राणा पूंजा

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राणा पूंजा, अरावली पर्वतमाला में स्थित भोमट क्षेत्र के सोलंकी राजपूत राजा[1][2][3] थे, उन्होंने मजबूत सेना का गठन कर रखा था, जिसमें करीब ४००-५०० सिपाही थे | राणा पुंजा के ४०० सैनिक मुगलों के ४००० के बराबर थे, क्यूंकि वे गुरिल्ला युद्ध करते थे | उनकी शक्ति को देखते हुए ही , मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप जी और मुगल शासक अकबर के संरक्षक बैरम खान, भील राणा के पास सहायता लेने पहुंचे ।हल्दीघाटी युद्ध को सफल बनाने में राणा पुंजा और उनकी सेना का बड़ा योगदान रहा। इसी युद्ध के दौरान ही महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह को बचाने में इनके इकलौते बेटे का निधन हो गया | राणा पूंजा के योगदान के फलस्वरूप ही मेवाड़ चिन्ह में उन्हें अंकित किया गया है, साथ-साथ राणा पूंजा के नाम से पुरस्कार वितरित किया जाता है और कॉलेज और विद्यालयों की स्थापना की गई है [4]

आरंभिक जीवन[संपादित करें]

राणा पूंजा का जन्म 5 अक्टूबर पानरवा के मुखिया दूदा के आदिवासी परिवार में हुआ था इनके दादा राणा हरपाल थे।[5][6][7] उनकी माता का नाम केहरी बाई था, उनके पिता का देहांत होने के पश्चात 15 वर्ष की अल्पायु में उन्हें पानरवा का मुखिया बना दिया गया। यह उनकी योग्यता की पहली परीक्षा थी, इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर वे जल्दी ही भोमट के राजा’ बन गए।[8][9]

हल्दीघाटी का युद्ध[संपादित करें]

1576 ई. में मेवाड़ में मुगलों का संकट उभरा।[10] मेवाड़ तक पहुंचने के लिए मुगलों को राणा पूंजा के क्षेत्र से होकर जाना था लेकिन राणा के राजकीय क्षेत्र से होकर जाना आसान नहीं था, इसलिए तत्कालीन समय के सबसे ताकतवर राजा के नितिकार एवं संरक्षक बैरम खां और मेवाड़ के महाराणा प्रताप दोनों ही भोमट के राणा पूंजा के पास सहयोग लेने पहुंचे। मुगलों ने राणा पूंजा को धन-दौलत देकर मुगल सम्राट अकबर का साथ देने को कहा तो वही महाराणा प्रताप ने बप्पा रावल की तलवार राणा पूंजा के समक्ष रखते हुए देशभक्ति की राह पर चलते हुए मेवाड़ का साथ देने को कहा।


हल्दीघाटी का युद्ध


इस संकट के काल में महाराणा प्रताप ने राणा पूंजा का सहयोग मांगा। राणा पूंजा ने मुगलों से मुकाबला करने के लिए मेवाड़ के साथ खड़े रहने का निर्णय किया। महाराणा को वचन दिया कि राणा पूंजा और सभी भील भाई मेवाड़ की रक्षा करने को तत्पर है। इस घोषणा के लिए महाराणा ने राणा पूंजा को गले लगाया और अपना भाई कहा। 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में राणा ने अपनी सारी ताकत देश की रक्षा के लिए झोंक दी [10]

राणा पूंजा का सैनिक संगठन[संपादित करें]

राणा पूंजा के नेतृत्व में भील सेना , मेहता रतनचंद , ताराचंद , पुरोहित गोपीनाथ , जगन्नाथ , मेहसानी जगन्नाथ , केशो , जयसा , और सोनियाणा के चारण आदि शामिल थे [11] । भीलू राणा के नेतृत्व में करीब 70 हजार भील हल्दीघाटी युद्ध में शामिल हुए जिनमें से 400 भील तीरंदाज थे । हल्दीघाटी युद्ध में पैदल सेना नहीं थी ।


हल्दीघाटी युद्ध में भीलो के राणा पूंजा ने अहम भूमिका निभाई, हल्दीघाटी युद्ध के अनिर्णय रहने में राणा पूंजा का अहम योगदान रहा। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप राणा पूंजा के साथ रहे।


राणा के इस युगों-युगों तक याद रखने योग्य शौर्य के संदर्भ में ही मेवाड़ के राजचिन्ह में भील प्रतीक अपनाया गया है।[12]

यह भी देखे[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Singh, Sabita (2019-05-27). The Politics of Marriage in India: Gender and Alliance in Rajasthan (अंग्रेज़ी में). Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-909828-6.
  2. Singh, V. P.; Jadhav, Dinesh (2011-01-01). Ethnobotany of Bhil Tribe (अंग्रेज़ी में). Scientific Publishers. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-87307-36-0. मूल से 13 अक्तूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2 जून 2019.
  3. Sharma, Gopi Nath; Mathur, M. N.; Samiti, Maharana Pratap Smarak (1989*). Maharana Pratap & his times (अंग्रेज़ी में). Maharana Pratap Smarak Samiti. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  4. साँचा:Https://books.google.co.in/books?id=-HtHDwAAQBAJ&pg=PA219&dq=Maharshi+Valmiki+Bhil&hl=hi&sa=X&ved=0ahUKEwjR07Cy7ZnrAhXK4XMBHQKlC4AQ6AEIPDAD
  5. Singh, Sabita (2019-05-27). The Politics of Marriage in India: Gender and Alliance in Rajasthan (अंग्रेज़ी में). Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-909828-6.
  6. Singh, V. P.; Jadhav, Dinesh (2011-01-01). Ethnobotany of Bhil Tribe (अंग्रेज़ी में). Scientific Publishers. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-87307-36-0. मूल से 13 अक्तूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2 जून 2019.
  7. Sharma, Gopi Nath; Mathur, M. N.; Samiti, Maharana Pratap Smarak (1989*). Maharana Pratap & his times (अंग्रेज़ी में). Maharana Pratap Smarak Samiti. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  8. Mahārāṇā Pratāpa ke pramukha sahayogī. Rājasthānī Granthāgāra. 1997.
  9. Feudal Polity In Mewar (1750-1850 AD) pg-24
  10. Svatantratā āndolana meṃ Mevāṛa kā yogadāna. Sāhitya Saṃsthāna, Rājasthāna Vidyāpīṭha. 1991.
  11. शर्मा, गोपीनाथ (1954). Mewar and the Mughal Emperor 1526-1707 A.D. S.L Agrawal. पृ॰ 94-96.
  12. Ram, Gordhan (2001). Politics, development & modernization in tribal India: a study of Bhil village panchayat in Rajasthan (अंग्रेज़ी में). Manak Publications. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7827-026-5.