मोर

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

पंखो को फैलाए हुए मोर को कार्तिकेय (मुरुगन) का वाहन माना जाता है। प्रख्यात चित्रकार मोर अथवा मयूर एक पक्षी है जिसका मूलस्थान दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी एशिया में है। ये ज़्यादातर खुले वनों में वन्यपक्षी की तरह रहते हैं। नीला मोर भारत और श्रीलंका का राष्ट्रीय पक्षी है। नर की एक ख़ूबसूरत और रंग-बिरंगी फरों से बनी पूँछ होती है, जिसे वो खोलकर प्रणय निवेदन के लिए नाचता है, विशेष रूप से बसन्त और बारिश के मौसम में। मोर की मादा मोरनी कहलाती है। जावाई मोर हरे रंग का होता है।

बरसात के मौसम में काली घटा छाने पर जब यह पक्षी पंख फैला कर नाचता है तो ऐसा लगता मानो इसने हीरों से जरी शाही पोशाक पहनी हुई हो; इसीलिए मोर को पक्षियों का राजा कहा जाता है। पक्षियों का राजा होने के कारण ही प्रकृति ने इसके सिर पर ताज जैसी कलंगी लगायी है। मोर के अद्भुत सौंदर्य के कारण ही भारत सरकार ने 26 जनवरी,1963 को इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया। हमारे पड़ोसी देश म्यांमार का राष्ट्रीय पक्षी भी मोर ही है। ‘फैसियानिडाई’ परिवार के सदस्य मोर का वैज्ञानिक नाम ‘पावो क्रिस्टेटस’ है। अंग्रेजी भाषा में इसे ‘ब्ल्यू पीफॉउल’ अथवा ‘पीकॉक’ कहते हैं। संस्कृत भाषा में यह मयूर के नाम से जाना जाता है। मोर भारत तथा श्रीलंका में बहुतायत में पाया जाता है। मोर मूलतः वन्य पक्षी है, लेकिन भोजन की तलाश इसे कई बार मानव आबादी तक ले आती है।

मोर प्रारम्भ से ही मनुष्य के आकर्षण का केन्द्र रहा है। अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को उच्च कोटी का दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्त्व को दर्शाता है। महाकवि कालिदास ने महाकाव्य ‘मेघदूत’ में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी अधिक ऊँचा स्थान दिया है। राजा-महाराजाओं को भी मोर बहुत पसंद रहा है। प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य में जो सिक्के चलते थे, उनके एक तरफ मोर बना होता था। मुगल बादशाह शाहजहाँ जिस तख्त पर बैठते थे, उसकी संरचना मोर जैसी थी। दो मोरों के मध्य बादशाह की गद्दी थी तथा पीछे पंख फैलाये मोर। हीरों-पन्नों से जरे इस तख्त का नाम तख्त-ए-ताऊस’ रखा गया। अरबी भाषा में मोर को ‘ताऊस’ कहते हैं।

मोर पंख)

नर मोर की लम्बाई लगभग २१५ सेंटीमीटर तथा ऊँचाई लगभग ५० सेंटीमीटर होती है। मादा मोर की लम्बाई लगभग ९५ सेंटीमीटर ही होती है। नर और मादा मोर की पहचान करना बहुत आसान है। नर के सिर पर बड़ी कलंगी तथा मादा के सिर पर छोटी कलंगी होती है। नर मोर की छोटी-सी पूँछ पर लम्बे व सजावटी पंखों का एक गुच्छा होता है। मोर के इन पंखों की संख्या १५० के लगभग होती है। मादा पक्षी के ये सजावटी पंख नहीं होते। वर्षा ऋतु में मोर जब पूरी मस्ती में नाचता है तो उसके कुछ पंख टूट जाते हैं। वैसे भी वर्ष में एक बार अगस्त के महीने में मोर के सभी पंख झड़ जाते हैं। ग्रीष्म-काल के आने से पहले ये पंख फिर से निकल आते हैं। मुख्यतः मोर नीले रंग में पाया जाता है, परन्तु यह सफेद, हरे, व जामुनी रंग का भी होता है। इसकी उम्र २५ से ३० वर्ष तक होती है। मोरनी घोंसला नहीं बनाती, यह जमीन पर ही सुरक्षित स्थान पर अंडे देती है।

शशि शर्मा पत्रकार हरिद्वार:- मोरनी एक बार में पांच से सात बच्चों को अंडों से जन्म देती है इनमें नर बच्चे अपने जन्म स्थान के आसपास ही रुक जाते हैं और मादा बच्चे अपनी मां के साथ जन्म के कुछ माह बाद माइग्रेट कर जाते हैं, कहां जाते हैं मुझे नहीं मालूम लेकिन जो मैं पिछले पांच सालों से मोरों का व्यवहार देख रही हूं उसी के आधार पर लिख रही हूं। मोरनियां समूह में रहती हैं और मोर अलग अलग रहते हैं, लेकिन एक दो में गुट बनाते हैं जिनमें खाने और मोरनियों को अपनी तरफ आकर्षित करने में झगड़ा और मारामारी भी होती है। इन दिनों मोरों की प्रजनन रुत है पिछले एक सप्ताह से मोरनियों का झुंड आया हुआ है, पिछले साल पांच मोरनियां थीं इस साल आठ से दस मोरनियां आई हुई है,मोरनियों का स्वर कर्कश और ऐसा होता है जैसे ट्रक का हार्न बज रहा हो, जबकि मोर पीयू पीयू की आवाज निकालता है,मोरनियों की लीडर बाकी सबको आवाज लगा कर समूह में बांधे रखती हैं,छाती पर सफेद रंग का निशान और ग्रे रंग के पंख मोरनी की पहचान होती है। एक मिथक है कि मोर बादल देखता है तो नाचता है ऐसा नहीं है,मोर दो कारणों से पंख फैलाता है पहला फ़रवरी के अंत से अप्रैल की शुरुआत तक मोरनियों को आकर्षित करने के लिए और दूसरा बारिश के बाद अपने गीले पंखों को सुखाने के लिए फैलाते हैं। इन दिनों रोज दिन में कई बार मोर नाचते हैं, बशर्ते आसपास मोरनियों की मौजूदगी हो। सम्पूर्ण म्यूर नृत्य का आनन्द लिजिए। मोर के पंख आठ प्रकार के देखें हैं मैंने, विषेशज्ञों का क्या कहना है मुझे नहीं मालूम, मोर के एक पंखों का प्रकार तो वो है जो हमें सामने सजीला नजर आता है,जिसे हम मोर पंख कहते हैं, नाचते मोर के इन पंखों को खडे करने में सहायक होते हैं एक सफेद,ग्रे रंग का सख्त पंखों का एक पंखे नुमा सैट जिनसे मोर अपनी आतुरता का प्रर्दशन करता है तो झनकार की आवाज निकालती है,इन सख्त पंखों को सफेद छोटे-छोटे पंखों की एक गद्दी सम्भालती है,इस गद्दी के नीचे दोनों ओर होते हैं सफेद काली धारियों वाले पंख जो राते में कहीं मिल जायें तो हम चील या बाज के पंख समझेंगे और उसके नीचे काले रंग के लगभग डेढ फुट लम्बे काले पंख और उनके नीचे होते हैं भूरे रंग के पंख जो मोर में एक तरह की झरझराहट पैदा करते हुए नृत्य में सहायक बनते हैं, इसके अलावा गर्दन के सुंदर छोट करीने से सजे नीले पंख मोर नाचते हुए बार बार गर्दन को ऐसे झुकाता है जैसे मोरनी को निकट आने का आमंत्रण दे रहा हो या फिर अपने पैरों को देखने की कोशिश कर रहा हो, शायद मोर के इसी उपक्रम को देख कर ये कहा गया कि मोर नाचते हुए अपने पैरों का काला रंग देखता है और रोता है, लेकिन मोर के पैर काले होते ही नहीं, उसके पैर सफेद होते हैं,निशेचन अथवा अश्रुपान अभी पहेली ही है जो दुर्लभ दृश्य भी हो सकता है। शशि शर्मा पत्रकार हरिद्वार

चित्र दीर्घा[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]