कार्तिकेय

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कार्तिकेय
युद्ध और विजय के देवता, देवताओं के सेनापति
Murugan by Raja Ravi Varma.jpg
राजा रवि वर्मा द्वारा बनाया कार्तिकेय (मुरुगन) का चित्र
संबंध हिंदु देव
अस्त्र धनुष, भाला
सवारी मोर

कार्तिकेय या मुरुगन (तमिल: முருகன்), एक लोकप्रिय हिन्दु देव हैं और इनके अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिल नाडु में की जाती है इसके अतिरिक्त विश्व में जहाँ कहीं भी तमिल निवासी/प्रवासी रहते हैं जैसे कि श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी यह पूजे जाते हैं। इनके छ: सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिल नाडु में स्थित हैं। तमिल इन्हें तमीज़ कादुवुल यानि कि तमिलों के देवता कह कर संबोधित करते हैं। यह भारत के तमिल नाडु राज्य के रक्षक देव भी हैं।

बातू गुफ़ाओं, मलेशिया का प्रवेश द्वार, जहाँ भगवान मुरुगन की विशाल प्रतिमा है

कार्तिकेय जी भगवान शिव और भगवती पार्वती के पुत्र हैं तथा सदैव बालक रूप ही रहते हैं। परंतु उनके इस बालक स्वरूप का भी एक रहस्य है।

भगवान कार्तिकेय छ: बालकों के रूप में जन्मे थे तथा इनकी देखभाल कृतिका (सप्त ऋषि की पत्निया) ने की थी, इसीलिए उन्हें कार्तिकेय धातृ भी कहते हैं।

कार्तिकेय के जन्म की कथा[संपादित करें]

स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव के दिये वरदान के कारण अधर्मी राक्षस तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली हो चुका था। वरदान के अनुसार केवल शिवपुत्र ही उसका वध कर सकता था। और इसी कारण वह तीनोँ लोकोँ मेँ हाहाकार मचा रहा था। इसीलिए सारे देवता भगवान विष्णु के पास जा पहूँचे। भगवान विष्णु ने उन्हेँ सुझाव दिया की वे कैलाश जाकर भगवान शिव से पुत्र उत्पन्न करने की विनंती करे। विष्णु की बात सुनकर समस्त देवगण जब कैलाश पहुंचे तब उन्हेँ पता चला कि शिवजी और माता पार्वती तो विवाह के पश्चात से ही देवदारु वन एकांतवास के लिए जा चुके हैँ। विवश व निराश देवता जब देवदारु वन जा पहुंचे तब उन्हेँ पता चला की शिवजी और माता पार्वती वन मेँ एक गुफा मेँ निवास कर रहे हैँ। देवताओँ ने शिवजी से मदत की गुहार लगाई किँतु कोई लाभ नहीँ था, भोलेभंडारी तो कामपाश मेँ बंधकर अपनी अर्धाँगिनी के साथ सम्भोग करने मेँ रत थे। उनको जागृत करने के लिए अग्नि देव ने उनकी कामक्रीड़ा मे विघ्न उत्पन्न करने की ठान ली। अग्निदेव जब गुफा के द्वार तक पहुंचे तब उन्होँने देखा की शिव शक्ती कामवासना मे लीन होकर सहवास मेँ तल्लीन थे, किँतु अग्निदेव के आने की आहट सुनकर वे दोनोँ सावधान हो गए। सम्भोग के समय परपुरुष को समीप पाकर देवी पार्वती ने लज्जा से अपना सुंदर मुख कमलपुष्प से ढक लिया। देवी का वह रुप लज्जा गौरी के नाम से प्रसिद्द हो गया। कामक्रिड़ा मेँ मग्न शिव जी ने जब अग्निदेव को देखा तब उन्हेँ भी सम्भोग क्रिडा त्यागकर अग्निदेव के समक्ष आना पड़ा। लेकिन इतने मेँ कामातुर शिवजी का अनजाने मेँ वीर्यपात हो गया। अग्निदेव ने उस अमोघ वीर्य को कबुतर का रुप धारण करके ग्रहण कर लिया व तारकासुर से बचाने के लिए उसे लेकर जाने लगे। किँतु उस वीर्य का ताप इतना अधिक था की अग्निदेव से भी सहन नहीँ हुआ। इस कारण उन्होँने उस अमोघ वीर्य को गंगादेवी को सौँप दिया। जब देवी गंगा उस दिव्य अंश को लेकर जाने लगी तब उसकी शक्ती से गंगा का पानी उबलने लगा। भयभीत गंगादेवी ने उस दिव्य अंश को शरवण वन मेँ लाकर स्थापित कर दिया किँतु गंगाजल मेँ बहते बहते वह दिव्य अंश छह भागोँ मे विभाजित हो गया था। भगवान शिव के शरीर से उत्पन्न वीर्य के उन दिव्य अंशोँ से छह सुंदर व सुकोमल शिशुओँ का जन्म हुआ। उस वन मेँ विहार करती छह कृतिका कन्याओँ की दृष्टी जब उन बालकोँ पर पडी तब उनके मन मे उन बालकोँ के प्रति मातृत्व भाव जागा। और वो सब उन बालकोँ को लेकर उनको अपना स्तनपान कराने लगी। उसके पश्चात वे सब उन बालकोँ को लेकर कृतिकालोक चली गई व उनका पालन पोषण करने लगीँ। जब इन सबके बारे मेँ नारद जी ने शिव पार्वती को बताया तब वे दोनोँ अपने पुत्र से मिलने के लिए व्याकुल हो उठे, व कृतिकालोक चल पड़े। जब माँ पार्वती ने अपने छह पुत्रोँ को देखा तब वो मातृत्व भाव से भावुक हो उठी, और उन्होने उन बालकोँ को इतने ज़ोर से गले लगा लिया की वे छह शिशु एक ही शिशु बन गए जिसके छह शीश थे। तत्पश्चात शिव पार्वती ने कृतिकाओँ को सारी कहानी सुनाई और अपने पुत्र को लेकर कैलाश वापस आ गए। कृतिकाओँ के द्वारा लालन पालन होने के कारण उस बालक का नाम कार्तिकेय पड़ गया। कार्तिकेय ने बडा होकर राक्षस तारकासुर का संहार किया।

विविध[संपादित करें]

  • षण्मुख, द्विभुज, शक्तिघर, मयूरासीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित हैं ये ब्रह्मपुत्री देवसेना-षष्टी देवी के पति होने के कारण सन्तान प्राप्ति की कामना से तो पूजे ही जाते हैं, इनको नैष्ठिक रूप से आराध्य मानने वाला सम्प्रदाय भी है।
  • तारकासुर के अत्याचार से पीड़ित देवताओं पर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने पार्वती जी का पाणिग्रहण किया। भगवान शंकर भोले बाबा ठहरे। उमा के प्रेम में वे एकान्तनिष्ठ हो गये। अग्निदेव सुरकार्य का स्मरण कराने वहाँ उज्ज्वल कपोत वेश से पहुँचे। उन अमोघ वीर्य का रेतस धारण कौन करे? भूमि, अग्नि, गंगादेवी सब क्रमश: उसे धारण करने में असमर्थ रहीं। अन्त में शरवण (कास-वन) में वह निक्षिप्त होकर तेजोमय बालक बना। कृत्तिकाओं ने उसे अपना पुत्र बनाना चाहा। बालक ने छ: मुख धारण कर छहों कृत्तिकाओं का स्तनपान किया। उसी से षण्मुख कार्तिकेय हुआ वह शम्भुपुत्र। देवताओं ने अपना सेनापतित्व उन्हें प्रदान किया। तारकासुर उनके हाथों मारा गया।
  • स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय (स्कन्द) ही हैं। समस्त भारतीय तीर्थों का उसमें माहात्म्य आ गया है। पुराणों में यह सबसे विशाल है।
  • स्वामी कार्तिकेय सेनाधिप हैं। सैन्यशक्ति की प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन इनकी कृपा से सम्पन्न होता है। ये इस शक्ति के अधिदेव हैं। धनुर्वेद पद इनकी एक संहिता का नाम मिलता है, पर ग्रन्थ प्राप्य नहीं है।

कार्तिकेय के नाम[संपादित करें]

संस्कृत ग्रंथ अमरकोष के अनुसार कार्तिकेय के निम्न नाम हैं:

  • 1. कार्तिकेय
  • 2. महासेन
  • 3. शरजन्मा
  • 4. षडानन
  • 5. पार्वतीनन्दन
  • 6. स्कन्द
  • 7. सेनानी
  • 8. अग्निभू
  • 9. गुह
  • 10. बाहुलेय
  • 11. तारकजित्
  • 12. विशाख
  • 13. शिखिवाहन
  • 14. शक्तिश्वर
  • 15. कुमार
  • 16. क्रौञ्चदारण

परिवार[संपादित करें]

पिता - भगवान शिव
माता - भगवती पार्वती
भाई - गणेश (छोटे भाई)
बहन - अशोक सुन्दरी
पत्नि - देवसेना (कुमारी)
वाहन - मोर (संस्कृत - शिखि)
बालपन में इनकी देखभाल कृतिका (सप्तर्षि की पत्नियाँ) ने की थी।

विश्व में उपस्थिति[संपादित करें]

बातू गुफाएँ जो की मलेशिया के गोम्बैक जिले में स्थित एक चूना पत्थर की पहाड़ी है वहां, भगववान मुरुगन की विश्व में सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा स्थित है जिसकी ऊंचाई 42.7 मीटर (140 फिट) है।