परमर्दिदेव

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परमर्दिदेव
बाल-ओपी-नेता-परमभट्टरक-महाराजाधिराज-परमेश्वर-परम-महेश्वर-श्री-कलंजराधिपति
कालिंजर के सम्राट
शासनावधिc. 1165-1203 CE
पूर्ववर्तीयशोवर्मन द्वितीय
उत्तरवर्तीत्रैलोक्यवर्मन
जन्मc. 1160
महोबा, उत्तर प्रदेश
निधनc. 1203
महोबा, कालिंजर किला, उत्तर प्रदेश
जीवनसंगीमल्हाना परिहार (प्रतिहार राजकुमारी)
संतानब्रम्हजीत, नायकी देवी, त्रैलोक्यवर्मन (समरजीत)
पूरा नाम
श्रीमंत परमर्दीदेव चन्देल
शासनावधि नाम
परमाल
घरानाहैहया, चन्द्रवंश
राजवंशचन्देल
पितायशोवर्मन द्वितीय
धर्मशैव धर्म, हिंदू धर्म

परमर्दिदेव (संस्कृत: परमर्दिदेव,) (शासनकाल 1165-1203 सीई) सबसे शक्तिशाली और मध्य भारत के महान हिंदू चन्देल सम्राटों में से एक थे। जिन्होंने महोबा, जेजाकभुक्ति से शासन किया। 1182 ईस्वी में पृथ्वीराज III ने महोबा के गढ़ सिरसा पर छापा मारा। परंतु 1187 इस्वी में कीर्तिसगर के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान परमार्दिदेव द्वारा परास्त हुआ और युद्धभूमि छोड़के भाग गया। 1203 के दौरान कलंजारा के घेराबंदी में परमार्दी ने घुरिद सेनापति कुतुब अल-दीन ऐबक से अंतिम तक युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

महोबे के सम्राट परमर्दिदेव या परमाल का नाम समस्त उत्तर भारत में विख्यात है। सन् ११६५ के लगभग सिंहासन पर बैठने के समय इसकी उम्र 5 साल रही होगी किंतु इसने राज्य को अच्छी तरह संभाला। वो बहुत ही उदार राजा था से साम्राज्य में सब खुशहाली से रहते थे। परमर्दिदेव का नियम था की वो गऊ दान तथा ब्राह्मण को भोजन कराकर ही भोजन करता तथा। परमर्दिदेव चंदेल ने उरई की लड़ाई जितने के बाद उरई के राजा वासुदेव प्रतिहार की पुत्री मल्हना से विवाह किया तथा उसकी बहन देवला और तिलका का विवाह अपने छोटे चचेरे भाई दसराज वनाफर (चंदेल) और वत्सराज वनाफर (चंदेल) से कराया।

राजकाल[संपादित करें]

सम्राट बनने के बाद ही उसने अपने पिता के समय स्वतंत्र हुए राजाओं को पुन हराकर साम्राज्य खड़ा किया। पूरे दक्षिण और उत्तर भारत को जितने के बाद इसके बचे केवल दो प्रतिद्वंदी थे, एक तो काशी और कन्नौज का राजा जयचंद्र गहडवाल और दूसरा दिल्ली तथा अजमेर का शासक पृथ्वीराज चौहान। परमर्दिदेव ने जयचंद्र से मित्रता की और पृथ्वीराज से संघर्ष। परमर्दिदेव शिव का भक्त और अच्छा कवि था। संभवत: वह अच्छा राजनीतिज्ञ रहा होगा; किंतु यदि हम परंपरागत कथाओं पर विश्वास करें तो यह कहना पड़ेगा कि साहस की कमी उसका मुख्य दोष था। इस महान योद्धा की प्रस्तुत जानकारी काव्य और शिलालेख के आधार पर प्रस्तुत की गई है। पृथ्वीराजरासो तथा आल्हाखंड के वर्णनों से यह निश्चित है कि चौहानों और चंदेलों का यह संघर्ष कुछ वर्षों तक चलता रहा और इसमें दोनों पक्षों की पर्याप्त हानि हुई। परमर्दिदेव के मुख्य सेनापति में से चंदेलवंशी बनाफर बंधु ऊदल और मलखान और युवराज ब्रम्हजित चंदेल मारे गए और ब्रम्हजित पत्नी बेला ( पृथ्वीराज की पुत्री) सती हो गई परंतु अंत में परमर्दिदेव ने 1187 में पृथ्वीराज को परास्त किया वही और उसे युद्ध से भागने पर विवश किया। पृथ्वीराज ने जो किले मलखान को हारकर जीते थे उसे आल्हा और उनके पुत्र इंदल ने पुन चौहानों को हराकर जीता।

परमर्दिदेव के शासनकाल के पहले कुछ वर्षों के शिलालेख सेमरा (1165-1166 सीई), महोबा (1166-1167 सीई), इछावर (1171 सीई), महोबा (1173 सीई) में पाए गए हैं। पचर (1176 सीई) और चरखारी (1178 सीई)।[1] ये सभी शिलालेख उनके लिए शाही उपाधियों का उपयोग करते हैं: बालोपनाता-परमभट्टरक-महाराजाधिराज-परमेश्वर परम-महेश्वर श्री-कलंजराधिपति श्रीमनमत परमर्दी-देव। यह इंगित करता है कि अपने शासनकाल के प्रारंभिक भाग में, परमर्दी-देव ने अपने दादा मदनवर्मन से विरासत में प्राप्त साम्राज्य को बरकरार रखा था।[2]

शाशनकाल[संपादित करें]

परमार्दी शक्तिशाली चंदेल शासकों में से अंतिम थे, और कई पौराणिक ग्रंथों जैसे परमल रासो (परमल रासो या महोबा खंड), पृथ्वीराज रासो में उल्लेख किया गया है। तथा आल्हा-खंड (आल्हा रासो या आल्हा का गाथागीत)। जबकि ये ग्रंथ ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित हैं, उनकी अधिकांश सामग्री पृथ्वीराज चौहान या परमार्दी को महिमामंडित करने के लिए गढ़ी गई है। इस प्रकार, ये ग्रंथ संदिग्ध ऐतिहासिकता के हैं, और इसलिए, परमर्दिदेव का अधिकांश शासनकाल अस्पष्टता में डूबा हुआ है।[3][2]

कई चन्देल शिलालेखों में भी परमर्दिदेव का उल्लेख है, लेकिन इनमें बहुत कम ऐतिहासिक जानकारी है। उदाहरण के लिए, सेमरा ताम्रपत्र शिलालेख अस्पष्ट रूप से उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में स्तुति करता है जो सुंदरता में मकरध्वज (प्रेम के देवता) से आगे निकल गया, गहराई में समुद्र, महिमा में स्वर्ग का स्वामी, बृहस्पति ज्ञान में, और युधिष्ठिर सच्चाई में। बघारी (बतेश्वर) पत्थर के शिलालेख में उन्हें सैन्य जीत का श्रेय दिया गया है और कहा गया है कि अन्य राजाओं ने उन्हें प्रणाम किया, लेकिन इनमें से किसी भी राजा का नाम शायद जागीरदार का कारण नहीं है।[3] उनके पोते की पत्नी कल्याणदेवी का अजयगढ़ शिलालेख इसी तरह उन्हें एक सार्वभौमिक संप्रभु के रूप में वर्णित करता है,जिनके दुश्मन दयनीय हालत में रह गए थे। [4] व्यापक विजय के कुछ दावों की ऐतिहासिक साक्ष्यों से पुष्टि नहीं होती है।[5]

चौहानों से युद्ध[संपादित करें]

मध्ययुगीन गाथागीतों के अनुसार, पृथ्वीराज पद्मसेन की बेटी से शादी करके दिल्ली लौट रहे थे। इस यात्रा के दौरान उस पर तुर्क सेना ( घुरिद) द्वारा हमला किया गया था। चौहान सेना हमलों को खदेड़ने में कामयाब रही, लेकिन इस प्रक्रिया में गंभीर हताहत हुए। वे अपना रास्ता भटक गए, और चंदेल साम्राज्य की राजधानी महोबा में पहुंच गए। चौहान सेना, जिसमें कई घायल सैनिक थे, ने अनजाने में चंदेला शाही उद्यान में एक शिविर स्थापित कर दिया। उन्होंने बगीचे के

रखवाले को उनकी उपस्थिति पर आपत्ति करने के लिए मार डाला। जब परमार्दी को इस बात का पता चला तो उन्होंने चौहान सेना का मुकाबला करने के लिए कुछ सैनिकों को भेजा। आगामी संघर्ष में चंदेलों को भारी नुकसान हुआ। तब परमर्दिदेव ने पृथ्वीराज के खिलाफ अपने सेनापति उदल के नेतृत्व में एक और सेना भेजने का फैसला किया। उदल ने इस प्रस्ताव के खिलाफ सलाह देते हुए तर्क दिया कि घायल सैनिकों पर हमला करना या पृथ्वीराज जैसे शक्तिशाली राजा का विरोध करना उचित नहीं होगा। हालाँकि, सम्राट परमर्दिदेव अपने बहनोई महिला परिहार (प्रतिहार) के प्रभाव में थे, जिन्होंने चंदेलों के खिलाफ गुप्त रूप से दुर्भावना को बरकरार रखा था। माहिल ने परमर्दिदेव को हमले की योजना पर आगे बढ़ने के लिए उकसाया। उदल के नेतृत्व में चंदेला सेना ने फिर चौहान सेना के खिलाफ दूसरा हमला किया, लेकिन हार गई। स्थिति तब शांत हुई जब पृथ्वीराज दिल्ली के लिए रवाना हुए।[6]

माहिल परिहार की राजनीतिक साजिश को सहन करने में असमर्थ, उदल और उनके भाई आल्हा ने चंदेल दरबार छोड़ दिया। उन्होंने जयचंद, गहदवाला कन्नौज के शासक के साथ शरण ली।[6] माहिल ने तब पृथ्वीराज चौहान को एक गुप्त संदेश भेजा, जिसमें उन्हें सूचित किया गया था कि परमर्दिदेव के सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों ने महोबा छोड़ दिया है। उसके द्वारा उकसाया गया, पृथ्वीराज 1182 ईस्वी में दिल्ली से निकला और ग्वालियर और बटेश्वर के रास्ते चंदेला साम्राज्य की ओर बढ़ा। सबसे पहले, उसने सिरसागढ़ को घेर लिया, जो कि आल्हा और उदल के चचेरे भाई मलखान के पास था। पृथ्वीराज ने मलखान को जीतने की कोशिश की, लेकिन मलखान परमर्दी के प्रति वफादार रहे और आक्रमणकारियों के खिलाफ लड़े। मलखान द्वारा आक्रमणकारी सेना के आठ सेनापतियों के मारे जाने के बाद, पृथ्वीराज ने स्वयं युद्ध की कमान संभाली। चंदेल अंततः युद्ध हार गए, और मलखान मारा गया।

युद्ध[संपादित करें]

सिरसागढ़ चंदेलस सेना की दूसरी लड़ाई में परमार्दी-देव के बेटे ब्रह्मजीत और भतीजे आल्हा ने चौहानों को हराया और ब्रह्मजीत ने बेला चौहान (पृथ्वीराज III की बेटी) से शादी की। [7][8][9]

सिरसागढ़ की लड़ाई में जीत के बाद, परमर्दिदेव के पुत्र ब्रह्मा ने बेला चौहान से शादी की, जिसे वह प्यार करता था। लेकिन 1182 में, माहिल के उकसाने पर पृथ्वीराज III ने फिर से चंदेलों के एक सूबे महोबा पर हमला किया और महोबा गढ़ के एक किले सिरसागढ़ को जीत लिया। [8][7][10] 1187 में पृथ्वीराज ने पुन महोबा पे हमला किया कीर्तिसागर के समीप घमासान युद्ध हुआ जिसमें परमर्दीदेव ने पृथ्वीराज को पराजित कर दिया और युद्ध से भागने पर विवश कर दिया। वही परमर्दिदेव के सेनपति एवं भतीजे आल्हा ने पृथ्वीराज के 5 पुत्रो को बंदी बना के ब्रम्हा की विधवा पत्नी बेला के सामने रख दिया जिसके बाद बेला ने उनका सर कलम कर सती हो गई। [11][12][13][9]

1195 सीई बटेश्वर शिलालेख में कहा गया है कि अन्य सामंती राजा उसके सामने झुके थे, और 1201 सीई कलंजरा शिलालेख उन्हें दशरना देश के स्वामी के रूप में वर्णित करता है।[14]

बाद के दिन और मृत्यु[संपादित करें]

एक कलंजर शिलालेख के अनुसार, जबकि परमर्दिदेव के पूर्ववर्तियों में से एक ने सांसारिक शासकों की पत्नियों को कैद कर लिया था, परमर्दिदेव वीर ने दैवीय शासकों को भी अपनी पत्नियों की सुरक्षा के लिए चिंतित कर दिया। नतीजतन, देवताओं ने उसके खिलाफ मलेच्छस (विदेशियों) की एक सेना को छोड़ दिया, और उसे हार का सामना करना पड़ा।[5]

पृथ्वीराज चौहान 1192 ईस्वी में घुरिद के खिलाफ तराइन की दूसरी लड़ाई में मारा गया था। चौहान (चौहान) और गढ़वाला को हराने के बाद, दिल्ली के घुरीद राज्यपाल ने चन्देल साम्राज्य पर आक्रमण की योजना बनाई। सन् १२०२ में कुत्बुद्दीन ने कई अन्य अमीरों का साथ लेकर कालिंजर पर आक्रमण किया। परमर्दिदेव ने कुछ समय तक घेरे में रहते हुए युद्ध किया किंतु अंत में वो वीरगति को प्राप्त हुआ परंतु उसकी मृत्यु के बाद प्रधानामात्य अजय देव वशिष्ठ ने कुछ समय तक महोबा के सेना के साथ मुसलमानों का सामना किया परंतु मारा गया। सम्राट परमर्दिदेव का एक भृगुवंशी ब्राह्मण सेनापति चित्रगंध था जिसके पिता सेनापति ढेवा ने सम्राट परमार्दिदेव के साथ मिलके चौहानों को सीमा खदेड़ते वक्त धोखे से मारा गया। पिता की मृत्यु के बाद चित्रगंध को परमर्दिदेव ने अपने पुत्र समान ही पाला था, कहा जाता है की युद्ध में परमर्दिदेव की मृत्यु के बाद चित्रगंध को एहसास हो गया था की महोबा की सेना सम्राट के बिना नही जीत पाएगी इसलिए उसने परमर्दिदेव के आठ वर्षीय घायल पुत्र समरजीत को खजुराहों की कंदरा में धन के साथ छुपा दिया था। वही समरजीत बड़ा हो कर त्रैलोक्यवर्मन चन्देल के नाम से विख्यात हुआ और अपनी पिता और प्रजा की हत्या का प्रतिशोध किरतसागर को घुरीदो के खून से भरके लिया और विंध्याचल से यमुना तक चंदेल राज्य बना लिया।

परिचय[संपादित करें]

महोबे के राजा परमर्दिदेव या परमाल का नाम समस्त उत्तर भारत में विख्यात है। सन् ११६५ के लगभग सिंहासन पर बैठने के समय इसकी उम्र अधिक न रही होगी किंतु इसने राज्य को अच्छी तरह संभाला। इसके दो प्रतिद्वंदी थे, एक तो काशी और कन्नौज का राजा जयचंद्र गहडवाल और दूसरा दिल्ली तथा अजमेर का शासक पृथ्वीराज चौहान। परमर्दिदेव ने जयचंद्र से मित्रता की और पृथ्वीराज से संघर्ष। पृथ्वीराजरासो तथा आल्हाखंड के वर्णनों से यह निश्चित है कि चौहानों और चंदेलों का यह संघर्ष कुछ वर्षों तक चलता रहा और इसमें दोनों पक्षों की पर्याप्त हानि हुई। परमर्दिदेव के मुख्य सामंतों में से बनाफर बंधु ऊदल और मलखान मारे गए और चंदेल राज्य के बहुत से भाग पर पृथ्वीराज का अधिकार हो गया। शिलालेखों से इन घटनाओं पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता, किंतु मदनपुर के शिलालेखों से इतना निश्चित है कि दिग्विजयी पृथ्वीराज ने महोबे के आसपास के प्रदेश को सन् ११८२ में बुरी तरह से लूटा। परमर्दिदेव की हार इतनी जबरदस्त हुई थी कि कुछ कवियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि परमर्दि ने मुँह में घास लेकर पृथ्वीराज से अपने प्राण बचाए। ऐसी भी किंवदंती है कि पराजय की शर्म के मारे परमर्दिदेव ने आत्मघात कर लिया। किंतु वास्तव में परमर्दिदेव कम से कम बीस साल तक और जीवित रहा और उसके शिलालेखों से यह भी सिद्ध है कि प्राय: सभी राज्य पर उसका अधिकार बना रहा। चौहान सेना बुंदेलखंड को लूटकर फिर वापस चली गई।

किंतु एक आफत टली तो दूसरी आई। सन् ११८२ में चौहान राज्य और सन् ११९४ में गहडवाल राज्य का मुहम्मद गोरी ने अंत कर दिया और भारत में कुत्बुद्दीन को अपना प्रतिनिधि बनाया। सन् १२०२ में कुत्बुद्दीन ने कई अन्य अमीरों का साथ लेकर कालिंजर पर आक्रमण किया। परमर्दिदेव ने कुछ समय तक घेरे में रहते हुए युद्ध किया किंतु अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार की और कर रूप में बहुत से हाथी तथा घोड़े कुत्बुद्दीन को देने की बात तय हुई। भाग्यवशात् इसी समय परमर्दिदेव की मृत्यु हो गई। इसके प्रधानामात्य ने कुछ समय तक मुसलमानों का और सामना किया किंतु दुर्ग में पानी की कमी पड़ने पर उसने भी आत्मसमर्पण कर दिया।

परमर्दिदेव शिव का भक्त और अच्छा कवि था। संभवत: वह अच्छा राजनीतिज्ञ रहा होगा; किंतु यदि हम परंपरागत कथाओं पर विश्वास करें तो यह कहना पड़ेगा कि साहस की कमी उसका मुख्य दोष था।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • पृथ्वीराज रासो, महोबा खंड;
  • आल्हा खंड;
  • शिशिरकुमार मित्र, अर्ली रूलर्स ऑफ खजुराहो,
  • दशरथ शर्मा, प्राचीन चौहान राजवंश।
  1. Sisirkumar Mitra 1977, पृ॰ 119.
  2. Sisirkumar Mitra 1977, पृ॰ 120.
  3. R. K. Dikshit 1976, पृ॰ 141.
  4. R. K.Dikshit 1976, पृ॰ 141.
  5. R. K. Dikshit 1976, पृ॰ 143.
  6. Sisirkumar Mitra 1977, पृ॰ 121.
  7. Sisirkumar Mitra 1977, पृ॰ 125.
  8. Sisirkumar Mitra 1977, पृ॰ 122.
  9. Parmaalraso 1189, पृ॰ Jagnikarao.
  10. Mohinder Singh Randhawa & Indian Council of Agricultural Research 1980, पृ॰प॰ 472.
  11. M.S. Randhawa & Indian Sculpture: The Scene, Themes, and Legends 1985, पृ॰प॰ 532.
  12. Parmal Raso, Shyam sunder Das, 1919, 467 pages
  13. Pandey(1993) pg197-332
  14. Sisirkumar Mitra 1977, पृ॰ 126.