पृथ्वीराज चौहान

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भारतेश्वर[1] पृथ्वीराज
अन्तिमहिन्दुराजरूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज
अन्तिमहिन्दुराजरूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज
अजयमेरु के दुर्ग में स्थित पृथ्वीराजतृतीय की प्रतिमा
अधिकार
काल १178-११९२
राज्याभिषेक १178
पूर्वज सोमेश्वर चौहान
उत्तराधिकारी हरिराज चौहान
परिवार
पिता सोमेश्वर चौहान
माता कर्पूरदेवी
पुत्र गोविन्द चौहान
राज्ञीयां
  • जम्भावती पडिहारी
  • पंवारी इच्छनी
  • दाहिया
  • जालन्धरी
  • गूजरी
  • बडगूजरी
  • यादवी पद्मावती
  • यादवी शशिव्रता
  • कछवाही
  • पुडीरनी
  • शशिव्रता
  • इन्द्रावती
  • संयोगिता गाहडवाल
सन्तान हरिराज, पृथा
वंश चौहानवंश
जन्म १२/३/१२२० भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार,
१/६/११६३ आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार
पाटण, गुजरातराज्य
मृत्यु ११/१/१२४९ भारतीयपञ्चाङ्ग के अनुसार,
11 मार्च 1192(1192-03-11) (उम्र 28) आङ्ग्लपञ्चाङ्ग के अनुसार
अयमेरु (अजमेर), राजस्थानराज्य
धर्म हिन्दुधर्म

पृथ्वीराज चौहान ( ( सुनें) /ˈprʊθəvɪrɑːjəh xɔːhɑːnə/) (संस्कृत: भारतेश्वरः पृथ्वीराजः, अंग्रेज़ी: Prithviraj Chavhan) (सन् 1178-1192) चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे[2][3] जो उत्तरी भारत में 12 वीं सदी के उत्तरार्ध में अजमेर और दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर राज्य के राजा सोमश्वर के यहाँ हुआ था।[4][5][6][7][8] वे भारतेश्वर [9], पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दुसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा इत्यादि नाम से प्रसिद्ध हैं। भारत के अन्तिम हिन्दुराजा के रूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज १२३५ विक्रमसंवत्सर में पंद्रह वर्ष (१५) की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ हुए। अतः उनकी माता कर्पूरदेवी ही उस अल्पवयस्क पृथ्वीराज के स्थान पर संरक्षिका के रूप में राज्यकार्यों का वहन करती थी।

पृथ्वीराज की तेरह रानीयां थी। उन में से संयोगिता प्रसिद्धतम है। अन्य जाङ्गलु, पद्मावती, चन्द्रावती भी प्रसिद्धि को प्राप्त हुई। भारतसम्राट् के रूप में जब पृथ्वीराज सिंहासनारूढ हुए, तब उन्हें अल्पवयस्क जानकर सपादलक्षसाम्राज्य के अनेक सामन्तों और प्रतिवेशी राज्याों ने विद्रोह कर दिया। उनमें प्रप्रथम नागार्जुन था। नागार्जुन चौहान विग्रहराज का पुत्र था। ११७७ वर्ष में पृथ्वीराज ने उसके विद्रोह का दमन किया। उस युद्ध में भादानकदेशीय शासक, जेजाकभुक्तिप्रदेश का शासक और चालुक्यवंश ने नागार्जुन की सहायता की थी। यद्यपि सम्पूर्ण सपादलक्षसाम्राज्य के शासन को प्राप्त करने के लिए उन सर्व ने षडयंत्र करके सैन्यबल द्वारा और धनबल द्वार आक्रमण किया था, फिर भी पृथ्वीराज ने नागार्जुन का दमन किया।

नागार्जुन की सहायता जिन शासकों ने की थी, उनको उनके षडयंत्र का उत्तर देने के लिए पृथ्वीराज ने दिग्विजयाभियान आरंभ किया। उस दिग्विजय अभियान में पृथ्वीराज ने ११७७ वर्ष में भादानकदेशीय को, ११८२ वर्ष में जेजाकभुक्तिशासक को और ११८३ वर्ष में चालुक्यवंशीय शासक को पराजित किया। इन्हिं वर्षों में भारत के उत्तरभाग में घोरी नामक गौमांस भक्षण करने वाला योद्धा अपने शासन और धर्म के विस्तार की कामना से अनेक जनपदों को छल से या बल से पराजित कर रहा था। उसकी शासनविस्तार की और धर्मविस्तार की नीत के फल स्वरूप ११७५ वर्ष से पृथ्वीराज का घोरी के साथ सङ्घर्ष आरंभ हुआ। उसके बाद ११७८ वर्ष में घोरी ने गुजरातराज्य के उपर आक्रमण करने के लिए पृथ्वीराज की सहायता भी मांगी। परन्तु पृथ्वीराज के मन में घोरी के प्रति घृणा भाव था और पृथ्वीराज के मत से चालुक्यवंश के साथ उसका सङ्घर्ष गृहसङ्घर्ष था। उस गृहसङ्घर्ष का लाभ उठा कर कोई वैदेशीक, गौमांसभक्षी भारत के उपर आक्रमण करें ये पृथ्वीराज नहीं चाहते थे।

यद्यपि पृथ्वीराज ने घोरी की सहायता नहीं की, फिर भी घोरी गुजरातराज्य पर आक्रमण करने के लिए गया। उस युद्ध में घोरी की लज्जास्पद पराजय हुई। तब से घोरी पृथ्वीराज का परमशत्रु बन गया। यतो हि घोरी का मत था कि, पृथ्वीराज ने यदि मेरी सहायता की होती, तो मेरी विजय हो जाती। उसके बाद अनेक लघु और मध्यम युद्ध पृथ्वीराज के और घोरी के मध्य हुए। उनके बीच हुए युद्ध की सङ्ख्या का उल्लेख अनेक ग्रन्थों में प्राप्य है। उन सभी युद्धों में घोरी की पराजय हुई। विभिन्न ग्रन्थों में जो सङ्ख्याएं मिलती है, वे सङ्ख्या ७, १७, २१ और २८ हैं। सभी युद्धों मेें पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बनाया और उसको छोड दिया। परन्तु अन्तिम बार नरायन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय के बाद घोरी ने पृथ्वीराज को बन्दी बनाया और कुछ दिनों तक 'इस्लाम्'-धर्म का अङ्गीकार करवाने का प्रयास करता रहा। उस प्रयोस में पृथ्वीराज को शारीरक पीडाएँ दी गई। शरीरिक यातना देने के समय घोरी ने पृथ्वीराज को अन्धा कर दिया। अन्ध पृथ्वीराज ने शब्दवेध बाण से घोरी की हत्या करके स्वपराजय का प्रतिशोध लेना चाहा। परन्तु देशद्रोह के कारण उनकी वो योजना भी विफल हो गई। एवं जब पृथ्वीराज के निश्चय को परिवर्तित करने में घोरी अक्षम हुआ, तब उसने अन्ध पृथ्वीराज की हत्या कर दी।

एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।

शरीरेण समं नाशं सर्वम् अन्यद्धि गच्छति । । ८.१७ । । मनुस्मृतिः

अर्थात्, धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मरणोत्तर भी साथ चलता है। अन्य सभी वस्तुएं शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती हैं।

इतिहासविदों के मत अनुसार पृथ्वीराज ने उक्त श्लोक का अन्तिम समय पर्यन्त आचरण किया [10]

जन्म और परिवार[संपादित करें]

१२२० विक्रमसंवत्सर ज्येष्ठमास कृष्णपक्ष की द्वादशी (१२/३/१२२०) तिथि को गुजरातराज्य के पाटण पत्तन में पृथ्वीराज का जन्म हुआ[11] । क्रिस्तवर्ष के अनुसार ११६३ जून-मास के प्रथम (१/६/११६३) दिनाङ्क को पृथ्वीराज का जन्म हुआ। पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य में ये उल्लेख मिलता है।

ज्येष्ठत्वं चरितार्थतामथ नयन-मासान्तरापेक्षया,

ज्येष्ठस्य प्रथयन्परन्तपकया ग्रीष्मस्य भीष्मां स्थितिम् ।
द्वादश्यास्तिथि मुख्यतामुपदेशन्भोनोः प्रतापोन्नतिं,
तन्वन्गोत्रगुरोर्निजेन नृपतेर्यज्ञो सुतो जन्मना ।। सप्तमसर्गः, श्लो. ५०, पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् ।।

तब पाटण पत्तन अण्हिलपाटण के नाम से प्रसिद्ध था। तथा पाटण न केलव महानगर था, अपि तु गुजरातराज्य की राजधानी भी था। पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर, माता कर्पूरदेवी थे। पृथ्वीराज के अनुज का नाम हरिराज, छोटी बहन का नाम पृथा था। पृथ्वीराज की तेरह रानीयां थी। पृथ्वीराज का एक पुत्र था, जिसका नाम गोविन्द था।

नामकरण और बाल्यकाल[संपादित करें]

इतिहास में वर्णन मिलता है कि, पुत्र के जन्म के बाद पिता सोमेश्वर स्वपुत्र का भविष्यफल बताने के लिए राजपुरोहितों को निवेदन करता है। उसके बाद बालक का भाग्यफल देख कर राजपुरोहितो ने "पृथ्वीराज" नामकरण किया । पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य में नामकरण का उल्लेख प्राप्त है -

पृथ्वीं पवित्रतान्नेतुं राजशब्दं कृतार्थताम् ।

चतुर्वर्णधनं नाम पृथ्वीराज इति व्यधात् ।। ३० ।। पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यं, सर्गः ८

पृथ्वी को पवित्र करने के लिए और "राज" शब्द को सार्थक बनाने के लिए इस राजकुमार का नामकरण "पृथ्वीराज" इति । 'पृथ्वीराजरासो' काव्य में भी नामकरण का वर्णन करते हुए चन्द्रवरबदाई लिखते हैं –

यह लहै द्रव्य पर हरै भूमि ।

सुख लहै अंग जब होई झूमि ।।

पृथ्वीराज नामक बालक महाराजाओं के छत्र स्वबल से हर लेगा। सिंहासन की शोभा को बढाएगा अर्थात् कलियुग में पृथिवी में सूर्यसमान देदीप्यमान होगा ।

कुमारपाल के शासन में चालुक्यों के प्रासाद में जन्मा पृथ्वीराज बाल्यावस्था से ही वैभवपूर्ण वातावरण में बड़ा हुआ। वैभवसम्पन्न प्रासाद में पृथ्वीराज के परितः परिचायिकाओं का बाहुल्य था । दुष्टग्रहों से बालक की रक्षा करने के लिए परिचायिकाएं भी विभिन्न मार्गों का अवलम्बन करती थी । पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य में महाकवि जयानक द्वारा ये वर्णन प्राप्त है।

दशावतार मुद्रित कण्ठाभरण और दुष्टग्रहो से रक्षा के लिए व्याघ्रनख से निर्मित आभरण परिचायिकाओंने बालका को पहनाया था (व्याघ्र के नख को धारण करना मङ्गल मानते हैं। अतः राजस्थान में परम्परागत रूप से व्याघ्र के नख को सुवर्ण के आभरण में पहनते थे।) ।

बालक के कृष्ण केश और मधुकरवाणी मन को मोहित करते थे। सुन्दर ललाट पर किया गया तिलक बालक के सौन्दर्य में और वृद्धि कर रहा था। उज्जवल दन्त हीरक जैसे आभायुक्त थे । नेत्र में किया गया अञ्जन आकर्ष बढाता था। घुटनों द्वारा जब बालक यहाँ वहाँ घुमता था, तब उसके वस्त्र धूलिकामय होते थे। खेलते हुए पुत्र को देख कर माता कर्पूरदेवी अपने पुत्र का कपोल चुम्बति थी।

मनिगन कंठला कंठ मद्धि, केहरि नख सोहन्त

घूंघर वारे चिहूर रुचिर बानी मन मोहन्त
केसर समुंडि शुभभाल छवि दशन जोति हीरा हरन ।
नह तलप इक्क थह खिन रहत, हुलस हुलसि उठि उठि गिरत ।।
रज रंज्जित अंजित नयन घुंटन डोलत भूमि ।
लेत बलैया मात लखि भरि कपोल मुख चूमि ।।

इस प्रकार अण्हिलपाटण के सहस्रलिङ्गसरोवर और अलङ्कृत सोपानकूप के मध्य में स्थित राजप्रासाद के विशालभूभाग में पृथ्वीराज का बाल्यकाल व्यतीत हुआ।

अभ्यास[संपादित करें]

चालुक्यवंश के प्रासाद से जब सोमेश्वर अजमेरू-प्रदेश गए, तब उनके साथ उनकी पत्नी कर्पूरदेवी, दो पुत्र पृथ्वीराज और हरिराज थे। १२२६ विक्रमसंवत्सर में [12] गुजरातराज्य से जब सोमेश्वर अजमेरू-प्रदेश में स्थानान्तरित हुए, तब पृथ्वीराज की आयु पांच वर्ष थी। पृथ्वीराज का अध्ययन अजयमेरू-प्रासाद में और विग्रहराज द्वारा स्थापित सरस्वतीकण्ठाभरणविद्यापीठ में (आज कल वो विद्यापीठ 'ढाई दिना का झोपडा' नामक 'मस्जिद्' है) हुआ। प्रासाद का और विद्यापीठ के प्राङ्गण में युद्धकला और शस्त्रविद्या का ज्ञान पृथ्वीराज ने प्राप्त किया। यद्यपि आदिकाला से ही शाकम्भरी के चौहाणवंश स्रामाज्य की राजभाषा संस्कृतम् थी, तथापि अन्य भाषाओं में भी वाग्व्यवहार होता था। परन्तु संस्कृत आदिकाल से शाकम्भरी की राजभाषा थी ये प्राप्त शिलालेखों से सिद्ध होता है। विग्रहराज द्वारा और उनके राजकवि द्वारा रचित ग्रन्थों से भी अपने संस्कृत ज्ञान का प्रदर्शन किया है। विग्रहराज के राजकवि सोमदेव ने 'ललितविग्रहराजः' नामक नाटक की रचना की थी। उस नाटक में उन्होंने प्रचल छः भाषाओं का कुशलता से उपयोग किया। शिला लेखों के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि, चौहानवंश के काल में मुख्यतया छः भाषाए प्रचलित थी। वे इस प्रकार है - संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंशभाषा[13][14][15][16]

पृथ्वीराजविजय में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज चौहान छओं भाषा में निपुण थे [17][18]। छः भाषाओं के अतिरिक्त पृथ्वीराज ने मीमांसा, वेदान्त, गणित, पुराण, इतिहास, सैन्यविज्ञान और चिकित्साशास्त्र का भी ज्ञान प्राप्त किया था। वह सङ्गीतकला और चित्रकला में भी प्रवीण थे [19][20]। पृथ्वीराजरासोकाव्य में उल्लेख है कि, धनुर्विद्या में पारंगत पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण को चलाने में भी सक्षम हो गए थे। पृथ्वीराज अश्व नियन्त्रण विद्या और गज नियन्त्रण विद्या में विचक्षण थे।[21] । इस प्रकार विविध विद्याओं के अर्जन करते हुए पृथ्वीराज तरुणावस्था को प्राप्त हुए।

सोमेश्वर की मृत्यु और पृथ्वीराज का राज्याभिषेक[संपादित करें]

सोमेश्वर का अन्तिमशिलालेख आंवल्दा से प्राप्त होता है। वो शिलालेख १२३४ विक्रमसंवत्सर भाद्रपदमास की शुक्ल चतुर्थी (४/६/१२३४) को शुक्रवासर के दिन प्रस्थापित किया गया था। क्रिस्तगणानानुसार अठ्ठारा अगस्त ११७८ (१८/८/११७८) दिनाङ्क को वह शिलालेख प्रस्थापित किया गया। उसी संवत्सर में पृथ्वीराज का प्रप्रथम शिलालेख बडल्या से प्राप्त होता है। वो शिलालेख १२३५ विक्रमसंवत्सर चैत्रमास के शुक्ल चतुर्थी पर प्रस्थापित हुआ था। क्रिस्त गणानानुसार चौदह मार्च-मासस्य ११७९ (१४/३/११७९) दिनाङ्क को वह शिलालेख प्रस्थापित हुआ था। सोमेश्वर के निधन के बाद पृथ्वीराज का राज्याभिषेक हुआ।

पृथ्वीराजरासोकाव्य में उल्लेख है कि,

मृगशिरा नक्षत्र व सिद्धयोग में कुमार पृथ्वीराज, राजा पृथ्वीराज बने ।

शुभमुहूर्त में पृथ्वीराज स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ हुए। ब्राह्मणों ने वेदमन्त्र गान के साथ उनका राजतिलक किया। पृथ्वीराज के राज्याभिषेक के अवसर पर प्रासाद की शोभा आह्लादिक थी। सभी सामन्तों द्वारा जयघोषा हुआ और राजधानी में शोभायात्रा हुई। शोभायात्रा में हाथी पर आरूढ पृथ्वीराज के ऊपर नगरजनों ने पुष्पवर्षा की। सभी पृथ्वीराज की दीर्घायुष्य की प्रार्थना कर रहे थे। १२३५ विक्रसंवत्सर में पृथ्वीराज पंद्रह वर्ष (१५) के हुए। अतः माता कर्पूरदेवी ही अल्पवयस्क पृथ्वीराज की संरक्षिका के रूप में राज्यकार्य का वहन करती थी।

शासनव्यवस्था [22][संपादित करें]

सेनापति[संपादित करें]

१. स्कन्द – ये गुजरातराज्य के नागर ब्राह्मण थे। वे सेनापति के साथ साथ साम्राज्य के दण्डनायक भी थे।

२. भुन्नेकम्मल्ल – कर्पूरदेवी के चाचा थे।

३. उदयराज

४. उदग – मेडता-प्रदेश के सामन्त थे।

५. कतिया – वीकमपुर के मण्डलेश्वर थे।

६. गोविन्द – कुत्रचित् उल्लेख मिलता है कि, ये नरायन के द्वितीययुद्ध में मुहम्मद घोरी द्वारा मारे गए। परन्तु जम्मू से प्राप्त एक शिलालेख में उल्लिखित है कि, जम्मू-प्रदेश के नरसिंह नामक राजकुमार ने इनकी हत्या की थी।

७. गोपालसिंह चौहान – देदरवा-प्रान्त के सामन्त थे।

मन्त्री[संपादित करें]

१. पं. पद्मनाभ - इनकी अध्यक्षता में अन्य मन्त्री भी थे। पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य के लेखक जयानक, विद्यापति गौड, वाशीश्वर जनार्दन, विश्वरूप और रामभट्ट। रामभट्ट ही चन्दबरदायी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ही पृथ्वीराजरासोकाव्यं की रचना की थी।

२. प्रतापसिंह (इसने पृथ्वीराज के साथ द्रोह किया था। पृथ्वीराज को जब घोरी द्वारा अन्धा किया गया था, तब प्रतापसिंह के साथ मिल कर पृथ्वीराज घोरी को बाण से मारना चाहते थे । परन्तु इस प्रतापसिंह ने घोरी को पृथ्वीराज की योजना बता दी।)

३. रामदेव

४. सोमेश्वर

सेना[संपादित करें]

पृथ्वीराज की सेना में अश्व सेना का महत्त्व अधिक था। परन्तु हस्तिसेना और पदाति सैनिकों की भी मुख्यभूमिका रहती थी। पृथ्वीराज जब राजा बने, तब आरम्भिक काल में उनकी सेना में ७०,००० अश्वारोही सैनिक थे। जैसे जैसे सैन्याभियान में पृथ्वीराज की विजय होती गई, वैसे वैसे सेना में भी वृद्धि होती गई। नरायनयुद्ध में पृथ्वीराज की सेना में २,००,००० अश्वारोही सैनिक, पाँच सौ गज, अनेक पदातिसैनिक थे[23] । फरिश्ता-नाम लेखक के अनुसार पृथ्वीराज की सेना में २ लाख अश्वारोही सैनिक और तीन सहस्र गज थे[24]। डॉ. शर्मा फरिश्ता द्वारा उद्धृत संख्या का समर्थन करते हैं[25]

रानीयां[संपादित करें]

क्रम

पृथ्वीराज की वय

रानीओं के नाम

११

जम्भावती पडिहारी

१२

पंवारी इच्छनी

१३

दाहिया

१४

जालन्धरी

१५

गूजरी

१६

बडगूजरी

१७

यादवी पद्मावती

१८

यादवी शशिव्रता

१८

कछवाही

१०

२०

पुडीरनी

११

२१

शशिव्रता

१२

२२

इन्द्रावती

१३

२६

संयोगिता गाहडवाल

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य के दशम सर्ग के उत्तरार्ध में उल्लेखः मिलता है कि, पृथ्वीराज की अनेक रानीयां थी। परन्तु वे कितनी थी? कौन से प्रदेश की राजकुमारीयां थी? ये उल्लेख वहाँ नहीं है। पृथ्वीराजरासोकाव्य में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज जब ग्यारह वर्षीय थे, तब उनका प्रप्रथम विवाह हुआ था। उसके बाद प्रतिवर्ष उनका एक एक विवाह हुता गया। जब तक पृथ्वीराज बाईस वर्षीय (२२) न हुए। उसके बाद पृथ्वीराज जब छत्तीस वर्षीय हुए, तह उनका अन्तिम विवाह संयोगित के साथ हुआ।

पृथ्वीराज का प्रप्रथम विवाह मण्डोर-प्रदेश की नाहड राव पडिहार की पुत्री जम्भावती के साथ हुआ था। पृथ्वीराजरासोकाव्य के हस्तप्रत में केवल पांच रानीओ के नाम हैं। वे इस प्रकार है - जम्भावती, इच्छनी, यादवी शशिव्रता, हंसावती और संयोगिता । पृथ्वीजरासोकाव्य की लघु हस्तप्रत में केवल दो नाम हैं । वे इच्छनी और संयोगिता हैं। और सब से छोटी हस्तप्रत में केलव संयोगिता का ही नाम उपलब्ध है। एवं संयोगिता का नाम सभी हस्तप्रतों में उपलब्ध है।

जाङ्गलू [26][संपादित करें]

चौहानवंश ने जिस भूभाग में अपना राज्य स्थापित किया, उस भूभाग का नाम जाङ्गल था। उस प्रदेश की राजधानी अहिच्छत्रपुर थी। सद्यः उसका नाम नागौर है। वह नागौर नगर आज देशनोक नाम से प्रसिद्ध है। देशनोक नगर बीकानेर से उत्तरदिशा में ३२ कि.मी. दूर स्थित है। देशनोक से सोलह कि.मी. दूर है जाङ्गलू गाँव। वहाँ से १२३३ विक्रमसंवत्सर में लिखित एक शिलालेख प्राप्त होता है। उस शिलालेख के अनुसार उस ग्राम का प्राचीन काल में जाङ्गकूपदुर्ग और अजयपुर नाम थे। ११७६ विक्रमसंवत्सर में लिखित एक शिलालेख में उल्लिखित है कि, जाङ्गकूपदुर्ग नामक ग्राम की स्थापना पृथ्वीराज प्रथम द्वारा हुई थी। उस ग्राम से पृथ्वीराज के नाम्न की मुद्राएं भी प्राप्त हुई। जाङ्गलकूपदुर्ग ग्राम की स्थापना के बाद कुछ दिनों में ही गजनी प्रदेश के राजा अर्सलान द्वारा जाङ्गलकूपदुर्ग ग्राम को ध्वस्ति किया गया।

बीकानेर नगर का अनूपसंस्कृतपुस्तकालय में सोलहवी शताब्दी की हस्तप्रत प्राप्य हैं। उनके अनुसार चौहानसाम्राज के अमुक भाग में दहियाराजपूतों का लघु ग्राम था। दहिया राजपूतवंश की एक राजकुमारी पृथ्वीराज को प्रेम करती थी। वह उनके साथ विवाह करने की इच्छुक थी। उसका नाम अजिया था। एक बार अपने रक्षकों के साथ पृथ्वीराज को मिलने के लिए वह अजमेरू नगर जा रही थी। मार्ग में ध्वस्त जाङ्गलू ग्राम आता है। उस ध्वस्त ग्राम को देख कर वह दुःखी हो गई । उसके बाद उसने उसी भूमि में एक नवीन ग्राम की रचना की । उस ग्राम का नाम अजियापुर था। अजिया पृथ्वीराज तो पृथ्वीराज से मिलने जा ही रही थी, परन्तु पृथ्वीराज भी आखेट का बहाना करके जाङ्गलू प्रदेश के वन में गये थे। वे अजिया को अपनी राजधानी ले गए। उसके बाद उन दोनों का विवाह हुआ। दहिया नामक नगर के स्मारकों में आज भी अजिया के प्रासाद की गणना होती है। आज भी प्रवासी उस प्रासाद के दर्शन कर के ऐतिहासिक घटना का अनुमान करते हैं।

पद्मावती साङ्खली [27][संपादित करें]

पृथ्वीराजरासो काव्य में 'पद्मावतीसमयः' नामक आख्यान भी प्राप्य है। रासोकाव्य के अनुसार पूर्वदिश में समुद्रशिख नामक प्रदेश था। वहाँ यादव वंशीय के विजयपाल नाम राजा का शासन था। उसकी पत्नी का नाम पद्मसेन था। उन दोनों की पुत्री पद्मावती थी। पद्मावती एक दिन राजभवन के उद्यान में विचरण कर रही थी। उस समय उसके द्वारा एक शुक को देखा गया। वह शुक अत्यन्त आकर्षक था। वह शुक भी पद्मावती के रक्त अधर को बिम्बाफल मान कर उसे खाने के लिए आगे बढा। उसी समय पद्मावती ने शुक को अपने हाथ में ग्रहण किया। वह शुक मानव भाषा का ज्ञाता था। वह पद्मावती का मनोरञ्जन करने के लिए अनेक कथा सुनता रहा। उसके बाद पद्मावती ने जिज्ञासावश शुक को पुछा कि, "हे शुकराज ! आप कहां निवास करते हैं? आपके राज्य का राजा कौन है?" तब पद्मावती की जिज्ञासा के उपशमन के लिए शुक ने विस्तार पूर्वक अपने राज्य और पृथ्वीराज का वर्णन आरंभ किया।

हिंदवान थान उत्तम सुदेश, तह उगत द्रुग दल्ली सुदेष ।

संभरि नरेश चहुंवान थान, प्रीथिराज तहां राजंत भान ।।
वैसह वरिस षोजस नरिदं, आजानुबाहु भुवलोक यदं ।
संभपि नरेश सोमेस पूत, देवंत रूप अवतार धूत ।।
सता मसूंर सब्बे अपार, भूजान भीम जिस सार भार ।
तिहि पकरि शाह साहाबदीन, तिहु बेर करिन पानीप हीन ।।
सिंगिनि सुसद गुने चढ़ि जंजीर, चुक्के न शबद बेधंत तीर ।
बल बेल करन जिमि दान मान, सहस शील बहिचंद समान ।।
दस चारि सब काल भूप, क्रन्दप्प ज्ञान अवतार रूप ।।

हिन्दूओं का उत्तमप्रदेश हिन्दुस्थान है। वहाँ सुन्दर देहली नगरी है। उस नगर का अधिपति चौहानवंशीय राजा पृथ्वीराज है। सोलह वर्षीय पृथ्वीराज इन्द्रवत् पराक्रमी है। साकम्भरिनरेश सोमेश्वर के पुत्र देव का रूप धारण करके पृथिवी में उतरे हैं। उनके सभी सामान्त अत्यन्त पराक्रमी हैं। पृथ्वीराज की भुजा में भीमसेन के समान बल है। पृथ्वीराज तीन बार शहाबुद्दीन घोरी नाम राजा को पराजित कर चुके हैं। उनके धनुष के प्रत्यञ्चा की ध्वनि अतीव भयानक होती है। वह शब्दभेदी बाण चलाने में समर्थ है। पृथ्वीराज वचनपालन में बलि, दान में कर्ण, सत्कार्यों में विक्रमादित्य और आचरण में हरिश्चन्द्र के समान है । कलियुग में दुष्टों का संहार करने के लिए उनका जन्म हुआ है। चौदह कलाओं से सम्पन्न वह कामदेव के समान पृथ्वी पर अवकरित हुए हैं।

शुक के मुख से पृथ्वीराज की प्रशंसा सुन कर यादव कुमारी पद्मावती का मन पृथ्वीराज के प्रति अनुरक्त हो गया। परन्तु यौवन प्राप्त पद्मावती का विवाह विजयपाल ने कुमुदमणि की साथ निर्धारित कर दिया था। कुमुदमणि कुमाऊँ-प्रदेश का राजा था। समुद्रशिखर प्रदेश में राजकुमारी का विवाह की सज्जता हो रही थी। दुसरी तरफ अपने विवाह के समाचार सुनकर पद्मावती व्याकुल थी। उसके बाद वह शुक को बोली, "हे कीर ! शुक ! आप शीघ्र ही देहली जाकर मेरे प्रिय पृथ्वीराज को यहाँ बुला लाईए"। उसके बाद पद्मावती ने शुक को एक पत्र दिया।

हे क्षत्रिय कुलभूषण ! में तन मन से आपको प्रेम करती हूँ। यदि आप मुझे और मेरे कुल को वरणयोग्य मानते हैं, तो मेरा पाणिग्रहण कर के मेरे प्राणों की रक्षा करें। ११३० शकसंवत्सर के वैशाखमास की शुक्लद्वादशी तिथि को मेरा विवाह निश्चित है। अतः उससे पूर्व आकर श्रीकृष्ण ने जैसे रुक्मिणी का हरण किया था, वैसे ही मेरा हरण कर के मुझे कृतार्थ करें।

--- पद्मावती

शुक ने वायुवेग से देहली जा कर पृथ्वीराज को पत्र दिया। पत्र पढ़कर पृथ्वीराज ने सामन्तों के साथ समुद्रशिखर नगर की ओर यात्रा प्रारम्भ की। दुसरी तरफ कुमुदमणि ने कुमाऊँ से वरयात्रा प्रारम्भ की। पृथ्वीराज समुद्रशिखर जा रहा है ये समाचार प्राप्त करके मुहम्मद घोरी ने भी समुद्रशिखर की ओर यात्रा आरंभ की। उसके बाद समुद्रशिखर जा रहे कुमुदमणि के आगमन का समाचार सुन कर पद्मावती अति व्याकुला हो गई। क्योंकि पृथ्वीराज के आगमन का समाचार उसे नहीं मिला था। अतः वह प्रासाद के वातायन पर बैठ कर मार्ग को विह्वल मन से देखती हुई प्रतीक्षा करते हुए रो रही थी। उसी समय शुक आकर उसे बोला, "हे सुन्दरि ! तेरे प्रियतम समीप के शिव मन्दिर में हैं। तुम शीघ्र ही वहाँ जोओं" । शुक का वचन सुन कर पुनर्जीवन प्राप्त पद्मावती के नेत्रे अचानक चमत उठे। नवीन वस्त्र धारण कर सुगन्धित जल से स्नान कर षोडशशृङ्गार करके अपनी सखिओं के साथ वह स्वर्णस्थालिका में दीप लेकर शिवालय गई। शिवालय पहुंच कर शिव पार्वती की पूजा करके पृथ्वीराज की ओर गई। उसके बाद अपने मुखावरण को हटा कर वह मुग्ध हो कर पृथ्वीराज के सौन्दर्य को देखती रही। पृथ्वीराज भी थोडा आगे जाकर पद्मावती समीप खडे हो गये। मन्दिर का वह दृश्य देख कर पद्मावती की सखियां साश्चर्य चकित होकर पद्मावती को और पृथ्वीराज को देख रही थी। क्योंकि पद्मावती और पृथ्वीराज के प्रणय के विषय में शुक को छोड कर कोई भी नहीं जानता था।

उसके बाद पृथ्वीराज ने पद्मावती का हाथ अपने हाथ में लेखकर अश्वारोहण किया । देहली की ओर पृथ्वीराज और पद्मावती की यात्रा का आरम्भ होते ही समुद्रशिखरनगर में सर्वत्र पद्मवातीहरण का समाचार फेल गया। विजयपाल और कुमुदमणि पृथ्वीराज के साथ योद्ध करन के लिए पृथ्वीराज के पीछे गए। विजयपाल और कुमदमणि के आगमन का समाचार सुन कर पृथ्वीराज ससामन्त युद्ध के लिए सज्ज हो गए। उसके बाद विनाशक युद्ध में विजयी पृथ्वीराज ने देहली की ओर यात्रा आरम्भ की। परन्तु मार्ग में मुहम्मद घोरी ने अपने सैनिकों के साथ पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण कर दिया। परन्तु घोरी की सेना की घोर पराजय हुई। उसके सभी सैनिक यहां वहाँ पलायन कर रहै थै और पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना कर देहली की ओर प्रयाण किया। देहली पहुंच कर दुर्गा के मन्दिर में शुभमुहूर्त में पृथ्वीराज ने पद्मावती के साथ विवाह कर लिया।

इतिहासविदों का मत है कि, साहित्यिक दृष्टी से उक्त कथा का महत्त्व है, परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से उक्त कथा का महत्त्व नहीं है। क्योंकि इतिहास में कही पर समुद्रशिखर नामक दुर्ग का और उसके राजा विजयपाल का उल्लेख प्राप्य नहीं है। दोनों नाम काल्पनिक हैं। इतिहासविदों का मत है कि, ये कथा कोई पुराण कालीन प्रसिद्ध कथा होगी, जिसका अवलम्बन करके अज्ञातव्यक्ति ने पृथ्वीराजरासोकाव्य में प्रक्षेप किया हो।

चन्दबरदायी ने उक्त कथा की रचना नहीं की है इसका द्वितीय प्रमाण है कि,

बानं नाल हथनालि, तपुह तीरह स्रव सज्जिय

अर्थात् 'तोप' द्वारा (शतघ्नी) चोरों दिशा में धुआँ हो गया। परन्तु भारतीय इतिहास में १५२६ (ई.) वर्ष के अप्रैल-मास की बीसवी (२०/४/१५२६) दिनाङ्क को पानीपत-क्षेत्र के युद्ध में ही तोप का उपयोग हुआ था [28] । यद्यपि इस कथा में ऐतिहासक तथ्य नहीं है, तथापि कथा में पृथ्वीराज और पद्मावती के पात्र तो योग्य ही हैं। १२३६ विक्रमसंवत्सर के आषाढमास की शुक्लदशमी बुधवासर को लिखित एक शिलालेख पोकरण से प्राप्त हुआ है । उस में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज की आज्ञा से 'कतिया' नामक मण्डलेश्वर ने विजयपुर के लोकेश्वरमन्दिर में पिहिलापाउल नामक ग्राम का दान किया था। ग्राम के साथ तडाग, ग्राम के चोरो ओर के विशाल वन भी उसने दान में दिये थे। पद्मावती पाल्हण नामक परमारवंशी की पुत्री थी। कतिया नामक मण्डलेश्वर पद्मावती का भाई था।

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेमकथा[संपादित करें]

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेमकथा राजस्थान के इतिहास में स्वर्ण से अंकित है। वीर राजपूत जवान पृथ्वीराज चौहान को उसके नाना ने गोद लिया था। वर्षों दिल्ली का शासन सुचारु रूप से चलाने वाले पृथ्वीराज को कन्नौज के महाराज जयचंद की पुत्री संयोगिता भा गई। पहली ही नजर में संयोगिता ने भी अपना सर्वस्व पृथ्वीराज को दे दिया, परन्तु दोनों का मिलन इतना सहज न था। महाराज जयचंद और पृथ्वीराज चौहान में कट्टर दुश्मनी थी।

राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर आयोजित किया गया, जिसमें पृथ्वीराज चौहान को नहीं बुलाया गया तथा उसका अपमान करने हेतु दरबान के स्थान पर उनकी प्रतिमा लगाई गई। ठीक वक्त पर पहुँचकर संयोगिता की सहमति से महाराज पृथ्वीराज ने उसका अपहरण कर लिया और मीलों का सफर एक ही घोड़े पर तय कर अपनी राजधानी पहुँचकर विवाह कर लिया। जयचंद के सिपाही उसका बाल भी बाँका नहीं कर पाए।

मोहम्मद ग़ौरी द्वारा पराजित होने पर उसे बंदी बना कर ग़ौरी अपने साथ ले गया तथा उनकी आँखें गरम सलाखों से जला दी गईं। ग़ौरी ने पृथ्वीराज से अन्तिम ईच्‍छा पूछी तो चंदबरदायी द्वारा, जो कि पृथ्वीराज का अभिन्न सखा था, पृथ्वीराज शब्द भेदी बाण छोड़ने में माहिर सूरमा है इस बारे में बताया एवं ग़ौरी तक इसकी इस कला के प्रदर्शन की बात पहुँचाई। ग़ौरी ने मंजूरी दे दी। प्रदर्शन के दौरान ग़ौरी के शाबास लफ्ज के उद्घोष के साथ ही भरी महफिल में था, उस समय चंद बरदायी ने चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्‍ठ प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको रे चौहान दोहे द्वारा पृथ्वीराज को संकेत दिया जिस पर अंधे पृथ्वीराज ने ग़ौरी को शब्दभेदी बाण से मार गिराया तथा इसके पश्चात अपनी दुर्गति से बचने के लिए दोनों ने एक-दूसरे का वध कर दिया।

अमर प्रेमिका संयोगिता को जब इसकी जानकारी मिली तो वह भी वीरांगना की भाँति सती हो गई। दोनों की दास्तान प्रेमग्रंथ में अमिट अक्षरों से लिखी गई।

राजनैतिक नीति[संपादित करें]

पृथ्वीराज ने अपने समय के विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी को 17 बार पराजित किया। युवा पृथ्वीराज ने आरम्भ से ही साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई। पहले अपने सगे-सम्बन्धियों के विरोध को समाप्त कर उसने राजस्थान के कई छोटे राज्यों को अपने क़ब्ज़े में कर लिया। फिर उसने बुंदेलखण्ड पर चढ़ाई की तथा महोबा के निकट एक युद्ध में चदेलों को पराजित किया। इसी युद्ध में प्रसिद्ध भाइयों, आल्हा और ऊदल ने महोबा को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। पृथ्वीराज ने उन्हें पराजित करने के बावजूद उनके राज्य को नहीं हड़पा। इसके बाद गुजरात पर आक्रमण किया, पर गुजरात के शासक 'भीम द्वितीय' ने, जो पहले मुइज्जुद्दीन मुहम्मद को पराजित कर चुका था, पृथ्वीराज को मात दी। इस पराजय से बाध्य होकर पृथ्वीराज को पंजाब तथा गंगा घाटी की ओर मुड़ना पड़ा।

जयचंद्र का विद्वेश[संपादित करें]

कन्नौज का राजा जयचंद्र पृथ्वीराज की वृद्धि के कारण उससे ईर्ष्या करने लगा था। वह उसका विद्वेषी हो गया था। उन युद्धों से पहिले पृथ्वीराज कई हिन्दू राजाओं से लड़ाइयाँ कर चुका था। चंदेल राजाओं को पराजित करने में उसे अपने कई विख्यात सेनानायकों और वीरों को खोना पड़ा था। जयचंद्र के साथ होने वाले संघर्ष में भी उसके बहुत से वीरों की हानि हुई थी। फिर उन दिनों पृथ्वीराज अपने वृद्ध मन्त्री पर राज्य भार छोड़ कर स्वयं संयोगिता के साथ विलास क्रीड़ा में लगा हुआ था। उन सब कारणों से उसकी सैन्य शक्ति अधिक प्रभावशालिनी नहीं थी, फिर भी उसने गौरी के दाँत खट्टे कर दिये थे।

सं. ११९१ में जब पृथ्वीराज से मुहम्मद गौरी की विशाल सेना का सामना हुआ, तब राजपूत वीरों की विकट मार से मुसलमान सैनिकों के पैर उखड़ गये। स्वयं गौरी भी पृथ्वीराज के अनुज के प्रहार से बुरी तरह घायल हो गया था। यदि उसका खिलजी सेवक उसे घोड़े पर डाल कर युद्ध भूमि से भगाकर न ले जाता, तो वहीं उसके प्राण पखेरू उड़ जाते। उस युद्ध में गौरी की भारी पराजय हुई थी और उसे भीषण हानि उठाकर भारत भूमि से भागना पड़ा था। भारतीय राजा के विरुद्ध युद्ध अभियान में यह उसकी दूसरी बड़ी पराजय थी, जो अन्हिलवाड़ा के युद्ध के बाद सहनी पड़ी थी।

गौरी और पृथ्वीराज का युद्ध[संपादित करें]

किंवदंतियों के अनुसार गौरी ने 18 बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था, जिसमें 17 बार उसे पराजित होना पड़ा। किसी भी इतिहासकार को किंवदंतियों के आधार पर अपना मत बनाना कठिन होता है। इस विषय में इतना निश्चित है कि गौरी और पृथ्वीराज में कम से कम दो भीषण युद्ध आवश्यक हुए थे, जिनमें प्रथम में पृथ्वीराज विजयी और दूसरे में पराजित हुआ था। वे दोनों युद्ध थानेश्वर के निकटवर्ती तराइन या तरावड़ी के मैदान में क्रमशः सं. ११९१ और ११९२ में हुए थे।

पृथ्वीराज की सेना[संपादित करें]

कहा जाता है कि पृथ्वीराज की सेना में तीन सौ हाथी तथा 3,00,000 सैनिक थे, जिनमें बड़ी संख्या में घुड़सवार भी थे। दोनों तरफ़ की सेनाओं की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति भी हो सकती है। संख्या के हिसाब से भारतीय सेना बड़ी हो सकती है, पर तुर्क सेना बड़ी अच्छी तरह संगठित थी। वास्तव में यह दोनों ओर के घुड़सवारों का युद्ध था। मुइज्जुद्दीन की जीत श्रेष्ठ संगठन तथा तुर्की घुड़सवारों की तेज़ी और दक्षता के कारण ही हुई। भारतीय सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए। तुर्की सेना ने हांसी, सरस्वती तथा समाना के क़िलों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद उन्होंने अजमेर पर चढ़ाई की और उसे जीता। कुछ समय तक पृथ्वीराज को एक ज़ागीरदार के रूप में राज करने दिया गया क्योंकि हमें उस काल के ऐसे सिक्के मिले हैं जिनकी एक तरफ़ 'पृथ्वीराज' तथा दूसरी तरफ़ 'श्री मुहम्मद साम' का नाम खुदा हुआ है। पर इसके शीघ्र ही बाद षड़यंत्र के अपराध में पृथ्वीराज को मार डाला गया और उसके पुत्र को गद्दी पर बैठाया गया। दिल्ली के शासकों को भी उसका राज्य वापस कर दिया गया, लेकिन इस नीति को शीघ्र ही बदल दिया गया। दिल्ली के शासक को गद्दी से उतार दिया और दिल्ली गंगा घाटी पर तुर्कों के आक्रमण के लिए आधार स्थान बन गई। पृथ्वीराज के कुछ भूतपूर्व सेनानियों के विद्रोह के बाद पृथ्वीराज के लड़के को भी गद्दी से उतार दिया गया और उसकी जगह अजमेर का शासन एक तुर्की सेनाध्यक्ष को सौंपा दिया गया। इस प्रकार दिल्ली का क्षेत्र और पूर्वी राजस्थान तुर्कों के शासन में आ गया।

पृथ्वीराज का विजयी अभियान[संपादित करें]

गुजरात के भीमदेव के साथ युद्ध[संपादित करें]

गुजरात में उस समय चालुक्य वंश के महाराजा भीमदेव सोलंकी का राज था। उसने पृथ्वीराज के किशोर होने का फायदा उठाना चाहता था। यही विचार कर उसने नागौर पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। पृथ्वीराज किशोर अवश्य था परन्तु उसमे साहस-सयम और निति-निपुणता के भाव कूट-कूट कर भरे हुवे थे। जब पृथ्वीराज को पता चला के चालुक्य राजा ने नागौर पर अपना अधिकार करना चाहते है तो उन्होंने भी अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए कहा। भीमदेव ने ही पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर को युद्ध में हरा कर मृत्यु के घाट उतर दिया था। नौगर के किले के बाहर भीमदेव के पुत्र जगदेव के साथ पृथ्वीराज का भीषण संग्राम हुआ जिसमे अंतत: जगदेव की सेना ने पृथ्वीराज की सेना के सामने घुटने टेक दिए। फलसवरूप जगदेव ने पृथ्वीराज से संधि कर ली और पृथ्वीराज ने उसे जीवन दान दे दिया और उसके साथ वीरतापूर्ण व्यव्हार किया। जगदेव के साथ संधि करके उसको अकूत घोड़े, हठी और धन सम्पदा प्राप्त हुयी। आस पास के सभी राज्यों में सभी पृथ्वीराज की वीरता, धीरता और रन कोशल का लोहा मानने लगे। यहीं से पृथ्वीराज चौहान का विजयी अभियान आगे की और बढने लगा।

पृथ्वीराज और संयोगिता का प्रेम और स्वयंवर[संपादित करें]

संयोंगिता कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री थी। वह बड़ी ही सुन्दर थी, उसने भी पृथ्वीराज की वीरता के अनेक किस्से सुने थे। उसे पृथ्वीराज देवलोक से उतरा कोई देवता ही प्रतीत होता था। वो अपनी सहेलियों से भी पृथ्वीराज के बारे में जानकारियां लेती रहती थी। एकबार दिल्ली से पन्नाराय चित्रकार कन्नौज राज्य में आया हुआ था। उसके पास दिल्ली के सौंदर्य और राजा पृथ्वीराज के भी कुछ दुर्लभ चित्र थे। राजकुमारी संयोंगिता की सहेलियों ने उसको इस बारे में जानकारी दी। फलस्वरूप राजकुमारी जल्दी ही पृथ्वीराज का चित्र देखने के लिए उतावली हो गयी। उसने चित्रकार को अपने पास बुलाया और चित्र दिखने के लिए कहा परन्तु चित्रकार उसको केवल दिल्ली के चित्र दिखता रहा परन्तु राजकुमारी के मन में तो पृथ्वीराज जैसा योद्धा बसा हुआ था। अंत में उसने स्वयं चित्रकार पन्नाराय से महाराज पृथ्वीराज का चित्र दिखने का आग्रह किया। पृथ्वीराज का चित्र देखकर वो कुछ पल के लिए मोहित सी हो गयी। उसने चित्रकार से वह चित्र देने का अनुरोध किया जिसे चित्रकार ने सहर्ष ही स्वीकार लिया। इधर राजकुमारी के मन में पृथ्वीराज के प्रति प्रेम हिलोरे ले रहा था वहीं दूसरी तरफ उनके पिता जयचंद पृथ्वीराज की सफलता से अत्यंत भयभीत थे और उससे इर्ष्या भाव रखते थे। चित्रकार पन्नाराय ने राजकुमारी का मोहक चित्र बनाकर उसको पृथ्वीराज के सामने प्रस्तुत किया। पृथ्वीराज भी राजकुमारी संयोगिता का चित्र देखकर मोहित हो गए। चित्रकार के द्वारा उन्हें राजकुमारी के मन की बात पता चली तो वो भी राजकुमारी के दर्शन को आतुर हो पड़े। राजा जयचंद हमेशा पृथ्वीराज को निचा दिखने का अवसर खोजता रहता था। यह अवसर उसे जल्दी प्राप्त हो गया उसने संयोगिता का स्वयंवर रचाया और पृथ्वीराज को छोड़कर भारतवर्ष के सभी राजाओं को निमंत्रित किया और उसका अपमान करने के लिए दरबार के बाहर पृथ्वीराज की मूर्ती दरबान के रूप में कड़ी कर दी। इस बात का पता पृथ्वीराज को भी लग चूका था और उसने इसका उसी के शब्दों और उसी भाषा में जवाब देने का मन बना लिया। उधर स्वयंवर में जब राजकुमारी संयोगिता वरमाला हाथो में लेकर राजाओ को पार करती जा रही थी पर उसको उसके मन का वर नज़र नहीं आ रहा था। यह राजा जयचंद की चिंता भी बढ गयी। अंतत: सभी राजाओ को पार करते हुए वो जब अंतिम छोर पर पृथ्वीराज की मूर्ति के सामने से गुजरी तो उसने वही अपने प्रियतम के गले में माला डाल दी। समस्त सभा में हाहाकार मच गया। राजा जयचंद ने अपनी तलवार निकल ली और राजकुमारी को मारने के लिए दोड़े पर उसी समय पृथ्वीराज आगे बढ कर संयोगिता को थाम लिया और घोड़े पर बैठाकर निकल पड़ा। वास्तव में पृथ्वीराज स्वयं मूर्ति की जगह खड़ा हो गया था। इसके बाद तो राजा जयचंद के मन में पृथ्वीराज के प्रति काफी कटुता भर गयी और वो अवसर की तक में रहने लगा।

तराइन का प्रथम युद्ध (गौरी की पराजय)[संपादित करें]

The last stan of Rajputs against Muhammadans.jpg

अपने साम्राज्य के विस्तार और सुव्यवस्था पर पृथ्वीराज की पैनी दृष्टि हमेशा जमी रहती थी। अब उनकी इच्छा पंजाब तक विस्तार करने की थी। किन्तु उस समय पंजाब पर मुहम्मद शाहबुद्दीन गौरी का राज था। ११९० ई० तक सम्पूर्ण पंजाब पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो चुका था। अब वह भटिंडा से अपना राजकाज चलता था। पृथ्वीराज यह बात भली भांति जनता था की मुहम्मद गौरी से युद्ध किये बिना पंजाब में चौहान साम्राज्य स्थापित करना असंभव था। यही विचार कर उसने गौरी से निपटने का निर्णय लिया। अपने इस निर्णय को मूर्त रूप देने के लिए पृथ्वीराज एक विशाल सेना लेकर पंजाब की ओर रवाना हो गया। तीव्र कार्यवाही करते हुए उसने हांसी, सरस्वती और सरहिंद के किलो पर अपना अधिकार कर लिया। इसी बीच उसे सुचना मिली की अनहीलवाडा में विद्रोहियों ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। पंजाब से वह अनहीलवाडा की ओर चल पड़ा। उनके पीठ पीछे गौरी ने आक्रमण करके सरहिंद के किले को पुन: अपने कब्जे में ले लिया। पृथ्वीराज ने शीघ्र ही अनहीलवाडा के विद्रोह को कुचल दिया। अब उसने गौरी से निर्णायक युद्ध करने का निर्णय लिया। उसने अपनी सेना को नए ढंग से सुसज्जित किया और युद्ध के लिए चल दिया। रावी नदी के तट पर पृथ्वीराज के सेनापति समर सिंह और गौरी की सेना में भयंकर युद्ध हुआ परन्तु कुछ परिणाम नहीं निकला। यह देख कर पृथ्वीराज गौरी को सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ा। थानेश्वर से १४ मील दूर और सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर यह युद्ध लड़ा गया। तराइन के इस पहले युद्ध में राजपूतो ने गौरी की सेना के छक्के छुड़ा दिए। गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे। जो भाग गया उसके प्राण बच गए, किन्तु जो सामने आया उसे गाजर-मुली की तरह काट डाला गया। सुल्तान मुहम्मद गौरी युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ। अपने ऊँचे तुर्की घोड़े से वह घायल अवस्था में गिरने ही वाला था की युद्ध कर रहे एक उसके सैनिक की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने बड़ी फुर्ती के साथ सुल्तान के घोड़े की कमान संभल ली और कूद कर गौरी के घोड़े पर चढ़ गया और घायल गौरी को युद्ध के मैदान से निकाल कर ले गया। नेतृत्व विहीन सुल्तान की सेना में खलबली मच चुकी थी। तुर्क सेनिक राजपूत सेना के सामने भाग खड़े हुए। पृथ्वीराज की सेना ने ८० मील तक इन भागते तुर्कों का पीछा किया। पर तुर्क सेना ने वापस आने की हिम्मत नहीं की। इस विजय से पृथ्वीराज चौहान को ७ करोड़ रुपये की धन सम्पदा प्राप्त हुयी। इस धन सम्पदा को उसने अपने बहादुर सैनिको में बाँट दिया। इस विजय से सम्पूर्ण भारतवर्ष में पृथ्वीराज की धाक जम गयी और उनकी वीरता, धीरता और साहस की कहानी सुनाई जाने लगी।

तराइन का द्वितीय युद्ध (११९२ ई०) और जयचंद का देशद्रोह[संपादित करें]

पृथ्वीराज चौहान द्वारा राजकुमारी संयोगिता का हरण करके इस प्रकार कनौज से ले जाना रजा जयचंद को बुरी तरह कचोट रहा था। उसके ह्रदय में अपमान के तीखे तीर से चुभ रहे थे। वह किसी भी कीमत पर पृथ्वीराज का विध्वंश चाहता था। भले ही उसे कुछ भी करना पड़े। विश्वसनीय सूत्रों से उसे पता चला की मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता है। बस फिर क्या था जयचंद को मानो अपने मन की मुराद मिल गयी। उसने गौरी की सहायता करके पृथ्वीराज को समाप्त करने का मब बनाया। जयचंद अकेले पृथ्वीराज से युद्ध करने का साहस नहीं कर सकता था। उसने सोचा इस तरह पृथ्वीराज भी समाप्त हो जायेगा और दिल्ली का राज्य उसको पुरस्कार सवरूप दे दिया जायेगा। राजा जयचंद के देशद्रोह का परिणाम यह हुआ की जो मुहम्मद गौरी तराइन के युद्ध में अपनी हार को भुला नहीं पाया था, वह फिर पृथ्वीराज का मुकाबला करने के षड़यंत्र करने लगा। राजा जयचंद ने दूत भेजकर गौरी को सैन्य सहायता देने का आश्वासन दिया। देशद्रोही जयचंद की सहायता पाकर गौरी तुरंत पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए तैयार हो गया। जब पृथ्वीराज को ये सुचना मिली की गौरी एक बार फिर युद्ध की तैयारियों में जुटा हुआ तो उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मुहम्मद गौरी की सेना से मुकाबल करने के लिए पृथ्वीराज के मित्र और राज कवि चंदबरदाई ने अनेक राजपूत राजाओ से सैन्य सहायता का अनुरोध किया परन्तु संयोगिता के हरण के कारण बहोत से राजपूत राजा पृथ्वीराज के विरोधी बन चुके थे वे कन्नौज नरेश के संकेत पर गौरी के पक्ष में युद्ध करने के लिए तैयार हो गए। ११९२ ई० में एक बार फिर पृथ्वीराज और गौरी की सेना तराइन के क्षेत्र में युद्ध के लिए आमने सामने खड़ी थी। दोनों ओर से भीषण युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में पृथ्वीराज की और से ३ लाख सेनिको ने भाग लिया था जबकि गौरी के पास एक लाख बीस हजार सैनिक थे। गौरी की सेना की विशेष बात ये थी की उसके पास शक्तिशाली घुड़सवार दस्ता था। पृथ्वीराज ने बड़ी ही आक्रामकता से गौरी की सेना पर आक्रमण कर किया। उस समय भारतीय सेना में हाथी के द्वारा सैन्य प्रयोग किया जाता था। गौरी के घुड़सवारो ने आगे बढकर राजपूत सेना के हाथियों को घेर लिया और उनपर बाण वर्षा शुरू कर दी। घायल हाथी न तो आगे बढ पाए और न पीछे बल्कि उन्होंने घबरा कर अपनी ही सेना को रोंदना शुर कर दिया। तराइन के द्वित्य युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी की देशद्रोही जयचंद के संकेत पर राजपूत सैनिक अपने राजपूत भाइयो को मार रहे थे। दूसरा पृथ्वीराज की सेना रात के समय आक्रमण नहीं करती थी (यही नियम महाभारत के युद्ध में भी था) लेकिन तुर्क सैनिक रात को भी आक्रमण करके मारकाट मचा रहे थे। परिणामस्वरूप इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई और उसको तथा राज कवि चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया। देशद्रोही जयचंद का इससे भी बुरा हाल हुआ, उसको मार कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया गया। पृथ्वीराज की हार से गौरी का दिल्ली, कन्नौज, अजमेर, पंजाब और सम्पूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार हो गया। भारत मे इस्लामी राज्य स्थापित हो गया। अपने योग्य सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का गवर्नर बना कर गौरी, पृथ्वीराज और चंदबरदाई को युद्धबन्धी के रूप में अपने गृह राज्य गौरी की और रवाना हो गया।

चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो[संपादित करें]

अंत में अपने प्रमाद और जयंचद्र के द्वेष के कारण वह पराजित हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। उसका मृत्यु काल सं. 1248 माना जाता है। उसके पश्चात मुहम्मद गौरी ने कन्नौज नरेश जयचंद्र को भी हराया और मार डाला। आपसी द्वेष के कारण उन दोनों की हार और मृत्यु हुई। पृथ्वीराज से संबंधित घटनाओं का काव्यात्मक वर्णन चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो नामक ग्रंथ में हुआ है।जब चंद पृथ्वीराज के कष्टों का समाचार मिला, वह गजनी अपने मित्र तथा स्वामी के उद्धार के लिये अवधूत के वेष में चल पड़ा। वह शहाबुद्दीन से मिला। वहाँ जाने का कारण पूछने पर उसने बताया कि अब वह बदरिकाश्रम जाकर तप करना चाहता था किंतु एक साध उसके जी में शेष थी, इसलिये वह अभी वहाँ नहीं गया था। उसने पृथ्वीराज के साथ जन्म ग्रहण किया था और वे बचपन में साथ साथ ही खेले कूदे थे। उसी समय पृथ्वीराज ने उससे कहा था कि वह सिंगिनी के द्वारा बिना फल के बाध से ही सात घड़ियालों को एक साथ बेध सकता था। उसका यह कौशल वह नहीं देख सका था और अब देखकर अपनी वह साध पूरी करना चाहता था। गोरी ने कहा कि वह तो अंधा किया जा चुका है। चंद ने कहा कि वह फिर भी वैसा संधानकौशल दिखा सकता है, उसे यह विश्वास था। शहाबुद्दीन ने उसकी यह माँग स्वीकार कर ली और तत्संबंधी सारा आयोजन कराया। चंद के प्रोत्साहित करने पर जीवन से निराश पृथ्वीराज ने भी अपना संघान कौशल दिखाने के बहाने शत्रु के वध करने का उसका आग्रह स्वीकार कर लिया। पृथ्वीराज से स्वीकृति लेकर चंद शहाबुद्दीन के पास गया और कहा कि वह लक्ष्यवेध तभी करने को तैयार हुआ है जब वह (शहाबुद्दीन) स्वयं अपने मुख से उसे तीन बार लक्षवेध करने का आह्वाहन करे। शहाबुद्दीन ने इसे भी स्वीकार कर लिया1 शाह ने दो फर्मान दिए, फिर तीसरा उसने ज्यों ही दिया पृथ्वीराज के बाण से विद्ध होकर वह धराशायी हुआ। पृथ्वीराज का भी अंत हुआ। देवताओं ने उस पर पुष्पवृष्टि की और पृथ्वी ने म्लेच्छा गोरी से त्राण पाकर हर्ष प्रकट किया।

पृथ्वीराज चौहान[संपादित करें]

गौरव राणा मंधौर वाला

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्, सर्गः ११, श्लो. ८
  2. http://asi.nic.in/asi_books/8401.pdf
  3. http://www.britannica.com/biography/Prithviraja-III
  4. https://books.google.co.in/books/about/Prithviraj_Chauhan_and_His_Times.html?id=pTYhAAAAMAAJ
  5. http://www.mapsofindia.com/who-is-who/history/prithviraj-chauhan.html
  6. http://www.thefamouspeople.com/profiles/prithviraj-chauhan-6240.php
  7. http://www.factsninfo.com/2013/06/interesting-facts-and-history-of-prithviraj-chauhan.html
  8. http://www.indianrajputs.com/history/chauhan.php
  9. पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्, सर्गः ११, श्लो. ८
  10. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ २६५. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  11. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ ८६. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  12. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५१. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  13. जर्नल ऑफ् रॉयल् एशियाटिक् सोसायटी ऑफ् बंगाल, भागः – ५५, खण्डः – १, पृ. ४६
  14. चौहानसरित्सागरः, खण्डः – १, पृ. १२०-१२३
  15. प्रो. कीलहार्न्, इण्डियन् एन्टिक्वैरी, भागः – २०, पृ. २०१-२१२
  16. हरविलास शारदा, स्पीचेज् एण्ड् राइटिंग, पृ. २६७-२६८
  17. पृथ्वीराजविजयं, सर्गः १, श्लो. ३५, टीका १४,१५,३१
  18. डॉ। गौरीशङ्कर हीराचन्द ओझा, मध्यकालीन भीरतीय संस्कृति, पृ. १३५-१३७
  19. पृथ्वीराजरासो, खण्डः १, पृ. ७२९-७४६
  20. नयचन्द्र सूरी, हम्मीरमहाकाव्यं, सर्गः २, श्लो. ७९-९०, पृ. ८५-८६
  21. पृथ्वीराजविजयं, सर्गः ९, श्लो। ८८
  22. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५२-१५३. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  23. पृथ्वीराजप्रबन्धः, पृ. ८६
  24. दिल्ली सुल्तनत, खण्डः १, पृ. १३७
  25. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १५३. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  26. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ ९७-९८. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  27. डॉ. बिन्ध्यराज चौहान (2012). दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान एवं उनका युग. राजस्थानी ग्रन्थागार. प॰ १०४-१०८. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-86103-09-1. 
  28. Khan, Iqtidar Alam (1996). "Coming of Gunpowder to the Islamic World and North India: Spotlight on the Role of the Mongols". Journal of Asian History 30: 41–5. .