मुहम्मद

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हज़रत मुह़म्मद
[सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम]
محمد صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم

इस्लाम के पैग़म्बर
Al-Masjid AL-Nabawi Door.jpg
अरबी सुलेख में मुहम्मद का नाम
जन्म मुह़म्मद इब्न अ़ब्दुल्लाह
५७०
मक्का (शहर), मक्का प्रदेश, अरब
(अब सऊदी अरब)
मृत्यु 8 जून 632(632-06-08) (उम्र 62)
यस्रिब, अरब (अब मदीना, हेजाज़, सऊदी अरब)
मृत्यु का कारण बुख़ार
स्मारक समाधि मस्जिद ए नबवी, मदीना, हेजाज़, सऊ़दी अ़रब
अन्य नाम मुसतफ़ा, अह़मद, ह़ामिद मुहम्मद के नाम
जातीयता क़ुरैश क़बीला, अरब लोग, बनू हाशिम
धार्मिक मान्यता इस्लाम
जीवनसाथी पत्नी: खदीजा बिन्त खुवायलद (५९५–६१९)
सोदा बिन्त ज़मआ (६१९–६३२)
आयशा बिन्त अबी बक्र (६१९–६३२)
हफ्सा बिन्त उमर (६२४–६३२)
ज़ैनब बिन्त खुज़ैमा (६२५–६२७)
हिन्द बिन्त अवि उमय्या (६२९–६३२)
ज़ैनब बिन्त जहाश (६२७–६३२)
जुवय्रिआ बिन्त अल-हरिथ (६२८–६३२)
राम्लाह बिन्त अवि सुफ्याँ (६२८–६३२)
रय्हना बिन्त ज़यड (६२९–६३१)
सफिय्या बिन्त हुयाय्य (६२९–६३२)
मयुमा बिन्त अल-हरिथ (६३०–६३२)
मरिया अल-क़ीब्टिय्या (६३०–६३२)
बच्चे बेटे अल-क़ासिम, `अब्द-अल्लाह, इब्राहिम
बेटियाँ: जैनाब, रुक़य्याह, उम्कु ल्थूम, फ़ातिमः ज़हरा
माता-पिता पिता अब्दुल्लह इब्न अब्दुल मुत्तलिब
माता आमिना बिन्त वहब
संबंधी अहल अल-बैत

हज़रत मुहम्मद (محمد صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم) - "मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल मुत्तलिब" का जन्म सन ५७० ईसवी में हुआ था। इन्होंने इस्लाम धर्म का प्रवर्तन किया। ये इस्लाम के सबसे महान नबी और आख़िरी सन्देशवाहक (अरबी: नबी या रसूल, फ़ारसी : पैग़म्बर) माने जाते हैं जिन को अल्लाह ने फ़रिश्ते जिब्रईल द्वारा क़ुरआन का सन्देश' दिया था। मुसलमान इनके लिये परम आदर भाव रखते हैं।

परिचय[संपादित करें]

पैग़म्बर : हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम)

हज़रत मुहम्मद का जन्म मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार अरब के रेगिस्तान के शहर मक्काह में 8 जून ,570 ई. को हुआ। ‘मुहम्मद’ का अर्थ होता है ‘जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो'। इनके पिता का नाम अब्दुल्लाह और माता का नाम बीबा आमिनाह है।

नाम और कुरान में प्रश्ंसा[संपादित करें]

नाम "मुहम्मद" इस्लामी लिपीकला "सुलुस" लिपी में लिखा गया है।

मुहम्मद (/mʊˈhæmədˌ-ˈhɑːməd/)[1] का अर्थ "प्रशंसा के क़ाबिल"। यह शब्द कुरान में चार जगह पर आया है। [2] क़ुरान में मुहम्मद का ज़िक्र "प्रेशित", "वार्ताहर", "ईश्वर दूत", "ईश्वर दास", "एलान करने वाला" [Qur'an 2:119], "गवाह" (शाहिद), [Qur'an 33:45] "सुवार्ता सुनाने वाला", "चेतावनी देने वाला" [Qur'an 11:2] "याद दिलाने वाला" [Qur'an 88:21] "ईश्वर की तरफ़ बुलाने वाला" (दाई),[Qur'an 12:108] "तेजस्वी" (नूर)[Qur'an 05:15], और "कांती (रौशनी) देने वाला (सिराज मुनीर) [Qur'an 33:46] जैसे नामों से होता है। मुहम्मद को क़ुरान में "अय चादर औढ्ने वाले" (मुज़म्मिल) 73:1 और "चादर में बैठने वाले" (मुदस्सिर) 74:1.[3] क़ुरान के सूरा अहज़ब में मुहम्मद को "आखरी नबी" और "खातिमुन नबी" या "अंतिम प्रवक्ता या प्रेशित" के नाम से संभोदित किया गया है। [4] क़ुरान में मुहम्मद को "अहमद" के नाम से (ज़्यादा प्रशंसनीय) से भी संभोदित किया है (अरबी: أحمد‎, सूरा "अस-सफ़" 61:6).[5]

हिजरत[संपादित करें]

अंत में सन् 622 में उन्हें अपने अनुयायियों के साथ मक्का से मदीना के लिए कूच करना पड़ा। इस यात्रा को हिजरत कहा जाता है और यहीं से इस्लामी कैलेंडर हिजरी की शुरुआत होती है। मदीना में उनका स्वागत हुआ और कई संभ्रांत लोगों द्वारा स्वीकार किया गया। मदीना के लोगों की ज़िंदगी आपसी लड़ाईयों से परेशान-सी थी और मुहम्मद स० के संदेशों ने उन्हें वहाँ बहुत लोकप्रिय बना दिया। उस समय मदीना में तीन महत्वपूर्ण यहूदी कबीले थे। आरंभ में मुहम्मद साहब ने जेरुसलम को प्रार्थना की दिशा बनाने को कहा था।

सन् 6 30 में मुहम्मद स्० ने अपने अनुयायियों के साथ मक्का पर चढ़ाई कर दी। मक्के वालों ने हथियार डाल दिये। मक्का मुसल्मानों के आधीन मे आगया। और इसके बाद मक्कावासियों से इस्लाम कबूल करवा लिया गया। मक्का में स्थित काबा को इस्लाम का पवित्र स्थल घोषित कर दिया गया। सन् 632 में हजरत मुहम्मद साहब का देहांत हो गया। पर उनकी मृत्यु तक लगभग सम्पूर्ण अरब इस्लाम कबूल कर चुका था।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Muhammad". Random House Webster's Unabridged Dictionary.
  2. Jean-Louis Déclais, Names of the Prophet, Encyclopedia of the Quran
  3. Uri Rubin, Muhammad, Encyclopedia of the Qur'an
  4. Ernst (2004), p. 80
  5. Iqbal, Muzaffar, सं (2013). Integrated Encyclopedia of the Qur’an. 1. Center for Islamic Sciences. प॰ 33. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1926620008. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]