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राम

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राम
  • मर्यादा पुरुषोत्तम
    विष्णु के सातवें अवतार
दशावतार के सदस्य
धनुष और बाण लेकर खड़े हुए श्याम वर्ण राम
अन्य नामराघव, रामचन्द्र, रघुनन्दन, काकुत्स्थ, सीतावल्लभ, कौशल्यानंदन
देवनागरीराम
Sanskrit transliterationRāma
धर्मरामानंदी संप्रदाय
श्री वैष्णव संप्रदाय
स्मार्त संप्रदाय
संबंधनविष्णु के सातवें अवतार
पूर्वाधिकारीदशरथ
उत्तराधिकारीलव (उत्तर कोसल)
कुश (दक्षिण कोसल)
निवास
मंत्रजय श्री राम
जय सियाराम
ॐ श्रीरामचंद्राय नमः
सीताराम
शस्त्रकोदंड धनुष तथा बाण, कौमुदी गदा, तलवार
सेनावानर सेना
चिह्नकोदंड/सारंग धनुष
बाण
शंख
कमल
दिवसगुरुवार
ग्रंथवाल्मीकि रामायण
रामचरितमानस
विष्णु पुराण
भागवत पुराण
अध्यात्म रामायण
लिंगपुरुष
उत्सव
वंशावली
अवतार जन्मअयोध्या, कोसल (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत)
अवतार अंतसरयू नदी, अयोध्या, कोसल (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत)
माता-पिता
सहोदर
जीवनसाथीसीता
संतान
वंशरघुवंश-सूर्यवंश
दशावतार क्रमांक
पूर्ववर्तीपरशुराम
उत्तरवर्तीकृष्ण

राम (जिन्हें श्रीराम भी कहा जाता है) एक प्रसिद्ध हिंदू देवता हैं, जिन्हें भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है। उनका जीवन धर्मयुक्त और आदर्श माना जाता है, जिसके कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है।[1]

वैष्णव परंपराओं में उन्हें सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाता है। उनके जीवन पर आधारित महाकाव्य वाल्मीकि रामायण ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से अत्यंत लोकप्रिय है। राम को भारत तथा संपूर्ण दक्षिण एशिया में व्यापक तौर पर पूजा जाता है।

राम के जीवनचरित्र का मुख्य आधार संस्कृत भाषा का आदिकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण है। इसके अनुसार त्रेतायुग में जब लंका का राजा रावण अधर्म और अत्याचार फैला रहा था, तब अयोध्या के महाराज दशरथ और उनकी तीन रानियां कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी पुत्रहीन थे। रावण के अत्याचारों का अंत करने एवं धर्म की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में अवतार लिया। उनकी सहायता के लिए लक्ष्मी ने सीता, शेषनाग ने लक्ष्मण, और शिव ने हनुमान के रूप में अवतार लिया। चैत्र शुक्ल नवमी के दिन राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। बाल्यकाल में उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की।

शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रमों में राक्षसों का संहार करने गए। यज्ञ की रक्षा करने के बाद उन्होंने मिथिला में सीता स्वयंवर में भाग लिया। वहां राम ने शिव धनुष को भंग करके सीता से विवाह किया। कुछ समय बाद राजा दशरथ ने राम को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया, लेकिन महारानी कैकयी ने दासी मन्थरा के बहकावे में आकर दशरथ से अपने वचनों के रूप में राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया।

अपने माता-पिता के वचन और आज्ञा को शिरोधार्य कर राजसुख त्याग कर राम ने वनवास स्वीकार किया। भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता ने भी राम का साथ दिया। वनवास के दौरान राम ने अनेक राक्षसों का संहार किया और अंत में दंडकारण्य में निवास किया। वहां राम ने रावण के भाई खर-दूषण का सेना समेत नाश किया और शूर्पणखा को दंडित किया। इसके प्रतिशोध में रावण ने सीता की सुंदरता से आकर्षित होकर छद्मवेष में कपट से उनका अपहरण कर लिया और उन्हें बचाने आए पक्षीराज जटायु का वध कर दिया।

राम और लक्ष्मण ने जटायु और शबरी को सद्गति देकर वानरराज सुग्रीव से मित्रता की। राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को राजा बनाया। समस्त वानर और रीछ जाति की सहायता से सीता की खोज की गई। राम ने अपने प्रताप से समुद्र पर रामसेतु का निर्माण किया और रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। लंका युद्ध में राम ने कुंभकर्ण, इंद्रजीत और रावण सहित समस्त राक्षस सेना का अंत करके सीता और बंधक देवताओं को मुक्त करवाया। पश्चात सीता और राम का राज्याभिषेक हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम ने 11 हजार वर्ष तक अयोध्या पर सुशासन किया, जिसे "रामराज्य" कहा जाता है।[2] रामराज्य में प्रजा सुखी थी और समाज से अधर्म व अशांति समाप्त हो चुकी थी।[3]

अपने कर्तव्य पूर्ण करने के बाद अपने पुत्रों लव और कुश को राज्य सौंप कर राम ने वैकुंठ गमन किया। राम ने एक आदर्श पुत्र, मित्र, भाई, पति और राजा का कर्तव्य निभाया। राम की यह जीवनगाथा वैष्णव शास्त्रों में विस्तार से उल्लेखित है।[4]

नाम-व्युत्पत्ति एवं अर्थ

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'रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द निष्पन्न होता है।[5] 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' करते हैं, इसलिए 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें ध्याननिष्ठ होते हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं - "रमते कणे कणे इति रामः"। 'विष्णुसहस्रनाम' पर लिखित अपने भाष्य में आद्य शंकराचार्य ने पद्मपुराण का हवाला देते हुए कहा है कि नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे 'राम' हैं।[6]

अवतार रूप में प्राचीनता

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वैदिक साहित्य में 'राम' का उल्लेख प्रचलित रूप में नहीं मिलता है। ऋग्वेद में केवल दो स्थलों पर ही 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है[7] (१०-३-३ तथा १०-९३-१४)। उनमें से एक जगह काले रंग (रात के अंधकार) के अर्थ में[8] तथा एक जगह व्यक्ति के अर्थ में प्रयोग हुआ है[9]; लेकिन वहाँ भी उनके अवतारी पुरुष या दशरथ के पुत्र होने का कोई संकेत नहीं है। यद्यपि नीलकण्ठ चतुर्धर ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों को स्वविवेक से चुनकर उनके रामकथापरक अर्थ किये हैं, परन्तु यह उनकी निजी मान्यता है। ऋग्वेद में एक स्थल पर 'इक्ष्वाकुः' (१०-६०-४) का[10] तथा एक स्थल पर[11] 'दशरथ' (१-१२६-४) शब्द का भी प्रयोग हुआ है, परन्तु उनके राम से सम्बद्ध होने का कोई संकेत नहीं मिल पाता।[12]

ब्राह्मण साहित्य में 'राम' शब्द का प्रयोग ऐतरेय ब्राह्मण में दो स्थलों पर[13] हुआ है; परन्तु वहाँ उन्हें 'रामो मार्गवेयः' कहा गया है, जिसका अर्थ आचार्य सायण के अनुसार 'मृगवु' नामक स्त्री का पुत्र है।[14] शतपथ ब्राह्मण में एक स्थल पर[13] 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है। यहाँ 'राम' यज्ञ के आचार्य के रूप में हैं तथा उन्हें 'राम औपतपस्विनि' कहा गया है।[15] तात्पर्य यह है कि प्रचलित राम का अवतारी रूप वाल्मीकीय रामायण एवं पुराणों की ही देन है।

राम-जन्म, अकबर की रामायण से

राम की कथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ वाल्मीकीय रामायण में राम के जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:-

...................... चैत्रे नावमिके तिथौ।।

नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।[3]

अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर राम का जन्म हुआ।

यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। प्रायः विद्वानों ने राम के जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है।

जन्म-समय पर आधुनिक शोध

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परम्परागत रूप से राम का जन्म त्रेता युग में माना जाता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष होते हैं। चूँकि कलियुग का अभी प्रारंभ ही हुआ है (लगभग 5,500 वर्ष ही बीते हैं) और राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ, अतः परंपरागत रूप से राम का जन्म आज से लगभग 8,80,100 वर्ष पहले माना जाता है।

प्रख्यात शोधकर्ता डॉ॰ पद्माकर विष्णु वर्तक ने अपने ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में मुख्यतः ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके[16] वाल्मीकीय रामायण में उल्लिखित ग्रहस्थिति के अनुसार राम की जन्म-तिथि 4 दिसंबर 7323 ईसापूर्व सुनिश्चित की है।[17]

डॉ॰ वर्तक के शोध के अनेक वर्षों बाद 'आई-सर्व' के एक शोध दल ने राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व में सिद्ध किया। परंतु यह समय संदेहास्पद माना गया क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त सॉफ्टवेयर ईसा पूर्व 3000 से पहले का सही ग्रह-गणित करने में सक्षम नहीं था।[18]

जीवन की प्रमुख घटनाएँ

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बालपन और सीता-स्वयंवर

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पुराणों के अनुसार राम का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। राम के पूर्वज रघु थे।

राम जन्म

राम बचपन से ही शान्‍त स्‍वभाव के वीर पुरूष थे। उन्‍होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया। राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरु वशिष्‍ठ से शिक्षा प्राप्‍त की। किशोरावस्था में गुरु विश्वामित्र उन्‍हें वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गए, जहाँ राम ने ताड़का नामक राक्षसी का वध किया तथा मारीच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान गुरु विश्‍वामित्र उन्हें मिथिला ले गए, जहाँ राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के लिए स्वयंवर आयोजित किया था। राम ने शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे भंग कर दिया और सीता से उनका विवाह हुआ।

धनुष टूटने की ध्वनि सुनकर महर्षि परशुराम वहाँ आ गए और क्रोधित हुए। लक्ष्‍मण से उनका विवाद हुआ, तब राम ने बीच-बचाव किया। इसके पश्चात् राम और सीता सुखपूर्वक अयोध्या में रहने लगे।

सीताराम
सीताराम और लक्ष्मण वनवास के दौरान

राजा दशरथ के वानप्रस्थ लेने का समय आने पर उन्होंने राम को राज्य सौंपने का विचार किया। परंतु कैकेयी की दासी मन्थरा ने कैकेयी को भड़का दिया। कैकेयी ने राजा दशरथ से पूर्व में मिले दो वरों के आधार पर राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजसिंहासन मांग लिया। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राम, उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण वनवास के लिए निकल पड़े।

सीता का हरण

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वनवास के समय, लंका के राजा रावण ने सीता का हरण किया। रामायण के अनुसार, रावण के मामा मारीच ने सुनहरे हिरण का रूप धारण किया। सीता के अनुरोध पर राम उसका पीछा करते हुए दूर चले गए। राम के बाण से मरते हुए मारीच ने राम की आवाज़ में लक्ष्मण को पुकारा। सीता के आग्रह पर लक्ष्मण राम की खोज में गए और सुरक्षा के लिए एक रेखा खींची जिसे लक्ष्मण रेखा कहा जाता है। लक्ष्मण की अनुपस्थिति में रावण ने साधु का वेश धरकर सीता का अपहरण कर लिया।

Ravi_Varma-Ravana_Sita_Jathayu

सीता की खोज में राम और लक्ष्मण की भेंट हनुमान और सुग्रीव से हुई। हनुमान राम के सबसे बड़े भक्त बने।

रावण का वध

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सीता को पुनः प्राप्त करने के लिए राम ने हनुमान, विभीषण और वानर सेना की मदद से रावण और उसकी सेना को पराजित किया। लौटते समय राम ने विभीषण को लंका का राजा नियुक्त किया।

अयोध्या वापसी

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राम का अयोध्या में पुनः आगमन

रावण को परास्त करने के पश्चात् राम, सीता, लक्ष्मण और अन्य वानर पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे। राम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ।

सीताराम का राज्याभिषेक

दैहिक त्याग

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ब्रह्मा द्वारा राम का स्वर्ग मे स्वागत

सीता के भूगर्भ में समा जाने के पश्चात, राम ने अपने दोनों पुत्रों कुश और लव को राज्य सौंप दिया। अंततः उन्होंने सरयू नदी के तट पर गुप्तार घाट में दैहिक त्याग किया और पुनः साकेतधाम में अपने दिव्य स्वरूप में विराजमान हो गए।

संबंधित पृष्ठ

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सन्दर्भ

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  1. "Shri Ram".
  2. "Valmiki Ramayana".
  3. 1 2 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (सटीक), प्रथम भाग, बालकाण्ड- 1.1.97; गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996 ई०, पृष्ठ-57.
  4. गोस्वामी, तुलसीदास (2019). रामचरितमानस. गोरखपुर: गीताप्रेस गोरखपुर.
  5. संस्कृत-हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे।
  6. श्रीविष्णुसहस्रनाम, सानुवाद शांकर भाष्य सहित, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1999, पृष्ठ-143.
  7. ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-348.
  8. ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्य कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-3892.
  9. ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्यजी कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-4406.
  10. ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-79.
  11. वैदिक-पदानुक्रम-कोषः, संहिता विभाग, तृतीय खण्ड, संपादक- विश्वबन्धुजी शास्त्री, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशिआरपुर, संस्करण-1956, पृष्ठ-1550; एवं ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-195.
  12. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-2, संपादक- डॉ० धीरेंद्र वर्मा एवं अन्य, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण-2011, पृष्ठ-497.
  13. 1 2 वैदिक-पदानुक्रमकोषः, ब्राह्मण-आरण्यक विभाग, द्वितीय खण्ड, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लवपुर, संस्करण-1936, पृष्ठ-852.
  14. ऐतरेयब्राह्मणम् (सायण भाष्य एवं हिन्दी अनुवाद सहित) भाग-2, संपादक एवं अनुवादक- डॉ० सुधाकर मालवीय, तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी, संस्करण-1983, पृष्ठ-1201.
  15. शतपथब्राह्मण (सटीक), भाग-1, विजयकुमार गोविंदराम हासानंद, दिल्ली, संस्करण-2010, पृष्ठ-657.
  16. A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.290-300.
  17. A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.300.
  18. इतिहास का उपहास (राम की जन्मतिथि एवं जन्मकुण्डली की भ्रामक व्याख्या का निराकरण), विनय झा, अखिल भारतीय विद्वत् परिषद्, वाराणसी, संस्करण-2015, पृष्ठ-10-11.

बाहरी कड़ियाँ

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