हकीम खाँ सूरी

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इनका जन्म 1538 ई. में हुआ | ये अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के वंशज थे | महाराणा प्रताप का साथ देने के लिए ये बिहार से मेवाड़ आए व अपने 800 से 1000 अफगान सैनिकों के साथ महाराणा के सामने प्रस्तुत हुए | हकीम खान सूरी को महाराणा ने मेवाड़ का सेनापति घोषित किया | हकीम खान हरावल (सेना की सबसे आगे वाली पंक्ति) का नेतृत्व करते थे | ये मेवाड़ के शस्त्रागार (मायरा) के प्रमुख थे | मेवाड़ के सैनिकों के पगड़ी के स्थान पर शिरस्त्राण पहन कर युद्ध लड़ने का श्रेय इन्हें ही जाता है | हाकिम खां सूरी एक मात्र व्यक्ति थे जो मुग़लो के खिलाफ मुसलमान होते हुए भी। महाराणा प्रताप की तरफ से लड़े। जबकि कई राजपूत राजा उस समय अकबर की तरफ से लड़े थे। हल्दीघाटी के युद्ध मे लड़ते लड़ते शहिद होकर अमर हो गए।

  • एक बात तो सामने आयी है की हल्दीघाटी के युध्द में राणा प्रताप जी हारे नहीं (वह विजय चित्तोड के भीषण नरसहार 1568 का बदला था) हल्दीघाटी युद्ध मे आक्रमण के प्रमुख महान योध्दा हकीम खान सुर थे उनकी वजह यह विजय प्राप्त हूआ!
  • डाॅ.चंद्रशेखर शर्मा,चारणकार रामा सांधू (जो प्रत्यक्ष युद्ध देख रहा था ),डाॅ गोपीनाथ मुंडे इनका कथन सच है लेकीन फजल,बदायूनी, टाॅड ने (made the bundle of mistakes )ऐसा अंग्रेज लेखक सर एलीयट ने कहा था!नैनसी ने भी झूट का सहारा लीया जो1666 में अपने नोकरी से सस्पेंड हूआ था!
  • देश के गद्दारो के दरबार में नोकरी करने वाले लेखक कैसे न्याय कर सकते थे इतिहास के साथ -सुधीर जोर्वेकर