कार्तिकेय

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कार्तिकेय
युद्ध और विजय के देवता, देवताओं के सेनापति
Gombak Selangor Batu-Caves-01.jpg
बातू गुफाओं, मलेशिया का प्रवेश द्वार, जहाँ भगवान मुरुगन की विशाल प्रतिमा है
अन्य नाम स्कन्द , कुमार , पार्वतीनन्दन , शिवसुत , गौरीपुत्र , षडानन आदि
संबंध देव
मंत्र ॐ कर्तिकेयाय विद्महे वल्लीनाथाय धीमहि तन्नो कार्तिकेय प्रचोदयात् ||
अस्त्र धनुष, भाला
युद्ध तारकासुर युद्ध
जीवनसाथी देवसेना और वल्ली
माता-पिता
भाई-बहन गणेश अशोक सुंदरी , मनसा देवी , ज्योति और भगवान अय्यपा
सवारी मोर
त्यौहार स्कन्दषष्ठी

कार्तिकेय या मुरुगन (तमिल: முருகன்), एक लोकप्रिय हिन्दु देव हैं और इनके अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिल नाडु में की जाती है इसके अतिरिक्त विश्व में जहाँ कहीं भी तमिल निवासी/प्रवासी रहते हैं जैसे कि श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी यह पूजे जाते हैं। इनके छ: सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिल नाडु में स्थित हैं। तमिल इन्हें तमिल कडवुल यानि कि तमिलों के देवता कह कर संबोधित करते हैं। यह भारत के तमिल नाडु राज्य के रक्षक देव भी हैं। ये भगवान शिव की छ: और माता पार्वती की पांच में संतानों में सबसे बड़े हैं । इनके छोटे भाई बहन हैं देवी अशोकसुन्दरी , भगवान अय्यपा , देवी ज्योति , देवी मनसा और भगवान गणेश हैं। इनकी दो पत्नियां हैं जिनके नाम हैं देवसेना और वल्ली । देवसेना देवराज इंद्र की पुत्री हैं जिन्हें छठी माता के नाम से भी जाना जाता है। वल्ली एक आदिवासी राजा की पुत्री हैं ।

कार्तिकेय जी भगवान शिव और भगवती पार्वती के पुत्र हैं । ऋषि जरत्कारू और राजा नहुष के बहनोई हैं और जरत्कारू और इनकी छोटी बहन मनसा देवी के पुत्र महर्षि आस्तिक के मामा ।

भगवान कार्तिकेय छ: बालकों के रूप में जन्मे थे तथा इनकी देखभाल कृतिका (सप्त ऋषि की पत्निया) ने की थी, इसीलिए उन्हें कार्तिकेय धातृ भी कहते हैं।

कार्तिकेय के जन्म की कथा[संपादित करें]

स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव के दिये वरदान के कारण अधर्मी दैत्य तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली हो चुका था। वरदान के अनुसार केवल शिवपुत्र ही उसका वध कर सकता था।[1] और इसी कारण वह तीनों लोकों में हाहाकार मचा रहा था। इसीलिए सारे देवता भगवान विष्णु के पास जा पहुँचे। भगवान विष्णु ने उन्हें सुझाव दिया की वे कैलाश जाकर भगवान शिव से पुत्र उत्पन्न करने की विनती करें। विष्णु की बात सुनकर समस्त देवगण जब कैलाश पहुंचे तब उन्हें पता चला कि शिवजी और माता पार्वती तो विवाह के पश्चात से ही देवदारु वन में एकांतवास के लिए जा चुके हैं। विवश व निराश देवता जब देवदारु वन जा पहुंचे तब उन्हें पता चला की शिवजी और माता पार्वती वन में एक गुफा में निवास कर रहे हैं। देवताओं ने शिवजी से मदद की गुहार लगाई किंतु कोई लाभ नहीं हुआ, भोलेभंडारी तो कामपाश में बंधकर अपनी अर्धांगिनी के साथ सम्भोग करने में रत थे। उनको जागृत करने के लिए अग्नि देव ने उनकी कामक्रीड़ा में विघ्न उत्पन्न करने की ठान ली। अग्निदेव जब गुफा के द्वार तक पहुंचे तब उन्होने देखा की शिव शक्ति कामवासना में लीन होकर सहवास में तल्लीन थे, किंतु अग्निदेव के आने की आहट सुनकर वे दोनों सावधान हो गए। सम्भोग के समय परपुरुष को समीप पाकर देवी पार्वती ने लज्जा से अपना सुंदर मुख कमलपुष्प से ढक लिया। देवी का वह रूप लज्जा गौरी के नाम से प्रसिद्द हो गया। कामक्रीड़ा में मग्न शिव जी ने जब अग्निदेव को देखा तब उन्होने भी सम्भोग क्रीड़ा त्यागकर अग्निदेव के समक्ष आना पड़ा। लेकिन इतने में कामातुर शिवजी का अनजाने में ही वीर्यपात हो गया। अग्निदेव ने उस अमोघ वीर्य को कबूतर का रूप धारण करके ग्रहण कर लिया व तारकासुर से बचाने के लिए उसे लेकर जाने लगे। किंतु उस वीर्य का ताप इतना अधिक था की अग्निदेव से भी सहन नहीं हुआ। इस कारण उन्होने उस अमोघ वीर्य को गंगादेवी को सौंप दिया। जब देवी गंगा उस दिव्य अंश को लेकर जाने लगी तब उसकी शक्ति से गंगा का पानी उबलने लगा। भयभीत गंगादेवी ने उस दिव्य अंश को शरवण वन में लाकर स्थापित कर दिया किंतु गंगाजल में बहते बहते वह दिव्य अंश छह भागों में विभाजित हो गया था। भगवान शिव के शरीर से उत्पन्न वीर्य के उन दिव्य अंशों से छह सुंदर व सुकोमल शिशुओं का जन्म हुआ। उस वन में विहार करती छह कृतिका कन्याओं की दृष्टि जब उन बालकों पर पडी तब उनके मन में उन बालकों के प्रति मातृत्व भाव जागा। और वो सब उन बालकों को लेकर उनको अपना स्तनपान कराने लगी। उसके पश्चात वे सब उन बालकोँ को लेकर कृतिकालोक चली गई व उनका पालन पोषण करने लगीं। जब इन सबके बारे में नारद जी ने शिव पार्वती को बताया तब वे दोनों अपने पुत्र से मिलने के लिए व्याकुल हो उठे, व कृतिकालोक चल पड़े। जब माँ पार्वती ने अपने छह पुत्रों को देखा तब वो मातृत्व भाव से भावुक हो उठी, और उन्होने उन बालकों को इतने ज़ोर से गले लगा लिया की वे छह शिशु एक ही शिशु बन गए जिसके छह शीश थे। तत्पश्चात शिव पार्वती ने कृतिकाओं को सारी कहानी सुनाई और अपने पुत्र को लेकर कैलाश वापस आ गए। कृतिकाओं के द्वारा लालन पालन होने के कारण उस बालक का नाम कार्तिकेय पड़ गया। कार्तिकेय ने बड़ा होकर दैत्य तारकासुर का संहार किया।

कार्तिकेय का विवाह

एक बार भगवान शंकर के पुत्र गणेश और कार्तिकेय विवाह योग्य हुए तब दोनों में विवाद हो गया कि कौन पहले विवाह करेगा इस विवाद में कार्तिकेय ने कहा कि "अनुज गणेश तुम मुझसे छोटे हो अत: मैं तुम से पहले विवाह करूँगा" | तब ये बात सुनकर गणेश बोले कि "नहीं भैया मैं आप से छोटा हूँ अत: मेरा विवाह पहले होगा " अपने पुत्रों में इस प्रकार विवाद देखकर भगवान शिव और माता पार्वती भी आ गए | तब कार्तिकेय और गणेश ने अपने माता पिता को ही निर्णय लेने को कहा | तब भगवान शिव ने घोषणा की कि " तुम में से जो भी पृथ्वी की सात बार परिक्रमा करकर आएगा उसी का विवाह पहले किया जायेगा" | ये घोषणा सुनकर कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर पृथ्वी पर रवाना होने के लिए निकल पड़े | गणेश ने अपने माता पिता को ही संसार मानकर उनकी परिक्रमा सात बार कर दी | तब गणेश का विवाह पहले हुआ जब कुछ दिनों बाद कार्तिकेय वापिस कैलाश पर्वत पर आए तब उन्हें दो सुन्दर युवतियां दिखी और उन्होंने उन्हें प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया तब कार्तिकेय सोच में पड़ गए कि ये दोनों युवतियां कौन हैं ? जब उन्होंने अपने पिता भगवान शंकर के पास जाकर पूछा तो भगवान शंकर ने उत्तर दिया कि ये गणेश की वधुएँ और विश्वकर्मा की पुत्री रिद्धि सिद्धि हैं | तब भगवान कार्तिकेय इस बात से नाराज हो गए और अपने माता पिता से कहा "कि गणेश ने तो पृथ्वी की परिक्रमा तो की ही नहीं तो अपने इसका विवाह कैसे किया ?" तब गणेश जी ने विनम्रता से उत्तर दिया "कि भैया माता पिता में ही सारा संसार और तीर्थ निहित होते हैं इसलिए मैंने माँ और पिताश्री की सात बार परिक्रमा कर दी " | भगवान कार्तिकेय ने ये बात छुककर स्वीकार कर ली और से प्रण लिया "कि मैं आजीवन अविवाहित ही रहूँगा" | इसके बाद कार्तिकेय दक्षिण भारत में चले गए तत्पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती सोचने लगे "कि एक पुत्र का विवाह तो कर दिया किन्तु दूसरे का नहीं हुआ और ये उसके साथ ठीक नहीं हुआ उन्होंने पहले गणेश को भेजा किन्तु गणेश उनका प्रण खंडित करने में असमर्थ रहे तत्पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती स्वयं कार्तिकेय के पास गए और उनका प्रण खंडित करने में सफ़ल हो गए | भगवान कार्तिकेय ने अपने माता पिता के सामने ये शर्त रखी कि "मैं विवाह करने के लिए तत्पर हूँ किन्तु मेरी पत्नी से संतान नहीं उत्त्पन होगी" इसके पश्चात् कार्तिकेय का विवाह इन्द्रदेव की पुत्री देवसेना और एक आदिवासी राजा की पुत्री वल्ली से हुआ |

देव असुर युद्ध में देवो के सेनापति के रूप में। दक्षिण भारत में युवा और बाल्य रूप में पूजा जाता है।

वरदान

कार्तिकेय को देवताओ से सदैव युवा रहने का वरदान प्राप्त था।

विविध

  • षण्मुख, द्विभुज, शक्तिघर, मयूरासीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित हैं ये ब्रह्मपुत्री देवसेना-षष्टी देवी के पति होने के कारण सन्तान प्राप्ति की कामना से तो पूजे ही जाते हैं, इनको नैष्ठिक रूप से आराध्य मानने वाला सम्प्रदाय भी है।
  • तारकासुर के अत्याचार से पीड़ित देवताओं पर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने पार्वती जी का पाणिग्रहण किया। भगवान शंकर भोले बाबा ठहरे। उमा के प्रेम में वे एकान्तनिष्ठ हो गये। अग्निदेव सुरकार्य का स्मरण कराने वहाँ उज्ज्वल कपोत वेश से पहुँचे। उन अमोघ वीर्य का रेतस धारण कौन करे? भूमि, अग्नि, गंगादेवी सब क्रमश: उसे धारण करने में असमर्थ रहीं। अन्त में शरवण (कास-वन) में वह निक्षिप्त होकर तेजोमय बालक बना। कृत्तिकाओं ने उसे अपना पुत्र बनाना चाहा। बालक ने छ: मुख धारण कर छहों कृत्तिकाओं का स्तनपान किया। उसी से षण्मुख कार्तिकेय हुआ वह शम्भुपुत्र। देवताओं ने अपना सेनापतित्व उन्हें प्रदान किया। तारकासुर उनके हाथों मारा गया।
  • स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय (स्कन्द) ही हैं। समस्त भारतीय तीर्थों का उसमें माहात्म्य आ गया है। पुराणों में यह सबसे विशाल है।
  • स्वामी कार्तिकेय सेनाधिप हैं। सैन्यशक्ति की प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन इनकी कृपा से सम्पन्न होता है। ये इस शक्ति के अधिदेव हैं। धनुर्वेद पद इनकी एक संहिता का नाम मिलता है, पर ग्रन्थ प्राप्य नहीं है।

कार्तिकेय के नाम[संपादित करें]

संस्कृत ग्रंथ अमरकोष के अनुसार कार्तिकेय के निम्न नाम हैं:

  • 1. कार्तिकेय
  • 2. महासेन
  • 3. शरजन्मा
  • 4. षडानन
  • 5. पार्वतीनन्दन
  • 6. स्कन्द
  • 7. सेनानी
  • 8. अग्निभू
  • 9. गुह
  • 10. बाहुलेय
  • 11. तारकजित्
  • 12. विशाख
  • 13. शिखिवाहन
  • 14. शक्तिश्वर
  • 15. कुमार
  • 16. क्रौंचदारण
  • 17॰ थिरुचनदूर मुर्गा
  • 18 देवदेव
  • 19 विश्वेश
  • 20 योगेश्वर
  • 21शिवात्मज
  • 21आदिदेव
  • 22विष्णु
  • 23महासेन
  • 24इश्वर
  • 25परब्रह्म
  • 26स्वामिनाथ
  • 27अग्निभू
  • 28वल्लिवल्लभ
  • 29महारुद्र
  • 30ज्ञानगम्य
  • 31गुहा
  • 32सर्वेश्वर
  • 33प्रभु
  • 34भुतेश
  • 35शंकर
  • 36शिव
  • 36ब्रम्ह
  • 37शिवसुत

परिवार[संपादित करें]

पिता - भगवान शिव
माता - भगवती पार्वती
भाई - गणेश ,अय्यपा ( छोटे भाई)
बहन - अशोकसुन्दरी , मनसा देवी और देवी ज्योति सभी छोटी बहन
पत्नी - देवसैना (षष्ठी देवी), इंद्रदेव की पुत्री एवं वल्ली
वाहन - मोर (संस्कृत - शिखि)
बालपन में इनकी देखभाल कृतिका (सप्तर्षि की पत्नियाँ) ने की थी।

अस्त्र[संपादित करें]

माँ पार्वती द्वारा दी गयी उनकी शक्तियों से परिपूर्ण अस्त्र का नाम वेल है।

विश्व में उपस्थिति[संपादित करें]

बातू गुफाएँ जो की मलेशिया के गोम्बैक जिले में स्थित एक चूना पत्थर की पहाड़ी है वहां, भगववान मुरुगन की विश्व में सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा स्थित है जिसकी ऊंचाई 42.7 मीटर (140 फिट) है।

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध कार्तिकेय मंदिर : थिरुथनी, पलानी मुरूगन , शिवा सुबरमनीय स्वामी, रत्नागिरी, कुमुरकन्दन, थिरूपोरुर्कंसवामी, स्वामीनाथस्वामी, थिरुपपरमकुनरम, पज़्हमुदिर्चोलाई, स्वामीमली, तिरुचेंदूर , मरुदमली, वेल्लिमलाई

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का दर्शन करना महिलाओं के लिए मना, दर्शन किए तो सात जन्म तक रहेंगी विधवा..." Patrika News (hindi में). अभिगमन तिथि 2020-08-28.सीएस1 रखरखाव: नामालूम भाषा (link)