पृथ्वीराज चौहान

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भारतेश्वर [1] पृथ्वीराज
अन्तिमहिन्दुराजरूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज
अन्तिमहिन्दुराजरूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज
अजयमेरु के दुर्ग में स्थित पृथ्वीराजतृतीय की प्रतिमा
अधिकार
काल ११७८-११९२
राज्याभिषेक ११७८
पूर्वज सोमेश्वर चौहान
उत्तराधिकारी हरिराज चौहान
परिवार
पिता सोमेश्वर चौहान
माता कर्पूरदेवी
पुत्र गोविन्द चौहान
राज्ञीयां
  • जम्भावती पडिहारी
  • पंवारी इच्छनी
  • दाहिया
  • जालन्धरी
  • गूजरी
  • बडगूजरी
  • यादवी पद्मावती
  • यादवी शशिव्रता
  • कछवाही
  • पुडीरनी
  • शशिव्रता
  • इन्द्रावती
  • संयोगिता गाहडवाल
सन्तान हरिराज, पृथा
वंश चौहानवंश
जन्म १२/३/१२२० भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार,
१/६/११६३ आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार
पाटण, गुजरातराज्य
मृत्यु ११/१/१२४९ भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार,
11 मार्च 1192(1192-03-11) (उम्र 28) आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार
अयमेरु (अजमेर), राजस्थानराज्य
धर्म हिन्दुधर्म

पृथ्वीराज चौहान ( ( सुनें) /ˈprʊθəvɪrɑːjəh xɔːhɑːnə/) (संस्कृत: भारतेश्वरः पृथ्वीराजः, अंग्रेज़ी: Prithviraj Chavhan) (सन् 1178-1192) चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे, जो उत्तर भारत में 12 वीं सदी के उत्तरार्ध में अजमेर (अजयमेरु) और दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर राज्य के राजा सोमश्वर के यहाँ हुआ था। वे भारतेश्वर[1], पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दूसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा इत्यादि नाम से प्रसिद्ध हैं। भारत के अन्तिम हिन्दूराजा के रूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज १२३५ विक्रम संवत्सर में पंद्रह वर्ष (१५) की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ हुए। अतः उनकी माता कर्पूरदेवी ही उन अल्पवयस्क पृथ्वीराज के स्थान पर संरक्षिका के रूप में राज्य के कार्यों का वहन करती थीं।

पृथ्वीराज की तेरह रानीयाँ थी। उन में से संयोगिता प्रसिद्धतम मानी जाती है। अन्य जाङ्गलु, पद्मावती, चन्द्रावती भी प्रसिद्धि को प्राप्त हुई। भारतसम्राट् के रूप में जब पृथ्वीराज सिंहासन पर आरूढ हुए, तब उन्हें अल्पवयस्क जानकर सपादलक्ष साम्राज्य के अनेक सामन्तों और प्रतिवेशी राज्यों ने विद्रोह कर दिया। उनमें प्रप्रथम नागार्जुन था। नागार्जुन चौहान विग्रहराज का पुत्र था। ११७७ वर्ष में पृथ्वीराज ने उसके विद्रोह का दमन किया।[2] उस युद्ध में भादानकदेशीय शासक, जेजाकभुक्तिप्रदेश का शासक और चालुक्यवंश ने नागार्जुन की सहायता की थी। यद्यपि सम्पूर्ण सपाद लक्षसाम्राज्य के शासन को प्राप्त करने के लिए उन सर्व ने षडयंत्र करके सैन्य बल द्वारा और धन बल द्वार आक्रमण किया था, फिर भी पृथ्वीराज ने नागार्जुन का दमन किया।

नागार्जुन की सहायता जिन शासकों ने की थी, उनको उनके षडयंत्र का उत्तर देने के लिए पृथ्वीराज ने दिग्विजय अभियान आरंभ किया। उस दिग्विजय अभियान में पृथ्वीराज ने ११७७[3] वर्ष में भादानक देशीय को, ११८२[4] वर्ष में जेजाकभुक्ति शासक को और ११८३[5] वर्ष में चालुक्य वंशीय शासक को पराजित किया। इन्हिं वर्षों में भारत के उत्तरभाग में घोरी नामक गौमांस भक्षण करने वाला योद्धा अपने शासन और धर्म के विस्तार की कामना से अनेक जनपदों को छल से या बल से पराजित कर रहा था। उसकी शासन विस्तार की और धर्म विस्तार की नीत के फल स्वरूप ११७५ वर्ष से पृथ्वीराज का घोरी के साथ सङ्घर्ष आरंभ हुआ।[6] उसके बाद ११७८ वर्ष में घोरी ने गुजरात राज्य के उपर आक्रमण करने के लिए पृथ्वीराज की सहायता भी मांगी। परन्तु पृथ्वीराज के मन में घोरी के प्रति घृणा भाव था और पृथ्वीराज के मत से चालुक्यवंश के साथ उसका सङ्घर्ष गृहसङ्घर्ष था। उस गृहसङ्घर्ष का लाभ उठा कर कोई वैदेशीक, गौमांसभक्षी भारत के उपर आक्रमण करें ये पृथ्वीराज नहीं चाहते थे।

यद्यपि पृथ्वीराज ने घोरी की सहायता नहीं की, फिर भी घोरी गुजरात राज्य पर आक्रमण करने के लिए गया। उस युद्ध में घोरी की लज्जास्पद पराजय हुई।[7] तब से घोरी पृथ्वीराज का परमशत्रु बन गया। यतो हि घोरी का मत था कि, पृथ्वीराज ने यदि मेरी सहायता की होती, तो मेरी विजय हो जाती। उसके बाद अनेक लघु और मध्यम युद्ध पृथ्वीराज के और घोरी के मध्य हुए। उनके बीच हुए युद्ध की सङ्ख्या का उल्लेख अनेक ग्रन्थों में प्राप्य है। उन सभी युद्धों में घोरी की पराजय हुई। विभिन्न ग्रन्थों में जो सङ्ख्याएं मिलती है, वे सङ्ख्या ७, १७, २१[8] और २८ हैं।[9] सभी युद्धों मेें पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बनाया और उसको छोड दिया। परन्तु अन्तिम बार नरायन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय के बाद घोरी ने पृथ्वीराज को बन्दी बनाया और कुछ दिनों तक 'इस्लाम्'-धर्म का अङ्गीकार करवाने का प्रयास करता रहा। उस प्रयोस में पृथ्वीराज को शारीरक पीडाएँ दी गई।[10] शरीरिक यातना देने के समय घोरी ने पृथ्वीराज को अन्धा कर दिया। अन्ध पृथ्वीराज ने शब्दवेध बाण से घोरी की हत्या करके अपनी पराजय का प्रतिशोध लेना चाहा। परन्तु देशद्रोह के कारण उनकी वो योजना भी विफल हो गई।[11] एवं जब पृथ्वीराज के निश्चय को परिवर्तित करने में घोरी अक्षम हुआ, तब उसने अन्ध पृथ्वीराज की हत्या कर दी।

एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः।

शरीरेण समं नाशं सर्वम् अन्यद्धि गच्छति।। ८.१७।। मनुस्मृतिः

अर्थात्, धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मरणोत्तर भी साथ चलता है। अन्य सभी वस्तुएं शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती हैं।

इतिहासविदों के मत अनुसार पृथ्वीराज ने उक्त श्लोक का अन्तिम समय पर्यन्त आचरण किया [12]

अनुक्रम

जन्म और परिवार[संपादित करें]

१२२० विक्रम संवत्सर ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की द्वादशी (१२/३/१२२०) तिथि को तदनुसार ग्रेगोरियन पंचाग के ११६३ जून-मास के प्रथम (१/६/११६३) दिनाङ्क को गुजरात राज्य के पाटण पत्तन में पृथ्वीराज का जन्म हुआ[13] पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में ये उल्लेख मिलता है।

ज्येष्ठत्वं चरितार्थतामथ नयन-मासान्तरापेक्षया,

ज्येष्ठस्य प्रथयन्परन्तपकया ग्रीष्मस्य भीष्मां स्थितिम्।
द्वादश्यास्तिथि मुख्यतामुपदेशन्भोनोः प्रतापोन्नतिं,
तन्वन्गोत्रगुरोर्निजेन नृपतेर्यज्ञो सुतो जन्मना।। [14]

तब पाटण पत्तन अण्हिलपाटण के नाम से प्रसिद्ध था। तथा पाटण न केलव महानगर था, अपि तु गुजरात राज्य की राजधानी भी था। पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर, माता कर्पूरदेवी थे। पृथ्वीराज के अनुज का नाम हरिराज, छोटी बहन का नाम पृथा था। पृथ्वीराज की तेरह रानीयाँ थी। पृथ्वीराज का एक पुत्र था, जिसका नाम गोविन्द था।

नामकरण और बाल्य काल[संपादित करें]

इतिहास में वर्णन मिलता है कि, पुत्र के जन्म के बाद पिता सोमेश्वर अपने पुत्र का भविष्यफल बताने के लिए राजपुरोहितों को निवेदन करते हैं। उसके बाद बालक का भाग्यफल देख कर राजपुरोहितों ने "पृथ्वीराज" नामकरण किया। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में नामकरण का उल्लेख प्राप्त है -

पृथ्वीं पवित्रतान्नेतुं राजशब्दं कृतार्थताम्।

चतुर्वर्णधनं नाम पृथ्वीराज इति व्यधात्।। ३०।। [15]

पृथ्वी को पवित्र करने के लिए और "राज" शब्द को सार्थक बनाने के लिए इस राजकुमार का नामकरण "पृथ्वीराज" किया गया है। 'पृथ्वीराज रासो' काव्य में भी नामकरण का वर्णन करते हुए चन्द्रबदाई लिखते हैं –

यह लहै द्रव्य पर हरै भूमि।

सुख लहै अंग जब होई झूमि।।

पृथ्वीराज नामक बालक महाराजाओं के छत्र अपने बल से हर लेगा। सिंहासन की शोभा को बढाएगा अर्थात् कलियुग में पृथिवी में सूर्य के समान देदीप्यमान होगा।

कुमारपाल के शासन में चालुक्यों के प्रासाद में जन्मा पृथ्वीराज बाल्यावस्था से ही वैभवपूर्ण वातावरण में बड़ा हुआ। वैभव सम्पन्न प्रासाद में पृथ्वीराज के परितः (चारों ओर) परिचायिकाओं का बाहुल्य था। दुष्ट ग्रहों से बालक की रक्षा करने के लिए परिचायिकाएं भी विभिन्न मार्गों का अवलम्बन करती थीं। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में महाकवि जयानक द्वारा ये वर्णन प्राप्त है।

दशावतार मुद्रित कण्ठाभरण (कण्ठ का आभूषण) और दुष्टग्रहो से रक्षा के लिए व्याघ्रनख से निर्मित आभरण परिचायिकाओंने बालक को पहनाया था (व्याघ्र के नख को धारण करना मङ्गल मानते है। अतः राजस्थान में परम्परागत रूप से व्याघ्र के नख को सुवर्ण के आभरण में पहनते थे।)।

बालक के कृष्ण केश और मधुकर वाणी मन को मोहित करते थे। सुन्दर ललाट पर किया गया तिलक बालक के सौन्दर्य में और वृद्धि कर रहा था। उज्जवल दन्त हीरक जैसे आभायुक्त थे। नेत्र में किया गया अञ्जन आकर्ष बढाता था। घुटनों द्वारा जब बालक यहाँ वहाँ घुमता था, तब उसके वस्त्र धूलिकामय होते थे। खेलते हुए पुत्र को देख कर माता कर्पूरदेवी अपने पुत्र का कपोल चुम्बति थी।

मनिगन कंठला कंठ मद्धि, केहरि नख सोहन्त

घूंघर वारे चिहूर रुचिर बानी मन मोहन्त
केसर समुंडि शुभभाल छवि दशन जोति हीरा हरन।
नह तलप इक्क थह खिन रहत, हुलस हुलसि उठि उठि गिरत।।
रज रंज्जित अंजित नयन घुंटन डोलत भूमि।
लेत बलैया मात लखि भरि कपोल मुख चूमि।।

इस प्रकार अण्हिलपाटण के सहस्रलिङ्ग सरोवर और अलङ्कृत सोपानकूप के मध्य में स्थित राजप्रासाद के विशाल भूभाग में पृथ्वीराज का बाल्य काल व्यतीत हुआ।

अभ्यास[संपादित करें]

चालुक्य वंश के प्रासाद से जब सोमेश्वर अजमेरु (अजमेर) गए, तब उनके साथ उनकी पत्नी कर्पूरदेवी, दो पुत्र पृथ्वीराज और हरिराज थे। १२२६ विक्रम संवत्सर में [16] गुजरात राज्य से जब सोमेश्वर अजमेरू प्रदेश में स्थानान्तरित हुए, तब पृथ्वीराज की आयु पांच वर्ष थी। पृथ्वीराज का अध्ययन अजयमेरु प्रासाद में और विग्रहराज द्वारा स्थापित सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ में (आज कल वो विद्यापीठ 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' नामक 'मस्जिद्' है) हुआ। प्रासाद और विद्यापीठ के प्राङ्गण में युद्धकला और शस्त्र विद्या का ज्ञान पृथ्वीराज ने प्राप्त किया। यद्यपि आदिकाल से ही शाकम्भरी के चौहाण वंश स्रामाज्य की राजभाषा संस्कृतम् थी, तथापि अन्य भाषाओं में भी वाग्व्यवहार होता था। परन्तु संस्कृत आदिकाल से शाकम्भरी की राजभाषा थी ये प्राप्त शिलालेखों से ज्ञात होता है। विग्रहराज द्वारा और उनके राजकवि द्वारा रचित ग्रन्थों से भी अपने संस्कृत ज्ञान का प्रदर्शन किया है। विग्रहराज के राजकवि सोमदेव ने 'ललितविग्रहराजः' नामक नाटक की रचना की थी। उस नाटक में उन्होंने प्रचलित छः भाषाओं का कुशलता से उपयोग किया। शिला लेखों के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि, चौहान वंश के काल में मुख्यतया छः भाषाए प्रचलित थीं। वे इस प्रकार हैं - संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश भाषा[17][18][19]

पृथ्वीराज विजय में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज चौहान छओं भाषा में निपुण थे [20][21]। छः भाषाओं के अतिरिक्त पृथ्वीराज ने मीमांसा, वेदान्त, गणित, पुराण, इतिहास, सैन्य विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान प्राप्त किया था। वह सङ्गीत कला और चित्र कला में भी प्रवीण थे [22][23]। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, धनुर्विद्या में पारंगत पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण को चलाने में भी सक्षम हो गए थे। पृथ्वीराज अश्व नियन्त्रण विद्या और गज नियन्त्रण विद्या में विचक्षण थे।[24]। इस प्रकार विविध विद्याओं के अर्जन करते हुए पृथ्वीराज तरुणावस्था को प्राप्त हुए।

सोमेश्वर की मृत्यु और पृथ्वीराज का राज्याभिषेक[संपादित करें]

सोमेश्वर का अन्तिम शिलालेख आंवल्दा से प्राप्त होता है। वो शिलालेख १२३४ विक्रम संवत्सर भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी (४/६/१२३४) को शुक्रवार के दिन, तदनुसार ग्रेगोरियन गणना में १८ अगस्त ११७८ को वह शिलालेख प्रस्थापित किया गया। उसी वर्ष में पृथ्वीराज का प्रथम शिलालेख बडल्या से प्राप्त होता है। १२३५ विक्रम संवत्सर चैत्र मास की शुक्ल चतुर्थी, तदनुसार १४ मार्च ११७९ को वो शिलालेख प्रस्थापित हुआ था। सोमेश्वर के निधन के बाद पृथ्वीराज का राज्याभिषेक हुआ।

पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि,

मृगशिरा नक्षत्र व सिद्धयोग में कुमार पृथ्वीराज, राजा पृथ्वीराज बने।

शुभ मुहूर्त में पृथ्वीराज स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ हुए। ब्राह्मणों ने वेदमन्त्र गान के साथ उनका राजतिलक किया। पृथ्वीराज के राज्याभिषेक के अवसर पर प्रासाद की शोभा आह्लादक थी। सभी सामन्तों द्वारा जय घोषा हुआ और राजधानी में शोभा यात्रा हुई। शोभा यात्रा में हाथी पर आरूढ पृथ्वीराज के ऊपर नगर जनों ने पुष्प वर्षा की। सभी पृथ्वीराज की दीर्घायुष्य की प्रार्थना कर रहे थे। १२३५ विक्रम संवत्सर में पृथ्वीराज पंद्रह वर्ष (१५) के हुए थे। अतः माता कर्पूरदेवी ही अल्पवयस्क पृथ्वीराज की संरक्षिका के रूप में राज्यकार्य का वहन करती थीं।

शासन व्यवस्था[संपादित करें]

पृथ्वीराज की शासन व्यवस्था का वर्णन विभिन्न ग्रन्थों में प्राप्त होता है।[25]

सेनापति[संपादित करें]

१. स्कन्द – ये गुजरात राज्य के नागर ब्राह्मण थे। वे सेनापति के साथ साथ साम्राज्य के दण्डनायक भी थे।

२. भुन्नेकम्मल्ल – कर्पूरदेवी के चाचा थे।

३. उदयराज

४. उदग – मेडता प्रदेश के सामन्त थे।

५. कतिया – वीकमपुर के मण्डलेश्वर थे।

६. गोविन्द – कुत्रचित् उल्लेख मिलता है कि, ये नरायन के द्वितीययुद्ध में मुहम्मद घोरी द्वारा मारे गए। परन्तु जम्मू से प्राप्त एक शिलालेख में उल्लिखित है कि, प्रदेश के नरसिंह नामक राजकुमार ने इनकी हत्या की थी।[26]

७. गोपालसिंह चौहान – देदरवा-प्रान्त के सामन्त थे।

मन्त्री[संपादित करें]

१. पं. पद्मनाभ - इनकी अध्यक्षता में अन्य मन्त्री भी थे। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के लेखक जयानक, विद्यापति गौड, वाशीश्वर जनार्दन, विश्वरूप और रामभट्ट। रामभट्ट ही चन्दबरदायी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ही पृथ्वीराज रासो काव्य की रचना की थी।

२. प्रतापसिंह (इसने पृथ्वीराज के साथ द्रोह किया था। पृथ्वीराज को जब घोरी द्वारा अन्धा किया गया था, तब प्रतापसिंह के साथ मिल कर पृथ्वीराज घोरी को बाण से मारना चाहते थे। परन्तु इस प्रतापसिंह ने घोरी को पृथ्वीराज की योजना बता दी।)

३. रामदेव

४. सोमेश्वर

सेना[संपादित करें]

पृथ्वीराज की सेना में अश्व सेना का महत्त्व अधिक था। परन्तु हस्ति (हाथी) सेना और पदाति सैनिकों की भी मुख्य भूमिका रहती थी। पृथ्वीराज जब राजा बने, तब आरम्भिक काल में उनकी सेना में ७०,००० अश्वारोही सैनिक थे। जैसे जैसे सैन्याभियान में पृथ्वीराज की विजय होती गई, वैसे वैसे सेना में भी वृद्धि होती गई। नरायन युद्ध में पृथ्वीराज की सेना में २,००,००० अश्वारोही सैनिक, पाँच सौ गज, अनेक पदाति सैनिक थे[27]। फरिश्ता नाम लेखक के अनुसार पृथ्वीराज की सेना में २ लाख अश्वारोही सैनिक और तीन सहस्र गज थे[28]। डॉ॰ शर्मा फरिश्ता द्वारा उद्धृत संख्या का समर्थन करते हैं[29]

रानीयाँ[संपादित करें]

क्रम

पृथ्वीराज की वय

रानीओं के नाम

११

जम्भावती पडिहारी

१२

पंवारी इच्छनी

१३

दाहिया

१४

जालन्धरी

१५

गूजरी

१६

बडगूजरी

१७

यादवी पद्मावती

१८

यादवी शशिव्रता

१८

कछवाही

१०

२०

पुडीरनी

११

२१

शशिव्रता

१२

२२

इन्द्रावती

१३

२६

संयोगिता गाहडवाल

पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के दशम सर्ग के उत्तरार्ध में उल्लेख मिलता है कि, पृथ्वीराज की अनेक रानीयाँ थी। परन्तु वे कितनी थी? कौन से प्रदेश की राजकुमारीयाँ थी? ये उल्लेख वहाँ नहीं है। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज जब ग्यारह वर्षीय थे, तब उनका प्रप्रथम विवाह हुआ था। उसके बाद प्रतिवर्ष उनका एक एक विवाह हुता गया, जब तक पृथ्वीराज बाईस वर्षीय (२२) न हुए। उसके बाद पृथ्वीराज जब छत्तीस वर्षीय हुए, तह उनका अन्तिम विवाह संयोगित के साथ हुआ।

पृथ्वीराज का प्रप्रथम विवाह मण्डोर प्रदेश की नाहड राव पडिहार की पुत्री जम्भावती के साथ हुआ था। पृथ्वीराज रासो काव्य के हस्तप्रत में केवल पांच रानीओ के नाम हैं। वे इस प्रकार है - जम्भावती, इच्छनी, यादवी शशिव्रता, हंसावती और संयोगिता। पृथ्वीजरासोकाव्य की लघु हस्तप्रत में केवल दो नाम हैं। वे इच्छनी और संयोगिता हैं। और सब से छोटी हस्तप्रत में केलव संयोगिता का ही नाम उपलब्ध है। एवं संयोगिता का नाम सभी हस्तप्रतों में उपलब्ध है।

जाङ्गलू[संपादित करें]

चौहान वंश ने जिस भूभाग में अपना राज्य स्थापित किया, उस भूभाग का नाम जाङ्गल था। उस प्रदेश की राजधानी अहिच्छत्रपुर थी। सद्यः उसका नाम नागौर है। वह नागौर नगर आज देशनोक नाम से प्रसिद्ध है। देशनोक नगर बीकानेर से उत्तर दिशा में ३२ कि॰मी॰ दूर स्थित है। देशनोक से सोलह कि॰मी॰ दूर है जाङ्गलू गाँव। वहाँ से १२३३ विक्रम संवत्सर में लिखित एक शिलालेख प्राप्त होता है। उस शिलालेख के अनुसार उस ग्राम का प्राचीन काल में जाङ्गकूपदुर्ग और अजयपुर नाम थे। ११७६ विक्रम संवत्सर में लिखित एक शिलालेख में उल्लिखित है कि, जाङ्गकूपदुर्ग नामक ग्राम की स्थापना पृथ्वीराज प्रथम द्वारा हुई थी। उस ग्राम से पृथ्वीराज के नाम्न की मुद्राएं भी प्राप्त हुई। जाङ्गलकूपदुर्ग ग्राम की स्थापना के बाद कुछ दिनों में ही गजनी प्रदेश के राजा अर्सलान द्वारा जाङ्गलकूपदुर्ग ग्राम को ध्वस्त किया गया।

बीकानेर नगर के अनूप संस्कृत पुस्तकालय में सोलहवी शताब्दी की हस्तप्रत प्राप्य हैं।[30] उनके अनुसार चौहानसाम्राज के अमुक भाग में दहिया राजपूतों का लघु ग्राम था। दहिया राजपूत वंश की एक राजकुमारी पृथ्वीराज को प्रेम करती थी। वह उनके साथ विवाह करने की इच्छुक थी। उसका नाम अजिया था। एक बार अपने रक्षकों के साथ पृथ्वीराज को मिलने के लिए वह अजयमेरु नगर जा रही थी। मार्ग में ध्वस्त जाङ्गलू ग्राम आता है। उस ध्वस्त ग्राम को देख कर वह दुःखी हो गई। उसके बाद उसने उसी भूमि में एक नवीन ग्राम की रचना की। उस ग्राम का नाम अजियापुर था। अजिया पृथ्वीराज तो पृथ्वीराज से मिलने जा ही रही थी, परन्तु पृथ्वीराज भी आखेट का बहाना करके जाङ्गलू प्रदेश के वन में गये थे। वे अजिया को अपनी राजधानी ले गए। उसके बाद उन दोनों का विवाह हुआ।

पद्मावती साङ्खली[संपादित करें]

पृथ्वीराज रासो काव्य में 'पद्मावतीसमयः' नामक आख्यान भी प्राप्य है। रासोकाव्य के अनुसार पूर्व दिशा में समुद्रशिख नामक प्रदेश था। वहाँ यादव वंशीय के विजयपाल नाम राजा का शासन था। उसकी पत्नी का नाम पद्मसेन था। उन दोनों की पुत्री पद्मावती थी। पद्मावती एक दिन राजभवन के उद्यान में विचरण कर रही थी। उस समय उसके द्वारा एक शुक को देखा गया। वह शुक अत्यन्त आकर्षक था। वह शुक भी पद्मावती के रक्त अधर को बिम्बाफल मान कर उसे खाने के लिए आगे बढा। उसी समय पद्मावती ने शुक को अपने हाथ में ग्रहण किया। वह शुक मानव भाषा का ज्ञाता था। वह पद्मावती का मनोरञ्जन करने के लिए अनेक कथा सुनाता रहा। उसके बाद पद्मावती ने जिज्ञासावश शुक को पुछा कि, "हे शुकराज ! आप कहाँ निवास करते हैं? आपके राज्य का राजा कौन है?" तब पद्मावती की जिज्ञासा के उपशमन के लिए शुक ने विस्तार पूर्वक अपने राज्य और पृथ्वीराज का वर्णन आरंभ किया।

हिंदवान थान उत्तम सुदेश, तह उगत द्रुग दल्ली सुदेष।

संभरि नरेश चहुंवान थान, प्रीथिराज तहां राजंत भान।।
वैसह वरिस षोजस नरिदं, आजानुबाहु भुवलोक यदं।
संभपि नरेश सोमेस पूत, देवंत रूप अवतार धूत।।
सता मसूंर सब्बे अपार, भूजान भीम जिस सार भार।
तिहि पकरि शाह साहाबदीन, तिहु बेर करिन पानीप हीन।।
सिंगिनि सुसद गुने चढ़ि जंजीर, चुक्के न शबद बेधंत तीर।
बल बेल करन जिमि दान मान, सहस शील बहिचंद समान।।
दस चारि सब काल भूप, क्रन्दप्प ज्ञान अवतार रूप।।

हिन्दूओं का उत्तमप्रदेश हिन्दूस्थान (हिन्दूस्तान) है। वहाँ सुन्दर देहली नगरी है। उस नगर का अधिपति चौहान वंशीय राजा पृथ्वीराज है। सोलह वर्षीय पृथ्वीराज इन्द्रवत् पराक्रमी है। साकम्भरी नरेश सोमेश्वर के पुत्र देव का रूप धारण करके पृथिवी में उतरे हैं। उनके सभी सामान्त अत्यन्त पराक्रमी हैं। पृथ्वीराज की भुजा में भीमसेन के समान बल है। पृथ्वीराज तीन बार शहाबुद्दीन घोरी नाम राजा को पराजित कर चुके हैं। उनके धनुष के प्रत्यञ्चा की ध्वनि अतीव भयानक होती है। वह शब्दभेदी बाण चलाने में समर्थ हैं। पृथ्वीराज वचनपालन में बलि, दान में कर्ण, सत्कार्यों में विक्रमादित्य और आचरण में हरिश्चन्द्र के समान हैं। कलियुग में दुष्टों का संहार करने के लिए उनका जन्म हुआ है। चौदह कलाओं से सम्पन्न वह कामदेव के समान पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।

शुक के मुख से पृथ्वीराज की प्रशंसा सुन कर यादव कुमारी पद्मावती का मन पृथ्वीराज के प्रति अनुरक्त हो गया। परन्तु यौवन प्राप्त पद्मावती का विवाह विजयपाल ने कुमुदमणि के साथ निर्धारित कर दिया था। कुमुदमणि कुमाऊँ प्रदेश का राजा था। समुद्रशिखर प्रदेश में राजकुमारी का विवाह की सज्जता हो रही थी। दुसरी ओर अपने विवाह के समाचार सुनकर पद्मावती व्याकुल थी। उसके बाद वह शुक को बोली, "हे कीर ! शुक ! आप शीघ्र ही देहली जाकर मेरे प्रिय पृथ्वीराज को यहाँ बुला लाईए"। उसके बाद पद्मावती ने शुक को एक पत्र दिया।

हे क्षत्रिय कुलभूषण ! में तन मन से आपको प्रेम करती हूँ। यदि आप मुझे और मेरे कुल को वरणयोग्य मानते हैं, तो मेरा पाणिग्रहण कर के मेरे प्राणों की रक्षा करें। ११३० शकसंवत्सर के वैशाखमास की शुक्लद्वादशी तिथि को मेरा विवाह निश्चित है। अतः उससे पूर्व आकर श्रीकृष्ण ने जैसे रुक्मिणी का हरण किया था, वैसे ही मेरा हरण कर के मुझे कृतार्थ करें।

--- पद्मावती

शुक ने वायुवेग से देहली जा कर पृथ्वीराज को पत्र दिया। पत्र पढ़कर पृथ्वीराज ने सामन्तों के साथ समुद्रशिखर नगर की ओर यात्रा प्रारम्भ की। दुसरी ओर कुमुदमणि ने कुमाऊँ से वरयात्रा प्रारम्भ की। पृथ्वीराज समुद्रशिखर जा रहा हैं ये समाचार प्राप्त करके मुहम्मद घोरी ने भी समुद्रशिखर की ओर यात्रा आरंभ की। उसके बाद समुद्रशिखर जा रहे कुमुदमणि के आगमन का समाचार सुन कर पद्मावती अति व्याकुला हो गई। क्योंकि पृथ्वीराज के आगमन का समाचार उसे नहीं मिला था। अतः वह प्रासाद के वातायन पर बैठ कर मार्ग को विह्वल मन से देखती हुई प्रतीक्षा करते हुए रो रही थी। उसी समय शुक आकर उसे बोला, "हे सुन्दरि ! तेरे प्रियतम समीप के शिव मन्दिर में हैं। तुम शीघ्र ही वहाँ जोओं"। शुक का वचन सुन कर पुनर्जीवन प्राप्त पद्मावती के नेत्रे अचानक चमक उठ्ठे। नवीन वस्त्र धारण कर सुगन्धित जल से स्नान कर षोडश (सोलह) शृङ्गार करके अपनी सखिओं के साथ वह स्वर्ण स्थालिका (थाली) में दीप लेकर शिवालय गई। शिवालय पहुंच कर शिव पार्वती की पूजा करके पृथ्वीराज की ओर गई। उसके बाद अपने मुखावरण को हटा कर वह मुग्ध हो कर पृथ्वीराज के सौन्दर्य को देखती रही। पृथ्वीराज भी थोड़ा आगे जाकर पद्मावती के समीप खडे हो गये। मन्दिर का वह दृश्य देख कर पद्मावती की सखियाँ साश्चर्य चकित होकर पद्मावती को और पृथ्वीराज को देख रही थी। क्योंकि पद्मावती और पृथ्वीराज के प्रणय के विषय में शुक को छोड कर कोई भी नहीं जानता था।

उसके बाद पृथ्वीराज ने पद्मावती का हाथ अपने हाथ में लेखकर अश्वारोहण किया। देहली की ओर पृथ्वीराज और पद्मावती की यात्रा का आरम्भ होते ही समुद्रशिखरनगर में सर्वत्र पद्मवातीहरण का समाचार व्याप्त हो गया। विजयपाल और कुमुदमणि पृथ्वीराज के साथ युद्ध करन के लिए पृथ्वीराज के पीछे गए। विजयपाल और कुमदमणि के आगमन का समाचार सुन कर पृथ्वीराज ससामन्त (सामन्तों के साथ) युद्ध के लिए सज्ज हो गए। उसके बाद विनाशक युद्ध में विजयी पृथ्वीराज ने देहली की ओर यात्रा आरम्भ की। परन्तु मार्ग में मुहम्मद घोरी ने अपने सैनिकों के साथ पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण कर दिया। परन्तु घोरी की सेना की घोर पराजय हुई। उसके सभी सैनिक यहाँ वहाँ पलायन कर रहे थे और पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना कर देहली की ओर प्रयाण किया। देहली पहुंच कर दुर्गा के मन्दिर में शुभमुहूर्त में पृथ्वीराज ने पद्मावती के साथ विवाह कर लिया।

इतिहासविदों का मत है कि, साहित्यिक दृष्टी से उक्त कथा का महत्त्व है, परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से उक्त कथा का महत्त्व नहीं है। क्योंकि इतिहास में कही पर समुद्रशिखर नामक दुर्ग का और उसके राजा विजयपाल का उल्लेख प्राप्य नहीं है। दोनों नाम काल्पनिक हैं। इतिहासविदों का मत है कि, ये कथा कोई पुराण कालीन प्रसिद्ध कथा होगी, जिसका अवलम्बन करके अज्ञात व्यक्ति ने पृथ्वीराज रासो काव्य में प्रक्षेप की होगी।

चन्दबरदायी ने उक्त कथा की रचना नहीं की है इसका द्वितीय प्रमाण है कि,

बानं नाल हथनालि, तपुह तीरह स्रव सज्जिय

अर्थात् 'तोप' द्वारा (शतघ्नी) चोरों दिशा में धुआँ हो गया। परन्तु भारतीय इतिहास में १५२६ (ई.) वर्ष के अप्रैल-मास की बीसवी (२०/४/१५२६) दिनाङ्क को पानीपत क्षेत्र के युद्ध में ही तोप का उपयोग हुआ था। [31] परन्तु जगनिक रचित आल्हाखंड में बार बार तोपों के उपयोग का उल्लेख मिलता है। यद्यपि इस कथा में ऐतिहासक तथ्य नहीं है, तथापि कथा में पृथ्वीराज और पद्मावती के पात्र तो योग्य ही हैं। १२३६ विक्रम संवत्सर के आषाढमास की शुक्लदशमी बुधवासर को लिखित एक शिलालेख पोकरण से प्राप्त हुआ है।[32] उस में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज की आज्ञा से 'कतिया' नामक मण्डलेश्वर ने विजयपुर के लोकेश्वरमन्दिर में पिहिलापाउल नामक ग्राम का दान किया था। ग्राम के साथ तडाग, ग्राम के चोरो ओर के विशाल वन भी उसने दान में दिये थे। पद्मावती पाल्हण नामक परमारवंशी की पुत्री थी। कतिया नामक मण्डलेश्वर पद्मावती का भाई था।

चन्द्रावती[संपादित करें]

पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, चन्द्रपुण्डीर प्रदेश की राजकुमारी चन्द्रावती का विवाह पृथ्वीराज के साथ हुआ था। उस के गर्भ से सपादलक्ष साम्राज्य का उत्तराधिकारी रैणसी समुद्भूत हुआ। इतिहास विदों का मत है कि, रैणसी कल्पित नाम है, वस्तुतः उसका नाम गोविन्द आसीत्। परन्तु चन्द्रपुण्डीर प्रदेश की राजकुमारी का विवाह पृथ्वीराज से हुआ थाये उचित ही है [33]

संयोगिता[संपादित करें]

संयोगिताहरण का दृश्य

पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में तिलोत्तमा नाम से, पृथ्वीराज रासो काव्य में संयोगिता नाम से, सुरजन चरित महाकाव्य में 'कान्तिमति' नाम से संयोगिता का उल्लेख मिलात है। संयोगिता का उल्लेख रम्भामञ्जरी महाकाव्य में और हम्मीर महाकाव्य में प्राप्त नहीं होता। संयोगिता का हरण इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना थी।

उस समय पृथ्वीराज की वीरता की प्रशंसा चारो दिशाओं में हो रही थी। एक बार संयोगिता ने पृथ्वीराज की वीरता का और सौन्दर्य का वर्णन सुना। उसके बाद वो उन्हें प्रेम करने लगी। दूसरी ओर संयोगिता के पिता जयचन्द ने संयोगिता का विवाह स्वयंवर माध्यम से करने की घोषणा कर दी। जयचन्द ने अश्वमेधयज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ की परिसमाप्ति पर संयोगिता के स्वयंवर का मुहूर्तः था। जयचन्द अश्वमेधयज्ञ करके भारत पर स्वप्रतिष्ठा का इच्छा रखता था। परन्तु पृथ्वीराज ने उसका विरोध किया था। अतः जयचन्द ने पृथ्वीराज को स्वयंवर में आमंत्रित नहीं किया और उसने द्वारपाल के स्थान पर पृथ्वीराज की प्रतिमा स्थापित कर दी। दूसरी ओर जब संयोगिता ने जाना कि, पृथ्वीराज स्वयंवर में अनुपस्थित रहेंगे, तो उसने पृथ्वीराज को बुलाने के लिये दूत भेजा। संयोगिता मुझे प्रेम करती है ये जान कर पृथ्वीराज ने कन्नौज नगर की ओर प्रस्थान किया।

अश्वमेधयज्ञ के बाद स्वयंवरकाल में जब संयोगिता हाथ में वरमाला लिये उपस्थित राजाओं को देख रही थी, तब द्वार पर स्थित पृथ्वीराज की मूर्ति को उसने देखा। संयोगिता ने मूर्ति के समीप जा कर वरमाला पृथ्वीराज की मूर्ति के कण्ठ में पहना दी। उसी क्षण प्रासाद में अश्वारूढ पृथ्वीराज प्रविष्ट हुए। उन्होंने सिंहनाद के साथ सभी राजाओं को युद्ध के लिये ललकारा। उसे बाद संयोगिता को ले कर इन्द्रपस्थ (आज दिल्ली का एव भाग है) प्रस्थान कर गये। मार्ग में जयचन्द को पराजित कर के, मुहम्मद घोरी को बन्दी बना कर पृथ्वीराज संयोगिता के साथ इन्द्रपस्थ पहुंचे। जयचन्द तो अपने अपमान के प्रतिशोध का वैरोद्धार करने के लिये पृथ्वीराज के साथ युद्ध किया। परन्तु मुहम्मद घोरी ने जब जना कि, पृथ्वीराज कन्नौज नगर कि ओर जा रहे हैं, तब पृथ्वीराज को पराजित करने के लिये उसने मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया था। पृथ्वीराज ने न केवल मुहम्मद घोरी को पराजित किया, अपि तु उस को बन्दी बना कर इन्द्रप्रस्थ भी ले गये। [34]

नागार्जुन के विद्रोह का दमन (११७७) [2][संपादित करें]

पृथ्वीराज जब शाकम्भरी के सिंहासन पर आरूढ हुए, तब चौहान वंश का साम्राज्य के सामान्तों की सहायता से चलता था। सामन्तीय शासन प्रणाली में सभी सामन्त स्वतन्त्रा से अपने राजकोष का व्यवस्थापन करते हैं और वार्षिक उपहार के रूप में अपने सम्राट को नियत धनराशि प्रदान करते हैं। युद्धकाल में सामन्त सम्राट के आज्ञानुसार अपनी सेना भी भेजते हैं। सामन्तीय शासन प्रणाली में राजनैतिक एकता की स्थिति अति शिथिला होती है। क्योंकि जो सैनिक सम्राट के आदेश से युद्ध के लिये उद्युक्त होते हैं, उनकी निष्ठा अपने राजा के प्रति होती है, न कि अपने सम्राट के प्रति। सामन्तों की भी अपनी महेच्छाएँ होती हैं। अतः वें अपने प्रभाव के और क्षेत्र के विस्तार के लिये निरन्तर प्रयत्न शील होते हैं। जब सामन्तों का सम्राट् किसी युद्ध में परास्त होता है, मरणासन्न होता है या निर्बल होता है, तब सामन्त अपनी स्वतन्त्रता के लिये प्रयत्न आरम्भ कर देतें हैं। सम्राट् की शिथिलता का कारण जान कर वें, अपने सम्राट् के उपर आक्रमण करने के लिये भी तत्पर होते हैं।

राजसिंहासन पर आरूढ पृथ्वीराज युवा थे, अतः अनेक सामन्तों ने अपनी स्वतन्त्रता के स्वप्न देख कर युद्ध की घोषणा कर दी। परन्तु कैमास और भुनैकमल्ल की सहायता से कर्पूरदेवी ने उन विद्रोहि सामन्तों का दमन कर दिया। ततः (उसके बाद) विग्रहराज के द्वितीय पुत्र नागार्जुन ने अजयमेरु राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में विद्रोह कर दिया। पृथ्वीराज जब सत्तारूढ हुए, तब योगिनीपुर में (दिल्ली में) नागार्जुन निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। उस समय योगिनीपुर में नागार्जुन के मातुल (मामा) तोमरवंशीय पृथ्वीपाल का शासन था। तोमरवंशीय राजा पृथ्वीपाल भी चौहान वंश का एक सामन्त था।

पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के दशम सर्ग के षष्ठम और सप्तम श्लोक में उल्लेख है कि, भाग्यशाली, बलशाली विग्रहराज का विवेकशून्य पुत्र नागार्जुन ने गुजपुर के उपर आक्रमण किया था। तोमरवंशीय राजा पृथ्वीपाल के पास उतनी सैन्यशक्ति नहीं थी, जिससे वह पृथ्वीराज पर आक्रमण कर सके। परन्तु पृथ्वीपाल का समर्थन अन्य यादववंशी भादानक नामक सामन्त ने भी किया। फिर भी उन दोनों की सम्मिलित सेना भी पृथ्वीराज के ७०,००० अश्वारोही सैनिकों का, गजसैनिका का और पदातिओं का सामना करने में असमर्थ थी। हरिहर निवास द्विवेदी का मत है कि, सपादलक्ष साम्राज का पूर्वीय प्रतिवेशी (पड़ोशी) राज्य जेजाकभुक्ति और कान्यकुब्ज राज्य ने भी पृथ्वीराज के विरुद्ध युद्ध करने के लिये पृथ्वीपाल को सैन्य सहायता प्रदान की थी।

भादानक देशीयों का उच्छेदन ११७७[संपादित करें]

शाकम्भरी के चौहान वंश का बयानप्रदेशीय यादववंशीयों को साथ प्रप्रथम बार युद्ध अजयराज के काल में हुआ थआ। बिजौलिया के शिलालेख में पन्द्रहवें श्लोक में उल्लेख प्राप्त होता है कि, श्रीमार्ग का और दुर्द्द प्रदेश के अभियान काल में चाचिग, सिङ्घुल, और यशोधर इत्यादि वीरों का वध अजयराज ने किया था। उसके पश्चात् अर्णोराज और विग्रहराज ने भी बयानप्रदेशीय यादववंशीयों के साथ किये थे। परन्तु वे सब यादवों को समूल नष्ट करने में सफल न हुए। पृथ्वीराज के विरुद्ध यदा नागार्जुन ने विद्रोह किया, तदा भादानक प्रदेशीय राजा सोहणपाल चौहान वंश के विरुद्ध युद्ध करने के लिये सज्ज हुआ। अतः उसने अपने सैन्यबल से नागार्जुन की सहायता की। सोहणपाल के पूर्वज कुमारपाल के साथ विग्रहराज ने युद्ध किया था(ई. ११५०-११६४) [35]। आनुवंशिक युद्ध की स्थिति पृथ्वीराज के शासनकाल में अपि समुद्भूत हुई। परन्तु पृथ्वीराज ने भादानक प्रदेश के यादववंशीयों का समूल उच्छेदन कर दिया[3]

भादानक प्रदेश के ऊपरि आक्रमण करने से प्राक् पृथ्वीराज ने अपनी शासन व्यवस्था में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये थे। प्रप्रथम तो हांसीपुर के सामन्त को पदच्युत करके अपने भाई हरिराज को हांसीदुर्ग के सामन्त के रूप में नियुक्त किया[36]। द्वितीय कार्य में उन्होंने योगिनीपुर में पृथ्वीपाल के रिक्तस्थान में गोविन्द को नियुक्त किया। एवं युद्ध के मुख्य दो केन्द्रों की पर्याप्त रक्षण व्यवस्था करके अपने विरोधियों के षडयंत्र का प्रत्युत्तर देने के लिये पृथ्वीराज सज्ज हो गए।

खरतरगच्छपट्टावली के १४ पृष्ठ पर सूचना प्राप्य है कि, पृथ्वीराज ने दिग्विजय अभियान के लिये नरायन प्रदेश में (नरायन, नारायणा इत्यादि भी नामान्तर हैं। सद्यः वो स्थल नरैना (राजस्थानराज्य) से प्रसिद्ध है।) अपनी सेना का सङ्घटन किया। भुवन्नैकमल्ल स्वयं सैनिकों का और अधिकारियों का दिशानिर्देशन और सञ्चालन कर रहे थे। पृथ्वाराज ने सैन्य सज्जता के अनन्तर शत्रु प्रदेश के निरीक्षण के लिये भुवनैकमल्ल के नेतृत्व में एक दल को आगे भेजा। उसके पश्चात् अपने सेनापतियों के साथ स्वयं विशाल सैन्य को लेकर दिग्विजय अभियान आरम्भ किया। पृथ्वीराज के सेनापतियों में कैमास और स्कन्द प्रमुख थे।

उस समय भदानक प्रदेश में बयाना, अलवर, भिवानी, रिवाडी इत्यादि प्रमुख नगर अन्तर्भूत होते थे। उस प्रदेश की पूर्व सीमा के समीप में यमुनानदी और दक्षिण सीमा के समीप में चम्बलनदी प्रवाहित होती थी। बयाना नामक नगर से बाइस (२२) कि.मी। दूर त्रिभुवनगढ नामक नगर भदानक प्रदेश की राजधानी था। पृथ्वीराज ने भादानक प्रदेश के ऊपर चारो दिशाओं से आक्रमण कर दिया। उस भयङ्कर युद्ध में यादववंशी सोहणपाल पराजित हुआ। पृथ्वीराज और उनकी सेना ने सोहणपाल की हस्तिसेना पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। जो सैनिक जीवित थे, उन्हो ने चम्बल नदी को लाङ्घ कर शिकोहाबाद नगर से बाइस (२२) कि.मी। दूर भादान नामक स्थान में निवास आरम्भ कर दिया। [37] उस युद्ध के अनन्तर सपादलक्ष साम्राज्य की पूर्वसीमा में यमुनानदी और दक्षिणपूर्व दिशा में चम्बलनदी प्रवाहित होने लगी। भादनक प्रदेश के ऊपर किये गए उल्लेखनीय विजय का वर्णन खरतरगच्छपट्टावली में इस प्रकार प्राप्य है -

यस्य अन्त बाहेगेहं बलभृचककुंभः श्री जय श्री प्रवेशे।

दीप्र प्रास प्रहर घटततट प्रस्त मुक्तावलिभिः।।
नूनं भादानकीयैं रणभूवि करिभिः स्वास्तिकोअयूर्य तोच्चेः।
पृथ्वीराजस्यतस्यातुलबल महसः किं वयं वर्णनामः।। २९।।

हे पृथ्वीराज ! आपके पराक्रम और यश का वर्णन किन शब्द में कर सकते हैं? जिनकी सेना ने चारो दिशा से विजयदेवी को प्रसन्न किया। जिसने अरने भुजबल से विरोधियों की हस्तिसेना पर आधिपत्य स्थापित किया वो स्वस्तिक चिह्न से युक्त हो।

जेजाकभुक्ति पर आक्रमण ११८२[संपादित करें]

जेजाकभुक्ति प्रदेश के चेदिदेश, दशार्ण, जुझोती, कुन्तलदेश इत्यादि नामान्तर भी हैं। सद्यः जेजाकभुक्ति प्रदेश को बुन्देलखण्ड के रूम में जाना जाता है। यद्यपि बुन्देलखण्ड का विशाल भूभाग मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश राज्य के मध्य विभक्त हो गया है, तथापि वह प्रदेश बुन्देलखण्ड नाम से ही प्रसिद्ध है। उस बुन्देलखण्ड में जेजाकभुक्ति नामक स्वतन्त्र राज्य था। जेजाकभुक्ति प्रदेश की उत्तर सीमा में यमुनानदी, उत्तरपश्चिम दिशा में चम्बलनदी बहती थी। दक्षिणपूर्व दिशा की सीमा में बुन्देलखण्ड का पर्वतीयस्थल था। जेजाकभुक्ति प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी खजुराहो (खुर्जूरवाहक, खर्जूरपुर) थी। जेजाजभुक्ति प्रदेश के दो सामरिक केन्द्र थे। प्रप्रथम तो मुख्यराजधानी कालिञ्जर-नगर और द्वितीय महोबागढ-नगर। जेजाकभुक्ति राज्य का निर्माण अति विचित्र था। सर्वत्र लघु दुर्ग थे। उन में कालिञ्जर, अजयगढ, बैरीगढ, महोबा, मडफा इत्यादि महत्त्वपूर्ण दुर्ग थे।

११८२ वर्ष में पृथ्वीराज ने जेजाकभुक्ति पर आक्रमण किया। पृथ्वीराज के आक्रमण से चकित शत्रु युद्ध में पराजित हुए। पहूजनदी के तट पर स्थित सिरसादुर्ग में सलखान नामक सेनापति नियुक्त था। कैमाष ने उसका वध किया। सलखान के मलखान नामक एक भाई का भी वध कैमाष ने किया। सिरसादुर्ग जित कर यदा पृथ्वीराज की सेना आकोरी नामक स्थान की ओर अग्रेसर थी, तदा मार्ग में ही चन्द्रेरीसेना के साथ भयङ्कर युद्ध हुआ। आल्हा नामके परमर्दिदेव का योद्धा उस युद्ध में पराजित हुआ। अतः उसने वन में शरण ली। ब्रह्मजित नामक योद्धा उस युद्ध में हुतात्मा हुआ। उसके पश्चात् पृथ्वीराज के आक्रमण से परमर्दिदेव के प्रसिद्ध सेनापति हुतात्मा हुआ। स्वयं परमर्दिदेव चन्देल युद्ध से विमुख हो कर कालञ्जिरदुर्ग में गुप्तवास करने लगा। परन्तु पृथ्वीराज ने कालञ्जिरदुर्ग पर चारों दिशा से आक्रमण कर के परमर्दिदेव को आत्मसमर्पण के लिये विवश किया। पृथ्वीराज जब अपनी सेना के साथ मालवाप्रदेश के ऐरन नामक स्थान के पास स्थित मदनपुर के शिबिर में थे, तदा परमर्दिदेव के आत्मसमर्पण का समाचार उनको मिला। मेरुतुङ्ग के प्रबन्धचिन्तामण में उल्लेख प्राप्य है कि, "परमर्दिदेव ने अपने मुख में तृण स्थापित करिया अर्थात्, अत्यन्तदीनता को प्रदर्शित कर पृथ्वीराज से जीवनभिक्षा प्राप्त कर गया" [4]। पृथ्वीराज के जेजाकभुक्तिविजय का समर्थन शिलालेख भी करते हैं।

मन्दश्चन्द्रकिरीटपूजनरसे तृष्णा न कृष्णार्चने।

स्तम्भः शम्भुनितम्बनीप्रणतिषु व्यग्रो न धातुर्गृहे।।
अस्माकं परमर्दनोस्ति वदने न्यस्तेन संरक्षितः।
पृथ्वीराजेननरेश्वरादिति तृणं तत्पत्तने पूज्यते।। श्लो. ८, भाग १, शार्ङ्गधरपद्धतिः

अर्थात् शिव की पूजा में मन्द है, कृष्णार्चन में तृष्णा नहीं, दुर्गाको प्रणाम न कर स्तब्ध खडा है (पूजा नहीं कर रहा) और विधाता रूपी ग्रह व्यग्र जिसका ऐसा हमारा स्वामी परमर्दिदेव तृण मुख में संस्थापित कर नरपति पृथ्वीराज से जीवनदान पाने में सफल हुए।

पृथ्वीराज की जेजाकभुक्तिप्रदेश का अभियान सफल हुआ। परन्तु वह अभियान अपूर्ण ही था। क्योंकि जेजाकभुक्तिप्रदेश की रानी परमर्दिदेव की पुत्री नाइकीदेवी चालुक्यसम्राट् की मूलराजद्वितीय की माता था[38]। नाईकीदेवी कुशलराजनीतिज्ञा अपि थी। अतः उसने अपने पिता के पराजय की स्थिति को जान कर पृथ्वीराज का ध्यानच्युत करने के लिये अजयमेरु साम्राज्य पर आक्रमण करवाया। कूटनीत में प्रौढ वह अपने अभियान में सफल अपि हुई। यदा पृथ्वीराज ने अजमेरुसाम्राज्य के ऊपर आक्रमण के समाचार सुने, तदा वह जेजाकभुक्तिप्रदेश के अन्यप्रदेशों का अभियान स्थगिग कर अजयमेरुप्रदेश की ओर चले गये। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, युद्ध में पराजित परमर्दिदेव ने देहत्याग किया। परन्तु १२०१ वर्ष में लिखा परमर्दिदेव का अन्तिम शिलालेख प्राप्त होता है। अतः उस वर्ष तक तो उसके जीवनघटना की पुष्टि होती है[39]

चालुक्यों की पराजय ११८३[संपादित करें]

पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के शासनकाल में चालुक्यवंशीय अजयपाल से सोमेश्वर ने अनेक कष्ट सहे थे। पृथ्वीराज की सेना ने रात्रिकाल में ही आबू प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। परन्तु उस अभियान का नेतृत्व पृथ्वीराज नहीं कर रहे थे। क्योंकि पृथ्वीराज तो दिग्विजय अभियान के लिये भण्डानकप्रदेश और जेजाकभुक्तिप्रदेश में थे। मदनपुर से प्राप्त १२३९ विक्रम संवत्सर में लिखित शिलालेख अपि इसकी पुष्टि करता है। खरतरगच्छपट्टावली के अनुसार पृथ्वीराज द्वारा १२३९ विक्रम संवत्सर में (ई. ११८२ वर्ष में) दिग्विजयाभियान आरम्भ करने के लिये नरायनक्षेत्र में अपनी सेना एकत्र की थी[40]। पृथ्वीराज यदा जेजाकभुक्तिप्रदेश के विजयाभियान में थे, तदा पृथ्वीराज को ध्यानच्युत करने के लिये चालुक्यवंशीय भीमदेवद्वितीय ने अजमेरु साम्राज्य के ऊपर आक्रमण किया था। उस आक्रमण में भीमदेव द्वितीय द्वारा सपादलक्ष साम्राज्य के लघु भूभाग पर आधिपत्य स्थापित किया गया था। चालुक्यवंशीयों के उस अभियान का नेतृत्व जगद्देव नामक अधिकारी ने किया था। परन्तु वो सफलता अति स्वल्पकालिन थी[41]

बीकानेर नगर के आग्नेयकोण में स्थित छापर ग्राम से २२ कि॰मी॰ दूर स्थित चारलूग्राम से जो दो शिलालेख प्राप्त हुए, उन शिलालेखों में नागौरयुद्ध का विवरण प्राप्त होता है। उन में अङ्कित संवत्सर १२४१ विक्रम संवत्सरः है। तत्र नागौर सङ्ग्राम में जो वीरगति को प्राप्त हुए, उनके स्मृतिचिह्न स्थापित किये गए हैं। खरतरगच्छपट्टावली के जैसे तत्रापि चौहान और चालुक्यवंश के सन्धि का उल्लेख मिलता है[42]। उक्त तथ्यों के आधार से स्पष्ट है कि, चालुक्य के दो सेनापति जगद्देवः और धारावर्ष को प्रारम्भिक काल में चौहान वंश के विरुद्ध सैन्य सफलता मिली और सपादलक्षसाम्राज्य के भूभाग पर आधिपत्य प्राप्त करने में वे दो सफल भी हुए। परन्तु उसके पश्चात् चौहाणवंश के साथ हुए दीर्घकालीन युद्ध से सन्धि की स्थिति समुद्भूत हुई। खरतरगच्छपट्टावली में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज के साथ दीर्घकालीनयुद्ध से सेनापति जगद्देव विपद्ग्रस्त हो गया था। अतः उसने पृथ्वीराज के साथ सन्धि कर ली थी। जगद्देव किसी भी प्रकार से पृथ्वीराज के साथ सन्धि-सातत्य चाहता था। जगद्देव की सन्धि से सम्बद्धित विवशता खरतरगच्छपट्टावली में वर्णित एक घटन से बहुधा ज्ञात हो सकती है।

खरतरगच्छपट्टावली के ४३ पृष्ठ पर लिखा है कि, १२४४ विक्रम संवत्सर में सपादलक्षसाम्राज्य के कुछ श्रेष्ठी (व्यापारी) गुजरात राज्य गए थे। तदा अभयड नामक दण्डनायक ने उनको लुटने की योजना बनाई। अपने दल को भी उसने लुण्ठनकार्य के लिये सज्ज कर दिया। परन्तु इतने महत्कार्य को करने के लिये प्रधानमन्त्री की अनुमति आवश्यक है ये सोच कर उसने जगद्देव को पत्र लिखा।

अभी यहाँ सपादलक्षसाम्राज्य के धनिक श्रेष्ठीओं का एक मण्डल आया हुआ है।
आपकी आज्ञा से मैं उनको लुट कर धन की व्यवस्था कर सकता हूं?

इतना पढते ही जगद्देव क्रोध से उग्र हो उठ्ठे। उन्होंने प्रत्युत्तर लिखा कि,

मैंने बहुत कष्ट से अभी अभी पृथ्वीराज के साथ सन्धि करने में सफलता प्राप्त की है।
अतः मैं तुमको चेतावनी देता हूँ कि, यदि तुने सपादलक्ष के किसी भी जन को पीडा दी,
तर्हि मैं तुम्हें गधे के पेट में सिलवा दूंगा।

उक्त पत्र को पढ कर दण्डनायक ने उन श्रेष्ठिओं का योग्य सत्कार कर सकुशल भेज दिया। खरतरगच्छपट्टावली के इस कथन की पुष्टि वेरावलप्रशस्ति भी करता है[5]

जेजाकभुक्तिप्रदेश में यदा पृथ्वीराज ने विजय प्राप्त की, तदा नाइकीदेवी के आदेश से चालुक्यवंशीय राजा भीमदेव ने अजयमेरु प्रदेश के ऊपर आक्रमण किया था। अतः पृथ्वीराज जेजाकभुक्तिप्रदेश के अन्यप्रदेश का विजयाभियान स्थगित कर चालुक्यवंशीयों के साथ युद्ध करने गये थे। पृथ्वीराज और भीमदेव के मध्य दीर्घकाल पर्यन्त युद्ध हुआ। १२४४ विक्रम संवत्सर में पृथ्वीराज की विजय के साथ उस युद्ध का अन्त हो गया। खरतगरगच्छपट्टावली का विवरण, जैसलमेर, नागौर, बाडमेर और जोधपुर से प्राप्त शिलालेख और वेरावलप्रशस्ति पृथ्वीराज और भीमदेव के मध्य के युद्धपरिणाम की पर्याप्त सूचना देते हैं। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज ने भीमदेव द्वितीय को मार डाला था। परन्तु यद्यपि ११९२ (ई.) वर्ष में पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई थी, तथापि भीमवेदव द्वितीय की स्थिति १२३८ (ई.) पर्यन्त थी ऐसा प्रमाणों से सिद्ध होता है[43]

पृथ्वीराज और घोरी के मध्य सङ्घर्ष की स्थितिः[संपादित करें]

मोहम्मद घोरी ई. ११७५ वर्ष में मुल्तान प्रदेश पर आधिपत्य प्रस्थापित कर उसी वर्ष उच्छ प्रदेश पर छल से आधिपत्य स्थापित कर चुका था। उसके पश्चात् ई. ११८२ वर्ष में दक्षिण सिन्ध प्रदेश के ऊपर आक्रमण करके शनैः शनैः उसने सिन्धुप्रदेश पर स्वाधिपत्य स्थापित किया। उस से सपादलक्षसाम्राज्य की और घोरी द्वारा शासित सन्धुप्रदेश की सीमा समान हो गई। एवं घोरी पृथ्वीराज का प्रतिवेशी और शत्रु बन बैठा। उन दोनों के पास शत्रुता के अपने कारण भ थे। पृथ्वीराज अपने प्रदेश का सीमारक्षण करना चाहते थे, परन्तु उसके लिये तूर्क के आक्रान्ताओं को पीछे हटाना अनिवार्य था। दूसरी ओर घोरी की विस्तारवादि नीति के मार्ग में पृथ्वीराज कण्टक समान थे। क्योंकि भारत प्रदेश पर सत्ताविस्तार के लिये पृथ्वीराज का अन्त ही घोरी का लक्ष्य था[6]

पृथ्वीराजविजय में उल्लेख मिलता है कि, पश्चिमोत्तर दिशा में जो अश्वों के लिये प्रसिद्ध प्रदेश हैं, उस प्रदेश का गौमांसभक्षी म्लेच्छ घोरी नामक राजा गर्जन देश में निवास करता है। तूर्क देशीय उस गौमांसभक्षण करने वाले के विषय में सुन कर पृथ्वीराज ने म्लेच्छों के नाश की प्रतिज्ञा ली। पृथ्वीराज द्वारा म्लेच्छनाश की जो प्रतिज्ञा की गई थी, उसके विषय में घोरी भी जानता थआ। अतः उसने ई. ११७७ वर्ष में अजयमेरु दुर्ग में अपना दूत भेजा। उसके पश्चात् अजयमेरु की राज्यसभा में टकला (नारङ्गः) दूत उपस्थित हुआ। यदा वो दूत अजमेरुप्रासाद में उपस्थित था, तदा प्रासाद में नागार्जुनदमन का उत्सव चल रहा था। विधाता द्वारा कपिलावध की प्रशस्ति लिखने के लिये ही उसके ललाट की रचना की है इत्यादि वाक्यों से उस दूत के सपाट टकले का उपहास पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में प्राप्त होता है। पृथ्वीराजविजय में आगे उल्लिख है कि, उसकी दाढि के, भ्रुवों के और पलक के केश उसके प्रदेश की द्राक्षावत् श्वेत वर्णीय थे। उसके मूर्धन्यवर्ण (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्) नष्ट हो चुके थे। अर्थात् वो मूर्धन्यवर्णों के उच्चारण में असमर्थ था। अतः उसकी भाषा पक्षओं के कलरववत् प्रतिभाषित हो रहा था। उसकी त्वक् (चमडी) कुष्ठरोगिवत् दिख रही थी। उसने कृष्णवर्ण का विचित्र वस्त्र धारण किया था[44][45]

इसके बाद पृथ्वीराजविजय महाकाव्य में कुछ श्लोक प्राप्त नहीं होते। अतः दूत की अजयमेरु के प्रासाद में उपस्थित का प्रयोजन निश्चिततया ज्ञात नहीं होता। परन्तु दूत के वचन सुनकर पृथ्वीराज ने यदा प्रत्युत्तर दिया, वे श्लोक उपलब्ध हैं। दूत के वचन सुनकर पृथ्वीराज की भीषण प्रतिक्रिया थी। अत्यन्त क्रोध से उच्च स्वर में पृथ्वीराज ने बोला, "मैं उस (घोरी) क्या बोलूं? वो निश्चय से जानता है कि, मैंने उसके सदृश नरभक्षक(विस्तारवाद से युद्ध होते हैं जिस में अनेक नर मरते हैं ये इङ्गित किया है) की हत्या करने के लिये ही विजयाभियान का आरम्भ किया है। ये जानकर भी वो मुझे, जिसे लोग "अजयमेरु का सिंह" ऐसा सम्बोधित करते हैं, उसको दूत भेजता है"[46]। पृथ्वीराज के उक्त क्रोधपूर्ण वचन से घोरी के सन्देश का अनुमान ही कर सकते हैं। इतिहासविदों का मत है कि, उस काल में जैसी राजनैतिक स्थिति थी, उसके अनुगुण तो घोरी ने पृथ्वीराज को आत्मसमर्पण के लिये अथवा सन्धि के लिये सन्देश भेजा होगा। घोरी के दर्प से पूर्ण प्रस्ताव सुनकर पृथ्वीराज ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार किया होगा, क्योंकि चौहान वंश का और पृथ्वीराज का स्वाभिमान से विपरीत सन्देश होगा[47][48]

पृथ्वीराज के सपादलक्षसाम्राज्य की सीमा का और सिन्धुप्रदेश की सीमा के परिवर्तित राजनैतिक समीकरण के साथ साथ वीकमपुर का भी राजनैतिक महत्त्व बढ गया था। क्योंकि वीकमपुर की सीम के साथ ही सिन्धु और सपादलक्ष प्रदेशों की सीमा सम्मिलत होती थी। इस प्रकार वीकमप्रदेश का पश्चीमभाग सिन्धुप्रदेश की और पूर्वभाग सपादलक्षप्रदेश की सीमा को स्पर्श करने लगा। उस समय वीकमपुर में लोद्रवावंश का शासन था। उक्त राजनैतिक समीकरण में राष्ट्रहित की बलि देकर लोद्रवा वंशीय राजा जैसल ने राजा घोरी की सहायता की। क्योंकि घोरी के समर्थन से ही लोद्रवावंश को शासन प्रप्त हुआ था[49]

पृथ्वीराज और घोरी के युद्धसङ्ख्या का विवादः[संपादित करें]

घोरी के साथ पृथ्वीराज के कितने युद्ध हुए? इस विषय पर विवाद है। क्योंकि विभिन्न ऐतिहासिक साहित्य में विभिन्न युद्धसङ्ख्याएं प्रदत्त हैं। परन्तु सर्वत्र उन दोनों के भीषण युद्ध का वर्णन उपलब्ध होता है। नरायन का प्रथम युद्ध और नरायन का द्वितीय युद्धम् तो प्रसिद्ध ही हैं। प्रथम युद्ध ई. ११९१ वर्ष में और द्वितीय युद्ध ई. १९९२ वर्ष में हुआ था। प्रथमयुद्ध में पृथ्वीराज की विजयः हुई और द्वितीय में पृथ्वीराज की पराजय।

पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लिखित है कि, पृथ्वीराज ने तीन बार (३) घोरी को पारजित कर दण्डित किया था[50]। पृथ्वीराज ने घोरी को सात बार (७) बन्दी किया था ऐसा हम्मीरमहाकाव्य में प्राप्त होता है[51]। प्रबन्धकोश में वर्णित है कि, पृथ्वीराज ने बीस बार (२०) घोरी को बन्दी कर छोड़ दिया था[52]। सुर्जनचरितमहाकाव्य के अनुसार इक्कीस बार पृथ्वीराज ने घोरी को दण्ड दिया था[8]। प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थ के अनुसार तेईस बार (२३) पृथ्वीराज ने घोरी को जीवित छोड़ दिया[9]

घोरी के साथ पृथ्वीराज के जितने युद्ध हुए, उनके प्रमाण अनुपलब्ध हैं। अतः निश्चित सङ्ख्या के विषय में विवाद यथावत् है। परन्तु इतिहासविदों का मत है कि, पृथ्वीराज और घोरी को मध्य अनेक बार घर्षण हुए थे। कहीं लघु घर्षण कुत्रचित् बड़े। सभी घर्षण में पृथ्वीराज की ही विजय हुई थी। अतः सङ्ख्या तो अस्पष्ट है, परन्तु पृथ्वीराज की विजय की निश्चितता सर्वत्र दिखाई गई है। अन्तिम युद्ध में अर्थात् नरायन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई थी।

सतलज का युद्ध ११८२-८३[संपादित करें]

सतलज का युद्ध पृथ्वीराज का घोरी के साथ प्रप्रथम (सर्वप्रथम) युद्ध था। उस युद्ध में घोरी की घोरपराजय हुई थी। उस युद्ध में घोरी के पराजय के अनन्तर ही परमारवंशीय सूर नामक सामन्त प्रतिवर्ष गझनी प्रदेश कर लेने जाता था। सतलजयुद्ध का विवरण बहुत्र प्राप्त नहीं होता, अतः पृथ्वीराज के घोरी के साथ दो युद्ध ही हुए ये भ्रमणा है। फलवर्द्धिका के शिलालेख में सप्रमाण सतलजयुद्ध के विवरण की पुष्टि होती है। सतलज युद्ध के विषय में हम्मीरमहाकाव्य के तृतीयसर्ग में उल्लेख मिलता है।

पृष्ठभूमिः[संपादित करें]

न्यायपूर्ण शासन करते हुए राजा पृथ्वीराज एक बार राजसभा में बैठे थे। उसी समय चन्द्रराज नामक कोई राजा पृथ्वीराज के सम्मुख उपस्थित हुआ। वह चन्द्रराज पश्चिमदिशा के राजाओँ का प्रमुख था। वे राजागण भयभीत और निरुत्साहित थे। क्योंकि घोरी नाम यनवराजा अपने साम्राज्यविस्तार की नीति को पोषित करने के लिये अन्य प्रदेशों पर आक्रमण करता रहा था। उस यनवराजा से परास्त पश्चिमदिशा के सभी राजा पृथ्वीराज से सहायता की अपेक्षा रखते थे। पृथ्वीराज ने उनके लटके हुए मुख देख कर क्लेश का कारण पुछा। चन्द्रराज बोला, "हे राजन्! पश्चिमदिशा से घोरी नामक यवनराजा अन्य साम्राज्यों को पदाक्रान्त करते हुए अनेक राज्यों का सर्वनाश कर चुका है। उसने जिस राज्य पर आक्रमण किया, उस राज्य के सभी नगरों को लुट लिया गया और मन्दिरों को अग्निसात् कर दिया गया। राज्यों की स्त्रीओं बलात्कार किये गए, उसकी क्रूरता के कारण उन महिलाओं की स्थिति अति दयनीय हो चुकी है। वो जिस किसी भी राजपूत को सशस्त्र देखता है, उसे यमलोक भेज देता है। सद्यः घोरी की राजधानी मुल्तान प्रदेश है।"

चन्द्रराज का वचन सुन कर पृथ्वीराज क्रोधि होकर खडे हुए और बोले,

"मैं उस म्लेच्छ यवन को पराजित करके अपने चरणों में न नमा दूं तो, मैं चौहानवंशीय नहीं।"

उसके पश्चात् पृथ्वीराज ने अति गर्व से अपने होथो से मुछो को सहलाया (titillate)। पश्चात् पृथ्वीराज ने चतुरङ्गिणी सेन के साथ मुल्तान प्रदेश पर आक्रमण कर दिया।

सतलज युद्ध[संपादित करें]

वीकमपुर और उच्छ प्रदेश के मध्य में एक विशाल भूखण्ड में पृथ्वीराज का घोरी के साथ युद्ध हुआ था। इतिहासविदों का मत है कि, वह युद्ध ११८२-८३ (ई.) वर्ष में हुआ होगा। चूकि वह युद्ध सतलज नदी के तीर पर हुआ था, अतः उस युद्ध का नाम सतलजयुद्ध पड़ा। पृथ्वीराज की विशालसेना के आक्रमण से घोरी की सेना युद्ध से पलायन कर गई। पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना लिया। घोरी की दयनीय स्थिति हम्मीरमहाकाव्य में स्पष्टतया वर्णित नहीं है। परन्तु वहाँ उल्लिख है कि, पृथ्वीराज के सम्मुख नतमस्तक घोरी तदा स्वतन्त्र हुआ, यदा उसने पृथ्वीराज को वार्षिककर देने का सङ्कल्प किया।

इतिहासविदों का मत है कि, पृथ्वीराज ने राष्ट्रसङ्कट को ध्यान में रखते हूए प्रतीकार किया और घोरी के साथ युद्ध का निर्णय लिया था। उस युद्ध के परिणाम घोरी के लिये भयङ्कर थे। क्योंकि उस युद्ध के पश्चात् घोरी पृथ्वीराज का करदाता बन गया था। पृथ्वीराज के आदेश से परमारवंशीय सूरः नामक सामन्त प्रतिवर्ष गझनी प्रदेश जाककर कर स्वीकार करता था। एक बार एकाकी सूर को देख कर तूर्की लोगो ने उसे मार डाला। परन्तु सूरः ७४ तुर्कसैनिको को मारकर मरा। सूर की मृत्युं के पश्चात् पृथ्वीराज ने प्रतापसिंह नामक अधिकारी को कर लेने के लिये नियुक्त किया [53]। परन्तु प्रतापसिह स्वामिभक्त और धर्माचारी नहीं था। वह तुर्क-देशीयों का दास था। गझनी प्रदेश से जो धनं कर के रूप में पृथ्वीराज के राजकोष में जाता था, उस धन का बड़ा भाग प्रतापसिंह मार्ग में ही 'मस्जिद्' में और वहाँ के यवनों में दान कर देता था। कोई भी यदि दान के विषय में कुछ भी पुछता था, तर्हि वह कहता था कि, पृथ्वीराज के विषम ग्रहदोष निवारण के लिये दान दे रहा हूँ।[54]

प्रतिवर्ष घोरी से करग्रहण करना[संपादित करें]

पृथ्वीराज ने अनेक बार घोरी को बन्दी बना कर अपमानित किया। पृथ्वीराज प्रतिवर्ष घोरी से दण्ड के रूप में वार्षिककर स्वीकार किया करते थे। पृथ्वीराज के करग्रहण की पुष्टि शिलालेखा भी करते हैं। पृथ्वीराज के कर स्वीकरण के विषय में अनेक फारसी कविओं ने भ्रमः समुत्पादित किया, परन्तु राजस्थानराज्य से फलवर्धिका नामक शिलालेख से पृथ्वीराज की कर स्वीकरण की घटना पुष्ट हो जाती है। फलवर्द्धिका नामक स्थल पर स्थित फलौदीदेवी के मन्दिर के जीर्णोद्धार समय पर उस शिलालेख की स्थापना हुई थी। वो शिलालेख १५५५ विक्रम संवत्सर के चैत्रमास की शुक्लैकादशी को (११/०१/१५५५) गुरुवार के दिन प्रस्थापित किया गया था[55]। डाहलदेश के अधिपति परमारवंशीय राजा मधुदेव था। उसका यशस्वी पुत्र सूर पृथ्वीराज की आज्ञा से प्रतिवर्ष वार्षिक दण्ड स्वीकारने के लिये गझनी प्रदेश जाता था। एक बार वह एकाकी ही कर लेने गझनी चला गया। एकाकी सूर के ऊपर घोरी के सैनिकों ने आक्रमण कर दिया। योद्धा सूर ने ७४ यवनों को मारकर अन्त में प्राण त्यागे[56]

गुजरात राज्य में घोरी की पराजय ११७८[संपादित करें]

११७७ वर्ष में पृथ्वीराज द्वारा यदा नागार्जुन का दमन किया गया था, तदा नागार्जुन दमन के पश्चात् अजमेरु प्रासाद में उत्सव था। उस उत्सव में घोरी ने पृथ्वीराज को सन्धि या समर्पण के लिये दूत भेजा था। यदा घोरी ने सपादलक्षसम्राज्य में दूत भेजा था, तब ही उसकी गुजरात राज्य पर आक्रम की योजना थी। अतः उसकी इच्छा थी कि, चालुक्यवंशीयों की और चौहान वंशीयों की जो शत्रुता है, उसे आधार बना कर चौहान वंश के साथ मिलकर गुजरात राज्य पर आक्रमण किया जाए। परन्तु पृथ्वीराज के विरोध करने पर घोरी स्वयं ही गुजरात पर आक्रमण करने नीकल पड़ा। एकवर्ष तक अपने सैन्यविस्तार की नीति पर कार्य करके उसने ११७८ वर्ष में गुजरात पर आक्रमण किया। परन्तु गुजरात राज्य के मार्ग में उच्छ प्रदेश आता था। अतः उसने पहले उच्छ प्रदेश पर आक्रमण किया।

कपट से उच्छ प्रदेश पर विजय[संपादित करें]

मुल्तान प्रदेश से भारत पहुचे घोरी ने उच्छ प्रदेश पर आक्रमण करना चाहा। परन्तु उच्छप्रदेश के राजपूतों से वह भयभीत हो गया। राजपूतों के सम्मुख घोरी की विजय असम्भव सी थी। अतः उसने कपट से उच्छप्रदेश पर आधिपत्य की योजना बनाई। घोरी को गुप्तचरो से ज्ञात हुआ कि, उच्छ प्रदेश के राजा के सम्बन्ध अपनी राज्ञी से सरल नहीं अर्थात् उनके सम्बन्ध में कटुता है[57][58]। अतः घोरी ने राज्ञी को सन्देश भेजा। उस सन्देश में उसने लिखा कि, "यदि आप अपने पति को विष देकर मार डालें, तर्हि मैं आपके साथ विवाह करूंगा"। घोरी के सन्देश के प्रत्युत्तर में राज्ञी ने लिखा, "मैं तो प्रौढ (अधेड़, middle aged) हो चली हूँ। मैं विवाह करके क्या करूंगी? परन्तु मेरी पुत्री के साथ आप विवाह करे तो, मैं आपका ईप्सित कार्य कर सकती हूँ।

राज्ञी के प्रत्युत्तर पाकर घोरी ने अनुक्षण अपना सम्मति पत्र भेजा। क्योंकि उसका उद्देश उच्छ प्रदेश पर आधिपत्य स्थापन करना था। विवाहादि का विषय तो उसके कपट का केवल भाग था। तत्पश्चात् उच्छप्रदेश की राज्ञी ने अपने पति को विष देकर मार दिया। दुर्ग, कोषागार और शस्त्रागार को ताला मारकर उसकी चाबी घोरी को भिजवा दी। इस प्रकार छल से और कपट से घोरी उच्छ प्रदेश का अधिपति बन बैठा। घोरी यदा उच्छ प्रदेश का अधिपतिः हुआ, तदा उसने उच्छप्रदेश की राज्ञी और राजकुमारी को गझनी प्रदेश भेज दिया। यदा राजकुमारी को अपनी मातुः के कृत्य पता चला, तदा उसने माता का तिरस्कार कर दिया। अपने आचरण के प्रति दोषभाव और पुत्री की घृणा के कारण राज्ञी ने अपने प्राण त्याग दिये। उसके पश्चात् कुछ दिन संसार के दुःख सह कर राजकुमारी ने भी देह त्याग दिया। डॉ. हबीबुल्लाह का मत है कि, उच्छप्रदेश में भट्टीराजाओँ के शासन का प्रमाण नहीं है। अतः इब्न असीर, यहिया सरहिन्दी, निजामुद्दीन अहमद, फरिस्ता इत्यादि के रचिता ने इस घटना को काल्पिनिक कहा है[59]। परन्तु घोरी ने उच्छप्रदेश पर कपट से आधिपत्य जमाया इस विषय पर सभी इतिहासविद् सम्मत हैं।

उच्छप्रदेश के ऊपर स्वाधिपत्य प्राप्त कर घोरी ने मार्ग में किराडू नामक स्थल पर स्थित सोमेश्वरमहादेव के मन्दिर को लुट लिया। शिव के वो मन्दिर उस समय राजस्थानराज्य में प्रसिद्ध था। सुन्दररत्नों से अलङ्कृत भव्य उस मन्दिर को लुट कर उस मन्दिर का पूर्णतया नाश करके घोरी गुजरात राज्य की ओर आगे बढा। व साण्डेराव प्रदेश से होते हुए नाडोलिया के चौहान वंशीयों की नाडोल नामक राजधानी पर ऊपर आक्रमण किया। उस समय नाडोल प्रदेश पर चालुक्यवंशयो के सामन्त क्लहणवंश के राजा शासन कर रहे थे। राजस्थान में स्थित उस नाडोल नगर में तूर्क-सैनिको द्वारा मन्दिरों को अग्निसात् किया गया और नागरिकों को लुट लिया गया[60]। घोरी द्वारा नाडोल नगर का जो अधःपतन हुआ, उसके समाचार पृथ्वीराज को मिले। उसके पश्चात् क्रोध से उन्होंने घोरी के दर्पभङ्ग की प्रतिज्ञा की। वह अपने सैनिको के साथ शस्त्र लेकर सज्ज हो गए।

युवा पृथ्वीराज का मत था कि, "चालुक्य और चौहान वंश की समस्या गृहसमस्या है। बाहर से आया कोई म्लेच्छ भारतदेश के ऊपर आक्रमण करके भारत की अस्मिता की हत्या नहीं कर सकता। अतः हमें [गुजरात राज्य]] को सैन्य सहायता देनी चाहिये"। परन्तु युवा पृथ्वीराज के क्रोध को शान्त करते हुए सपादलक्ष साम्राज्य के मण्डलेश्वर कैमास ने अपनी कूटनैतिकव्याख्या को प्रस्तुत किया। यत् –

राजन्नवसरो नायं रूषां भाग्यनिधेस्तव।

किं क्रमेलकभक्ष्येषु तार्क्ष्यः फणिषु कुप्यति।।मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः १०, श्लो. २।।" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 

हे राजन् ! इस समय क्रोध करना उचति नहीं। भाग्यवश ये अवसर प्राप्तः हुआ है। ऊँट भी भक्षण कर ले, ऐसे सर्प पर गरुड क्यों कोपं करें? अर्थात् अनायास ही ये अवसरः प्राप्त हुआ है, हमारे प्रतिद्वन्द्वि परस्पर युद्ध करके अपनी शक्ति और बल को क्षीण कर लेंगे। अपने तर्क को पुष्ट करने के लिये कैमास ने सुन्दोप और सुन्द नामक राक्षसों और तिलोत्तमा की पौराणिक कथा सुनाई। यथा सुन्दोप और सन्द नामक दो असुर भाई तिलोत्तमा के सौन्दर्य में आसक्त परस्पर युद्ध करके नष्ट हो गये थे, तथा इनका (घोरी और चालुक्यवंशस्य च) भी नाश हो जायेगा ये आशय था[61]

कैमास की इस राजनैतिक तर्क की सभी इतिहासविदों ने निन्दा की है। क्योंकि अपने देश के विषय में विचार कर युवा पृथ्वीराज ने तो चालुक्यों के साथ अपनी समस्या को गृहसमस्या ही गिना कर गुजरात राज्य की सहायता के लिये उद्यत हुए थे। परन्तु कैमास के जटिलतर्क में भ्रान्त युवा पृथ्वीराज उस प्रान्त पर हो रहे आक्रमण के द्रष्टा ही बने रहे। कुछ इतिहासविदे कहते हैं कि, यदि उस समय पृथ्वीराज ने गुजरात राज्य की सहायता की होती, अर्थात् गुजरातप्रान्त पर जो आक्रमण हुआ था, उसका प्रतीकार किया होता, तो वर्तमानभारत की सीमा और वर्तमानभारत की स्थिति भिन्न होती[62]

चालुक्यों से घोरी की पराजय[संपादित करें]

नाडोल के दुर्ग पर अपना आधिपत्य प्रस्थापित कर और सम्पूर्ण नाडोल नगर को लुट कर घोरी मीरपुर से सेवाडी में स्थित हस्तिकुण्डी स्थान के मन्दिरों को भी लुटता हुआ झालोडी नामक स्थल पहुंचा। तत्पश्चात् आबू पर्वतमाला के समीप स्थित कासह्रद (कासह्रद-ग्राम सद्य काशिन्द्रा नाम से प्रसिद्ध है, वह ग्राम राजस्थानराज्य के सिरोही मण्डल में स्थित है।) पहुचा। यदा घोरी कासह्रद पहुचा, तब ही गुजरात राज्य की विशाल सेना ने उसका मार्ग अवरोधित कर लिया। गुजरात राज्य की सेना का प्रतिनिधित्व नाडोल प्रदेश के सेनापति केल्हण और उनके अनुज कीर्तिपाल कर रहे थे। (कल्हण ने सोनिगरा-चौहान वंश की स्थापना की थी) आबू प्रदेश और चन्द्रावती प्रदेश के परमारवंशीय शासक धारावर्ष तथा चालुक्यवंश के अवस्यक नरेश मूलराज द्वितीय की माता नाईकीदेवी ने भी युद्ध में भाग लिया। मिन्हाज ने तबाकाते नासिरी नामक ग्रन्थ में उल्लेख किया है कि, "उस समय भीमदेव द्वितीय गुजरात राज्य के नरेश थे।" इस कथन का ही अन्धानुकरण कुछ परवर्ति लेखकों ने किया। परन्तु अभिलेखीय साक्षी से सिद्ध होता है कि, उस समय गुजरात राज्य के नरेश मूलराज द्वितीय ही थे[63]

घोरी की सेना के साथ गुजरात राज्य की विशालसेना का युद्ध हुआ। उस युद्ध में गुजरात राज्य की सेना ने तूर्कि-सेना का निकन्दन कर दिया। बहुत तूर्की सैनिक मारे गये, कुछ रणक्षेत्र का त्याग करके भाग भी गए। 'तारिखे फरिश्ता' ग्रन्थ में उल्लेख मिलिता है कि, घोरी भी किसी प्रकार अपने प्राणों की रक्ष करते हुए युद्धक्षेत्र से पलायन कर गया [7] इति। सून्धालेख का निर्माण १३१९ विक्रम संवत्सर में हुआ[64]। उस सून्धाशिलालेख में भी केल्हण और कीर्तिपाला द्वारा तुरुष्क की पराजय का (तुरुष्क ये घोरी का अपरनाम है) विवरण मिलता है।

पृथ्वीराज विजय महाकाव्य मेें उल्लेख मिलिता है कि, गुजरात राज्य की विजय के समाचार देने के लिये गुजरात राज्य से एक दूत सपादलक्ष पहुचा था। पृथ्वीराज के सम्मुख उसने तुरुष्क के पराजय का सम्पूर्ण विवरण विस्तार से बताया। पृथ्वीराज ने दूत का उचित सम्मान किया और जाने की अनुमति दी। तत्पश्चात् पृथ्वीराज ने अपने मन्त्री को राष्ट्रनीति ते विषय में बोध दिया[65]। पृथ्वीराज ने कैमास को अपनी राष्ट्रनीति के ज्ञानविकास के लिये स्पष्टशब्द में परामर्श दिया। इतिहासविदों का मत है कि, ११९१-११९२ मध्य में सपादलक्ष जैसा विशालसाम्राज्य तूर्क के आक्रमण से पराजित हुआ। उसके पिछे कैमास की असफल कूटनीति ही कारणभूत थी।

जैसे महमूद गझनवी ने १५० वर्षों पहले गुजरात राज्य के ऊपर आक्रमण करके गुजरात राज्य को लुटा था, वैसे ही घोरी की ईप्सा थी। परन्तु आबू पर्वतमाला के तल में घोरी की घोरपराजय हुई। इतिहासविदों का मत है कि, घोरी की महमूद गझनवी के साथ तुलना अयोग्य ही है। क्योंकि गझनवी की योद्धा बुद्धि सङ्कटकाल में अति प्रखर हो जाती थी। उससे विपरीत घोरी घोरी स्वभाव से ही लम्पट, धूर्त और कपटी था। उसने जितने यद्ध जिते, उनमें उसने कपट का ही मार्गः अपनाया[66]

गुजरात राज्य में पराजित हुए घोरी ने ११८२-८३ (ई.) वर्ष में लाहौर प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। उसके पश्चात् घोरी के साम्राज्य की सीमा पञ्जाबराज्य की अन्तिमनदी के समीप में अर्थात् सतलजनदी के समीप में आ पहुंची। सतलजनदी से दूसरे तट से सपादलक्षसाम्राज्य की सीमा आरम्भ होती थी। सरहिन्द और फरिश्ता ने समादलक्षसाम्राज्य के प्रथम सैन्य आवास को 'तपहिन्दा' से सम्बोधित किया है। सपादलक्षसाम्राज्य की सीमा के साथ घोरी के साम्राज्य की सीमा का मेल ने घर्षण की स्थिति को जन्म दिया। उसके पश्चात् सतलजयुद्ध का युद्ध हुआ, जिस में घोरी की परायज हुई।

तराइनयुद्ध या नरायनयुद्ध [67][संपादित करें]

पृथ्वीराज का घोरी के साथ युद्ध कहाँ हुआ था? इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। मिन्हाज सिराज ने युद्धक्षेत्र का नाम नरायन [68][69] बताया है। तारीखे फरीश्ता ग्रन्थ में युद्धक्षेत्र का नाम तरायन लिखा है। अन्यत्र उसका कथन है कि, तराइन उत तरायन अभी तरावडी नाम से प्रसिद्ध है[70]। डॉ। खलिक अहमद निजामी और डॉ. हबीबुल्लाह इन दोनो ने फरिश्ता-ग्रन्थ का समर्थन किया है। क्योंकि उन दोनों के मत हैं कि, मुद्रक के दोष से तरायन के स्थान पर नरायन हो गया। डॉ. हबीबुल्लाह जिस 'तरायन' क्षेत्र का समर्थन करते हैं, वह थानेश्वर से दक्षिणदिशा में १४ मील दूर है। परन्तु उस के मतानुसार तोरावाना नामक स्थल तरायन युद्ध क्षेत्र था। वो तोरावाना क्षेत्र राजस्थानराज्य के सिरसामण्डल के कलांवत नामक उपमण्डल के समीपस्थ स्थल है।

डॉ। हबीबुल्लाह का मताधार जनरल कनिंघम का ग्रन्थः है। 'आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ् इण्डिया' इस में जनरल कनिंघम ने लिखा है कि, तराइन युद्ध भटिण्डा से २७ मील दूर स्थित किसी स्थान में हुआ था। वह स्थान सद्यः तोरावाना नाम से प्रसिद्ध है[71]। कनिंघम ने भटिण्डा और सिरसा जल्ले के मध्य में स्थित जिस क्षेत्र की बात की है, उसका आधार 'याहिया सरहिन्दी' नामक पुस्तक है। याहिया सरहिन्दी नामक लेखक ने 'तारीखे मुबारकशाही' नामक पुस्तक में उल्लिखित किया है कि, खित्तये सुरसुती का युद्ध तराइनक्षेत्र में हुआ था[72]। 'तारीखे मुबारकशाही' का सम्पादन शम्सुलउम्मा मुहम्मद हिदायत हुसैन ने जन हस्तप्रतों के आधार पर किया है, उन में से कुछ राजस्थानराज्य के आजमगढ जिल्ले में भी हैं। आजमगढ जिल्ले की दारूल-मुसन्नफीन-स्थान के तिनो हस्तप्रतियों में से एक में "खितत्ये सरसुती" के स्थान पर केवल "सरसुती", "मेंतराइन" के स्थान पर "तराई" ही मुद्रित किया गया है[73]

वास्तव्य में वो युद्ध नरायन क्षेत्र ही था। तबकाते नासिरी और तारिखे-मुबारतशाही का भी यही मत है। 'याहिया सरहिन्दी' के शुद्ध मुद्रित ऐतिहासिक पाठ में मिलता है कि, सरस्वतीनदी के तीर पर 'तराई' में स्थित नरायनक्षेत्र में ही युद्ध हुआ था। फारसीभाषा के मूलपाठ में कही भी दोष नहीं है, परन्तु आङ्गाल अनुवाद देखकर या अज्ञानवश ये दोष प्रविष्ट हुआ है। इस प्रकार युद्धस्थल के विषय में विवाद समुद्भूत हुआ। इतिहासविदों की चर्चा का निष्कर्ष है कि, पृथ्वीराज का घोरी के साथ युद्ध नरायनक्षेत्र में ही हुआ था [74]। इसकाका दृढतया अनेक इतिहासविद् समर्थन करते हैं। उन में प्रो एस् एच् होदीवाला भी अन्तर्भूत होते हैं [75]। अतः भौगोलिक और ऐतिहासिकतथ्यों से युद्धक्षेत्र का नाम नरायन ही था। क्योंकि तारावडी ये स्थलं नरायनक्षेत्र से समीपतम स्थल है, अतः नरायन-तरावडी-युद्ध भी कहा जाता है हैं। सिरसा जिले में स्थित तोरवाना-स्थल नारयन युद्धक्षेत्र के रूप में ज्ञान भ्रामक सन्दर्भों का परिणाम था[76]दिल्ली से नरायनक्षेत्र १३५ कि.मी दूर है, थानेश्वर से नरायनक्षेत्र २१ कि.मी दूर है। ये 'तारीखे फरिश्ता' पुस्तक में भी उल्लिखित हुआ है। कनिंघम द्वारा उल्लिखित तोरवना-स्थल दिल्ली से ३४२ कि॰मी॰ दूर है, अतः भौगोलिक विवरण अनुसार भी जनरल कनिंघम की सूचना मथ्या सिद्ध होती है।

प्रथम नरायन युद्ध[संपादित करें]

नरायन के प्रथम युद्ध में घोरी की पराजय

११७५ से ११९१ तक घोरी द्वारा भारत के समीपवर्ति प्रदेशों में और भारतीयप्रदेशो में च बहुत आक्रमण किये। ११९० वर्ष में नरायन का प्रथम युद्ध हुआ था। उस युद्ध में घोरी की पराजय हुई तथा पृथ्वीराज ने घोरी को बिन्दी भी बनाया था।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

घोरी ने ११९० वर्ष में प्रथम बार सुनियोजित रूप से सपादलक्ष साम्राज्य के ऊपर आक्रमण किया था। सतलज नदी को लाङ्घकर सपादलक्षसाम्राज्य के सरहिन्द-स्थल पर घोरी ने आक्रमण किया। सरहिन्द के दुर्ग के सैनिको द्वारा घोरी का प्रतीकार किया गया, परन्तु घोरी ने उ दुर्ग पर आधिपत्य स्थापित सफलता पाली। सरहिन्द के दुर्ग पर आधिपत्य प्रस्थापित कर घोरी जियाऊद्दीन तोलकी (बहाउद्दीन टोंकी) नामके अपने सेवक को शासन दकर गझनी प्रदेश वापस चला गया [77]। जियाऊद्दीन तोलकी ने 'तबकाते नासिरी' नामक पुस्तक के लेखक मिन्हाज के चाचा का पुत्र था। अपने भाई के विषय में मिन्हाज ने लिखा है कि, दुर्ग के रक्षण के लिये घोरी ने १२,००० अश्वारोहि सैनिकों को नियुक्त किया था। 'तारिखे फरिश्ता' नामक पुस्तक में अश्वारोहिओँ की सङ्ख्या १०४० प्राप्त होती है [78]

पृथ्वीराज ने जब सरहिन्द के दुर्ग पर आक्रमण के समाचार पाए, तब वह अपने सामन्तों के साथ सरहिन्द प्रदेश की ओर बढ गये। पृथ्वीराज की सेना में २,००,००० अश्वोरोही और ३,००० हाथी थे। फरिश्ता-पुस्तक में उल्लिखित है कि, पृथ्वीराज ने सरहिन्द प्रदेश की ओर विशालसेना के साथ यात्राम् आरम्भ कर दी है ये जब घोरी को ज्ञात हुआ, तब उसने भी विशाल सैन्यबल को साथ लेकर सरहिन्द प्रदेश की ओर यात्रा आरम्भ कर दी। सद्यः जो स्थल 'तरावडी' नाम से प्रसिद्ध है, वो स्थल तब नरायन था, उस क्षेत्र में दोनों सेनाओं के मध्य में भीषण युद्ध हुआ था।

व्यूहरचना[संपादित करें]

नरायन के युद्ध की व्यूहरचना का वर्णन 'फरिश्ता' नामक पुस्तक में प्राप्त होता है। वहाँ उल्लिखित ह कि, राजपूतों की व्यूहबद्ध विशालसेना को जब घोरी ने देखा, तब वह भी अपनी सेना को व्यूहबद्ध करने के लिये सेना को तीन भागों में विभक्त कर दिया। राजपूतों की सेना को देखकर घोरी के मन में विशाद समुद्भूत हो गया। पराजय के भय से उसने शीघ्र हि अपनी सेना को तीन भाग में विभाजित किया क्योंकि राजपूतों की सेना के तीन भाग थे। मध्यभाग की सेना का नेतृत्व घोरी ने किया था[79]

तीन भागो में विभक्त पृथ्वीराज की सेना में मध्यभाग की गजसेना प्रबल आक्रमण करने को सज्ज थी। पृथ्वीराज की सेना में आक्रमण का मुख्यदायित्व अश्वारोहि सेना का था। अश्वारोहि सेना के पृष्ठ में तीन विभाग में विभक्त तलवारधारी सैनिक और शूलधारी सैनिक थे। पादाति (पैदल सेना) और गजसेना के मध्य में सञ्चालक के रूप में भट्टारकपरमेश्वर था। वही अपने प्रियगज पर आरूढ भारतेश्वर पृथ्वीराज युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे। जब सेना अपने शत्रुओं के प्रतीकार करने के लिये तीन भाग में विभक्त होती थी, तब विरुद्ध सेना के ऊपर भीषण आक्रमण का दायित्व वाम भाग और दक्षिण भाग का होता था। समरतन्त्र के भाग रूप सेनापति एसी व्यूहरचना बनाते हैं।

युद्ध[संपादित करें]

दोनों सेनाएं एक दूसरे की ओर दोडने लगी। सर्वप्रथम पृथ्वीराज के पृष्ठभाग की अश्वारोहिणी सेना ने घोरी की वामभाग और दक्षिणभाग की सेना पर आक्रमण कर दिया। घोरी के सैनिक उस घातक आक्रमण को सहने में शक्त नहीं थे। अतः प्राणों की रक्षा के लिये सेना के मध्यभाग की ओर पलायन करकने लगे। इस प्रकार तूर्कसेना का व्यूह ध्वस्त हो गया। घोरी के सभी विभाग मिश्रित हो चुके थे। उस व्यूह के ध्वस्त होने से अनेक यवनसैनिक मारे गये। राजपूतों के आक्रमण से तूर्कसेना के दिग्गज सैनिक भी रणक्षेत्र को त्याग कर पलायन कर गये। युद्ध के आरम्भ पश्चात् घोरी देहलीप्रदेश के सामन्त गोविन्द की ओर गया। घोरी को अपनी ओर आते देख गोविन्द भी उसके साथ योद्ध करने के लिये आगे गये। तत्पश्चात् उन दोनों में युद्ध हुआ। घोरी ने गोविन्द के ऊपर अपने शूल से प्रहार किया। वह शूल गोविन्द के मुख में प्रविष्ट हो गया। शूलप्रहार से गोविन्द के दांत भी गिर गये। शूल गोविन्द के मुख से प्रविष्ट हो कर कण्ठ तक अन्तर चला गया। उसके पश्चात् गोविन्द ने भी प्रतिप्रहार किया। गोविन्द ने अपने शूल के प्रहार से घोरी की भुजा पर आघात किया। वो आघात अति शक्तिशाली था। भयभीत घोरी अपने अश्व की दिशा को परिवर्तित कर युद्धक्षेत्र से भाग गया। परन्तु आहत घोरी भूमि पर गिर गया। राजपूत सैनिको द्वारा घोरी को बन्दी बना लिया गया। इस प्रकार पृथ्वीराज ने तूर्क सैनिको पर पूर्णतः आधिपत्य स्थापित कर लिया[80][81]

घोरी की पुनर्युद्ध के लिये सज्जता[संपादित करें]

प्रथम नरायनयुद्ध में घोरी की पराजय के अनन्तर पृथ्वीराज के आदेश से मुक्त किया गया घोरी लाहोर गया। वहाँ उसके सैनिक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। लाहोर प्रदेश में घोरी दो मास तक रुका। क्योंकि युद्ध में आहत घोरी की शारीरक वृण के लिये ओषधि आवश्यक थी। दो मास घोरी द्वारा लाहोर दुर्ग का नवनिर्माण भी करवाया गया। तत्पश्चात् वह अपनी सेना के साथ गझनी प्रदेश चला गया। इसामी के कथनानुसार गझनी प्रदेश पहुचकर घोरी ने गझनवी-वंश के खुशरो मलिक नामक राजा औक उसके पुत्र को मृत्युदण्ड दिया[82]

घोरी ने गझनी प्रदेश पहुच कर नरायन के प्रथम युद्ध में जो सैनिक रणक्षेत्र से पलायन कर गये थे, उनको भी दण्ड दिया। 'फरिश्ता' नामक पुस्तक में उल्लेख है कि, घोरी जब गझनी प्रदेश पहुचा, तब उसने अफगानप्रदेशीय सैनिको को तो पीडा नहीं दी, परन्तु घोरी-वंशीय, खुरासानी-वंशीय और खल्जी-वंशीय सैनिको का अपमान करके उनको दण्ड दिया। घोरी ने उन सैनिकों के मुख में अपक्व यव (जव) से भरे स्यूत (थैले - feedbag) बंधवाकर नगर उनको घुमाया। घोरी का आदेश था कि, जो सैनिक स्यूत से अपक्व यवों को न खाएँ, उनके शिर शरीर से पृथक् किये जायें[83]

नरायन युद्ध के अनन्तर घोरी की मनःस्थिति अवसाद, क्लेश और आत्मग्लानि से युक्त थी। तबकाते नासिरी और तारिखे फरिश्ता इत्यादि ग्रन्थों में उल्लेख है कि, घोरी इतना दुःखी हो गया था कि, उसने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया था। दिन और रात्रि वह अपने पराजय के दुःख की अग्नि में जलता रहता था। वह अपनी पत्नी के पास भी शयन नहीं करता था। तत्पश्चात् उसकी माता की प्रेरणा से घोरी पुनः युद्ध के लिये सज्ज हो गया।[84]

एक बार घोरी ऐबक् के साथ बैठ कर नरायनयुद्ध में हुए पराजय की समीक्षा कर रहा था। तब घोरी को ऐबक ने कहा, हमारे अश्व उत्तम हैं, परन्तु भारतीय हाथीओँ के मुख देखकर वे भयभीत हो जाते थे। क्योंकि पहले कभी भी उनका भारतीय हाथीओं के साथ युद्ध का अनुभव नहीं था। अतः भारतीय हथीओं के समीप वे भयभीत थे। यही मुख्य कारण है, जिस से हम भारतीय सेना के सम्मुख पराजित हुए[85]

अपने पराजय के कारण को को जानकर घोरी ने अग्रिम युद्ध के पूर्व अश्व प्रशिक्षण कैसे करना चाहिये? इसका भी उपाय ऐबक् को कहा। वह बोला, गिली मिट्टी से और काष्ठ से हथीओँ का निर्माण कराओ। उन हथीओँ को वैसे ही सजाओ, जैसे भारतीय हाथी सजे होते हैं। तत्पश्चात् उन हाथीओँ के चारो ओर अश्वारोही द्वारा युद्ध की स्थिति का निर्माण करवा कर अश्वों को निर्भय बनाओ। इस प्रकार युद्ध समय में भारतीय हाथीओं के सम्मुख उपस्थित हो ते हुए भी अश्व निर्भीक हो कर उनका प्रतीकार करने में सक्षम हो जाएँगे। घोरी के परामर्श के अनुसार ऐबक् ने अश्व प्रशिक्षण करवाया। वह स्वयं भी युद्ध सम्बद्ध नीतिओं को रचने लगा। उसने सचल-सैनिक-दल की रचना कर ली। उस सचल दल का मुख्य कार्य था कि, युद्ध के समय यदि किसी व्यूह के सैनिक दुर्बल हो जाएँ, तर्हि यह दल युद्ध क्षेत्र में एक दल से अपर दल में जाकर युद्ध कर सके। इस प्रकार युद्ध क्षेत्र में यदि किसी दल का सामर्थ्य दुर्बल हो जाता है, तर्हि ये दल उस अपर दल की सहायता करके युद्ध क्षेत्र में अपने बल को सन्तुलित कर सकता है। अश्व पर आरूढ हुए सैनिक बाण चलाने में भी सक्षम होने चाहिये, अतः ऐबक् द्वारा अपने सैनिकों को प्रशिण दिया गया था। ऐबक् की रणनीति का वर्णन फारसी-भाषा के ऐतिहासिक साहित्य में तो प्राप्त नहीं होता, परन्तु प्रसिद्ध युद्ध विज्ञानी आर् ए स्मैल के पुस्तक में उल्लेख मिलता है।

इसामी द्वारा लिखित फुतूहुस्सलातीन नामक पुस्तक में एक कवच का भी वर्णन प्राप्त होता है। उस कवच का नाम 'करवा' (जिहर्) था। वह कवच बैलों के चर्म से निर्मित किया गया था। उस कवच के दोनों ओर कपास या ऊन स्थापित किया जाता था। भारतीय सेना यदा तूर्क की सेना के पदाति पर प्रहार करें, तब वे तूर्क सैनिक आहत न हो जाये ये उस कवच निर्माण का उद्देश्य था। इस प्रकार घोरी ने ऐबक के साथ मिलकर प्रहारात्मक नीत और रक्षात्मक नीति की रचना कर ली।

लाहोर गमन[संपादित करें]

इतिहासविदों का मत है कि, घोरी की सेना में अफगान सेना, तुर्क सेना, ताजिक सेना और तुलक सेना के विभिन्न सेनापति थे। फुतूहुस्सलातीन नामक पुस्तक में कुछ सेनापतियों के नाम मिलते हैं। यथा –

१. खारबक – इसका दानव जैसा शरीर था। ये अग्रिम दल का सेनापति था।

२. अल्बा (इलाह) – वाम विभाग की सेना का सेनापति था।

३. मुकल्बा – केन्द्रिय सेना का योद्धा था।

४. खरमेल – केन्द्रिय सेना का योद्धा था।

५. कुत्बुद्दीन ऐबक – सेना की सम्पूर्ण सत्ता का महाप्रबन्धक था। युद्धक्षेत्र में ये सर्वदा घोरी के समीप ही बना रहता था।

६. ताजुद्दीन यल्दुज – किसी दल का सेनापति था।

७. नासिरुद्दीन कुबाचा – हरावल-दल का नेतृत्व ये कर रहा था।

८. मुहम्मद बिन महमूद – ये बख्तियार खलजि का चाचा था। यह प्रतिबद्ध और कुशल सेनानायक था।

ये सभी सेनापति रण क्षेत्र में सेना का सञ्चालन करने में दक्ष थे। घोरी की सेना को छोड़ कर इन सेनापतियों कि अपनी व्यक्तिगत सेना भी थी। मिन्हाज के कथनानानुसार घोरी द्वारा भारत यात्रा के कुछ समय पूर्व ही तुलकी के आग्रह से तुलक-वंशीयों के १२,००० अश्वारोही को अपनी सेना में समाविश्ट कर दिये थे [86]। ११९१ तमे वर्षे घोरी इत्येषः भारतं प्रति यत्राम् आरभत [87]। पेशावर प्रदेश और मुल्तान प्रदेश होते हुए घोरी लाहोर प्रदेश पहुँचा।

कूटनैतिक प्रयास[संपादित करें]

घोरी ने लाहोर के दुर्ग में रहकर पृथ्वीराज के विरुद्ध षडयन्त्र भी आरम्भ कर दिया। एक ओर वह अपने सैन्य व्यवस्थापन, सैन्य प्रशिक्षण और गुप्तचर भेजने के कार्य में व्यस्त था, दूसरी ओर उसने अपने दूत को अजयमेरु दुर्ग भेजा। यद्यपि वह जानता था कि, पृथ्वीराज उसके पत्र का क्या प्रत्युत्तर देंगे, तथापि उसने अजयमेरु के दुर्ग में दूत को भेजा। क्योंकि वह केवल समय व्यतीत करना चाहता था। उसके पीछे उसका उद्देश था कि, उसकी सेना युद्ध के लिये सज्ज हो और सहयोगी निष्ठा का पुनः परीक्षण हो सके।

घोरी का दूत पृथ्वीराज के सम्मुख उपस्थित हुआ। घोरी द्वारा प्रदत्त पत्र उसने पढा। उस पत्र में उल्लिखित था कि, पृथ्वीराज ! अपने कानों में पराधीनता का आभूषण पहन कर मेरे प्रासाद उपस्थित हो कर तुम इस्लाम-धर्म का अङ्गीकार करो [88]। अन्य फारसी लेखकों ने भी उक्त कथन का समर्थन किया है। फरिश्ता में मिलिता है कि, घोरी अपनी सेना के साथ लाहोर प्रदेश पहुंचा, तब कवामुल्मुल्क रुकुनुद्दीन हम्जा ने अजयमेरु दुर्ग को अपना सन्देश देने के लिये भेजा था। उस में "राजा इस्लाम्-धर्म का अङ्गीकारा करें" ये सन्देश लिखा हुआ था। फरिश्ता नामक ग्रन्थ में उल्लिखित है कि, पृथ्वीराज ने यदा दूत के मुख से सन्देश सुना, तदा उन्होंने इस्लाम-धर्म के लिये अभद्र भाषा का उपयोग किया। पृथ्वीराज ने इस्माल-धर्म के अनुयायी राजाओं को भी अपशब्द कहे थे। फिर कवामुल्मुल्क को वापस भेज दिया था[89]

पृथ्वीराज के विरुद्ध सैनिकसङ्घ[संपादित करें]

१९९० वर्ष में घोरी को पराजित कर पृथ्वीराज का साम्राज्य भारत की प्रमुख शक्ति के रूप में गिना जाने लगा था। पृथ्वीराज के सामर्थ्य से विरोधियों के हृदय में शूलाघातवत् पीडा उत्पन्न होने लगी। जो राजा पृथ्वीराज से पराजित हुए थे, वे अवसर प्राप्त कर पृथ्वीराज के ऊपर आघात करने को तत्पर थे। जम्मू प्रदेश का राजा विजयदेव घोरी का प्रमुख सहायक बन बैठा। प्रबन्धसङ्ग्रह और पृथ्वीराज रासो काव्य में जम्मूपति के घोरी की सहायता के उल्लेख प्राप्त होते हैं[90][91]। नयचन्द्र सूरि ने अपने पुस्तक में लिखा ह कि, जम्मूप्रदेश के राजा ने अपने पुत्र नरसिंहदेव को अपनी सेना के साथ नरायनक्षेत्र में भेजा था[26]

हेग नामक इतिहासविद् ने अपने पुस्तक में उल्लेख किया है कि, नरानय के द्वितीय युद्ध में भारत का सभी राजा (सभी पृथ्वीराज के सामन्त थे) उपस्थित थे, परन्तु राष्ट्र स्वतन्त्रता की रक्षा ते लिये भी कन्नौज प्रदेश के राजा जयचन्द ने अपने जामाता पृथ्वीराज की सहायता नहीं की। उसने नरायन के प्रथम युद्ध में भी युद्ध नहीं किया। नरायन के द्वितीययुद्ध में पृथ्वीराज की पराजय के कारण ही भारत में मुस्लिमसत्ता की स्थिति दृढ हो गई, क्योंकि जयचन्द राष्ट्रशत्रुओं के साथ सन्धि कर बैठा[92]

जेम्स् टॉड् के मतानुसार कन्नौज प्रदेश के राजा जयचन्द और पाटण प्रदेश के राजा ने पृथ्वीराज के समूलनाश के लिये मुहम्मद घोरी को आमन्त्रण दिया था [93]। जेजाकभुक्तिप्रदेश के राजा चन्देल भी घोरी का सहयोगी था। जेसलमेर प्रदेश का शालीवाहनभाटी-वंश तो घोरी के आशीर्वाद से ही राजसुख का उपभोग कर रहे थे। युद्ध में हेमलेटभाटी-वंश तो घोरी की सेना का महत्तवपूर्ण उत्तरदायित्व वहन कर रहे थे। सपादलक्षसाम्राज्य के प्रतिवेशी राजा द्वारा घोरी की आर्थिकसहायता, सैन्यसहायता और सूचनासहायता की थी। यदा घोरी अपने सैन्य के साथ सपादलक्षसाम्राज्य की सीमा के समीप पहुंचा, तदा सपादलक्ष-साम्राज्य के चारों ओर स्थित राज्यों ने सपादलक्षसाम्राज्य की सीमा पर उत्पात आरभ कर दिया। उनका उद्देश था कि, चारों ओर से युद्धरत पृथ्वीराज का सैन्यबल विभक्त हो जायेगा। द्वितीय नरायन युद्ध के समय उनकी योजना के अनुसार ही हुआ। पृथ्वीराज की सेना सपादलक्षसाम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध कर रही थी। सपादलक्षसाम्राज्य का प्रधानसेनापति नरायनयुद्ध के समय उन युद्धो में ही रत था[94]। पृथ्वीराज के अन्य उदयराज नामक सेनापति भी अन्यत्र युद्धरत थे[95][96]

समीपवर्ति राज्याओं की शत्रुता[संपादित करें]

घोरी को प्रथम नरायनयुद्ध में पराजित कर पृथ्वीराज उत्तरभारतीय के क्षेत्रो में चर्चा का विषय बने गये थे। पृथ्वीराज के भूतपूर्व शत्रु उनके पतन की प्रतीक्षा कर रहे थे। अतः यदा घोरी ने पृथ्वीराज के साथ युद्ध किया, तदा समीपस्थ राज्योंने पृथ्वीराज के साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। उन राज्यो में मख्यतया सपादलक्षसाम्राज्य के पूर्व-दक्षिण-सीमा के कन्नौज, कालिञ्जर, अण्हिलपाटण राज्य थे। भीमदेव की माता नाइकीदेवी जेजाकभुक्ति के चन्देलवंशीय के शासक परमर्दिदेव की पुत्री थी। ११८२-८३ वर्ष में उन दोनों राज्यों की भी पृथ्वीराज द्वारा परिजय हुई थी। दुसरी ओर संयोगिता हरण से क्रुद्ध जयचन्द किसी भी प्रकार पृथ्वीराज का विनाश देखना चाहता था। नरायन के प्रथम युद्ध के अनन्तर ही संयोगिता हरण की घटना हुई थी।

जिन इतिहासविदों ने तत्कालीन परिस्थितिओँ का अध्ययन किया, उनका कथन है कि, पृथ्वीराज यदा दिग्विजय अभियान में थे, तब उन्होंने अनेक राजाओं के मानभङ्ग किये। परन्तु पृथ्वीराज ने सब को जीवनदान दे दिया। इस प्रकार दिग्विजय अभियान से पृथ्वीराजकी सेना में या सीमा में कोई वृद्धि नहीं हुई थी, अपि तु उनके शत्रुओं की सङ्ख्या में प्रतिदिन वृद्घि हो रही थी। शत्रुओँ का मानभङ्ग करके उनको जीवनदान देना ही पृथ्वीराज की पराजय का मुख्यकारण बना।

अजयमेरु प्रासाद में दुष्चक्र[संपादित करें]

संयोगिताहरण के अनन्तर पृथ्वीराज अधिक समय तक नवविवाहित संयोगिता के साथ ही समय व्यतीत करने लगे। जिससे अजयमेरु प्रासाद में किसी दुष्चक्र का उद्भव हुआ। पृथ्वीराज की पद्मावती नामक राज्ञी के मन में संयोगिता के प्रति द्वेष समुद्भूत हो गया। अजयमेरु प्रासाद में उन दोनों के मध्य बारं बार कलह होने लगे थे। पृथ्वीराज द्वारा उपेक्षित पद्मावती ने वशीकरण प्रयोग से पृथ्वीराज के ऊपर आधिपत्य का प्रयत्न किया। उसने तान्त्रिक विधि के चलते एक गर्भवती गाय की हत्या कर दी। उसके पश्चात् उस गाय के प्रजनन अङ्ग लेकर अपनी तान्त्रिकविधि को आरम्भ किया। तान्त्रिकविधि के सिद्ध होने पश्चात् पृथ्वीराज पद्मावती के वशीभूत हो गए। पृथ्वीराज जब पद्मावती के तन्त्रपाश में बद्ध थे, तभी प्रासाद में एक अन्य अवाञ्छनीय घटना हो गई।

सपादलक्षसाम्राज्य के कैमास नामक महामण्डलेश्वर पृथ्वीराज की अनुपस्थिति में समग्र राजकार्य देखा करते थे। वह कैमास कर्नाटी नामक दासी के साथ अवैध सम्बन्ध में बन्ध चुका था। समय प्राप्त होते ही वे दोनों रात्री के अन्धकार में राजभवन में अपनी कामलीला का आचरण करते थे। एक बार रात्रि में पद्मावती ने प्रासाद के एक प्रकोष्ठ में कैमास को उस दासी के साथ अभद्रस्थिति में देख लिया। पद्मावती ने पृथ्वीराज को कैमास के कामप्रपञ्च की चुगली (backbiting) कर दी। पृथ्वीराज चो पद्मावती के तन्त्रपाश में बद्ध है थे, अतः विभ्रम स्थिति में पृथ्वीराज उचितनिर्णय करने में असमर्थ थे। तत्पश्चात् कैमास जब रात्रि में दासी के साथ काममग्न था, तब पृथ्वीराज वहाँ पहुंचे और उन्हेंने वहीं कैमास का वध कर दिया।

कैमास के दासी के साथ पापसम्बन्ध थे ये तो अजयमेरु प्रासाद का दुर्भाग्य ही था। परन्तु पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रह में (पृ. ८६) कैमास के वध का कारण "देशद्रोह" उल्लिखित किया गया है। पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रह अनुसार पृथ्वीराज के राजस्व अधिकारी प्रतापसिंह गर्जनी प्रदेश में कर स्वीकार ने के लिये जाता था। एक बार गर्जनी प्रदेश में 'मस्जिद्' को प्रतापसिंह ने एक लक्ष पणों का दान दे दिया। यदा कैमास ने राजा को कहा, "हे देव ! गझनी प्रदेश से कर के रूप में जो धन हम पाते हैं, उससे हमारे राजकार्य होते हैं। परन्तु राजस्व अधिकारी प्रतापसिंह उस धन का ऐसे कार्यों में दुर्व्यय कर देते हैं"। राजा ने जब कैमास के आरोप विषय में प्रतापसिंह को पुछा, तब वह बोला, "देव ! आपके ऊपर प्रतिकूलग्रह प्रभाव को जानकर ही मैंने उस धन का व्यय किया था। क्योंकि ज्योतिषी ने आपके जीवन में कष्ट के विषय में मुझे बताया था"। अनुक्षण ही प्रतापसिंह ने शनैः पृथ्वीराज के कानों में कैमास के विरुद्ध चुगली कर दी। वह बोला, देव ! मन्त्री कैमास ही बार बार तुर्क-जनों को यहाँ बुलाते रहते हैं। प्रतापसिंह के वचन सुनकर क्रुद्ध पृथ्वीराज ने कैमास का वध कर दिया।

उक्त दोनों कथानक में सत्य और असत्य का परीक्षण कर तो नहीं सकते, परन्तु उपलब्ध प्रमाणों से दो विषयो की स्पष्टता हो रही है। एक तो घोरी के गुप्तचर तन्त्र के सम्पर्क में अजयमेरु शासन के अनेक सदस्य थे, उन में से प्रतापसिह प्रमुख था। द्वितीय कैमास के वध की भी पुष्टि होती है। परन्तु देशद्रोह वा कामप्रसङ्ग में ये ज्ञात नहीं होता। फुतुहूस्सलातीन नामक पुस्तक के अनुसार अजयमेरु प्रदेश के राजप्रासाद में कैमास के वध का समाचार घोरी के गुप्तचरो ने गझनी प्रदेश पहुचाया था[97]

द्वितीय नरायन युद्ध की तिथि[संपादित करें]

द्वितीय नरायन युद्ध की तिथि के विषय में अनेक तर्क हैं। विभिन्न पुस्तको में विभिन्न तिथियाँ प्राप्त होती हैं। उन पुस्तको को त्रिन विभागो में विभक्त किया जा सकता है। वे विभाग हैं पृथ्वीराज रासो के, फारसी लेखको के और भारतीयस्रोत के अनुसार तिथियाँ।

पृथ्वीराज रासो काव्य के अनुसार[संपादित करें]

साक सु विक्रम रुद्र सौ। अट्ठ अग्र पचास।

सनिवासर संक्रांति क्रक। श्रावण अद्धो मास। [98]

अर्थात्, ११५८ विक्रम संवत्सर के शनिवासर के दिन पृथ्वीराज का घोरी के साथ युद्ध हुआ था। उस समय श्रावण मास आधा व्यतीत हो चुका था औक कर्कसङ्क्रान्ति थी। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लिखित तिथि के अनेकों ने खण्डन किया है। क्योंकि अनेक भारतीयग्रन्थ और अन्य फारसीग्रन्थ भी अन्य तिथि का उपस्थापन करते हैं।

फारसीग्रन्थ के अनुसार[संपादित करें]

हसन निजामी ने ताजुल मासिर नामक पुस्तक में उल्लिखित किया है कि, 'हिजरीसन्' (यवन संवत्सर) ५८७ में घोरी ने गझनी प्रदेश से भारत की ओर यात्रा आरम्भ की थी। नरायन युद्ध में वह पराजय हुआ था, तत्पश्चात् नरायन युद्ध में विजयी घोरी ने 'हिजरीन्' ५८८ के 'रमजान' मास में हाँसी प्रदेश के ऊपर आक्रमण किया था। ऐबक् उस समय कोहराम प्रदेश में था औक घोरी का साथ देने के लिये उसने भी हाँसी प्रदेश की ओर यात्रा आरम्भ कर दी[99][100]। गुलशने इब्राहिमी नामक पुस्तक में फरिश्ता ने उल्लिखित किया है कि, हि. स. ५८७ में घोरी ने गझनी प्रदेश से यात्रा आरम्भ कर ५८८ हि. नरायन के युद्धक्षेत्र पर पहुंचा[101][102]

फारसीग्रन्थो में जो तिथि उल्लिखित की गई है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करके युद्ध की तिथि के विषय में किञ्चित् मार्गदर्शन प्राप्त होता है। ११९० वर्ष के जनवरी मास के उनतीस वी (२९/१/११९०) दिनाङ्क को युद्ध का आरम्भ हुआ था, तत्पश्चात् ११९१ वर्ष के जनवरी मास की सत्रह (१७/१/११९१) दिनाङ्क को युद्ध पूर्ण हो चुका था। अर्थात् ११९० वर्ष के जनवरी मास की उनतीस (२९/१/११९०) दिनाङ्क के पूर्व किसी भी समय घोरी ने भारत की ओर यात्रा आरम्भ कर दी थी। ११९१ वर्ष के जनवरी मास की सत्रह (१७/१/११९१) दिनाङ्क से पूर्व घोरी ने नरायन युद्ध में विजय पा ली थी। फारसी ग्रन्थ अनुसार तब 'रमजान' नामक यवनमास आरम्भ होने वाला था।

११९१ वर्ष के जनवरी मास की सत्रह (१७/१/११९१) दिनाङ्क को यदि 'रमजान'-मास होगा, तो ही फारसीग्रन्थ में उल्लिखित तिथि का प्रामाण्य सिध्य होता है। हि. सन् के यवनपञ्चाङ्ग का आरम्भ १ मुहर्रम से होता है[103]। इस प्रकार ५८८ हि.स का आरम्भ ११९२ वर्ष के जनवरी मास की अठारह (१८/१/११९२) दिनाङ्क को हुआ था। उस दिन शनिवासर था। 'रमजान'-मास यवनपञ्चाङ्ग के अनुसार दसवाँ मास है, अतः ११९२ वर्ष के सितम्बर मास की दसमी (१०/९/११९२) दिनाङ्क को 'रमजान'-मास का आरम्भ हुआ था। निजामी का कथन है कि, नरायन का युद्ध 'रमजान'-मास से पूर्व ही पूर्ण हो चुका था। अतः ११९२ वर्ष के जनवरी-मास की सत्रह (१७/१/११९२) दिनाङ्क से, ११९२ वर्ष के सितम्बर-मास की दसमी (१०/९/११९२) दिनाङ्क तक नरायन का युद्ध पूर्ण हो चुका था। फारसीग्रन्थों में युद्ध का काल तो जान पड़ता, परन्तु नरायन के द्वितीययुद्ध की निश्चित तिथि नहीं प्राप्त होती।

भारतीयस्रोतानुसारम्[संपादित करें]

विविधतीर्थकल्पः [104][संपादित करें]

जैनाचार्य जिनप्रभुसूरि देहली के राजा मुहम्मद तुगलक के समकालीन थे। उन दोनों के समानकालीनता के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। वह जैनाचार्य कन्यानयनीयमहावीरप्रतिमाकल्प नामक पुस्तक के रचनाकार हैं। इतिहासविदों का मत है कि, वह पुस्तक खरतरगच्छपट्टावली से भी अधिक उपयोगी है। कन्यानयनीयमहावीरप्रतिमाकल्प के बारहवें कल्प में उल्लेख प्राप्त होता है कि, १२४८ विक्रम संवत्सर में (ई. ११९१-९२) यदा चौहानकुलदिवाकर श्रीपृथ्वीराज की हत्या घोरी ने कर दी, तत्पश्चात् अजमेरु प्रासाद में तुर्कों का आधिपत्य हो गया। अतः अजयमेरु के मन्त्री महाश्रेष्टिरामदेव ने सूचना प्रासारित कर दी कि, "यवन जैनसङ्घ की मूर्तिओँ का नाश करे, उसके पूर्व ही सभी जैनाचार्य मूर्तिओँ को भूमि में गुप्त गुहा बनाकर (a burying-place) सुरक्षित कर लें"[105]

उस्तराँ-शिलालेख[संपादित करें]

१२४८ विक्रम संवत्सर में उस्तराँशिलालेख का निर्माण हुआ था। उस्तराँ प्रदेश से अनेक जीर्ण जैनमन्दिर और वीरस्मारक (देवलियाँ) मिलि थी। वीरस्मारको में अनेक शिलालेख उट्टङ्कित (कुतरे हुए) थे। उन शिलालेख में उल्लेख है कि, १२४८ विक्रम संवत्सर के ज्येष्ठमास की कृष्णषष्ठी सोमवासर को राणा मोतीश्वरा के मरणनिमित्त गोहिलवंशीय राजी नामक राज्ञी ने सतीधर्म (सतीप्रथा) का पालन किया था[106][107]। राणा मोतीश्वरा की मरणतिथि को ही विजयराज नामक उसका पुत्र भी हुतात्मा हुआ था ये अन्य शिलालेख में उल्लिखित किया गया है[108]। मोतीश्वरा और विजयराज के साथ साथ अनेक हुतात्माओं के नाम शिलालेखो में उट्टङ्किच किये गये मिलते हैं। उक्त तिथि के अननुसार ११९२ वर्ष के मई-मास की चौथी (४/५/११९२) दिनाङ्क को वह शिलालेख निर्मित हुआ था। अतः उस दिनाङ्क से पूर्व ही किसी युद्ध में उन वीरों की मृत्यु हुई थी ये सिद्ध होता है।

गोठ मांगलोद नामक स्थान से भी अन्य शिलालेख प्राप्त हुआ है। वह शिलालेख भी उक्त तिथि को ही उट्टङ्कित किया गया था। उस शिलालेख के अनुसार जयसिंह के वीरगति के पश्चात् अनेक राज्ञीयाँ सती हो गई थी। बजलू नामक स्थल से (राजस्थानराज्य के नागौर पत्तन (small town) के समीप में) प्राप्त १२४९ विक्रम संवत्सर के वैशाखमास के शुक्लचतुर्दशी को (१४/२/१२४९) सोमवासर के दिन (ई. २७/४/११९२) किसी परमारप्रमुख के हुतात्मा हो जाने से उसकी राज्ञीयाँ सती हुई थी[109]

विविधतीर्थकल्प और अन्यशीलालेखों के आधार पर तिथिओं का सामञ्जस्य (Propriety) स्थापित कर सकते हैं। उक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि, ११९२ वर्ष के मई-मास की चौथी (४/५/११९२) दिनाङ्क से पूर्व घोरी ने नरायन युद्ध में विजय पा ली थी। तत्पश्चात् उसने अजयमेरु पर स्वाधिकार प्रस्थापित कर लिया था। फारसीग्रन्थों, भारतीयग्रन्थों और भारतीयशिलालेखों के अवलम्बन से निश्चित होता है कि, युद्ध का समग्र घटनाक्रम ११९२ वर्ष के फरवरी-मास की अठ्ठारवीं (१८/२/११९२) दिनाङ्क से ११९२ वर्ष के अप्रैल-मास की सत्ताइस (२७/४/११९२) दिनाङ्क तक हुआ था।

ढीली-स्थान की राजावली[संपादित करें]

नरायन के युद्ध की वास्तविक तिथि के ज्ञानार्थ १६८५ विक्रम संवत्सर में लिखित राजावली का अध्ययन भी महत्त्वपूर्ण सिध्य हुआ है। सर्वप्रथम बार १९५३ वर्ष में जैनसाहित्याचार्य अगरचन्द नाहटा ने उस राजावली को प्रकाशित किया था। १९५३ वर्ष में डॉ. दशरथ शर्मा के 'अज्ञात कर्तृक इन्द्रप्रस्थ प्रबन्ध के कलेवर' नामक पुस्तक में वो आवली प्रकाशित की गई थी। वंशावली में लिखा है कि, १२४९ विक्रम संवत्सर के चैत्रमास की कृष्णद्वितीया (२/१/१२४९) तिथि को (ई. ३/३/११९२) पृथ्वीराज के सहबन्धु वीसलपाल के पुत्र दिवाकर को बन्दी बनाकर तेजपाल ने देहली पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। १२४९ विक्रम संवत्सर के चैत्रमास की शुक्लद्वितीय (१७/१/१२४९) तिथि को (ई. १७/३/११९२) घोरी ने तेजपाल को पराजित कर देहली पर आधिपत्य कर लिया। उक्त प्रमाणों से सिद्ध्य होता है कि, १७ मार्च दिनाङ्क से पूर्व देहली का पतन नहीं हुआ था और १७ मार्च दिनाङ्क से पूर्व पृथ्वीराज हुतात्मा हुए थे।

नरायन युद्ध के अनन्तर घोरी की सैन्यगतिविधि के भी प्रमाण उपलब्ध होते हैं। ताजुल मासिर नामक पुस्तक में हसन निजामी ने उल्लिखित किया है कि, नरायनयुद्ध के पश्चात् घोरी सर्वप्रथम अजयमेरु-प्रासाद पहुँचा[110], तत्पश्चात् उसने देहली को जिता[111]। हसन निजामी के कथन का समर्थन 'लुब्ब तवारिखे हिन्द' नामक पुस्तक भी करता है [112]

राजावली के अनुसार १२४९ विक्रम संवत्सर के चैत्रमास की कृष्णद्वितीया तिथ को तेजपाल नरायनयुद्ध से पलायन कर देहली भाग गया था। आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार ११९२ वर्ष के मार्च-मास की तृतीय (३/३/११९२) दिनाङ्क थी। नरायन के युद्ध तृतीय प्रहर में पूर्ण हो चुका था। इतिहासविदों का मत है कि, पृथ्वीराज को सम्भवतः तीन बजे या चार बजे तुर्कसैनिको ने बिन्दी बनाया होगा। तेजपाल उसी समय युद्धक्षेत्र से पलायन कर देहली चला गया होगा। तेजपाल नरायन के युद्धक्षेत्र से देहली तक अस्सी (८०) कि.मी। की द्रुततर गति से गया हो, तब भी उसकी यात्रा दो दिन में समाप्त हुई होगी। इस प्रकार नरायन का युद्ध ११९२ वर्ष के मार्च-मास की प्रथम (१/३/११९२) दिनाङ्क को रविवासर के दिन पूर्ण हुआ होगा[113]। भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार उस दिन होलिका पर्व था। १२४९ विक्रम संवत्सर के फाल्गुन-मास की पूर्णिमा (३०/१२/१२४९) तिथि को हिन्दूओं के रक्त से नरायन का युद्धक्षेत्र रञ्जित हुआ था।

श्रीहरिहर निवास द्वीवेदी के मतानुसार नरायनयुद्ध के पश्चात् की सम्भावित तिथि निम्न हो सकती हैं[114]

• १ मार्च – नरायनयुद्ध की समाप्ति (तृतीय प्रहर में)

• ५ मार्च – घोरी द्वारा पृथ्वीराज को अजयमेरु ले जाना।

• ११ मार्च – पृथ्वाराज का हुतात्मा होना।

• १३ मार्च – गोविन्द ने अजयमेरु का साम्राज्य समर्पित कर दिया।

• १७ मार्च – देहली का पतन

द्वितीय नरायनयुद्ध[संपादित करें]

ब्राह्ममुहूर्त में घोरी ने पृथ्वीराज की सेना के ऊपर आक्रमण किया।

पृथ्वीराज ने ११९० वर्ष में घोरी को नरायनक्षेत्र में पराजित किया था। तत्पश्चात् एकवर्ष के अभ्यान्तर में घोरी द्वारा अपने सैन्यशक्ति में वृद्धि की गई। दूसरी ओर पृथ्वीराज एक वर्ष तक भारतीय राजनीति क्षेत्र में व्यस्त रहे। उन्होंने उस वर्ष भी अनेक युद्ध लड़े थे। ११९० वर्ष में भारत की जो राजनैतिक पृष्ठभूमि खी, वह पृष्ठभूमि एक वर्ष में विपरीत हो चुकी थी। राजपूतों के अन्तःकलह विशालकाय हो चुके थे। उत्तरभारतीय राजा सतत परस्पर युध्य करने में व्यस्त थे। घोरी द्वारा राजपूत राजाओं की परस्पर सङ्घर्ष की स्थिति का लाभ लिया गया और पृथ्वीराज के ऊपर पुनः आक्रमण किया गया।

नरायन के युद्धक्षेत्र में घोरी को "किसी भी प्रकारण विजय प्राप्त करने के लिये सज्ज था"। दूसरी ओर पृथ्वीराज की सैन्यसज्जता ही नहीं थी। घोरी जानता था कि, पृथ्वीराज का सैन्यसामर्थ्य कितना है और पृथ्वीराज की युद्ध के लिये सज्जता नहीं है। पृथ्वीराज की युद्ध सम्बद्ध असज्जता के विषय में हम्मीरमहाकाव्ये विवरण प्राप्त होता है। हम्मीरमहाकाव्य में उल्लिखित किया गया है कि[115], पृथ्वीराज के सेनापति उदयराज अपनी सेना के युद्ध क्षेत्र में विलम्ब से पहुंचे। पृथ्वीराज के प्रधान तो नरायन युद्ध में भाग भी नहीं ले सका। क्योंकि वह अन्य युद्ध में रत था। विरुद्धविधिविध्वंश नामक ग्रन्थ के १७ श्लोक में भी एसे वर्णन प्राप्त होते हैं। पृथ्वीराज के लिये युद्ध में विलम्ब हो ये अत्यावश्यक था, परन्तु घोरी पृथ्वीराज की दुर्बलता का लाभ लेकर युद्ध करने को तत्पर हो गया।

युद्ध[संपादित करें]

घोरी और उसके अधिकारी युद्धयोजना के विषय में बहुत कुछ परिकल्पना (design) करके युद्ध के लिये सज्ज थे। वे कब ?, कहाँ ? और कैसे ? पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण करेंगे इसका सब चिन्तन उनके द्वारा हो चुका था नरायनक्षेत्र में घोरी के पास जो सेना थी, वह चार विभागों में विभक्त थी। उस सेना के सैनिक भार विहीन शस्त्रों और भारसहित अश्वों से सज्ज थए। चोराों विभागों में विभक्त वह सेना चारों दिशाओ में भारतीय सेना के ऊपर आक्रमण करने के लिये सज्ज थी। जो सेना चारों विभाग में विभक्त थी, उनके अतिरिक्त १०,००० सैनिकों के एक दल की रचना घोरी ने की थी। वें १०,००० सैनिक अश्व पर आरूढ होते हुए भी बाण चलाने में समर्थ थे। घोरी द्वारा उनको आदेश दिया गया था कि, वें सर्वदा शत्रुओं के साथ वाम, दक्षिण, अग्र और पृष्ठ भाग से युद्ध करें। आगे घोरी द्वारा आदेश दिया गया था कि, यदा भारतीय सेना के अश्वारोही, पदाति और हाथी आक्रमण के लिये आगे आयें, तदा वें (तुर्कसैनिक) पीछे जाकर अपने और शत्रुं के मध्य एक अश्व दौड़ सके उतना अन्तर रक्खें[116]। घोरी की ये नीति भारती सैनिकों में भ्रम उत्पादित करने के लिये थी। उक्त नीति से यदि तुर्कसैनिक युद्धक्षेत्र में आचरण करते हैं, तर्हि भारतीय सैनिकों में भ्रम होता है कि, तुर्कसेना ते सभी सैनिक युद्धक्षेत्र में हैं।

घोरी की रणनीति की विभिन्न परियोजना विभिन्न पुस्तकों में प्राप्त होती है। यथा यहिया सरहिन्दी नामक पुस्तक में उल्लेख है कि, यदा हिन्दूओं के हाथी और अश्व आरोहिणः तुर्कसेना के किसी दलस्य के ऊपर आक्रमण करते, तर्हि अन्य दल तीनों दिशा से आक्रमण करते थे[117]। इसामी के पुस्तक में भी उल्लिखित है कि, नरायन के प्रथमयुद्ध के अनन्तर घोरी का चिन्तन था कि, भारतीय हस्तीओं की उपस्थिति में तुर्कदेशीय अश्व भयभीत थे, अतः द्वितीय युद्ध में हमें मुख्यतया हाथी पर ही प्रहार करने हैं। इसके लिये घोरी द्वारा ऐबक् के साथ मिलकर गझनी प्रदेश में अश्व भी प्रशिक्षित किये गये थे[118]

उक्त सैन्य योजना के साथ घोरी ने सम्पूर्ण रात्रि सैन्य सज्जता में व्यतीत की। दूसरी ओर पृथ्वीराज की सेना सम्पूर्ण रात्रि गहन निद्रा के अधीन थी। ब्राह्ममुहूर्त में [119] घोरी की सेना पृथ्वीराज की शिविर पर चारों ओर से आक्रमण करने के लिये सज्ज थी। जिस समय पृथ्वीराज के सैनिक निद्राधीन थे, उसी समय घोरी ने आक्रमण कर दिया। युद्ध के आरम्भ में स्वय पृथ्वीराज भी निद्रा में निमग्न थे। कुछ सैनिक दैनिक कार्यों में व्यस्त थे।

९९८ वर्ष में यथा लमगान-युद्ध मे हुआ था, तथैव नरायन युद्ध में भी हुआ। सुप्त राजपूत सेना के उपरि कवचधारी, सशस्त्रसैनिक और अश्वारोही का आक्रमण हो गया। चालिस सहस्र (४०,०००) से अधिक तुर्कसैनिकों ने पृथ्वीराज की सेना के ऊपर अकस्मात् आक्रमण कर दिया था। जब तक पर्यन्तं सभी सज्ज होते, तब तक तो प्रलय सदृश स्थिति हो गई थी। अनेक राजपूतसैनिको की युद्धशिबिर में ही मृत्यु हो चुकी थी। पृथ्वीराज का अधिक सैन्यबल उस आक्रमण में ही विनष्ट हो चका था।

इतिहासविदों के मत है कि, नरायन का द्वितीय युद्ध वास्तविक युद्ध नहीं था, अपि तु दुर्घटना ही थी। उस युद्ध में न तो हाथीओं या अश्वों का युद्ध में उपयोग हुआ, न तो कोई राजपूतसैनिक युद्ध कर पाया। आश्चर्यचकित सब प्राणान्तक वेदना से आहत यमलोक चले गये। अधिकतम सैनिक स्नान भी नहीं कर पाये, कुछ अश्व के समीप भी नहीं पहुंच सके, युद्ध की घोषणा के पहले ही अनेक राजपूत सैनिकों की हत्या हो गई। उस आक्रमण में आक्रमणकारी ही शुभस्थिति में थे, क्योंकि उन्होंने आक्रमण का काल और स्थान निर्धारित किया था।

घोरी की केन्द्रीय सेना का नेतृत्व वह स्वयं कर रहा था। उसके वाम भाग में इलाह नामक सेनापति और दक्षिण भाग में मुकल्बा नामक सेनापति था। अग्रिम दल का नेतृत्व खारबक नामक योद्धा कर रहा था। खरमेल नामक योद्धा अपनी सेना के साथ घोरी के पृष्ठ भाग में नियुक्त था। कुतुबुद्दीन ऐबक् सभी विभागों का नेतृत्व कर रहा था। वह सर्वदा घोरी के समीप ही बना रहता था। उस समय घोरी की सेना में १,०३,००० अश्वारोही थे। घोरी की सेना का प्रत्येक सैनिक 'जिहर्' नामक कवच से सुसज्जित था। घोरी की आरक्षित सेना में १२,००० आक्रमक योद्धा थे। वें सब भी 'जिहर' नामक कवच से, लोह के मुकुट से और असि, धनुष और शुल के साथ सुसज्ज थे।

तुर्क सैनिको के आकस्मिक आक्रमण से पृथ्वीराज की सेना छिन्न-विच्छिन्न हो गई। सैनिको का नेतृत्व करने के लिये कोई भी समर्थ नहीं था। उस समय देहली के गोविन्द राय नामक प्रधान सेनापति ने राजपूतों की सेना का नेतृत्व किया। उसने अपनी सेना को एकत्रित करके तुर्क सेना के विरुद्ध युद्ध आरम्भ कर दिया। गोविन्द राय यदा युद्ध का नेतृत्व कर रहा था, तदा अन्य सेनाध्यक्ष भी उससे जुड़ने लगे। केन्द्रीय सेना का नेतृत्व पिथौरा ने किया। गोविन्दराय के वाम भाग की सेना के अध्यक्ष पदमशा रावल और दक्षिण भाग की सेना के अध्यक्ष भुवनैकमल्ल नामक सेनापति निजसेना के सैनिकों का नेतृत्व कर रहे थे।

गोवन्द राय ने हाथीसेना के साथ खाबरक के अग्रिम दल पर आक्रमण कर दिया। खाबरक ने किसी प्रकार अपनी रक्षा की। तत्पश्चात् उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि, "अपने बाणों से केवल हाथीओं पर आक्रमण करो"। खाबरक के आदेश अनुसार तुर्कसैनिकों ने हाथीओं औप महावतों पर आक्रमण कर दिया। हाथीसेना के ५४ चौवन हाथी तुर्क सैनिकों के बाणों से आहत हो गए। जिस से भारतीय सेना के हाथी इतस्ततः होगए। इसामी के वर्णन अनुसार इसके पश्चात् ही हिन्दूसेना पराजय की ओर उन्मुख हुई।

फरिश्ता में उल्लिखित है कि, घोरी के आदेश अनुसार उसकी सेना चार विभागों में विभक्त थी। घोरी का आदेश था कि, सभी विभाग हिन्दूसेना के साथ मिलकर नहीं, अपि तु विभागशः युद्ध करें। "यदा हिन्दूओं की हस्तिसेना यवनसेना पर विजयोन्मुखी हो, तदा सैनिक युद्धक्षेत्र से पलायन कर जाएँ। तत्पश्चात् राजपूतसैनिक आपके पीछे आयेंगे, युद्धक्षेत्र से दूर उचितस्थान पर पहुंचकर यवनसैनिक हिन्दूसेना के ऊपर आक्रमण कर देवें। किसी भी प्रकार सभी हिन्दूसैनिकों का नाश करना है" ये भी घोरी का आदेश था। यवनसेना घोरी के आदेश अनुसार ब्राह्ममुहूत से आरम्भ कर मध्याह्न पर्यन्त युद्ध करती रही, परन्तु हिन्दूसेना की पराजय की सम्भावना भी नहीं दिख रही थी। मध्याह्न में घोरी ने यदा अनुभव किया कि, हिन्दूसेना के साथ युद्ध में अभी भी विजय की स्थिति नहीं है, तदा उसने आरक्षित सेना को आक्रमण का आदेश दिया। १२,००० आरक्षित यवनसैनिकों ने आकस्मिक रीति से हिन्दूसेना के ऊपर आक्रमण कर दिया। वह आक्रमण अतिभयङ्कर था। उस आक्रमण में अनेक हिन्दूसैनिक हुतात्मा हो गये।

पृथ्वीराज हुए बन्दी[संपादित करें]

युद्ध से पूर्व सपादलक्ष साम्राज्य के ऊपर चारों और से आक्रमण करके सीमावर्ति राज्यों का देशद्रोह के षडयन्त्र के परिणाम स्वरूप पृथ्वीराज की सेना अनेक विभागो में विभक्त हो गई थी। तत्पश्चात् युद्ध के दिन ब्राह्ममुहूर्त में घोरी की सेना का अनैतिक रीति से पृथ्वीराज की युद्ध शिबिर पर आक्रमण से अनेक हिन्दूसैनिक हुतात्मा हो गए। न केवल भारत के अनेक राजपरिवार पृथ्वीराज के विरुद्ध षडयन्त्र कर चुके थे, अपि तु पृथ्वीराज की सेना के अनेक पदाधिकारी भी यवन सेना के षडयन्त्र में सम्मिलित हो चुके थे। पृथ्वीराज के समीपवर्ती के विश्वासघात से ही पृथ्वीराज बन्दी भी हुए। उक्त कथन का समर्थन हसन निजामी, इसामी, नयचन्दसूरि इत्यादि लेखक भी करते हैं। इनकी पुस्तको में युद्ध के विर्णन विस्तार से प्राप्त होते हैं।

यदा युद्ध पराकाष्ठा पर था और गोविन्द राय अपने हाथीसेना के प्रभाव से तुर्कसेना के ऊपर विजयोन्मुख था, तदा पृथ्वीराज हिन्दूसेना के और घोरी यवनसेना के केन्द्रीय विभाग का नेतृत्व कर रहे थे। उसी समय खरमेल ने अपने धनुर्धर सैनिको को आदेश दिया कि, "हिन्दूसेना के हथीओं पर आक्रमण करें"। तत्पश्चात् यवन सैनिकों ने पूर्णबल से हिन्दूसेना के हाथीओं पर आक्रमण कर दिया। बाणवर्षा से आहत हाथी भयभीत होकर इतस्ततः पलायन करने लगे। उस उपद्रव में खरमेल के आदेश से यवनसैनिकों द्वारा दौड़ते हुए हाथीओं के पीछे दुन्दुभी आदि से गम्भीर ध्वनि उत्पन्न की गई। हिन्दूसेना में अस्तव्यस्तता की स्थिति में दो घटनाएँ हो गई। सब से प्रथम तो जिस हाथी पर आरूढ होकर पृथ्वीराज युध्य कर रहे थे, वह हाथी बाणों से आहत होकर अनियन्त्रित हो गया। अतः पृथ्वीराज आहत हाथी से नीचे उतरे और अपने विश्वस्त को अश्व लाने की आज्ञा दी। द्वितीय हुआ ये कि, घोरी ने हिन्दूसेना में अस्तव्यस्तता की स्थिति को देखकर वामभाग और दक्षिणभाग से आक्रमण करने के लिये अपने सैनिकों को आदेश दिया और १२,००० आरक्षित सैनिकों को भी आक्रमण का आदेश दे दिया वह स्वयं केन्द्रीय सेना के साथ आगे आ गया।

आहत हाथी से नीचे उतरकर पृथ्वीराज जिस अश्व पर आरूढ बुए, वह अश्व नाट्यशाला का अश्व था। घोरी के साथ देशद्रोहीओं का षडयन्त्र युद्धक्षेत्र में बहुधा सफल हुआ। जब पृथ्वीराज अश्व पर आरूढ हुए, तब दूसरे ही क्षण घोरी के सैनिकों ने भेरी (भूंगल) को बजाना आरम्भ कर दिया। भेरी का सङ्गीत सुनकर पृथ्वीराज का अश्व नृत्य करने लगा। अश्व की स्थिति देखकर पृथ्वीराज जान गये कि, क्या हुआ है ? और क्या होगा ?। वे शीघ्र ही उस अश्व से उतर गये और हिन्दूपदातिओं के साथ मिलकर युद्ध करने लगे। उसी समय पीछे से किसी तुर्कसैनिक ने पृथ्वीराज की ग्रीवा (गला) पर आघात किया। तत्पश्चात् तुर्कसैनिकों ने मिलकर पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण करके पृथ्वीराज को बन्दी बना लिया [120]

११९२ वर्ष के मार्च-मास की प्रथम (१/३/११९२) दिनाङ्क को आकस्मिक आक्रमण, बुभुक्षा (भूख), पिपासा (प्यास) और षडयन्त्रों से थके हिन्दूसैनिक युद्ध में पराजित हो गये। उस दिन ३६ राजवंशों के असङ्ख्य वीरसैनिक ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये अपने प्राणाहूति दे दी। अनेक बालक अनाथाः और अनेक स्त्रियाँ विधवा हो गई। सपादलक्ष साम्राज्य के पतन से कन्नौज प्रदेश के राजा जयचन्द ने घृत के दीपक जलाकर उत्सव मनाया। नरायन के युद्ध में विजय प्राप्त कर घोरी पृथ्वीराज को लेकर अजयमेरु-प्रासाद पहुचा। नगर में प्रवेश के अनुक्षण ही तुर्कसैनिकों ने नगर में उत्पात आरम्भ कर दिया। मन्दिर, मूर्तियाँ और पाठशालाएँ लूटकर अग्निसात् कर दी गई। नगर जनों का धन और अमूल्यवस्तुओं का बल पूर्वक अपहरण यवनसैनिक द्वारा किया गया। वे हिन्दूमहिला, युवती और विधवाओं के ऊपर बलात्कार करने लगें। नगर में महिला, बालक, वृद्ध और पुरुषों के आर्तनाद गुञ्जन रहे थे[121]

पृथ्वीराज का अन्तिमकाल[संपादित करें]

बीकानेर में 'सार्दूल रिसर्च इन्स्टिट्यूट्' नामक एक संस्था है। उस संस्था में पृथ्वीराज रासो काव्य की प्राचीनतम हस्तप्रत प्राप्त होती हैं। उन हस्तप्रतों में एक प्रसिद्ध चौपाई है कि,

दिन पलटु-पलटु न मन, भुज वाहत सब शस्त्र।

अरि मिट मिटये न कोई, लिख्यु विधाता पत्र।। [122]

उक्त चौपाई के जैसी अन्य 'चोपाई' तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस में प्राप्त होती है –

सुनहु भरत भावी प्रबल, विहंसि कहा मुनिनाथ।

हानि-लाभ, जीवन-मरण, जस-अपजस विधि हाथ।। १७१।। अयोध्याकाण्डः

अर्थात्, भाग्य ही बलवान् है। जीवन, मरण, दिन, रात्रि, सुख, दुःख, जय, पराजय, उत्थान और पतन नियति के अनुसार होते हैं।

पृथ्वीराज रासो काव्य के अनेक अंश चन्दबरदायी ने की रचना नहीं है ये अनेक विद्वानों प्रमाणित किया है। गझनी प्रदेश में एक बाण से पृथ्वीराज ने घोरी का वध किया[123] इसका पृथ्वीराज रासो काव्य में वर्णन है। जिसके विरुद्ध अनेके इतिहासविदों में मतभेद है। घोरी के वध के पश्चात् चन्द और पृथ्वीराज ने परस्पर घात करके मृत्यु का वरण कर लिया इस उल्लेख के साथ ही वर्णन मिलता है कि, ये सूचना चन्द द्वारा उल्लिखित है। काई भी व्यक्ति अपनी मृत्युं का वर्णन कैसे कर सकता है? यही सर्वप्रथम प्रश्न उत्पन्न होता है। तत्पश्चात् शिलालेख इत्यादि के विश्लेषण से अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं। जिससे वह रचना चन्द के द्वारा रचित नहीं, अपि तु किसी अन्य अज्ञात कवि ने उस में आक्षेप किये हैं ऐसा प्रतीत होता है।

यद्यपि पृथ्वीराज रासो काव्य के मूलस्रोत में परवर्तिन से वह दूषित हो गया है, तथापि रासोकाव्य में बाणवेध का वर्णन सर्वथा अनैतिहासिक नहीं सिद्ध होता।

चार बांस चौबीस गज, अङ्गुल अष्ट प्रमान।

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।

उक्त पङ्क्ति के घोष भारतीय जनमानस में अनेक शतकों से अत्यन्त लोकप्रिय है और आज भी है।[124][125]पृथ्वीराज के द्वारा चला बाण घोरी को भेद ही देता, परन्तु उस से पूर्व देशद्रोहिओँ ने घोरी की सहायता कर दी और घोरी की प्राणरक्षा हो गई।

पृथ्वीराज का अन्तिमकाल कैसा था? इसके विषय में भारतीय साहित्य में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। उ प्रमाणों के उपस्थापन में प्रत्येक भारतीय स्रोत की परस्पर भिन्नता भी है, परन्तु फारसी-ग्रन्थ भी वैसे ही हैं। जिन मध्यकालीन साहित्य में पृथ्वीराज के मृत्यु का उल्लेख प्राप्त होता है, उन में पृथ्वीराज रासो काव्यं, पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रहः, विरुद्धविधिविध्वंसः, सुर्जचरितमहाकाव्यं, राजदर्शिनी (जम्मूप्रदेश का तवारिख), कान्हडदे-प्रबन्धः, प्रबन्धचिन्तामणिः और हम्मीरमहाकाव्यं अन्तर्भूत होते हैं। फारसी-साहित्य में ताजुल मासिर, जवामि उल हिकायता या रिवायत, तबकाते नासिरी, फुतुहूस्सलातीन, तारीखे फरिश्ता, गुलदशने इब्राहीमी और आइने-अकबरी जैसे ग्रन्थ प्रमुख हैं।

भारतीय स्रोत[संपादित करें]

पृथ्वीराज रासो[संपादित करें]

घोरी पृथ्वीराज को बन्दी बना कर गझनी प्रदेश ले गया। चन्दबरदायी उस युद्ध में अनुपस्थित था, क्योंकि वह स्वयं पृथ्वीराज के आदेश से जम्मू में हाहुली हम्मीर नामक सामन्त के साथ सन्धि करने के लिये गया था। वहाँ हम्मीर नामक सामन्त ने चन्दबरदायी के परामर्श को अस्वीकार कर दिया और चन्दबरदायी को ही जालपा-देवी के मन्दिर में बिन्दी बना लिया। युद्ध के समाप्ति के पश्चात् चन्द मुक्तः हुआ। पृथ्वीराज पराजित हुए हैं और वें घोरी के बन्दी हैं ये समाचार चन्द को मिले। अतः वह अपने सम्राट् के उद्धार के लिये गझनी प्रदेश गया। वहाँ अपने वाक् चातुर्य से चन्द ने घोरी को प्रभावित किया।

तत्पश्चात् उनसे घोरी कहा कि, पृथ्वीराज अन्ध होते हुए भी कुशलतया लक्ष्य भेदने में समर्थ हैं। इस प्रकार घोरी को वो चमत्कार देखने के लिये प्रेरित किया। तत्पश्चात् चन्द वर्णन करते हैं कि, घोरी को पृथ्वीराज ने एक ही बाण से किस प्रकार मार दिया। घोरी के मरण के पश्चात् पृथ्वीराज और चन्द ने आत्मघात कर लिया। चन्द के अनुसार उसकी और पृथ्वीराज की मृत्यु गझनी प्रदेश में हुई थी। उक्त कथानक पृथ्वीराज रासो काव्य के लघुतम, मध्यम, और बृहत् तीनो रूपान्तरों में उपलब्ध होता है।

पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रहः[संपादित करें]

पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रह का रचनाकाल १२९० विक्रम संवत्सर (ई. ११३३) वर्तते। लिपिकाल ई. १४२८ – १४७१ माना जाता है[11]। पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रह के "पृथ्वीराजप्रबन्ध" में उल्लिखित है कि, राजा की ग्रीवा (गले) में भार स्थापित करके घोरी ने सुवर्ण की श्रृङ्खला से पृथ्वीराज को बन्दी बना लिया। तत्पश्चात् वह पृथ्वीराज को योगिनीपुर (देहली) ले गया। देहली के राजप्रासाद में घोरी ने पृथ्वीराज को पुछा, "हे राजन्! यदि मैं तुमको जीवनदान दूं, तो आप क्या करोगे?"। पृथ्वीराज ने प्रतिप्रश्न किया कि, "मैंने तुझे सात बार जीवनदान दिया, क्या तुम मुझे एकबार भी छोड़ोगे?"।

जिसके नयनबुद्बुदें (अाँख, Eyeball) निकाल दिये गये थे, ऐसे पृथ्वीराज घोरी के सम्मुख खेदमग्न हो गये। तत्पश्चात् पृथ्वीराज के प्रधान ने पुछा, देव! क्या करना चाहिये? नियति द्वारा निर्धारित ये सङ्कट समुद्भूत हुआ है। पृथ्वीराज बोले, "यदि तुम मुझे धनुष्काण्ड (Bow and Arrow) देते हो, तो मैं इसको (घोरी को) मार सकता हूँ"। प्रधान ने पुछा, महाराज! एवमेव करोतु। तत्पश्चात् वह प्रधान ने घोरी के समीप जाकर कहा कि, इस स्थान पर न बैठो। अतः घोरी ने अपने स्थान पर लौह का पुत्तल (पुतला) प्रस्थापित करवा दिया और पश्चात् उस प्रधान ने पृथ्वीराज को धनुष्काण्ड दिया। पृथ्वीराज ने अपने बाण के आघात से लोहपुत्तल के दो भाग कर दिये। फिर उन्होंने धनुष्काण्ड का त्याग कर दिया। परन्तु लोहे की ध्वनि सुनकर वे समझ गये कि, वे निष्फल हुए हैं। अतः उन्होंने मन में ही सोचा कि, मेरा कार्य तो अपूर्ण ही रह गया, अतः अन्य कोई मुझे मार ही डालेगा। तत्पश्चात् घोरी ने एक महागर्त में (hole, गड्ढा) पृथ्वीराज को फेंक दिया और उसने पृथ्वीराज को पाशाणो से मारने का आदेश दे दिया। यदि इनका (पृथ्वीराज का) रक्त भूमि पर पड़ेगा, तो शुभ ही होगा ऐसा वो बार बार लोगता रहा। १२४६ विक्रम संवत्सर में (ई. ११८९) यवनों ने पाशाणों मार-मार कर पृथ्वीराज के प्राण ले लिये।

बाणवेध का प्रसङ्ग यहाँ भी प्राप्त होता है परन्तु वर्णन किञ्चित् भिन्न है। यहाँ घोरी के स्थान पर उसका पुत्तल (पुतला) भेदन का विवरण प्राप्त होता है। यहाँ स्थान गझनी प्रदेश नहीं, अपि तु देहली है। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लिखित है कि, पृथ्वीराज ने आत्मघात किया, परन्तु जैनाचार्य के मतानुसार यहाँ एक गर्त में पाशाणों के आघातों से पृथ्वीराज के प्राण गये। इस कथानक में केवल पृथ्वीराज की मृत्यु का उल्लेख है। चन्दबरदायी की और घोरी की मृत्यु का वर्णन नहीं प्राप्त होता।

सुर्जनचरितमहाकाव्यम् [126][संपादित करें]

चन्द्रशेखरकृत सुर्जनचरितमहाकाव्य की रचना १६९२ विक्रम संवत्सरः (ई. १६३५) मानी जाती है। सुर्जनचरितमहाकाव्य के दशमसर्ग के १२० वें श्लोक से १६८ वें श्लोक पर्यन्त वर्णन मिलता है कि, दिग्विजय अभियान के अन्तर पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना लिया था। इक्कीस बार पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बनाया और फिर छोड़ दिया, परन्तु उसने पृथ्वीराज का अपकार ही किया। एक युद्ध में छल से पृथ्वीराज को बन्दी बना कर घोरी उनको गझनी प्रदेश ले गया। वहाँ उसने पृथ्वीराज को नेत्रहीन कर दिया। तत्पश्चात् पृथ्वीराज का मित्र भी गझनी प्रदेश पहुंचा। उसने पृथ्वीराज को प्रतिशोध के लिये प्रेरित किया। पृथ्वीराज ने बोला, मेरे पास सेना नहीं और नेत्र भी नहीं हैं। ऐसे में प्रतिशोध कैसे सम्भव है?। तब चन्दबरदायी ने पृथ्वीराज को शब्दवेधविद्या का स्मरण करवाया और पृथ्वीराज प्रतिशोध के लिये सज्ज हो गये।

पृथ्वीराज के साथ शब्दवेधविद्या की योजना करके चन्दबरदायी घोरी की सभा में गया। स्वल्प ही दिनों में चन्दबरदायी घोरी और उसके मन्त्रीओं का विश्वासभाक् (विश्वासपात्र) बन गया। तत्पश्चात् एक दिन चन्दबरदायी ने सभा में कहा, पृथ्वीराज अन्ध होकर भी लोहे की श्रृङ्खलाओं को भेदने में समर्थ हैं। उनके उस कौशल को एकवार तो दर्शना ही चाहिये। चन्दबरदायी ने कहने पर घोरी पृथ्वीराज के कौशल देखने के लिये तत्पर हो गया। तत्पश्चात् राजप्रासाद (राजमहल) में एक स्तम्भ पर सुवर्णश्रृङ्खला बांधकर यवनसैनिकों ने पृथ्वीराज के हाथ में धनुष्काण्ड दिये। चन्दबरदायी ने घोरी को कहा कि, तुम स्वयं तीन बार पृथ्वीराज को बाण चलाने के लिये आज्ञा दो, उसके बाद ही वें बाणवेध करेगें। इस प्रकार घोरी ते मुख से शब्द निकलने के अनुक्षण ही पृथ्वीराज ने बाण चला दिया। वह बाण घोरी के तालुमूल (the root of the palate) भेद दिया। अतः तत्क्षण ही घोरी की मृत्यु हो गई। घोरी की हत्या से राजप्रासाद में कौतुहल की स्थिति उत्पन्न हो गई। अतः चन्दबरदायी ने पृथ्वीराज को अश्व पर चढाया और जाङ्गलदेश ले गया। वहाँ वह पृथ्वीराज ने अपने यश के अनुसार राज्य करके परलोक गये।

सुर्जनचरितमहाकाव्य की कथा पृथ्वीराज रासो काव्य के साथ अनेक अंशों में सामाञ्जस्य धारण करती है। वहाँ से भेद है कि, यहाँ पृथ्वीराज चन्दबरदायी के साथ गझनी प्रदेश से निकलने में सफल हो जाते हैं। तत्पश्चात् वे जाङ्गलप्रदेश में राज्य करके परलोक जाते हैं। सुर्जनचरितमहाकाव्यकार पृथ्वीराज रासो काव्य से पूर्णतया असमर्थन भी नहीं करते और विरोध भी नहीं करते। इस प्रकार सुर्जनचरितमहाकाव्य में केवल घोरी की हत्या का ही वर्णन प्राप्त होता है।

प्रबन्धचिन्तामणिः [127][संपादित करें]

१३६१ विक्रम संवत्सर के वैशाखमास की पूर्णिमा (१५/२/१३६१) तिथि पर (ई. १३०४) प्रबन्धचिन्तामण की रचना हुई। इस ग्रन्थ के रचनाकार मेरुतुङ्ग हैं। प्रबन्धचिन्तामणि में उल्लिखित है कि, म्लेच्छराज के पुत्र ने अपने पिता के अपमान का वैरोद्धार (बदला लेने) के लिये सपादलक्ष साम्राज्य के शासक पृथ्वीराज पर आक्रमण कर दिया। घोरी ने पूर्णसज्जता के साथ पृथ्वीराज के राज्य पर आक्रमण कर दिया। परन्तु पृथ्वीराज की सेना के धनुर्धरवीरों की बाणवर्षा से भयभीत होकर घोरी अपने सैन्य के साथ भाग गया। पृथ्वीराज ने घोरी का पीछा किया। मार्ग में भोजन विभाग के किसी अधिकारी ने पृथ्वीराज को कहा, हे राजन्! कृपया सातसो ऊट (She-camel) दान में देवें। उसका वचन सुनकर पृथ्वीराज ने प्रत्युत्तर दिया कि, सर्वप्रथम म्लेच्छराज को मारकर उसके ऊटों को अपने अधीन करूंगा, तत्पश्चात् तुम्हारी इच्छापूर्ति होगी। तब राजा आगे प्रयाण करने के लिये उद्यत हुए, तो सोमेश्वर नामक किसी प्रधान ने पृथ्वीराज को बार बार म्लेच्छराज के पीछे न जाने के लिये कहा। सोमेश्वर के वचनों से क्रुद्ध पृथ्वीराज ने उसके कान काट लिये। पृथ्वीराज से पराभूत हुआ सोमेश्वर म्लेच्छराज के पक्ष में सक्रिय हो गया। सोमेश्वर ने घोरी के साथ दीर्घकाल तक योजना बनाकर उसका विश्वासार्जन किया। वह घोरी को विश्वास देता रहा कि, पृथ्वीराज के सम्मुख उसकी ही विजय होगी। तत्पश्चात् घोरी ने एकादशी तिथि को पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया। म्लेच्छराज की सेना ने जब सपादलक्ष साम्राज्य के ऊपर आक्रमण किया, तब पारणा के पश्चात् पृथ्वीराज घाढनिद्रा में थे। घोरी के सैनिकों ने उन पर आक्रमण कर उनको बन्दी बना लिया।

घोरी द्वारा बन्दी बनाये गये पृथ्वीराज ने एकमास तक बन्दी के रूप में अजमेरु-प्रासाद में निवास किया। एक मास के पश्चात् एकादशी तिथि पर पृथ्वीराज जब पूजामग्न थे, तब म्लेच्छराज ने उनको पक्वमांस खाने के लिये भेजा। भोजन के समय होने पर भी पृथ्वीराज पूजामग्न थे, अतः उनका ध्यान मांस पर नहीं गया। परन्तु बहुकाल व्यतीत हो जाने पर एक कुक्कुर (कुत्ता) पृथ्वीराज के शिबिर में प्रविष्ट हुआ। उस कुक्कुर ने उस मांस को खा लिया। कुक्कुर को मांस लेकर जा रहा देख शिबिर के प्रतिहारी ने पृथ्वीराज को पुछा, क्यों आपने भोजन की रक्षा नहीं की?। पृथ्वीराज ने प्रत्युत्तर दिया कि, जिसके भोजन का भार सातसो ऊट भी ढोने में असमर्थ हुआ करते थे, उसके भोजन की ऐसी स्थिति है। ये सब मैं अननुकूल (unfavorable) होकर देख रहा हूँ। तत्पश्चात् एक प्रतिहारी ने क्रोध से पृथ्वीराज को पुछा, क्या अभी भी इतनी शक्ति अवशिष्ट है? उसको उत्तर देते हुआ पृथ्वीराज ने कहा, यदि मैं अपने स्थान पर पहुंच जाऊँ, तो मैं अपना शारीरक बल बताऊँ।

पृथ्वीराज के साथ प्रतिहारी की जो चर्चा हुई, उस चर्चा के समाचार घोरी को भी मिले। क्रोधाविष्ट हो कर वह पृथ्वीराज को अजयमेरु-प्रासाद में ले गया। उसने प्रासाद के राजसिंहासन पर बैठने के लिये पृथ्वीराज को आदेश दिया। तत्पश्चात् सिंहासन के चारों और स्थित चित्रों को देखकर घोरी को पीडा हुई। राजसिंहासन के चारों और पृथ्वीराज ने म्लेच्छों (यवानों) को मारते हुए शूकरों के चित्र प्रस्थापित किये थे। फिर क्रोधावेश में घोरी ने परशु से राजसिंहास पर स्थित पृथ्वीराज का शिरश्छेदन कर दिया।

इस मेरुतुङ्गरचित महाकाव्य में पृथ्वीराज के देहत्याग का ही वर्णन प्राप्त होता है। पृथ्वीराज ने अजयमेरुप्रासाद में ही देहत्याग किया ये वर्णन मिलता है।

विविधतीर्थकल्पप्रदीपः [128][संपादित करें]

विविधतीर्थकल्पप्रदीप का रचनाकाल ई. १३०७-१३३२ माना जाता है। विविधतीर्थकल्पप्रदीप नामर ग्रन्थ प्राकृतभाषा में लिखा गया है। उस ग्रन्थ का कन्यानयनीयमहावीरप्रतिमाकल्प नामक बाइसवें (२२) कल्प में वर्णन प्राप्त होता है कि,

जाव हारहसय अडयाले (१२४८) विक्कमाइच्च संवच्छरे चाहुयाण कुलपइये सिरि पुहविराय नरदि सुरताण साहब दीणेण निहणनीए रज्जपहाणेण पराम सावएण सिच्चि रामदेवेण साव संघस्य लेहो पेसियो, जहां तुरुक्क रज्ज सजायं। सिरि महावीर पडियमा पच्छन्न धारियव्व।

अर्थात्, १२४८ विक्रम संवत्सर में (ई. ११९१-९२) जब चौहानकुल के दिवाकर श्रीपृथ्वीराज की घोरी द्वारा हत्या की गई, तब अजमेरु-प्रासाद पर तुर्कों का आधिपत्य हो गया। अतः अजयमेरु के मन्त्री महाश्रेष्टिरामदेव ने सूचना प्रासारित करवाई कि, "यवन जैनसङ्घ की मूर्तियों का नाश करें उससे पूर्व ही सभी जैनाचार्य मूर्तियों को भूमि में वैलस्थान (a burying-place) में स्थापित करें"। इस प्रकार इस ग्रन्थ में पृथ्वीराज के देहत्याग का स्थान अजमेरु ही वर्णित हुआ है।

हम्मीरमहाकाव्यम् [129][130][संपादित करें]

हम्मीरमहाकाव्य के कर्ता नयचन्द सूरि थे। हम्मीरकाव्य का रचनाकाल १४६० विक्रम संवत्सर (ई। १४०३) माना जाता है। पृथ्वीराज के अन्तिमकाल का वर्णन हम्मीरकाव्य के तृतीयसर्ग में ५३ वें श्लोक से ७२ वें श्लोक पर्यन्त प्राप्त होता है। वहाँ उल्लिखित है कि,

घोरी ने पहले जितने भी युद्ध पृथ्वीराज के साथ किये थे, उन युद्धों का स्मरण करते हुए घोर ने पृथ्वीराज को देखा और सोचने लगा कि, "जैसे मृगों (हिरणों) से सिंह अजेय होता है, वैसे ही ये (पृथ्वीराज) हमारे लिये अजेय हैं"। अतः रात्रिकाल में घोरी ने अपने विश्वस्तों को पृथ्वीराज की अश्वशाला में भेजा। जिन्होंने अश्वाधिपति को और तूर्यवादक को उत्कोच (घूस) के रूप में असीमित सुवर्णमुद्रा दी। रात्री के अन्तिमप्रहर में (ब्राह्ममुहूर्त में) ही यवनसैनिकों ने पृथ्वीराज के सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। अनेक उत्पातजनक घोषों से यनवसैनिकों ने हिन्दूसैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सङ्ग्राम की स्थिति देखकर भारतेश्वर पृथ्वीराज अश्वपालक द्वारा प्रेषित नाट्यशाला के अश्व पर आरूढ हो गये। उस समय अश्वारूढ हुए पृथ्वीराज को देखकर तूर्यवादक ने पणवानक और गोमुख जैसे वाद्ययंत्रो की ध्वनि से सङ्गीतरागों को बजाना आरम्भ किया। सङ्गीत सुनकर नट्यशाला का अश्व नृत्य करने लगा। तत्पश्चात् अश्व से उतरकर पृथ्वीराज ने यवनसैनिकों के साथ युद्ध आरम्भ किया। अपने प्रहारों और गर्जना से पृथ्वीराज के शत्रूओँ के हृदय में भय उत्पन्न हो गया। पृथ्वीराज को चारों ओर से यवनसैनिकों ने वैसे घेरा था, जैसे सर्प के चारों और पक्षी होते हैं। पृथ्वीराज ने अनेक यवनसैनिकों के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। उस समय एक यवनसैनिक ने पृष्ठ भाग से (पीछे से) पृथ्वीराज की ग्रीवा (गले) पर रज्जू (रस्सी) फेंकी। तत्पश्चात् सभी सैनिकों ने मिलकर पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण कर दिया। दीर्घ काल तक सङ्घर्ष करके अन्त में पृथ्वीराज यवनसैनिकों द्वारा बन्दी हुए[131]

बन्दी होने के पश्चात् पृथ्वीराज की अपने जीवन और भोजन में रुचि ही लुप्त हो गई। किसीने म्लेच्छाधिपति को निवेदन किया कि, "भारतेश्वर पृथ्वीराज ने तुझे अनेक बार छोड़ दिया था, क्या तुम उन्हें एकबार भी नहीं छोड़ोगे?"। उस व्यक्ति का वचन सुनकर कुद्ध घोरी बोला, "इसीलिये ये हिन्दू राजनैतिक रहस्यों से हीन बोले जाते हैं"[132]। तत्पश्चात् घोरी ने पृथ्वीराज को अन्य दुर्ग के कारागार में भेज दिया। क्रुर यवनों ने पृथ्वीराज को कारागार में ही अन्ध कर दिया। तत्पश्चात् शिवमतानुयायी जिसे शिव कहते हैं, बौद्धमतानुयायी जिसे सुगत कहते हैं, जैनमतानुयायी जिसे सर्वज्ञता कहते है, उस अद्भुत चिन्मय ब्रह्म के स्वरूप का स्मरण करते हुए भारतेश्वर पृथ्वीराज शिवधाम गये[10]

विरुद्धविधिविध्वंसः [133][134][135][संपादित करें]

विरुद्धविधिविध्वंसकाव्य के रचयिता लक्ष्मीधर हैं। १५८२ विक्रम संवत्सर के चैत्रमास की शुक्लतृतीया तिथि को इस काव्य की रचना हुई। विरुद्धविधिविध्वंस के रचयिता लक्ष्मीधर के पितामह वामन थे। जब सोमेश्वर अण्हिलपाटण प्रदेश से अजयमेरु प्रदेश की ओर सपरिवार आ रहे थे, तब उनके साथ कैमास, भुवनैकमल्ल, सोढ इत्यादि नागरब्राह्मण भी थे। सोढ के दो पुत्र थे। स्कन्द और वामन। स्कन्द और वामन पृथ्वीराज के मन्त्रिमण्डल के सदस्य थे। स्कन्द सेनापति था और वामन सन्धिविग्रहकर्ता।

विरुद्धविधिविध्वंस में वामन के प्रौत्र लक्ष्मीधर ने लिखा है कि, जब घोरी का पृथ्वीराज के साथ प्रथम नरायन का युद्ध हुआ, तब स्कन्द ने असाधारण प्रदर्शन किया। द्वितीययुद्ध में जब पृथ्वीराज पराजित हुए, तब सिन्धिविग्रहकर्ता वामन ने अजमेरु के राजकोष से २,००२,००० द्रम्म-मुद्राएं (पृथ्वीराज के समय मुद्राओं का नाम "द्रम्म" था।) चोरी कर ली और भाग गया। आगे विरुद्धविधिविध्वंसकाव्य में लक्ष्मीधर ने लिखा कि,

गतेऽन्य सङ्गरे स्कन्दैः, निद्रा-व्यसन-सन्नधीः।

व्यापादितस्तुरूष्कैः सः राजा जीवन्मृतो युधिः।। १७।।

अर्थात्, सेनापति स्कन्द अन्यत्र युद्ध करने के लिये गये थे। उस समय जिस राजा की बुद्धि निद्रादि व्यसनों से अवरुद्ध हो गई थी, वह जीवित होते हुए भी मृतवत् राजा तुरूष्कसैनिकों के द्वारा (यवनों से) मारा गया [136]

कान्हड दे प्रबन्ध [137][संपादित करें]

'कान्हड दे प्रबन्ध' काव्य के रचयिता पद्मनाभ हैं। ई. १४५५ में इस काव्य की प्रस्तुति हुई थी। पद्मनाभ वीसलनगरा-सम्प्रदाय के ब्राह्मण थे। ये पद्मनाभ जालौर प्रदेश के शासक कान्हडदेव के पांचवें वंशज अखैराज के राजकवि थे। अखैराज के आदेश से ही उसने "कान्हड दे प्रबन्ध" नामक काव्य की रचाना की थी। इस काव्य की भाषा 'गुर्जरराजस्थानी' ही।

१३६८ विक्रम संवत्सर (ई. १३११) में जालौर प्रदेश के शासक 'कान्हड दे चौहान' की देहली के राजा अलाउद्दीन खल्जी के साथ जो युद्ध हुआ था, वह इतिहास के महत्त्वपूर्ण और प्रसिद्ध युद्धों में गिना जाता है। यद्यपि 'कान्हड दे चौहान' जानता थे कि, यवनसैनिकों ने जालौरदुर्ग के ऊपर चारों दिशा से आक्रमण किया है और विजय का कोई भी मार्ग शेष नहीं है, तथापि कुलपरम्परा के रक्षणार्थ 'कान्हड दे चौहान' ने अपने पुत्र वीरमदेव के साथ दुर्ग से बाहर निकलकर युद्ध किया। जालौरदुर्ग से बाहर ही उन दोनों पिता-पुत्र की मृत्यु हो गई। अलाउद्दीन खल्जी के कान्हड दे चौहान के साथ जो युद्ध किया, उसका कारण "कान्हड् दे प्रबन्ध" नामक ग्रन्थ में प्राप्य होता है।

पद्मनाभ "कान्हड दे प्रबन्ध" नामक अपने काव्य में उल्लिखत करते हैं कि, अलाउद्दीन खल्जी की पुत्री सिताई (मुस्लिम नाम, फीरोजा) वीरमदेव को प्रेम करती थी। वह वीरमदेव के साथ ही विवाह करना चाहती थी। परन्तु विजातीय स्त्री के साथ विवाह वीरमदेव के लिये अयोग्य था। क्योंकि वह सोचता था कि, इस प्रकार विजातीय विवाह करने से पूर्वजों का अपमान होगा। यद्यपि फीरोजा जानती थी कि, वीरमदेव क्यों बारंबार उसके प्रणयनिवेदन अस्वीकार कर रहे है, तथापि फिरोजा ने अनेकबार वीरमदेव को पत्र लिखें। फिरोजा का कथन था कि, मैं (फिरोजा) पूर्वजन्म में पृथ्वीराज की पद्मवाती नामक राज्ञी थी। अतः हम दोनों का प्रणय न केवल इस जन्म का है, अपि तु अनेक जन्म से है। तो कृपया मेरे प्रणयनिवेदन को अस्वीकार न करें।

वीरमदेव को फिरोजा ने जो कहा, वो निम्न है।


सोमेसर घर छठ्ठीबार, पृथ्वीराज लीधऊ अवतार।
पाल्हणनई घरि हूँ कुँवरि, पद्मावती नामई अवतरी।। २०१।।
तिणि अवतार पाप आदरिऊं, गाय विसाणी कामन करिऊ।
साधिउ मंत्र गर्भ गाइनइ, चित्त विकार हय राजनइ।। २०२।।
रायवश कीधऊं लोपी लाज, हण्या प्रधान निगम्यऊं राज।
घाघरि तिरि राय सुणिउ, सहाबुद्दीन सूतराणई हणिऊ।। २०३।।

उक्त श्लोक माध्यम से राजकुमारी कह रही हैं कि, मैंने तुमको प्राप्त करने के लिये अनेक जन्म स्वीकार किये। मेरे छःवें जन्म में मैं पाल्हण-वंशीयों की पुत्री के रूप में जन्मी थी। उस जन्म में तुम सोमेश्वर के पुत्र पृथ्वीराज थे। उस जन्म में मैंने घोरपाप किया था। पृथ्वीराज रूपी तुमको वश में करने के लिये मैं गौ हत्या की थी। उस गौ के गर्भाशय को निकाल कर उस गर्भाशय पर अपनी तान्त्रिक विधि की थी। उस तान्त्रिक विधि से पृथ्वीराज तो मेरे वशीभूत हो गये, परन्तु राजकार्यों से वह विमुख हो गये। उसके बाद घोरी नामक म्लेच्छराजा ने जब पृथ्वीराज की घग्घरनदी के तीर पर वध कर दिया, तब अपने सतीधर्म का अवलम्बन करते हुए मैंने भी अयोध्या में अपने देह को छोड़ा।

फारसी स्रोत[संपादित करें]

जवामि उल हिकायत [138][संपादित करें]

'जवामि उल हिकायत' ग्रन्थ की रचना मौलाना नसरुद्दीन मुहम्मद उफी ने की थी। ई. १२११ उस ग्रन्थ का रचनाकाल माना जाता है। उसने उल्लेख किया है कि, जब दोनों सेनाएं रणाङ्गण में समीप पहुचीं, तब दोनों सेनों के सैनिकों द्वारा शिबिरों कका निर्माण किया गया। परन्तु घोरी ने अपने सैनिकों को पहले ही आदेश दिया था कि, अनेक काष्ठ एकत्रित कर लेवें। क्योंकि उसकी योजना थी कि, शिबिर के सम्मुख हम अग्नि को प्रज्वलित रखकर शत्रुओं को भ्रमित करेंगें। हम रात्रि को ही अन्य मार्ग से शत्रुओं के शिबिर के पृष्ठभाग में पहुंच जाएंगे। तत्पश्चात् ब्राह्ममुहूर्त में ही उपर आक्रमण कर देंगे। घोरी की योजना सफला हुई, शिबिर में स्थित स्वल्प सैनिक पुरी रात शिबिर के सम्मुख अग्नि प्राज्वलित कर बैठे रहें। जिससे पृथ्वीराज के सैनिकों ने सोचा कि, तूर्कसेना सामने की शिबिर में ही है। घोरी अपने सैनिकों के साथ पुरी रात्रि यात्रा करके 'कोला' की (कोला ये किसी निम्न पशु विशेष का नाम है। फारसीभाषा के लेखकों ने फारसीग्रन्थों में मुख्यतया पृथ्वीराज का उल्लेख अपशब्दों से ही किया है।) शिबिर के पृष्ठभाग में पहुंचा। तत्पश्चात् अकस्मात् ही घोरी ने पृथ्वीराज की सेना के ऊपर आक्रमण कर दिया। यवनसैनिकों ने उस आक्रमण में अनेक हिन्दूसैनिकों का वध किया। अकस्मात् आक्रमण से अनेक सैनिकों का वध देखकर 'कोला' सोचा कि, पीछे जाते हैं। परन्तु तत्पश्चात् उसकी (पृथ्वीराज की) सेना के हाथी अनियन्त्रित हो गये और सेना में उत्पात की स्थिति उत्पन्न हो गई। फिर कोला को घोरी ने बन्दी बना लिया।

ताज उल मासिर [139][संपादित करें]

'ताज उल मासिर' ग्रन्थ का लेखक सदरुद्दीन बिन हसन निजामी नैशापुरी था। यवन पञ्चाङ्ग के अनुसार इस ग्रन्थ की रचना हि.स. ६०३-६१४ के मध्य (ई. १२०५-१२१७) हुई थी। हसन निजामी एकमात्र वैदेशिक लेखक है, जिसने नरायनयुद्ध का विवरण दिया है। उस ग्रन्थ में प्रथम नरायन युद्ध के अनन्तर का वर्णन प्राप्त होता है। जब घोरी ने अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिये अहोरात्र (रात-दिन) परिश्रम किया।

फिर युद्ध हुआ और अन्त में 'इस्लाम्' की विजय हुई। एकलाख से अधिक हिन्दूओं का वध किया गया। अजयमेरुराय (पृथ्वीराज) को बन्दी बना लिया गया, परन्तु तत्पश्चात् उसको मुक्त कर दिया गया। अजयमेरुराय मुक्त तो हुए, परन्तु उसके हृदय में यवनों के लिये (मुसलमानों के लिए) द्वेष था ही। अतः उसने योजना आरम्भ कर दी। जब घोरी को उसके आचरण के विषय में ज्ञता हुआ, तब उसने अजयमेरुराज के वध का आदेश दे दिया। तत्पश्चात् मोतियों से जड़ित तलवार से अजयमेरुराय का शिरश्छेद किया गया। घोरी के आदेश से अजयमेरुराय का शिर उनके पुत्र को भिजवाया गया।

तबकाते नासिरी [140][141][142][संपादित करें]

'तबकाते नासिरी' ग्रन्थ का लेखक अबू उमर मिन्हाजुद्दीन उस्मान बिन सिराजुद्दीन मुहम्मद जुजजानी था। उस ग्रन्थ का रचनाकाल ई. १२५९-६० माना जाता है। मिन्हाज ने युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है कि, यद्यपि हिन्दूओं की विशालसेना थी, तथापि यवनसेना से वो पराजित हो गई। 'अल्लाह्' ने यवनसेना पर उपकार किया, जिससे हिन्दूओं की सेना पराजित हुई। रायपिथौरा पहले हाथी पर बैठ कर युद्ध लड़ रहा था, उसके पश्चात् वह अश्व पर आरूढ हो कर सरसी प्रदेश तक भाग गया। परन्तु वहाँ वह यवनसैनिकों द्वारा बन्दी बना लिया गया। फिर उसे नरक ('वासिले जहन्नुम्') भेज दिया गया। देहली के गोविन्दराय को भी बन्दी बनया गया और उसका शिरश्छेदन करके घोरी के सम्मुख उसका शिर प्रस्तुत किया गया। घोरी ने उस शिर के दो खण्डित दन्त देखकर जान लिया कि, यह गोवन्दराय ही है। घोरी ने सपादलक्षसाम्राज्य की राजधानी को छोड़कर हांसी, सरसी, दीगर इत्यादि प्रदेशों पर अपना आधिपत्य प्रस्थापित कर दिया। हि.स ५८८ (यवनसंवत्सर) वर्ष में यवनों का यश बढा और घोरी ऐबक् को राजकार्य देकर गझनी प्रदेश गया। कुतुबुद्दीन् ऐबक् ने भी मेरठ इत्यादि स्थानों पर आक्रमण करके अपने आधिपत्य का विस्तार किया।

मीराते मसूदी [143][संपादित करें]

'मीराते मसूदी' ग्रन्थ का लेखक अब्दुर रहमान चिश्ती था। पृथ्वीराज 'अबू जलह' हो गया। ('अबू जलह' = यवनशत्रु, अबू जहल अर्थात्, पैगम्बर मुहम्मद के समय अबू जहल यवनों का घोरशत्रु था। वह इस्लाम्-विरोधी नेता था। पैगम्बर मुहम्मद के साथ उसका युद्ध भी हुआ था। वह 'गजवा-ए-बद्र' नामक युद्ध में पैगम्बर् के हाथों मारा गया। मदीना के स्थल से बद्र नामक स्थान ८० माईल् दूर है[144]। ) घोरी ने 'बैत' स्वीकार करने के लिये पृथ्वीराज को बारं बार कहा। परन्तु पृथ्वीराज ने यब 'बैत' का अङ्गीकार नहीं किया, तब घोरी ने उसकी हत्या कर दी। ('बैत' - अल्लाह् के लिये समर्पण का कोई संस्कार विशेष होता है।)।

फुतुहुस्सलातीन [145][संपादित करें]

'फुतुहुस्सलातीन' ग्रन्थ का लेखक इसामी था। पिथौराराय बन्दी हुए, उसके पश्चात् घोरी के सम्मुख उनको प्रस्तुत किया गया। घोरी ने उसके शिरश्छेदन का आदेश दिया। फुतुहुस्सतालीन ग्रन्थ में केवल इतना ही वर्णनं प्राप्त होता है। परन्तु उसमें 'करवा' नामक कवचन का वर्णन और घोरी के सेनापतिओं के नाम भी प्राप्त होते हैं।

तारिखे फरिश्ता[संपादित करें]

तारिखे फरिश्ता ग्रन्थ का लेखक मुहम्मद कासिम हिन्दू शाह फरिश्ता था। फरिश्ता ईरान-देशीय था। उसके पूर्वज हिन्दू थे। उसके पूर्वज पञ्जाब प्रदेश और अफगानिस्थान प्रदेश के सीमावर्ति प्रदेशों के 'हिन्दू शाहिया' वंश के थे। फरिश्ता के पूर्वजों द्वारा कब 'इस्लाम्' धर्म का अङ्गीकार किया गया? ये प्राप्त नहीं होता। परन्तु ई. १५८२ वर्ष में फरिश्ता अपने पिता के साथ महाराष्ट्रराज्य के अहमदनर के निजाम शाही सुल्तान मुर्तजा निजाम शाह के राजभवन में गया था। तब वह बारह वर्षीय था। वहाँ फरिश्ता के पिता शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए थे। फरिश्ता भी सेना का अङ्ग बन गया। उसके पश्चात् पदोन्नति होते ही वह रक्षकदल का अध्यक्ष बन गया। फरिश्ता 'शिया' नामक पन्थ का यवन था। उसके अहमद-नगर में अधिक मित्र नहीं थे। अतः वह अहमद-नगर को छोड़कर आजीविका के लिये बीजापुर चला गया। बीजापुर में निवास करते हुए इब्राहीम शाह-द्वितीयीत्य के (१५७९-१६२६) आदेश से तवारीख नामक ग्रन्थ की रचना की। ई. १६०६ वर्ष में वह ग्रन्थ पूर्ण पूर्ण हुआ।

नरायन युद्ध का वर्णन जिस ग्रन्थ मेें प्राप्त होता है, उस ग्रन्थ का नाम 'गुलशने-इब्राहिमी' है। वह ग्रन्थ 'तारीखे फरिश्ता' के नाम से ही प्रसिद्ध है। उस ग्रन्थ में उल्लेख है कि, पिथौराराय किञ्चित् दूर गया था, तभी तूर्कसैनिकों ने उसे बन्दी बना लिया। फिर घोरी ने उसका वध कर दिया।

आइने अकबरी[संपादित करें]

आइने अकबरी ग्रन्थ में उल्लिखित है कि, अन्त में राजा (पृथ्वीराजः) युद्ध में बन्दी हुआ। उसके बाद घोरी उनको लेकर गझनी प्रदेश चला गया। चन्द्रबरदायी (चांदा शब्द का उपयोग चन्दबरदायी के लिये 'आइने अकबरी' में हुआ है।) भी अपने स्वामिभक्ति का निर्वाह करने के लिये वहाँ पहुंचा। चन्दबरदायी ने घोरी का विश्वासार्जन करके उसकी सेवा में नियुक्त हुआ। चन्दबरदायी ने प्रयत्नों से पृथ्वीराज के कारगार के विषय में जान लिया और पृथ्वीराज के साथ मन्त्रणा करके उसने पृथ्वीराज को सान्त्वना दी। चन्दबरायी ने पृथ्वीराज को बोला कि, "मैं घोरी के सम्मुख आपकी धनुर्विद्या की प्रशंसा करूँगा और उसे आपका कौशल देखने के लिये सज्ज करूँगा। उस समय आप अवसरानुसार उसे (घोरी को) मार देवें"। चन्दबरदायी की योजना का समर्थन करते हुए पृथ्वीराज धनुर्विद्याकौशल का प्रदर्शन करने के लिये सज्ज हो गये। फिर उन्होंने एक बाण से ही घोरी का वध कर दिया। घोरी की हत्या देखकर उसके सैनिकों ने चन्दबरदायी और पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण कर दिया। अन्त में उन दोनों की हत्या कर दी।

भारतीयस्रोत में जैसे सभी लेखकों का वर्णन भिन्न है, वैसे ही फारसीभाषा के लेखकों का वर्णन भी भिन्न ही है। फारसीग्रन्थों में अनेक लेखकों का मत है कि, पृथ्वीराज की मृत्यु रणक्षेत्र में हुई थी।

भारतीयलेखकों द्वारा और फारसी-लेखकों द्वारा जो कुछ भी वर्णन अपने ग्रन्थों में उपस्थापित किया गया है, उस वर्णन का तुलनात्मक अध्ययन किया गया और उन कथनों को तीन भाग में विभक्त किया गया। प्रत्येक लेखक नरायनयुद्ध की, पृथ्वीराज की मृत्युं की और घोरी की मृत्युं के विषय में भिन्न भिन्न विवरण देते हैं। भारतीयलेखक और फारसीलेखक अपने वर्णनानुसार तीन विभाग में विभक्त हैं।

विवरण के तीन विभाग[संपादित करें]

नरायनयुद्ध के विवरण में जो भारतीयलेखकों और फारसीलेखकों ने विभिन्न वर्णन किये, उन वर्णनों को तीन विभागों में विभाजित किया गया है।

१. गझनी प्रदेश में घोरी के वध के पश्चात् चन्द और पृथ्वीराज का आत्मघात[संपादित करें]

नरायन युद्ध का वर्णन करने वाले एक वर्ग का कन है कि, पृथ्वीराज बन्दी अवस्था में गझनी प्रदेश में थे। फिर उनके मित्र चन्दबरदायी वहाँ पहुँचे। उन दोनों के सम्मिलित प्रयासों से घोरी की मृत्यु हुई। फिर उन दोनों ने आत्मघात कर लिया। पृथ्वीराज रासो काव्य का कथानक यही है। 'आइने अकबरी' का वर्णन पृथ्वीराज रासो काव्य के अनुगुण ही है, परन्तु उस काव्य मे लेखक ने स्थिति का कोई वर्णन नहीं किया है। सुर्जनचरितमहाकाव्य में पृथ्वीराज रासो काव्य के सदृश वर्णन प्राप्त होता है। परन्तु वहाँ रासोकाव्य से अधिक पृथकता दिखती है। सुर्जनचरित के अनुसार घोरी के वध के पश्चात् चन्द और पृथ्वीराज गझनी प्रदेश से सकुशल पलायन करने में सफल हुए। फिर सपादलक्षराज्य में ही उन दोनों की मृत्यु हुई।

२. युद्धक्षेत्र में पृथ्वीराज की मृत्यु[संपादित करें]

एक वर्ग है जिसका कथन है कि, पृथ्वीराज की मृत्यु नरायन युद्ध के समय रणाङ्गण में ही गई थी। उस वर्ग में प्रमुखतया फारसीभाषा के ग्रन्थ 'तबकाते नासिरी', 'फुतुहुस्सलातीन' और 'गुलशने इब्राहिमी' हैं। भारतीयस्रोत में केवल दो ग्रन्थ हैं। विरुद्धविधिविध्वंसः और 'कान्हड दे प्रबन्ध'।

३. अजयमेरुप्रासाद में पृथ्वीराज का वध[संपादित करें]

नरायन के युद्ध में पृथ्वीराज को बन्दी करके घोरी उनको अजयमेरु के प्रासाद में ले गया, फिर पृथ्वीराज ने घोरी के विरुद्ध योजना बनाई, जिसका ज्ञान घोरी को हो गया। उस समय घोरी ने पृथ्वीराज के वध का आदेश दिया ये वर्णन जिन ग्रन्थों में मिलता है, वे इस वर्ग में अन्तर्भूत होते हैं। 'ताजुल मासिर', 'जमीउल हिकायत', 'मीराते मसूदी' और 'जम्मू की तवारिख' इत्यादि फारसीग्रन्थो में एसा वर्णन प्राप्त होता है। भारतीयग्रन्थों में पुरातनप्रबन्धसङ्ग्रहः, प्रबन्धचिन्तामणिः इन दोनों ग्रन्थों का आशयः भी यही है, परन्तु जैनमतानुयायी नयनचन्दसूरि के वर्णन अनुसार अजयमेरुं के कारागार में अनशन से पृथ्वीराज ने प्राणत्याग दिये।

विभिन्न ग्रन्थों के वर्णन के अनुगुण सिद्ध नहीं होता कि, किसकी मृत्यु ?, कहाँ ?, कैसे ? और कब ? हुई थी। परन्तु प्रमाणों के आधार पर ही सिद्ध हो सकता है कि, किसकी मृत्यु ?, कहाँ ?, कैसे ? और कब ? तब हुई थी। अतः क्रम से घोरी की और पृथ्वीराज की मृत्य के प्रमाण का विश्लेषण किया गया[146]

पृथ्वीराज के हाथों से घोरी की मृत्यु ?[संपादित करें]

घोरी की हत्या का काल्पनिक दृश्य

घोरी की मृत्यु गझनी प्रदेश में पृथ्वीराज के हाथों नहीं हुई थी, अपि तु पृथ्वीराज की मृत्यु के पश्चात् चौदह (१४) वर्ष घोरी की उपस्थिति के प्रमाण प्राप्त होते हैं। घोरी की मृत्यु हिन्दूओं ने ही की थी। घोरी की मृत्यु के विषय में अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं।

ताजुल मासिर [147][संपादित करें]

'ताजुल मासिर' ग्रन्थ का लेखक हसन निजामी था। वह अपने ग्रन्थ में उल्लिखित करता है कि, खोखरों (पृथ्वीराज) का दमन करके घोरी वर्षों भारत में रहकर गझनी प्रदेश वापस जा रहा था। जब वह धमेक प्रदेश के समीप पहुंचा, तब वहाँ कुमुद और [[चमेली] जैसे पुष्पों से सुगन्धित उद्यान में शिबिर बनाई। जब घोरी सन्ध्याकालीन ('नमाज') प्रार्थना में रत था, तब कुछ लोग वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने रक्षकों और कर्मकरों को मारकर घोरी की हत्या कर दी।

तारीखे जहांकुशा [148][संपादित करें]

'तारिखे जहांकुश' ग्रन्थ का लेखक अलाउद्दीन जुवैनी था। इस ग्रन्थ का रचनाकाल हि.स. (यवनसंवत्सर) ६५५ (ई. १२५७) माना जाता है। मिन्हाज के 'तबकाते नासिरी' ग्रन्थ से तीन वर्ष पूर्व ही अलाउद्दीन जुवैनी के 'तारीखे जहांकुश' ग्रन्थ की रचना हुई थी। घोरी की मृत्य का वर्णन करते हुए अलाउद्दीन जुवैनी ने लिखा है कि, "हि.स. ६०२ (ई. १२०६) में खुरासान-प्रान्त का विध्वंस करके धन पाकर घोरी ने भारत के ऊपर अनेकबार आक्रमण किया। वह अनेक युद्धों में विजयी होकर अपने सैन्य को धनसम्पन्न करते जा रहा था। झेमल प्रदेश को लाङ्घकर जब वह गझनी प्रदेश की और मार्ग में था, तब उसने 'जिहू'-नदी (सन्धुनदी) के तट पर शिबिर लगाई। उस शिबिर में जब घोरी मध्याह्न काल में निद्राधीन था, तब कुछ हिन्दूओं ने नदी को लाङ्घकर शिबिर पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने शिबिर में उत्पात करके घोरी की हत्या कर दी।

तारिखे फरिश्ता[संपादित करें]

'तारिखे फरिश्ता' पुस्तक का दूसरा नाम 'गुलशने-इब्राहिमी' है। ब्रीग्स् नामक इतिहासविद् ने 'तारिखे फरिश्ता' पुस्तक का अनुवाद किया था। वह अपने पुस्तक में लिखता है कि,

'२ शाबान, हि.स. ६०२' (ई. १४/३/१२०६) दिनाङ्क को घोरी सिन्धनदी (सिन्धुनदी) के तीर पर स्थित रोहतक ग्राम (गाँव) में पहुंचा। वहाँ २० 'गक्खड' (हिन्दू) लोगों का एक समूह घोरी की हत्या के उद्देश से आ पहुंचा। उन हिन्दूओं के सम्बन्धिओं की घोरी ने युद्ध में हत्या कर दी थी। अतः वे प्रतिशोध के लिये बहुत समय से घोरी की हत्या करने के लिये अवसर की प्रतीक्षा में थे। उस दिन उमस भरा (Humidity) वातावरण था। अतः घोरी के आदेश अनुसार सैनिकों द्वारा शिबिर के आवरण (curtain) खुले रक्खे थे, जिस से शिबिर में वायुप्रवाह निर्बाध रहे। फिर घोरी के सेवकों द्वारा जब आवरण अनाच्छादित किया गया, तब हिन्दूओं ने उस सुअवसर को जान लिया। फिर हिन्दू समूह रात्रि में ही सेना के समीप में किसी स्थान पर छुप कर बैठ गया। उसके पश्चात् रात्रि में उन में से किसी एक सदस्य जब शिबिर के द्वार के समीप पहुंचा, तब शिबिर के द्वारपाल ने उसे रोक लिया। उस हिन्दू ने छुरिका (छुरी) के प्रहारों से उस द्वारपाल की हत्या कर दी। वक्ष स्थल (छाती) पर छुरिका के कठोर आघात से द्वारपाल के मुख से चित्कार (चिख) निगली। वो चित्कार सुनकक अन्य सैनिक भी शिबिर के समीप उपस्थित हो गये। परन्तु उस से पूर्व ही हिन्दूओं ने शिबिर के अन्दर प्रवेशकर घोरी की हत्या कर दी।

जब हिन्दूओं ने घोरी के शबिर में प्रवेश किया, तब घोरी निद्राधीन था। घोरी के समीप दो सेवक भी थे। परन्तु हिन्दूओं के हाथ में शस्त्र देखकर वें मूर्तिवत् बैठे रहे। फिर हिन्दूओं ने निद्रामग्न घोरी को मार दिया। घोरी के शरीर पर अनेक व्रण थे। बारह बार से अधिक हिन्दूओं ने छुरिका से प्रहार किये थे। सभी आघात घोरी के शरीर पर प्रत्यक्ष देखे जा सकते थे[149]

उक्त आङ्ग्ल (अंग्रेजी) अनुवाद से भिन्न उल्लेख मूल उर्दू ग्रन्थ में लिखा गया है। इतिहासविदों का मत है कि, इतिहास की घटना में भ्रम उत्पान्न करने के लिये अथवा भ्रमवश अशुद्ध अनुवाद हुआ[146]। 'तारिखे फरिश्ता' नामक ग्रन्थ के मूलसंस्करण में जो वर्णन हुआ है वह इस प्रकार है।

'२ शाबान, हि.स. ६०२' (ई. १४/३/१२०६) दिनाङ्क को घोरी सिन्दुसागर के तट पर स्थित बरमहेक-स्थान पर पहुंचा। वहाँ शिबिर घोरी ने शिबिर बनवाई। फिर दूसरे दिन घोरी की हत्या हुई। वहाँ २० 'गक्खड' (हिन्दू) लोगों का एक समूह घोरी की हत्या के उद्देश से आ पहुंचा। क्योंकि उन हिन्दूओं के सम्बन्धिओं की घोरी ने हत्या करवा दी थी और उनको गृहविहीन कर दिये थे। अतः वे प्रतिशोध की कामना से बहुत समय से घोरी की हत्या के अवसर की प्रतीक्षाया में थे। घोरी यहाँ शिबिर बनाकर रह रहा था, वहाँ किसी प्रकार वो समूह पहुंच गया। उस समय सैनिक आगे जाने के लिये उद्युक्त थे। एक सेवक आवरणों को निकाल कर एकत्रित कर रहा था। उसी समय वे हिन्दू शिबिर में प्रविष्ट हुए। एक हिन्दू ने शिबिर के द्वारपाल पर छुरिका से आक्रमण करके उसकी हत्या कर दी। फिर वह उस स्थान से भागा। द्वारपाल की आहत अवस्था को देखकर अन्य सैनिक भी वहाँ उपस्थित हो गये। जो सेवक अवरणों का सङ्कलन करने में रत था, वह सेवक घोरी के शिबिर का कार्य छोड़कर द्वारपाल के समीप गया। उसी समय हिन्दूंओं ने घोरी की शिबिर में प्रवेश किया। वहाँ दो तीन सेवक घोरी के समीप ही बैठे थे। परन्तु हिन्दूओं के हाथ में शस्त्र देखकर वे मौन ही रहे। घोरी उढकर प्रतिक्रिया दे उससे पूर्व ही हिन्दूओं ने उस पर आक्रमण कर दिया। छुरिका के बाइस (२२) अति कठोर प्रहार उन हिन्दूओं के द्वारा किये गये। अन्त में घोरी की मृत्यु हो गई[150]

 तबकाते नासिरी[संपादित करें]

'तबकाते नासिरी' पुस्तक का रचयिता काजी मिन्हाज था। उसमें उल्लिखित है कि, घोरी जब 'मगरबी नमाज' (सन्ध्याकालीन प्रार्थना) कर रहा था, तब उसकी हत्या हुई[151][152]

फुतुहूस्सलातीन[संपादित करें]

'फुतुहूस्सलातीन' ग्रन्थ में उल्लेख प्राप्त होता है कि, जब घोरी आगन्तुकों के साथ गोष्ठीमग्न था, तभी आगन्तुकों में से एक ने घोरी के ऊपर तलवार से आक्रमण कर दिया। तलवार के एक ही आघात से घोरी की मृत्यु हो गई।

गझनी प्रदेश की मुद्रा[संपादित करें]

घोरी ने गझनी प्रदेश में दो प्रकार की मुद्राएँ प्रकाशित की। सुवर्ण की और रजत की। उस मुद्रा का नाम 'दिरहम' था। घोरी की अनेक मुद्राएँ इतिहासविदों को प्राप्त हुई है। केवल मैशन्, प्रिन्सेप कैबिनेट् स्थान में सङ्गृहीत मुद्राओं का ही उल्लेख अधिक मिलता है। निम्न मुद्राओं का विवरण प्रख्यात मुद्राशास्त्री एडवर्ड् थॉमस् ने १८७१ में लण्डन-नगर में प्रास्तावित किया था।

मैसन कैबिनेट् (ईस्ट् इण्डिया लाइब्रेरी, लंदन)[संपादित करें]

सङ्ख्या १, फिगर् १ (प्लेट् १), स्वर्णधातु, भार ९३ ग्रेन्, गझनीटङ्कशाला (हं.स. ५९२, ई. ११९६)

प्रिन्सेप कैबिनेट् (वोडलियन् म्यूजियम्)[संपादित करें]

धातु – रजत, भार ७४ ग्रेन्, समय हि. ५६९ (१२०० ई.) इस मुद्रा में भी उक्तमुद्रा के जैसे मुद्रण प्राप्त होता है।

उक्त ग्रन्थों में घोरी की मृत्यु के विषय में विविध विवरण प्राप्त होते हैं। कोई कहता हा कि, घोरी मध्याह्नकाल में सोया हुआ था, अन्य कहता है कि, वह सन्ध्या कीलीन उपासना (नमाज) में व्यस्त था। कोई कहता है कि, वह सैन्य यात्रा के लिये सज्जता कर रहा था, कोई कहता है कि वह आगन्तुकों के साथ चर्चामग्न था। आक्रमणकारिओं के विषय में भी सभी के विभिन्न मत हैं। विभिन्न लेखकों के मत का सार है कि, हिन्दू, गक्ख्ड, मुलहिदा, फिदाईयान, खोखर, इस्माइली, करामाता इत्यादि में से कसी वंश में उत्पन्न बीस लोगो ने घोरी की हत्या की थी। उक्त इतिहासकार के वर्णनों में किसका वर्णन सत्य है और किसका असत्य? ये ज्ञान तो प्रमाणों से ही प्राप्त होता है।

इतिहासविदों का मत है कि, घोरी जैसे राजा की हत्या २० लोगो के समूह ने कर दी इस विषय में शङ्का समुद्भव होती है। लाखों सैनिकों के व्यूह में विद्यमान घोरी की हत्या हुई, उस पर किसी सैनिक का ध्यान नहीं था ये वर्णन तर्कसङ्गत नहीं लगता। परन्तु फारसी-ग्रन्थों से प्राप्त प्रमाणों से घोरी की मृत्यु का समय नरायन के युद्ध के पश्चात् चौबीस वर्षों तक सिद्ध होता है। ११९२ वर्ष के मार्च मास की प्रथमदिनाङ्क के पश्चात् घोरी ने गझनी प्रदेश और भारतीयप्रदेशों पर राज्य किया था। उसकी मृत्यु '२ शाबान हि.स. ६०२' (ई. १५/३/१२०६) यवनतिथि पर हुआ था।

घोरी की मृत्यु ऐतिहासिक दृष्टि से अनेक फारसीग्रन्थ समर्थन करते हैं और भारतीयस्रोतों में भी घोरी के चौबीस वर्ष का भारतीयप्रदेशों पर आधिपत्य के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। ढीली-राजावली[153] में प्रमाण मिलता है कि, घोरी ने ११९२+१४=१२०६ ई. पर्यन्त भारतीयप्रदेशों पर राज्य किया था। फिर सिन्धुनदी के तीर पर हिन्दूओं के द्वारा मारा गया [154]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः ११, श्लो. ८" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 
  2. दिल्ली के तोमरवंशीयों के विषय में अन्वेषण करने वाला इतिहासविद् हरिहर निवास के अनुसार पृथ्वीराज और नागार्जुन का युद्ध ई. ११७७ में हुआ था. प॰ पृ. २७०. 
  3. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५८-१६०. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  4. सं. आचार्य श्री जिनविजय. सिङ्घी जैन ग्रन्थमाला. प॰ पृ. १४३. 
  5. हिस्टोरिकल् इन्क्रिप्सन्स् ऑफ् गुजरात. प॰ भाग २, पृ. २१८, पङ्क्ति १८. 
  6. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १९१-१९५. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  7. तारीखे फरिश्ता, उर्दूसंस्ककरणम्. प॰ पृ. २१८. 
  8. सुर्जनचरितमहाकाव्यम्. प॰ अध्यायः १०, श्लो. ११९-१३२. 
  9. मेरुतुङ्गः. प्रबन्धचिन्तामणिः. प॰ पृ. १८९-९०. 
  10. हम्मीरमहाकाव्यं. प॰ सर्गः – ३, श्लो. ६५ - ७२. 
  11. आचार्य मुनि जिन विजयजी (ई. १९३६). सिंघीजैनगन्थमालासङ्ख्या ४. प॰ पृ. ८७. 
  12. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ २६५. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  13. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ ८६. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  14. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः- ७, श्लो- ५०" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 
  15. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः ८" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 
  16. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५१. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  17. प्रो. कीलहार्न्. इण्डियन् एन्टिक्वैरी. प॰ भाग – ५५, खण्ड – १, पृ. ४६. 
  18. जर्नल ऑफ् रॉयल् एशियाटिक् सोसायटी ऑफ् बंगाल. प॰ भाग – २०, पृ. २०१-२१२. 
  19. हरविलास शारदा. स्पीचेज् एण्ड् राइटिंग. प॰ पृ. २६७-२६८. 
  20. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः १, श्लो. ३५, टीका १४,१५,३१" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 
  21. डॉ। गौरीशङ्कर हीराचन्द ओझा. मध्यकालीन भीरतीय संस्कृति. प॰ पृ. १३५-१३७. 
  22. चन्दबरदायी. पृथ्वीराजरासो. प॰ खण्ड १, पृ. ७२९-७४६. 
  23. नयचन्द्र सूरी. हम्मीरमहाकाव्यं. प॰ सर्गः २, श्लो. ७९-९०, पृ. ८५-८६. 
  24. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः ९, श्लो। ८८" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 
  25. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५२-१५३. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  26. तबकाते-नासिरी. जम्मू की तवारिख (राजदर्शिनी) रेवर्टी. प॰ भाग १, पृ. ४६६—६७. 
  27. पृथ्वीराजप्रबन्धः. प॰ पृ. ८६. 
  28. दिल्ली सुल्तनत. प॰ खण्ड १, पृ. १३७. 
  29. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५३. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  30. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ ९७-९८. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  31. Khan, Iqtidar Alam (1996). "Coming of Gunpowder to the Islamic World and North India: Spotlight on the Role of the Mongols". Journal of Asian History 30: 41–5. .
  32. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १०४-१०८. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  33. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १०९-११०. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  34. डॉ॰ बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १११-१२६. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  35. खरतरगच्छ पट्टावली. प॰ पृ. १९. 
  36. पुरातन-प्रबन्ध-सङ्ग्रह. प॰ पृ. ८६. 
  37. डॉ। आर. बी. सिंह. हिस्ट्री ऑफ् चाहमान्स् (सद्यः वो स्थान शिकोहाबाद नगर से जसवन्त नगर के मार्ग में स्थित है। भादान नाम से उत्तर रेल मार्ग का एक रेलस्थानक भी विद्यमान है।). प॰ पृ. १६६-६७. 
  38. मेरुतुङ्गः प्रबन्धचिन्तामणिः. प॰ पृ. ११९. 
  39. जनरल् ऑफ् रॉयल् एशियाटिक् सोसायटी ऑफ् बंगाल. प॰ भाग १७, पृ. ३१३. 
  40. खरतरगच्छपट्टावली. प॰ पृ. २५. 
  41. ओला-ग्रामस्य शिलालेखः
  42. अर्ली चौहान डाइनेस्टीज्. प॰ पृ. ८५. 
  43. भीमदेव का कडीशासनपत्र. इण्डियन् एन्टिक्वैरी. विं.सं १२९५ में लिखित. प॰ भाग ६, पृ. २०५-६. 
  44. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः १०, श्लो. ३९-४१" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा. 
  45. डॉ. एच् सी रे. डायनेस्टीक् हिस्ट्री ऑफ् नार्दर्न् इण्डिया. प॰ खण्ड २, पृ. १०८६. 
  46. मन्त्री, जयानक (1136-1192). "सर्गः ४२, श्लो. ४२
    किम परम परीक्ष्य दीक्षित्वं, क्षमणविद्यौ नर राक्षसां स पापः।
    (व्यसृ) जद जयमेरु भूभृत्कुहर हरेरपि दूतमेकमग्रे।।" (संस्कृतम् में). पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् [पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]. डॉ गौरीशङ्कर होराचन्द ओझा.
     
  47. डॉ. दशरथ शर्मा. अर्ली चौहान डाइनेस्टीज. प॰ पृ. ८९. 
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  126. हिन्दी अनुवादक, सम्पादक और प्रकाशक चन्द्रधर शर्मा (प्राध्यापक हिन्दूविश्वविद्यालय, वारणसी). प॰ ई. १९५२. 
  127. हिन्दी अनुवादक – डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी. सन्दर्भ सिंघीजैनग्रन्थमाला, पुष्पतृतीय. प॰ पृ. १४३-४४. 
  128. सम्पादकः – आचार्य जिविजयजी सिंघीजैनग्रन्थमाला
  129. आचार्य मुनि जिनविजय. राजस्थानप्राच्यविद्याप्रतिष्ठान, जोधपुर. 
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  131. हम्मीरमहाकाव्यं. प॰ सर्गः – ३, श्लो. ५३ - ६४. 
  132. हम्मीरमहाकाव्यं. प॰ सर्गः – ३, श्लो. ७०. 
  133. बाई जुलियस् एगलिंग. कैटलॉग् ऑफ् दि संस्कृत मैन्युस्क्रिप्च् इन् दि लाइब्रेरी ऑफ् इण्डिया ऑपिस्, लण्डन्. कलेक्शन् ऑफ् कोलब्रुक्स्, ग्रन्थसङ्ख्या १४५. प॰ ग्रन्थाङ्कः १५७७, भाग ३, पृ. ४८९-९१. 
  134. डॉ. डी सी गाङ्गुली. इण्डियन् हिस्टोरिकल् क्वार्टर्ली. प॰ भाग १६, पृ. ५८९-९०. 
  135. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ २९७. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  136. नरोत्तमदासः स्वामी, राजस्थानी, कलकत्ता, जनवरी, १९५०, भाग ३, अङ्कः ३, पृ. ४५-४८
  137. प्रो के बी व्यास. राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला. प॰ सङ्ख्या ११, खण्ड ३, पृ. १४६. 
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  140. सम्पादक - नासउ लीस् (ई. १८६४). बिब्लियोथिका इण्डिका. मूलफारसीपाठ. प॰ पृ. १२०. 
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  142. आङ्गानुवादक - मेजर् एच जी रेवर्टी (ई. १९८०). बिब्लियोथिका इण्डिका. रॉयल् एशियाटिक् सोसायटी ऑफ् बंगल, पार्क् स्ट्रीट्, कोलकाता. प॰ पृ. ४६८. 
  143. इलियट् एण्ड् डाउसन्. प॰ खण्ड २, परिशिष्टम्, पृ. ५४८. 
  144. मौलाना सैयद अबूआला मौदूदी. कुरान मजीद (अनुदितपुस्तक). प॰ पृ. ३३. 
  145. मूलफारसीपाठ, आयातसङ्ख्या १४९०-१४९१. प॰ आङ्ग्लानुवाद, पृ. १५२. 
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  147. इलियट् एण्ड् डाउसन्. प॰ भाग २, पृ. २३५-३६. 
  148. इलियट् एण्ड् डाउसन्. प॰ भाग २, पृ. ३८८. 
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  150. तारिखे फरिश्ता. प॰ पृ. २२९. 
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