जालौर दुर्ग

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जालौर किले का इतिहास #

मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको प्रतिहार कालीन सवर्णगिरी पर्वत पर बना जालौर किले के इतिहास के बारे में जानकारी देंगे।।

जालौर राजस्थान के दक्षिणी - पश्चिम में स्थित पूर्व मध्यकाल का एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। जालौर का किला मारवाड़ के महत्वपूर्ण सुदृढ़ किलों में से एक है। 8 वीं शताब्दी अर्थात gurjar प्रतिहार काल में इसका निर्माण किया गया था। यह किला हिन्दू पद्धति से बना है।

जबालिपुर या जालहुर सूकडी नदी के किनारे बना हुआ गिरी दुर्ग है। सोहनगढ एवं सवर्णगिरी कनकाचल के नाम से जाना जाता है। इस दुर्ग का निर्माण 8 वीं शताब्दी में प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सम्राट नागभट्ट प्रथम (730 से 760) द्वारा जालौर को देश की राजधानी बनाकर किया गया था। आज तक किसी भी आक्रमणकारी ने आक्रमण के द्वारा इस दुर्ग के द्वार को खोल नहीं पाया। प्रतिहार राजपूतों के जालौर से पलायन पश्चात इस दुर्ग पर बारी बारी से कई शासकों ने राज किया जिसमें परमार, सोनगरा चौहान, खिलजी आदि। पर मूलतः यह किले प्रतिहार वंश का ही है।

# सम्राट नागभट्ट प्रतिहार #

इतिहासकार के.एम.पन्निकर ने अपनी पुस्तक "सर्वे ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री "में लिखा है -"जो शक्ति मोहम्मद साहिब की मृत्यु के सौ साल के अंदर एक तरफ चीन की दिवार तक पंहुच गयी थी ,तथा दूसरीऔर मिश्र को पराजित करते हुए उतरी अफ्रिका को पार कर के स्पेन को पद दलित करते हुए दक्षिणी फ़्रांस तक पंहुच गयी थी ,जिस ताकत के पास अनगिनित सेना थी तथा जिसकी सम्पति का कोई अनुमान नही था ,जिसने रेगिस्तानी प्रदेशों को जीता तथा पहाड़ी व् दुर्लभ प्रांतों को भी फतह किया था।

इन अरब सेनाओं ने जिन जिन देशों व् साम्राज्यों को विजय किया ,वंहा कितनी भी सम्पन्न संस्कृति थी उसे समाप्त किया तथा वंहा के निवासियों को अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। ईरान , मिश्र आदि मुल्कों की संस्कृति जो बड़ी प्राचीन व विकसित थी ,वह इतिहास की वस्तु बन कर रह गयी। अगर अरब हिंदुस्तान को भी विजय कर लेते तो यहां की वैदिक संस्कृति व धर्म भी उन्ही देशों की तरह एक भूतकालीन संस्कृति के रूप में ही शेष रहता। इस सबसे बचाने का भारत में कार्य नागभट्ट प्रतिहार ने किया। उसने खलीफाओं की महान आंधी को देश में घुसने से रोका और इस प्रकार इस देश की प्राचीन संस्कृति व धर्म को अक्षुण रखा। देश के लिए यह उसकी महान देन है। प्रतिहार/परिहार वंश में वैसे तो कई महान राजा हुए पर सबसे ज्यादा शक्तिशाली नागभट्ट प्रथम एवं मिहिर भोज जी थे जिन्होने अपने जीवन मे कभी भी मुगल और अरबों को भारत पर पैर जमाने का मौका नहीं दिया । इसीलिए आप सभी मित्रों ने कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक किताबो पर भी पढा होगा की प्रतिहारों को इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बताया गया है।।

इस किले में प्रतिहार कालीन वास्तु शैली, परमार कालीन कीर्ती स्तंभ, कान्हणदेव की बावणी, वीरमदेव की चौकी, जैन मंदिर एवं मल्लिकाशाह की दरगाह आदि वास्तु शिल्प के मुख्य नमूने है।

1311 वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी ने यहां के शासक कान्हणदेव चौहान से बडा ही भयावह युद्ध किया और बडे ही मुश्किल से उन्हें परास्त किया और इस दुर्ग को अपने अधिकार में ले सका।

दुर्ग में प्रवेश के लिए दो द्वार है मुख्य द्वार को सूरज पोल एवं द्वितीय पिछले द्वार को ध्रुव पोल के नाम से जाना जाता है।

प्रतिहारों का मूल प्रदेश आबू पर्वत अर्थात माउंट आबू था। किवदंती अनुसार इस स्थान से रिषी जी के यज्ञोपवीत संस्कार हुआ तभी प्रतिहार सूर्यवंशी से अग्निवंशी कहलाने लगे। और आंगे के इतिहासकारों ने भी बिना किसी शोध के आंख मूदकर प्रतिहार राजपूतों को हर जगह अग्निवंशी ही बता डाला जिससे समाज में प्रतिहारों के अग्निवंशी होने पर हास्य हुआ। कहा जाता है कि भारत भ्रमण करने से पहले ही यह क्षेत्र गुजरात्रा नाम से जाना जाता था। प्रतिहार सत्ता का विस्तार मण्डौर मेढ़ता से हुआ, जो उन दिनों "मारुमण्ड" कहलाता था जब प्रतिहारों की एक शाखा अर्थात ज्येष्ठ शाखा मण्डौर से जालौर आई तब प्रतिहारों को उनके समकालीन लोग गुर्जर कहने लगे और यही लोग जब स्थांनातरित होकर कन्नौज आये तब गुर्जर - प्रतिहार नाम से विख्यात हुए।

गुर्जर शब्द गुजरात्रा क्षेत्र से आये हुए लोगो के लिए है न कि किसी जाति से संबंधित है। और न ही प्रतिहार गुज्जर/गुर्जर मूल के है। गुर्जर जाति आजकल प्रतिहारों को शोसल मीडिया पर गुज्जर जाति का बता रही है। प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय है। प्रतिहारों ने अपने नाम के साथ कभी भी गुर्जर शब्द प्रयोग नहीं किया यह केवल कुछ मूर्ख इतिहासकारों की ही उपज है। जिससे यह शुद्ध क्षत्रिय वंश बार बार अपमानित हुआ।

प्रतिहारों के पतन के पश्चात गुजरात्रा क्षेत्र मे जब चालुक्य शक्तिमान हुए तब यही गुर्जर शब्द उनके लिए अगली तीन शताब्दियों तक प्रयुक्त होता रहा। गुर्जरात्रा की सीमा पर स्थित "अणहिल पाटक" गुर्जरपुर और गुर्जर नगर कहा गया है। शनैः शनैः गुर्जर शब्द चालुक्यों द्वारा शासित समूचे भू - भाग के लिए प्रयुक्त होने लगा। प्राकृत में उसी को गुजरात कहा जाने लगा। जालौर में विभिन्न राजाओं का शासनकाल इस प्रकार रहा --

सम्राट नागभट्ट प्रतिहार (730 से 760)

सम्राट ककुक्क प्रतिहार

सम्राट देवराज प्रतिहार

सम्राट वत्सराज प्रतिहार

इस तरह जालौर पर प्रतिहार वंश के चार सम्राटों ने शासन किया एवं संपूर्ण भारत वर्ष पर खलीफाओं (अरब) की आंधी को घुसने से रोका। यही से निकलकर कुछ प्रतिहार शाखा कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर, नागौद के लिए प्रस्थान कर गई और यहाँ कई सौ वर्षों तक शासन किया । जिसमें नागौद प्रतिहार बरमै राज्य मुख्य है जिसने 800 सौ वर्षों तक शासन किया है।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india


जय माँ चामुण्डा।।

जय क्षात्र धर्म।।

नागौद रियासत।।


जालौर के किले का तोपखाना बहुत आकर्षक है। इसके विषय में कहा जाता है कि यह परमार राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी, जो कालान्तर में दुर्ग के मुस्लिम अधिपतियों द्वारा मस्जिद परिवर्तित कर दी गयी तथा तोपखाना मस्जिद कहलाने लगी। तथा यह एक जल दुर्ग हैं। 1956

कान्हड़देव चौहान के शासनकाल में यहाँ दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 ई. आक्रमण किया था |

जालौर के किले का तोपखाना बहुत आकर्षक है। इसके विषय में कहा जाता है कि यह परमार राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी, जो कालान्तर में दुर्ग के मुस्लिम अधिपतियों द्वारा मस्जिद परिवर्तित

सन्दर्भ[संपादित करें]

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बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • Refrence : - (1) प्रतिहार राजपूतो का इतिहास - लेखक रामलखन सिंह (2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का ऐतिहासिक अनुशीलन - लेखक डॉ अनुपम सिंह (3) प्रतिहारों का मूल इतिहास - लेखक देवी सिंह मंडावा (4) ग्वालियर प्रशस्ति - मिहिर भोज (5) राजपूताने का इतिहास पृष्ठ संख्या 161 (6) राजस्थान का इतिहास पृष्ठ संख्या 954 (7) प्राचीन भारत का इतिहास 1 - 8 (8) राजस्थान थ्रू एजेज पृष्ठ संख्या 339/440 - 441 (9) राजोरगढ़ प्रस्तर अभिलेख वि. स. 1016/959 ई. , एपि इंडिया 111, पृष्ठ 263 (10) ग्वालियर प्रशस्ति - आकयॆलाजी इन ग्वालियर, 1934 ग्वालियर