रणथंभोर दुर्ग

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रणथम्भोर दुर्ग का प्रवेश द्वार

रणथंभोर दुर्ग दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से १३ कि॰मी॰ दूर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच समुद्रतल से ४८१ मीटर ऊंचाई पर १२ कि॰मी॰ की परिधि में बना है। दुर्ग के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है।

परिचय[संपादित करें]

जाट रियासत रणथम्भोर ( सवाई माधोपुर )जाटो द्वारा बनाया गया किला रणथम्भोररणथम्भोर का रियासत नागिल गोटा के जाटो की थी जिनको आज नागा बोल जाता है। रणथम्भोर में चौहान राजपूत आठवीं सदी से पीछे पहुंचे थे। किन्तु उस समय भी जाटों का जोर कम नहीं हुआ था। भाटों के काव्यों पर यदि हम विश्वास करें तो कहा जाता है कि गौर और नागिल जाटों ने उस स्थान पर बीसियों पीढ़ी राज्य किया था। रणमल नामक एक जाट सरदार ने जिस स्थान पर रणखम्भ गाड़ा था तो आस-पास के राजाओं ने लड़ने की चुनौती दी थी, उसी स्थान पर आज रणस्तंभपुर या रणथम्भोर है। भाग भट्ट चौहान की भी, आस-पास के जाट सरदारों ने मुसलमानों के विरुद्ध सहायता की थी। मुस्लिम-काल में जलालूद्दीन तूनियां जो कि रजिया के दल का था, यहां का शासक बनना चाहता था। रजिया भी रणथम्भोर पर चढ़कर आई। उसने जाटों से सहायता चाही। जब कि वह रणथम्भोर के पास पहुंचने वाली थी कि तूनियां गुलाम सरदार के साथ जाटों काएक बड़ा दल आ गया और वह लौट गई। रजिया ने लौटकर अपनी मर्जीदान के साथ शादी कर ली। अलतूनियां ने बादशाही के जाट-सरदारों की मदद लेकर दिल्ली पर चढ़ाई कीजाट बड़ी वीरता के साथ लड़कर इस औरत के लिये काम आये(1. तारीख फरिश्ता। उर्दू (नवलकिशोर प्रेस का छपा) पृ. 105, 106। ) ।नागिल गोत्र के जाट अपना निकास पंजाब से बतलाते हैं। साथ ही कहते हैं कि उनके नौ राजाओं ने राजपूताने पर राज किया था। अभी यह निश्चय नहीं हुआ कि इनकी राजधानी कहां पर थी। इस समय इनका अस्तित्व जयपुर और यू.पी. के प्रान्तों में पाया जाता है। नागा और नागिलों की भांति जाटों में एक गोत्र नागर भी है। स्यालकोट में नागर जाट अब भी हैं।1 नागरों का असल स्थान नगरकोट में था। जाट लोग आज तक भी नगरकोट की देवी की पूजा के लिए जाते हैं। वे उसी जाट-कन्या के रूप में पूजते हैं। उसके नाम पर कुंवारे जाट लड़के लड़कियों को खिलाते हैं।नवमी शताब्दी में मेदपाट की भूमि पर इनका नागावलोक नाम का एक राजा राज करता था । इनका वह राजा, अपना शासन, राज-सभा द्वारा करता था। राजधानी उसकी विजौलिया के आस-पास थी। वह राज पूर्ण उन्नति पर था। आजकल की सरकार की भांति इनकी राजसभा उपाधि वितरण करती थी। उन्होंने गूयक नाम के चौहान सरदार को ‘वीर’ की उपाधि दी थी।नागौर पर भी एक लम्बे अर्से तक नाग लोगों का शासन रहा था। जिसके कारण वह अहिछत्रपुर भी कहलाता था। नाग लोग आरम्भिक अवस्था में अराजकतावादी और मध्यकालमें प्रजातन्त्री थे। उन्होंने अपने प्रजातन्त्रों की रक्षा के लिए बड़े-बड़ेकष्ट सहे थे। उनके समूह के समूह विरोधियों से लड़कर मारे गए। वास्तव में नाग एकसमाज था, जिसके विद्वान् आज नागर ब्राह्मण और योद्धा लोग जाटों में पाये जाते हैं। उनके मंत्रि-मण्डल का अधिकांश भाग कायस्थों में शामिल हो गया है। बृज के हिन्दू श्री बलरामजी को शेषनाग का अवतार मान कर पूजते हैं।

मई 2017 की राजस्थान पत्रिका और 22 अगस्त 2015 को भास्कर में इस बात की पुष्टि होती है की रणथम्भोर किला जाटों ने बनाया था

https://m.bhaskar.com/news/raj-jai-hmu-ranthambore-fort-story-5091575-pho.html

विश्व धरोहर रणथंभोर दुर्ग[संपादित करें]

कंबोडिया के नामपेन्ह शहर में यूनेस्को की विरासत संबंधी वैश्विक समिति की 36वीं बैठक में दिनांक 21जून 2013 शुक्रवार को भारत का पहाड़ी दुर्ग रणथंभोर का चयन किया गया, इस दुर्ग के घटनाक्रम को विश्व में लाइव देखा गया और सराहा गया ! रणथंभोर दुर्ग के अलावा राजस्थान में जंतर-मंतर वेधशाला, घना पक्षी विहार , आमेर का दुर्ग, गागरोन का किला, कुंभलगढ़ का किला, जैसलमेर का दुर्ग एवं चितौड़गढ़ का किला भी विश्व धरोहर में शामिल है !

निर्माण काल[संपादित करें]

इस किले का निर्माण कब हुआ कहा नहीं जा सकता लेकिन ज्यादातर इतिहासकार इस दुर्ग का निर्माण चौहान राजा रणथंबन देव द्वारा ९४४ में निर्मित मानते हैं, इस किले का अधिकांश निर्माण कार्य चौहान राजाओं के शासन काल में ही हुआ है। दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समय भी यह किला मौजूद था और चौहानों के ही नियंत्रण में था।

शासक[संपादित करें]

११९२ में तहराइन के युद्ध में मुहम्मद गौरी से हारने के बाद दिल्ली की सत्ता पर पृथ्वीराज चौहान का अंत हो गया और उनके पुत्र गोविन्द राज ने रणथंभोर को अपनी राजधानी बनाया। गोविन्द राज के अलावा वाल्हण देव, प्रहलादन, वीरनारायण, वाग्भट्ट, नाहर देव, जैमेत्र सिंह, हम्मीरदेव, महाराणा कुम्भा, राणा सांगा, शेरशाह सुरी, अल्लाऊदीन खिलजी, राव सुरजन हाड़ा और मुगलों के अलावा आमेर के राजाओं आदि का समय-समय पर नियंत्रण रहा लेकिन इस दुर्ग की सबसे ज्यादा ख्याति हम्मीर देव (1282-1301) के शासन काल में रही। हम्मीरदेव का 19 वर्षो का शासन इस दुर्ग का स्वर्णिम युग था। हम्मीर देव चौहान ने 17 युद्ध किए जिनमे13 युद्धो में उसे विजय श्री मिली। करीब एक शताब्दी तक ये दुर्ग चितौड़ के महराणाओ के अधिकार में भी रहा। खानवा युद्ध में घायल राणा सांगा को इलाज के लिए इसी दुर्ग में लाया गया था।

आक्रमण[संपादित करें]

अकबर राय सुरजन हाडा के खिलाफ रणथम्भौर किले पर हमले का निर्देशन

रणथंभोर दुर्ग पर आक्रमणों की भी लम्बी दास्तान रही है जिसकी शुरुआत दिल्ली के कुतुबुद्दीन ऐबक से हुई और मुगल बादशाह अकबर तक चलती रही। मुहम्मद गौरी व चौहानो के मध्य इस दुर्ग की प्रभुसत्ता के लिये 1209 में युद्ध हुआ। इसके बाद 1226 में इल्तुतमीश ने, 1236 में रजिया सुल्तान ने, 1248-58 में बलबन ने, 1290-1292 में जलालुद्दीन खिल्जी ने, 1301 में अलाऊद्दीन खिलजी ने, 1325 में फ़िरोजशाह तुगलक ने, 1489 में मालवा के मुहम्म्द खिलजी ने, 1529 में महाराणा कुम्भा ने, 1530 में गुजरात के बहादुर शाह ने, 1543 में शेरशाह सुरी ने आक्रमण किये। 1569 में इस दुर्ग पर दिल्ली के बादशाह अकबर ने आक्रमण कर आमेर के राजाओं के माध्यम से तत्कालीन शासक राव सुरजन हाड़ा से सन्धि कर ली।

वर्तमान[संपादित करें]

कई ऐतिहासिक घटनाओं व हम्मीरदेव चौहान के हठ और शौर्य के प्रतीक इस दुर्ग का जीर्णोद्धार जयपुर के राजा पृथ्वी सिंह और सवाई जगत सिंह ने कराया। महाराजा मान सिंह ने इस दुर्ग को शिकारगाह के रूप में परिवर्तित कराया। आजादी के बाद यह दुर्ग सरकार के अधीन हो गया जो 1964 के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रण में है।

चित्रावली[संपादित करें]

Gallery[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]