर कनक, सिंह राव. Dharohar Basic Computer Anudeshak Evem Varisth Computer Anudeshak (Hindi Edition). प्रभात प्रकाशन. अभिगमन तिथि: 5 मार्च 2022.
- ↑ "मेवाड़ के रावल जैत्रसिंह (भाग – 1)". मूल से से 15 जून 2022 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 12 मार्च 2022.
- ↑ "जैत्रसिंह का इतिहास (1213-1253 ई.)". मूल से से 29 जनवरी 2022 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 15 जून 2021.
- ↑ "तेजसिंह". मूल से से 16 जनवरी 2022 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 15 जून 2022.