जूनागढ़ बीकानेर

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
चित्र:74823-Junagarh-Fort-Bikaner-1.jpg
जूनागढ़ बीकानेर।

रंगों भरा राजस्थान, जहाँ के जनजीवन का उत्साह, गढ़ी,गढ़ और राजमहलों में सिमटा है, अपने सोंदर्य और शोर्य गाथाओं को सम्मोहित करने में बेजोड़ है। इन गढो में बीकानेर का जूनागढ़ स्थापत्य शिल्प, भौगोलिक स्थिति, विलक्षण कला सज्जा का आर्श्चयजनक उदहारण है। थार के रेतीले टीलों के बीच, जो कभी जांगलू प्रदेश के नाम से जाना जाता था : एक से बढ़कर एक अट्टालिकाएँ, हवेलियाँ और महलों की कतार अपने आप में आर्श्चय है। बीकानेर किले को जूनागढ़ के नाम से भी जाना जाता है। इस शहर की स्थापना जोधपुर के शासक राव जोधा के पुत्र राव बीका ने की थी। और इसे सही रूप राजा राय सिंह ने दिया तथा इसे आधुनिक रूप देने का श्रेय महाराजा गंगा सिंह जी को दिया जाता है। बीकानेर के इस जूनागढ़ की नीवं ३० जनवरी १५८६ को रखी गयी थी और यह इसका निर्माण आठ साल बाद 17 फ़रवरी १५९४ को पूरा हुआ। गढ़ की सरंचना मध्ययुगीन स्थापत्य-शिल्प में गढ़, महल और सैनिक जरूरतों के अनुरूप बना है। जूनागढ़ बहुत कुछ आगरे के के किले से मिलता जुलता है। चतुर्भुजाकार ढांचे में डेढ़ किलोमीटर के दायरे में किला पत्थर व रोडों से निर्मित है। परकोटे की परिधि ९६८ मीटर है जिसके चारों और नौ मीटर चौडी व आठ मीटर गहरी खाई है। किले ३७ बुर्जे बनी है जिन पर कभी तोपें रखी जाती थी। किले पर लाल पत्थरों को तराश कर बनाए गए कंगूरे देखने में बहुत ही सुन्दर लगते हैं। गढ़ के पूरब और पश्चिम के दरवाजों को कर्णपोल और चांदपोल कहते हैं। मुख्य द्वार सूरजपोल के अलावा दौलतपोल, फतहपोल, तरनपोल और धुर्वपोल है। प्रवेश द्वार की चौडी गली पार करने के बाद दोनों और काले पत्थरों की बनी महावत सहित हाथियों की ऊँची प्रतिमाएं बनी है। ऊपर गणेश जी की मूर्ति और राजा राय सिंह की प्रशस्ति है। सूरजपोल जैसलमेर के पीले पत्थरों से बना है। दौलतपोल में मेहराब और गलियारे की बनावट अनूठी है। किले के भीतरी भाग में आवासीय इमारते, कुँए, महलों की लम्बी श्रंखला है जिनका निर्माण समय समय पर विभिन्न राजाओं ने अपनी कल्पना अनुरूप करवाया था। सूरजपोल के बाद एक काफी बड़ा मैदान है और उसके आगे नव दुर्गा की प्रतिमा | समीप ही जनानी ड्योढी से लेकर त्रिपोलिया तक पांच मंजिला महलों की श्रंखला है पहली मंजिल में सिलहखाना, भोजनशाला, हुजुरपोडी बारहदरिया, गुलाबनिवास, शिवनिवास, फीलखाना और गोदाम के पास पाचों मंजिलों को पार करता हुआ ऊँचा घंटाघर है। दूसरी मंजिल में जोरावर हरमिंदर का चौक और विक्रम विलास है। रानियों के लिए ऊपर जालीदार बारहदरी है। भैरव चौक, कर्ण महल और ३३ करौड़ देवी देवताओं का मंदिर दर्शनीय है। इसके बाद कुंवर-पदा है जहाँ सभी महाराजाओं के चित्र लगे हैं। जनानी ड्योढी के पास संगमरमर का तालाब है फिर कर्ण सिंह का दरबार हाल है जिसमे सुनहरा काम उल्लेखनीय है। पास में चन्द्र महल, फूल महल, चौबारे, अनूप महल, सरदार महल, गंगा निवास, गुलाबमंदिर, डूंगर निवास और भैरव चौक है। चौथी मंजिल में रतननिवास, मोतीमहल, रंगमहल, सुजानमहल और गणपतविलास है। पांचवी मंजिल में छत्र निवास पुराने महल, बारहदरिया आदि महत्वपूर्ण स्थल है। अनूप महल में सोने की पच्चीकारी एक उत्कृष्ट कृति है। इसकी चमक आज भी यथावत है। गढ़ के सभी महलों में अनूप महल सबसे ज्यादा सुन्दर व मोहक है। महल के पांचो द्वार एक बड़े चौक में खुलते हैं। महल के नक्काशीदार स्तम्भ, मेहराब आदि की बनावट अनुपम है। फूल महल और चन्द्र महल में कांच की जडाई आमेर के चन्द्र महल जैसी ही उत्कृष्ट है। फूल महल में पुष्पों का रूपांकन और चमकीले शीशों की सजावट दर्शनीय है। अनूप महल के पास ही बादल महल है। यहाँ की छतों पर नीलवर्णी उमड़ते बादलों का चित्रांकन है। बादल महल के सरदार महल है। पुराने ज़माने में गर्मी से कैसे बचा जा सकता था, इसकी झलक इस महल में है। गज मंदिर व गज कचहरी में रंगीन शीशों की जडाई बहुत अच्छी है। छत्र महल तम्बूनुमा बना है जिसकी छत लकड़ी की बनी है। कृष्ण-रासलीला की आकर्षक चित्रकारी इस महल की विशेषता है। पास ही रिहायसी इमारते हैं जिनमे राजाओं की बांदियाँ और रखैले रहती थी। इन महलों में हाथी दांत का सुन्दर काम भी देखने योग्य है। महलों में वास्तुकला राजपूत, मुग़ल गुजराती शैली का सम्मिलित रूप है। पश्चिम देशों की वास्तुकला की छाप भी कई महलों में देखि जा सकती है। इन सबको देखकर जूनागढ़ को कलात्मक-जगत का अदभूत केंद्र की संज्ञा दी जा सकती है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

भारत के दुर्ग, दीनानाथ दुबे