विक्रमादित्य

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चक्रवर्ती विक्रमादित्य सैन परमार :- उज्जैन के राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। "विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे) उल्लेखनीय हैं। राजा विक्रमादित्य नाम, 'विक्रम' और 'आदित्य' के समास से बना है जिसका अर्थ 'पराक्रम का सूर्य' या 'सूर्य के समान पराक्रमी' है।उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)। भविष्य पुराण व आईने अकबरी के अनुसार विक्रमादित्य सैन परमार वंश के सम्राट थे जिनकी राजधानी उज्जयनी थी । राजा विक्रमादित्य के इतिहास पर कई मतभेद है कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यह लोधी राजपूत हैं। लेकिन नवसाहसांकचरित, आएन-ए-अकबरी, विक्रमांकदेव चरित्र, प्राचीन जैन अनुश्रुतियां, भविष्य महापूराण, कल्हण कृत राजतरंगिणी,नेपाल राजवंशावली और तारिके - ए-फरिश्त जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों, अभिलेखों और साहित्यिक स्त्रोतों में विक्रमादित्य को प्रमार या परमार अथवा अग्निवंशीय कहाँ गया है। हिस्ट्री आॅफ राइज आॅफ मोहम्मद पावर इन इण्डिया में लिखा है कि "पोवार राजा विक्रमजीत (विक्रमादित्य) ने धारानगरी (धार) का प्रसिध्द किल्ला बनवाया था। उज्जयिनी के राजा विक्रमजीत पोवार का इतिहास शानदार धार्मिक और पवित्र है।" [1] प्राचीन जैन अनुश्रुतियों में विक्रमादित्य को गर्दभिल्ल या गंधर्वसेन प्रमार का पुत्र बताया गया है। तारीख ए फरिश्त नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में विक्रमादित्य पँवार का निम्नलिखित वर्णन प्राप्त होता है - "विक्रमादित्य जाती के पँवार थे। उनका स्वभाव बहुत अच्छा था। उनके विषय में जो कहानियां हिंदूओ में प्रचलित है, उससे स्पष्ट होता है कि उनका वास्तविक स्वरूप कितना महान था। युवा अवस्था में यह राजा बहुत समय तक साधुओं के वेशभूषा में (मालवगण में) भ्रमण करता रहा। उसने बड़ा तपस्वी जीवन व्यतीत किया। थोडे़ ही दिनों में नहरवाला और मालवा दोनों देश उसके अधिपत्य में हो गये। यह निश्चित था कि वह एक महापराक्रमी चक्रवर्ती राजा होगा। राजकाज हाथ में लेते ही उसने न्याय को संसार में ऐसा फैलाया कि अन्याय का चिन्ह बाकी न रहा और साथ ही साथ उदारता भी अनेकों कार्यों में दिखलाईं।" [2] द ओरिजिन आॅफ मॅथेमेटिक्स में भी वर्णन मिलता है कि विक्रमादित्य आज से करिब ईसा पूर्व पहली शताब्दी में पँवार (प्रमर) राजवंश के सम्राट के रूप में विख्यात हुए। उन्होंने समस्त भारत तथा भारत के लोगों के दिलों को जीता।[3] राजा भोज या परमार भोज और विक्रमादित्य एक ही राजवंश के है। दोनों का शासन भी उज्जयिनी में था। [4] महेशचंद्र जैन सील ने स्पष्ट लिखा है कि राजा विक्रमादित्य लोधी थे विक्रमादित्य भारतीय इतिहास का अनूठा 84 कलाओं से पूर्ण कवि दंतिया आज भी जिंदा है वह लोधी ही थे.इसमें कोई संदेह नहीं है कि विक्रमादित्य अग्निवंशीय प्रमार क्षत्रिय ही थे। [5] हिन्दू शिशुओं में 'विक्रम' नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाओं की दो श्रृंखलाओं को दिया जा सकता है।

ऐसा कहा जाता है कि ‘अरब’ का वास्तविक नाम ‘अरबस्थान’ है. ‘अरबस्थान’ शब्द आया संस्कृत शब्द ‘अरवस्थान’ से, जिसका अर्थ होता है ‘घोड़ों की भूमि’. और हम सभी को पता है कि ‘अरब’ घोड़ों के लिए प्रसिद्ध है.

‘टर्की’ देश में एक बहुत पुराना और मशहूर पुस्तकालय है जिसका नाम मकतब-ए-सुल्तानिया है. इस पुस्तकालय के पास पश्चिम एशियाई साहित्य से सम्बंधित सबसे बड़ा पुस्तक संग्रह है. इसी संग्रह में एक किताब संरक्षित रखी गई है.

किताब का नाम है ‘सयर-उल-ओकुल’. इस किताब में इस्लाम के पहले के कवियों और इस्लाम के आने के तुरंत बाद के कवियों का वर्णन किया गया है.

इसी किताब में मौजूद है ‘सम्राट विक्रमादित्य’ पर आधारित एक कविता.

कविता ‘अरबी’ में है लेकीन उस कविता का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है :-

कविता में मौजूद ये कुछ पंक्तियाँ हैं.

“खुशनसीब हैं वे लोग जो राजा विक्रम के राज में जन्मे,

उदारता और कर्ताव्यप्रायाणता के प्रतीक हैं राजा विक्रमादित्य.

हम, ‘अरबी’ और हमारी ज़मीन अंधकार में फँसी हुई थी लेकिन राजा विक्रम ने हमारी ज़मीन पर अपने दूतों को भेज कर यहाँ फिर से रौशनी का आगमन किया है”.

यह कविता इस बात का सबूत है कि विक्रमादित्य भारत के पहले राजा थे जिन्होंने अरबस्थान में विजय प्राप्त की, राज्य पर और लोगों के दिल पर.


यह कहना गलत नहीं होगा कि राजा विक्रमादित्य भारत के राजदूत बन भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया तक पहुंचाने में बेहद कुशल साबित हुए थे. उनकी महानता के गुणगान हम भारतीय सदा गाते रहेंगे. मैं आशा करूंगा कि भविष्य में भी कोई इनके जैसा इंसान भारत में पैदा हो और भारत का नाम और आगे बढाए. [6]


कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। -(गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)। विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।

सम्राट विक्रमादित्य अपने राज्य की जनता के कष्टों और उनके हालचाल जानने के लिए छद्मवेष धारण कर नगर भ्रमण करते थे। राजा विक्रमादित्य अपने राज्य में न्याय व्यवस्था कायम रखने के लिए हर संभव कार्य करते थे। इतिहास में वे सबसे लोकप्रिय और न्यायप्रीय राजाओं में से एक माने गए हैं।

कहा जाता है कि मालवा में विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि का शासन था। भर्तृहरित के शासन काल में शको का आक्रमण बढ़ गया था। भर्तृहरि ने वैराग्य धारण कर जब राज्य त्याग दिया तो विक्रम सेना ने शासन संभाला और उन्होंने ईसा पूर्व 57-58 में सबसे पहले शको को अपने शासन क्षेत्र से बहार खदेड़ दिया। इसी की याद में उन्होंने विक्रम संवत की शुरुआत कर अपने राज्य के विस्तार का आरंभ किया। विक्रमादित्य ने भारत की भूमि को विदेशी शासकों से मुक्ति कराने के लिए एक वृहत्तर अभियान चलानाय। कहते हैं कि उन्होंने अपनी सेना की फिर से गठन किया। उनकी सेना विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बई गई थी, जिसने भारत की सभी दिशाओं में एक अभियान चलाकर भारत को विदेशियों और अत्याचारी राजाओं से मुक्ति कर एक छत्र शासन को कायम किया।

[7][8][9][10]

ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथ ज्योतिविर्दाभरण में सम्राट शकारि विक्रमादित्य के रोम विजय का वर्णन आता है -

यो रुमदेशधिपति शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनी महाहवे । आनीय संभ्राम्य मुमोचयत्यहो स विक्रमार्कः समस हयाचिक्रमः ॥ यह श्लोक स्पष्टतः यह बता रहा है कि रुमदेशधिपति रोम देश के स्वामी शकराज (विदेशी राजाओं को तत्कालीन भाषा में शक ही कहते थे, तब उस काल में शकों के आक्रमण से भारत त्रस्त था) को पराजित कर विक्रमादित्य ने बंदी बना लिया था और उसे उज्जैनी नगर में घुमा कर छोड़ दिया था। [11]

सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जेन की सड़कों पर घुमाया था.

टिपण्णी यह है कि -

कालिदास-ज्योतिर्विदाभरण-अध्याय२२-ग्रन्थाध्यायनिरूपणम्-

श्लोकैश्चतुर्दशशतै सजिनैर्मयैव ज्योतिर्विदाभरणकाव्यविधा नमेतत् ॥ᅠ२२.६ᅠ॥

विक्रमार्कवर्णनम्-वर्षे श्रुतिस्मृतिविचारविवेकरम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे।

मत्तोऽधुना कृतिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्कनृपराजवरे समासीत् ॥ᅠ२२.७ᅠ॥

नृपसभायां पण्डितवर्गा-शङ्कु सुवाग्वररुचिर्मणिरङ्गुदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरो घटखर्पराख्य।

अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमो ॥ᅠ२२.८ᅠ॥

सत्यो वराहमिहिर श्रुतसेननामा श्रीबादरायणमणित्थकुमारसिंहा।

श्रविक्रमार्कंनृपसंसदि सन्ति चैते श्रीकालतन्त्रकवयस्त्वपरे मदाद्या ॥ᅠ२२.९ᅠ॥

नवरत्नानि-धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंहशङ्कुर्वेतालभट्टघटखर्परकालिदासा।

ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥ᅠ२२.१०ᅠ॥

यो रुक्मदेशाधिपतिं शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे।

आनीय सम्भ्राम्य मुमोच यत्त्वहो स विक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥ २२.१७ ॥

तस्मिन् सदाविक्रममेदिनीशे विराजमाने समवन्तिकायाम्।

सर्वप्रजामङ्गलसौख्यसम्पद् बभूव सर्वत्र च वेदकर्म ॥ २२.१८ ॥

शङ्क्वादिपण्डितवराः कवयस्त्वनेके ज्योतिर्विदः सभमवंश्च वराहपूर्वाः।

श्रीविक्रमार्कनृपसंसदि मान्यबुद्घिस्तत्राप्यहं नृपसखा किल कालिदासः ॥ २२.१९ ॥

काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततो ननु कियच्छ्रुतिकर्मवादः।

ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो हि ततो बभूव ॥ २२.२० ॥

वर्षैः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणै(३०६८)र्याते कलौ सम्मिते, मासे माधवसंज्ञिके च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः।

नानाकालविधानशास्त्रगदितज्ञानं विलोक्यादरा-दूर्जे ग्रन्थसमाप्तिरत्र विहिता ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥ २२.२१ ॥


ज्योतिर्विदाभरण की रचना ३०६८ कलि वर्ष (विक्रम संवत् २४) या ईसा पूर्व ३३ में हुयी। विक्रम सम्वत् के प्रभाव से उसके १० पूर्ण वर्ष के पौष मास से जुलिअस सीजर द्वारा कैलेण्डर आरम्भ हुआ, यद्यपि उसे ७ दिन पूर्व आरम्भ करने का आदेश था। विक्रमादित्य ने रोम के इस शककर्त्ता को बन्दी बनाकर उज्जैन में भी घुमाया था (७८ इसा पूर्व में) तथा बाद में छोड़ दिया।।

विक्रमादित्य की पौराणिक कथा[संपादित करें]

अनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है। उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है। संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी ("पिशाच की 25 कहानियां") और सिंहासन-द्वात्रिंशिका ("सिंहासन की 32 कहानियां" जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं)। इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं।

पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है। वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा| राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता| दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है। इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है।

सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था। स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है। इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं। इससे विक्रमादित्य की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं। अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं।

विक्रम और शनि[संपादित करें]

शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है। कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था। अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी। ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की। समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है। लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था। इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था। जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे। जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है। विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं।

एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है। घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था। इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है। विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया। दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया। विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे। जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया। उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं। चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे। ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.

किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए। जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी। जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई। लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया। बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया। वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी। उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया। वह सो गई। जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है। जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं। उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है।

विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया। राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया। उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं। वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं। उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं। वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं।

एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है। वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं। इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा। वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है। राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है। वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं। उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है। अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं। वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था। शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं। विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें। वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे। राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं। उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं। वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है। विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं।

नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबार[संपादित करें]

भारतीय परंपरा के अनुसार धन्वन्तरि, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, घटखर्पर, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि राजा के पास "नवरत्न" कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे।

कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वे मावलगण में ईसा पूर्व 56-57 के लगभग विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्न थे। नवरत्नों की प्रसिद्ध परंपरा सम्राट विक्रमादित्य परमार ने ही आरंभ की थी। [12] वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति-प्रदीप" ("आचरण का दीया") का श्रेय दिया है।

विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि

धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥

नौ रत्नों के चित्र[संपादित करें]

मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन-महानगर के महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य टिला है। वहाँ विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं।

Kalidas.jpgGhatkharpar.jpgBetalbhatt.jpgKshapnak.jpgVarahmihir.jpgVarruchi.jpgShanku.jpgAmarsingh(2).jpgDhanvantari.jpg

विक्रम संवत्[संपादित करें]

भारत और नेपाल की हिंदू परंपरा में व्यापक रूप से प्रयुक्त प्राचीन पंचाग हैं विक्रम संवत् या विक्रम युग। कहा जाता है कि ईसा पूर्व 56 में शकों पर अपनी जीत के बाद राजा ने इसकी शुरूआत की थी।

जैन साहित्य में विक्रमादित्य[संपादित करें]

जैन साहित्य में लिखित ऐतिहासिक अनुश्रुतियां शकों के आक्रमण के विषय में जानकारी प्रदान करती है। प्रभावकचरित के अनुसार जैन परिवाज्रक कलकाचार्य गर्दभिल्ल से अपमानित होकर सिंधु नदी में तट पर पहुंचे। वहां पर 96 शक सरदार शासन कर रहे थे। वे अपने (पल्लव) अधिराज द्वारा उपस्थापित किये गये थे। गर्दभिल्ल से प्रतिशोध लेने हेतु आचार्य ने उन शकों को अवन्ति में आक्रामण करने तथा वहां बस जाने का परामर्श दिया। इस स्वागत परामर्श से शकों ने सिंधु नदी पार की। और 72 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण किया। चूर्णी सहित निशीथ सुत्र,दशम उप्देश आदि में भी ऐसा ही वर्णन पाया जाता है। जैन अनुश्रुतिओं में यह भी कहा गया है कि गर्दभिल्ल के पुत्र महापराक्रमी विक्रमादित्य शकारि ने थोड़े ही समय बाद भारत के प्रथम शक आक्रांताओं को निष्कासित कर दिया। बलात्प्रविष्ट शकों के सर्वजनीन संकट के विरूद्ध मध्य भारत और राजस्थान के गणों (शतगण) ने मालवगणमुख्य विक्रमादित्य के सुयोग्य नेतृत्व में एक सबल संघ का निर्माण किया गया और 56 ई.पू. में शकों को निकाल बाहर किया गया। 

ईसा की चतुर्थ और पंचम शताब्दीयों के मध्य में हुणों के आक्रमण के भांति शकों का भारतीय आक्रमण भी जातियों की विशाल बाढ में एक घटना थी। जिसने भारत, एशिया और यूरोप के इतिहास को भी प्रभावित किया। विक्रमादित्य मालवों की गर्दभिल्ल शाखा के मालव-गण-मुख्य थे। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में मालवगण की राजधानी उज्जयिनी थी और विक्रमादित्य वहाँ शासन करते थे।उन्होंने ईसा पूर्व 56 में शकों के आक्रमण को निष्कासित कर दिया और उन्हें खदेड़ दिया था। शक पराजय में उन्होंने प्रसिद्ध संवत् विक्रम संवत् की शुरूआत की जो आरंभिक समय में कृत संवत् या मालव संवत् के नाम से भी जाना जाता था।

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साहित्यिक परंपरा में विक्रमादित्य[संपादित करें]

गाथा सप्तशती[संपादित करें]

विक्रमादित्य प्रमार के बारे में सबसे प्राचीन अनुश्रुती प्रतिष्ठान के राजा हाल सातवाहनरचित गाथा सप्तशती या गाहा सत्तसई की है, जिसमें श्रृंगार रस के ललित पदों का संग्रह है। इसमें निम्न श्लोक विक्रमादित्य का उल्लेख करता है -

संवाहण सुहरसतोसियेण देन्तेणतुह करे लक्खम्।

चल्लेण विक्कमाइत्त-चरिअं अणुसिक्खियं तिस्सा॥(गाथा 564)[17][18] अर्थात् नायिका जिसके चरण संवाहण (दबाने) से संतुष्ट हैं और हाथों में लक्ष (आलक्तक) विद्यमान है, तुम्हें विक्रमादित्य के आचरण का पाठ पढ़ाती है।

टीकाकार गदाधर उपर्युक्त श्लोक की व्याख्या निम्न प्रकार से करते हैं-

पक्षेसंवाहणं संबाधणम्।लक्खम् लक्षम्। विक्रमादित्योऽपि भृत्यकर्तुकेन् तुष्टः सन् भृत्यस्य करे लक्षम् ददातीत्यर्थः॥

अर्थात् विक्रमादित्य के इस संदर्भ में संवाहन का अर्थ है - शत्रुदलन (संवाधन) तथा लक्खम् का अर्थ है - लाखों मुद्राएँ। विक्रमादित्य अपने शत्रुओं के परास्त होने से संतुष्ट होकर अपने सेवकों के हाथ में मुद्राएं देते हैं। इस उध्दरण के अनुसार जिस समय गाथा सप्तशती की रचना हुईं, कवियों में यह परंपरा प्रचलित थी कि विक्रमादित्य नामक एक महान राजा था, जो अपने विजयों तथा उदारता के लिए प्रसिद्ध था। [19]

कथासरित्सागर[संपादित करें]

सोमदेव भट्ट कृत कथासरित्सागर भलेही विक्रमी बारहवीं शताब्दी के आरंभ में लिखी गई है लेकिन कई कारणों से उसका ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। यह कथा गुणाढ्य-रचित पैशाची प्राकृत में लिखी गई बृहत्कथा को आधार मानकर रची गई है। स्वयं सोमदेव ने लिखा है कि बृहत्कथाया सारस्य संग्रह रचयाम्यहम्। बृहत्कथा का लेखक गुणाढ्य सातवाहन हाल का समकालिन था। अतः कथासरित्सागर विक्रमादित्य के प्रायः एक शताब्दी पश्चात (ईसा की प्रथम शताब्दी) ही लिखें गये ग्रंथ के आधार पर होने के कारण उसका (विक्रमादित्य संबंधित) उल्लेख ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। कथासरित्सागर में विक्रमादित्य का नाम चार स्थान पर आया है।  पहले तो छटे लम्बक के पहले तरंग में उज्जैन के राजा विक्रमसिंह प्रमर का उल्लेख किया है। इस प्रकार से यह बात सिध्द हो जाती है कि विक्रम संवत् के प्रवर्तक विक्रमादित्य प्रमार ही थे, जो ईसा के पूर्व पहली शताब्दी में हो गये। [20]क्योंकि बृहत्कथा और नेपाल की राजवंशावली में भी विक्रमादित्य का उल्लेख है, जो चंद्रगुप्त विक्रमादित्य से भी सदियों पहले के साक्ष्य हैं। नेपाल के राजा अंशुवर्मन और विक्रमादित्य पँवार  दोनों समकालिन व्यक्ति थे।[21]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • द कथा सरित सागर, या ओशन ऑफ़ द स्ट्रीम्स ऑफ़ स्टोरी, सी.एच टॉने द्वारा अनूदित, 1880
  • विक्रम एंड द वैम्पायर रिचर्ड आर. बर्टन द्वारा अनूदित, 1870
  • द इनरोड्स ऑफ़ द स्काइथियंस इनटू इंडिया, एंड द स्टोरी ऑ कलकाचार्य, रॉयल एशियाटिक सोसायटी की मुंबई शाखा की पत्रिका, VVol. IX, 1872
  • विक्रमाज़ एडवेंचर्स ऑर द थर्टी-टू टेल्स ऑफ़ द थ्रोन, संस्कृत मूल के चार अलग संपादित पाठ संशोधन (विक्रम-चरित या सिंहासन-द्वात्रिंशिका), फ्रेंकलिन एजरटॉन द्वारा अनूदित, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1926.

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. History of Rise of mohamedan power in india. Year. 1829
  2. Tareekh e Farishta. By Muhammad Qasim Farishta
  3. The Origin of Mathematics.Arthor.V.Lakshmikantham. S. Leela University press of America. In. 2000.
  4. The history of India as told by its own Historians.vol.4.British historian pro.John Dowson. M. R. A. S.
  5. The history of India as told by its own Historians.vol.4.British historian pro.John Dowson. M. R. A. S. The history of India as told by its own Historians.vol.4.British historian pro.John Dowson. M. R. A. S.
  6. कवि जहराम कितनोई कृत सायर-उल-ओकुल. पेज. नं. 315. प्राचीनकाल. मकतब-ए-सुल्तानिया लाइब्रेरी
  7. गीता प्रेस गोरखपुर भविष्य पुराण. गीता प्रेस गोरखपुर. पपृ॰ 245, 246.
  8. गीता प्रेस गोरखपुर, भविष्य पुराण. पृष्ठ. क्र. 245
  9. {{Cite book|title=राजतरंगिणी|last=|first=|publisher=कल्हन|year=|isbn=|location=|pages=}}
  10. Kalhan's Raajataranginii.stein.
  11. ज्योतिविर्दाभरण.22/17.
  12. जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली:दूसरा खण्ड. स्कंदगुप्त विक्रमादित्य. पृ. क्र. 386.
  13. प्रो.रेप्सन, कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया भाग 1,पृ.क्र,567
  14. बी. ए. स्मिथ "अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया" (चतुर्थ संस्करण) प्रपृ. 263-265.
  15. प्रभावक चरित की भूमिका. जिनविजय मुनि. पृ.2
  16. विक्रमादित्य ऑव उज्जयिनी, डॉ॰ राजबली पांडेय कृत
  17. गाथा सप्तशती. गाथा.564
  18. मराठी विश्वकोश.ग.वा.तगारे यांचे. "गाहा सत्तसई" (मराठी मजकूर).मराठी विश्वकोश(marathivishwakosh.in). मराठी https://marathivishwakosh.maharashtra.gov.in/khandas/khand5/index.php/23-2015-01-28-09-45-34/9204-2011-12-28-04-45-33
  19. विक्रमादित्य(संवत् प्रवर्तक).डाॅ. राजबली पांडेय.एम.ए.,डी.लिट्.GOVERNMENT OF INDIA. Department of Archaeological Library.Acc. No.17913
  20. विक्रमादित्य(संवत् प्रवर्तक).डाॅ. राजबली पांडेय.एम.ए.,डी.लिट्.GOVERNMENT OF INDIA. Department of Archaeological Library.Acc. No.17913
  21. Chronology of Nepal History Reconstructed: (Nepalaraja Vamsavali).https://www.google.co.in/search?tbo=p&tbm=bks&q=inauthor:%22Kota+Venkatachelam%22

इन्हें भी देखें[संपादित करें]