परिहार गोत्र

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परिहार' पड़िहार.एक क्षत्रिय वंश है।[1] इस गोत्र के लोग मुख्यतः भारत में राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं गुजरात निवास करते हैं। इन्हें अग्निवंशी है।इतिहास में समुपलब्ध साक्ष्यों तथा भविष्यपुरांण में समुपवर्णित विवेचन कर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय बनारस के विद्वानों के द्वारा बतौर प्रमाण यजुर्वेदसंहिता, कौटिल्यार्थशास्त्र, श्रमद्भग्वद्गीता, मनुस्मृति, ऋकसंहिता पाणिनीय अष्टाध्यायी, याज्ञवल्क्यस्मृति, महाभारत, क्षत्रियवंशावली, श्रीमद्भागवत, भविष्यपुरांण इत्यादि में भी परिहार एवं विन्ध्य क्षेत्रीय वरगाही उपाधि धारी परिहारों का वर्णन मिलता है। जो ध्रुव सत्य है। परिहार वंश में केवल एक ही उपाधि प्रदान की गई थी। जो राजा रामचन्द्र बाघेल द्वारा 1562 ई . में श्री शेरबहादुर सिंह परिहार को दी गई थी। यह वंश मध्यकाल के दौरान मध्य-उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में राज्य करने वाला राजवंश था, जिसकी स्थापनानामक एक सामन्त ने ७२५ ई॰ में की थी। इस राजवंश के लोग स्वयं को राम के अनुज लक्ष्मण के वंशज मानते थे, जिसने अपने भाई राम को एक विशेष अवसर पर प्रतिहार की भाँति सेवा की। इस राजवंश की उत्पत्ति, प्राचीन कालीन ग्वालियर प्रशस्ति अभिलेख से ज्ञात होती है। अपने स्वर्णकाल साम्राज्य पश्चिम में सतलुज नदी से उत्तर में हिमालय की तराई और पुर्व में बंगाल-असम से दक्षिण में सौराष्ट्र और नर्मदा नदी तक फैला हुआ था। सम्राट ,, इस राजवंश का सबसे प्रतापी और महान राजा थे। अरब लेखकों ने के काल को सम्पन्न काल बताते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि राजवंश ने भारत को अरब हमलों से लगभग ३०० वर्षों तक बचाये रखा था। वर्तमान में इस राजवंंश के मूलतः ठीकाने जालोर जिले ( Panseri ) में है परिहार और प्रति हरो को एक ही माना जाता है और इनका मूलतः सबसे बड़ा गांव छायन हैं जो जैसलमेर जिले में है पहले इनका राज मंडोर में था नागभट्ट नागभट्ट2 और मिहिर भोज जैसे शासक भी इसी वंश से संबंधित है

सन्दर्भ rajasthan mei rajsamand ke aidana{batangad} or gugali ,{govindgarh} bhi parihar rajputo ke thikane hai[संपादित करें]

  1. विद्या प्रकाश त्यागी (2009). Martial races of undivided India [अविभाजित भारत की योद्धा जातियाँ] (अंग्रेज़ी में). ज्ञान बुक्स प्राइवेट लिमिटेड. पृ॰ 71. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788178357751.