क़ुरआन की आलोचना

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क़ुरआन इस्लाम मत की प्रमुख पुस्तक है ।

कुरान मतलब अल्लाह का कलाम (बात) जो रसुल्लाह सल्लाहूअलैवसल्लम के सीन ए मुबारक पर उतरा। जो सारे कायनात और इसके सारे वासियों के लिए अमन वा शांति का पैगाम था जिसे बाद मे एक किताब की शक्ल दे दी गयी ! किसी भी धर्म के अन्दर सामाजिक कुरितियो पर विजय पाने का जो निर्देश रह्ता है वैसे ही हिदायते कुरान मे है !

आलोचना[संपादित करें]

क़ुरान एक मजहबी किताब है ! मुसलमान क़ुरान की हिदायतो को मानते है ! इसके कुछ तथ्य आज बिलकुल प्रामाणिक नही लगते जैसे "ब्याज हराम है "

१. क़ुरान मुस्लिम को बैंकिंग की सुविधा से वंचित कर देते हें क़ुरान के कुछ नियमो के वजह से मुस्लिम बैंकिंग का इस्तेमाल करने से कतराते हें

२. आज कल फैले आतंकवाद में भी लोग क़ुरान के ग़लत मतलब निकालते है जैसे जिहाद !

कुछ कट्टरपन्थी क़ुरान की ग़लत व्याख्या कर मुस्लिम युवको को आतंकवाद की ओर आसानी से धकेल देते हें