जानागढ़

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नष्ट होता एक और प्राचीन दुर्ग: जानागढ़, प्रतापगढ़, राजस्थान[संपादित करें]

“हर हिन्दू को गौ और हर मुसलमान को सूअर की सौगंध!”

प्रतापगढ़ के घने जंगल और सुहागपुरा के पहाड़ की चोटी पर स्थित है जनागढ़ का दुर्ग

....२०-२५ वर्ष पहले तक यहाँ पीपल खूंट का जंगल इतना घना था कि सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पंहुचती थी। रामपुरिया-रतनपुरिया गांवों से १०-१२ किलोमीटर पर यहाँ मूल्यवान सागवान के और दूसरे हजारों पेड़ थे और हिंसक जानवरों की भी यहाँ काफी बड़ी तादाद थी। कोई असाधारण बिरला ही यहाँ तक पंहुचने की हिम्मत जुटा सकता था। १६ वीं शताब्दी के आरम्भ में मालवा के सुलतान नासिर शाह खिलजी के अधीन आज के प्रतापगढ़ के पास १८ किलोमीटर पर एक पुरानी बसावट के कस्बे ‘अरनोद’ परगने का हाकिम था- खान आलम मकबूल खान.

यहाँ तक घोड़े की पीठ पर बैठ कर आता रहा वह कोई बहुत एकान्तप्रेमी और कल्पनाशील व्यक्ति रहा होगा. उस हाकिम खान आलम मकबूल खान ने सुहागपुरा के पास जानागढ़ के नितांत निर्जन जंगलों में लगभग ४५० साल पहले अपने रहने के लिए यहाँ की खूबसूरत पहाड़ी का चुनाव किया और वहाँ एक दुर्ग, हम्माम, एक हज़ार फिट लंबा और सौ फुट चौड़ा तालाब तथा मस्जिद आदि का निर्माण करवाया, जिनके कलात्मक-अवशेष आज भी उसके अपने ज़माने की शानोशौकत की भूली बिसराई कहानी सुनाते हैं। दुर्ग की सुरक्षा के लिए यहाँ चारों तरफ काले पत्थरों की मजबूत दीवारें बनवाई गई थीं, जो आज भी मौजूद हैं। दुर्ग के पश्चिम में कोई १५० फिट गहरी खाई है।

वर्ष १५०५ ईस्वी में इसी खान आलम मकबूल खान ने सर्वधर्म-समभाव और ‘धार्मिक-सहिष्णुता’ का परिचय देते हुए पत्थर के शिलालेख पर एक आज्ञा खुदवा कर ‘गौतमनाथ मंदिर’ के द्वार के पास स्थापित की थी, ये राज्यादेश आज भी देखा जा सकता है – “मंदिर की क्षेत्र-सीमा में कोई भी व्यक्ति किसी प्रकार की हिंसा या ह्त्या न करे..... हर हिन्दू को गौ और हर मुसलमान को सूअर की सौगंध है। ..”.

कहा यह जाता रहा है कि इस दुर्ग या इसके परिसर में किसी गुप्त-स्थल पर खान आलम मकबूल खान का अकूत खजाना छिपा है। देशी रियासतों की समाप्ति के बाद से ही जानागढ़ वीरान हो गया था, तब से रात के अँधेरे में माल-मत्ते के लालची ऊंट, घोड़े, जीप और मोटर साइकिलों आदि से लोग इस दुर्गम स्थान पर आते रहे। हैं और तथाकथित खजाने के लालच में किले के चप्पे-चप्पे को खंगालते रहे। हैं।

यहाँ जीप आदि से बड़ी मुश्किल से पहुँचा जा सकता है। पर आज भी कोई वाहन के सहारे ऊपर दुर्ग तक नहीं पहुँच सकता. किले तक की आख़िरी चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ती है। अरनोद के उस मुस्लिम हाकिम का खज़ाना यहाँ है भी या नहीं, कोई नहीं जानता, पर आज भी जान की बाजी लगा कर, चोरी छिपे लोग तथाकथित-मांत्रिकों, पुजारियों और तांत्रिकों को साथ लेकर खजाने की अथाह दौलत पा लेने के अंधे लालच में जीप आदि वाहनों से यहाँ आ पहुँचते हैं, शुभ-शकुन के लिए वे पहले से सिन्दूर पुते कुछ पत्थरों की पूजा करते हैं, फिर अटकल लगा लगा कर गड़े धन की तलाश में पागलों की तरह इधर-उधर खुदाई करते रहते हैं। कई सिरफिरे तो खजाने के लिए यहीं बेगुनाह बेजुबान पशुओं की बलि तक चढाते आए हैं।

दुर्ग पर कलिका माता का स्थान है, कहते हैं मूलतः विक्रमादित्य ने इस किले का निर्माण करवाया था, पर तब "किसी 'भोपे' के माध्यम से माता ने ये आदेश दिया था कि उनका कोई मंदिर न बनाया जाए", वह आकाश के मंडप तले ही ज्यादा प्रसन्न हैं इसलिए अपनी स्थापना के दिन से आज तक माता कालिका यहाँ मंदिर में नहीं, खुले चबूतरे पर आसीन हैं। सेंकडों ध्वजाएं, जो माता के सम्मान में भक्तगण लगाते आ रहे। हैं, यहाँ हर बरस आज भी लगाई जाती हैं। ... पर किले के साथ खजाने की अफवाह कुछ इस कदर गहरे जुडी है कि माता कालिका खुद एक तरह से बेबस हैं। .. और हालत ये है कि मालवा के सुल्तानों के खजाने के लालच में प्रतापगढ़ जिले के जानागढ़ में स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले को सोना-चांदी के लालच में तहस-नहस कर दिया गया है। हीरे-जवाहरात के सपने देखने वाले मूर्खों ने कहीं कहीं तो पूरी की पूरी दीवारें ही बेरहमी से ढहा दी हैं। .. माणक-मोती पा लेने के पागल जूनून में उन्होंने जगह-जगह खुदाई कर डाली है। हालत यह हो गई है कि आज इस किले के अवशेष ही बचे हैं, बस नीचे के गावों के बहुत से चरवाहे किले पर अपने मवेशी चराने ले जाते हैं।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती, ज़मींदोज़ खजाना ढूँढने की तुफैल में बचे खुचे अवशेषों तक को आज भी बेदर्दी से नष्ट भ्रष्ट किया जा रहा है। देशी रियासतें समाप्त होने के बाद से वीरान पड़े जानागढ़ में मची लूट और रातों रात खरबपति बन जाने का ख्वाब देख रहे। लोगों के मतिभ्रम की वजह से जानागढ़-किला आज पूरी तरह तरह तहस-नहस होने की कगार पर पहुँच गया है। 'मुद्राराक्षसों' की कुदालों और फावड़ों ने तत्कालीन हाकिम के बनाये दुर्ग में जगह जगह गड्ढे खोद डाले हैं।

आश्चर्य की बात है कि कलेक्टर द्वारा पहले निदेशक, पुरातत्व विभाग, राजस्थान को अर्ध-शासकीय पत्र भेजने के बावजूद संग्रहालय विभाग की नाक पर जूँ तक नहीं रेंगी है। सरकार के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, किसी संस्कृति मंत्री या ‘बड़े’ आदमी का ध्यान इस पर आज तक इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की जिम्मेदारी की तरफ गया ही नहीं है।

कोई इतिहासप्रेमी अगर खोजता-पूछता भूले-भटके यहाँ आ भी जाता है तो उसका मन उदासी में डूब जाता है ये देख कर, ये सोच कर- क्या यही था। .. एक वक्त आबाद रहा ऐतिहासिक जानागढ़ दुर्ग...?

पूर्व कलेक्टर प्रतापगढ़ हेमंत शेष, स्थानीय पत्रकारों, इतिहासविशेषज्ञ और पुरातत्वप्रेमियों का मानना है कि इसे अगर ‘संरक्षित-स्मारक’ घोषित किया जाए तो क्या पता इसके अध्ययन से इतिहासविशारदों को प्रतापगढ़ के इतिहास के कुछ नए, कुछ अनजाने पहलुओं की जानकारी मिल सके!

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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