भारतीय परिषद अधिनियम १९०९

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तथ्य : इंडियन काउंसिल एक्ट, 1892 भारतीय नेताओं को संतुष्ट करने के में  विफल रहा. भारत की राजनैतिक परिस्थितियों ने ब्रिटिश नेताओं को भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के नरम दल या उदारवादियों का समर्थन प्राप्त करने के लिए सांवैधानिक सुधारों पर सोचने के लिए मजबूर किया। श्री गोपाल कृष्ण गोखले, जो उदारवादियों के नेता थे , "भारत मंत्री" लॉर्ड जॉन मोर्ले के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए उनसे मिलने इंग्लैंड गए। श्री गोखले ने मोर्ले को यह भरोसा दिलाया की भारत में सांवैधानिक सुधारों की तात्कालिक आवश्यकता है।  लॉर्ड मॉर्ले, श्री गोखले है के विचारों से सहमत थे और लॉर्ड मिंटो, जो उस समय भारत के वाइसराय थे, भी संवैधानिक सुधारों के लाये जाने के पक्ष में थे. भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (9 Edw. 7 सी. 4), जिसे सामान्यतः  मॉर्ले-मिंटो सुधारों के रूप में जाना जाता है, यूनाइटेड किंग्डम की संसद के एक अधिनियम के रूप में लाया गया था जिसके द्वारा ब्रिटिश भारत के शासन में सीमित रूप में भारतियों की भागीदारी बढ़ाने हेतु प्रबंध किया जाना था। 

मॉर्ले-मिंटो सुधार[संपादित करें]

 उदार दल के भारत सचिवजॉन मॉर्ले एवं रूढ़िवादी दल के  भारत के वायसराय, गिल्बर्ट इलियट-मरे-कैनिनमाउंड, 4 अर्ल ऑफ मिंटो, का मत था कि लॉर्ड कर्ज़न के बंगाल विभाजन से उपजे असंतोष को दबाना जरूरी था लेकिन ब्रिटिश राज के स्थायित्व के लिए दमन ही पर्याप्त नहीं था। उनका स्पष्ट मत था कि भारत के वफादार संभ्रांत  वर्ग और समाज के संवर्धनशील पश्चिमीकृत वर्ग  को एक नाटकीय कदम उठा कर संतुष्ट करना बेहद आवश्यक था। 

इस तरह उन्होंने भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधारों) को प्रस्तुत किया . भारतीय राष्ट्री कांग्रेस कि मुख्य मांग थी "स्वशासी ब्रिटिश कॉलोनियों की भांति सरकार की व्यवस्था" लेकिन इस मांग को मानने कि इस अधिनियम में कोई इच्छा नहीं दिखाई गयी। 

यह अधिनियम निम्न कारणों से महत्वपूर्ण था:

==सन्दर्भ==मुख्य सुधारः 1909 के मार्ले-मिन्टो सुधारों की मुख्य धारायें इस प्रकार थीं-

इस अधिनियम के अनुसार, केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि कर दी गयी। प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी बहुमत स्थापित किया गया। किंतु गैर-सरकारी सदस्यों में नामांकित एवं बिना चुने सदस्यों की संख्या अधिक थी, जिसके कारण निर्वाचित सदस्यों की तुलना में अभी भी उनकी संख्या अधिक बनी रही। सुमित सरकार के अनुसार, केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा में 60 सदस्य और 9 पदेन सदस्य होते थे। इन 69 सदस्यों में से 37 सरकारी अधिकारी और 32 गैर-सरकारी सदस्य थे। 32 गैर-सरकारी सदस्यों में से 5 नामजद एवं 27 चुने हुये सदस्य थे। निर्वाचित 27 सदस्यों में से 8 सीटें पृथक् निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत मुस्लिमों के लिए आरक्षित थीं, जबकि 4 सीटें ब्रिटिश पूंजीपतियों के लिए तथा 2 सीटें जमींदारों के लिए आरक्षित थीं और 13 सीटें सामान्य निर्वाचन के अंतर्गत आती थीं। निर्वाचित सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते थे। स्थानीय निकायों से निर्वाचन परिषद का गठन होता था। ये प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों का निर्वाचन करती करते थे। प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्य केन्द्रीय व्यवस्थापिका के सदस्तों का निर्वाचन करते थे। इस अधिनियम द्वारा मुसलमानों के लिये पृथक सामुदायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू की गयी। साथ ही मुसलमानों को प्रतिनिधित्व के मामले में विशेष रियायत दी गयी। उन्हें केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषद में जनसंख्या के अनुपात में अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया। मुस्लिम मतदाताओं के लिये आय की योग्यता को भी हिन्दुओं की तुलना में कम रखा गया। व्यवस्थापिका सभाओं के अधिकारों में वृद्धि की गयी। सदस्यों को आर्थिक प्रस्तावों पर बहस करने, उनके विषयों में संशोधन प्रस्ताव रखने, उनको कुछ विषयों पर मतदान करने, प्रश्न पूछने, साधारण प्रश्नों पर मतदान करने, साधारण प्रश्नों पर बहस करने तथा सार्वजनिक हित के प्रस्तावों को प्रस्तुत करने का अधिकार दिया गया। व्यवस्थापिकाओं को इतने अधिकार देने के पश्चात भी गवर्नर जनरल तथा गवर्नरों को व्यवस्थापिकाओं में प्रस्तावों को ठुकराने का अधिकार था। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में एक भारतीय सदस्य को नियुक्त करने की व्यवस्था की गयी। पहले भारतीय सदस्य के रूप में सत्येंद्र सिन्हा को नियुक्त किया गया। सुधार की समीक्षा

1909 के सुधारों से भारतीय राजनैतिक प्रश्न का न कोई हल हो सकता था न ही इससे वह निकला। अप्रत्यक्ष चुनाव, सीमित मताधिकार तथा विधान परिषद की सीमित शक्तियों ने प्रतिनिधि सरकार को मिश्रण सा बना दिया। लार्ड मार्ले ने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारत स्वशासन के योग्य नहीं है। कांग्रेस द्वारा प्रतिवर्ष स्वशासन की मांग करने के पश्चात भी मार्ले ने स्पष्ट तौर पर उसे ठुकरा दिया। उसने भारत में संसदीय शासन व्यवस्था या उत्तरदायी सरकार की स्थापना का स्पष्ट विरोध किया। उसने कहा ‘यदि यह कहा जाये कि सुधारों के इस अध्याय से भारत में सीधे अथवा अवश्यंभावी संसदीय व्यवस्था स्थापित करने अथवा होने में सहायता मिलेगी तो मेरा इससे कोई संबंध नहीं होगा’ ।