मतदान

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मतदान एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।

मतदान (Voting) निर्णय लेने या अपना विचार प्रकट करने की एक विधि है जिसके द्वारा कोई समूह (जैसे कोई निर्वाचन क्षेत्र या किसी मिलन में इकट्ठे लोग) विचार-विनिमय तथा बहस के बाद कोई निर्णय ले पाते हैं। मतदान की व्यवस्था के द्वारा किसी वर्ग या समाज का सदस्य राज्य की संसद या विधानसभा में अपना प्रतिनिधि चुनने या किसी अधिकारी के निर्वाचन में अपनी इच्छा या किसी प्रस्ताव पर अपना निर्णय प्रकट करता है। इस दृष्टि से यह व्यवस्था सभी चुनावों तथा सभी संसदीय या प्रत्यक्ष विधिनिर्माण में प्रयुक्त होती है। अधिनायकवादी सरकार में अधिनायक द्वारा पहले से लिए गए निर्णयों पर व्यक्ति को अपना मत प्रकट करने के लिये कहा जा सकता है, परंतु अपने निर्णयों को आरोपित करने के अधिनायक के विभिन्न ढंग इस प्रकार के मतदान को केवल औपचारिक प्रविधि तक सीमित कर देते हैं। जनतंत्रात्मक सरकार में ही मतदान को प्रमुख क्षेत्र तथा महत्व प्राप्त होता है।

इतिहास[संपादित करें]

प्राचीन भारत में गुटिकापात (lot) के अतिरिक्त मतदान द्वारा भी अधिकारियों के निर्वाचन की व्यवस्था थी। धार्मिक संस्थाओं में, विशेषत: बौद्ध संघों में, निर्वाचन के निश्चित नियमों का पालन किया जाता था। "चुल्लबग्ग" में सक्य द्वारा मतदान की तीन प्रविधियों का उल्लेख है : गुप्त मतदान, कान में कहकर मत प्रकट करने की, प्रविधि तथा खुला मतदान। गुप्त मतदान के लिये बौद्ध संघ मतपरिपत्र के रूप में रंगीन काष्ठ शलाकाओं का प्रयोग करते थे। शलाकाओं का संग्राहक मतदाताओं को रंगों के अर्थ समझाकर उनके मत संग्रह करता था और बहुमत का निर्णय मान्य होता था। यूरोप में प्राचीन यूनान तथा इटली में मतदान की व्यवस्था अंकुर रूप में विद्यमान थी। प्राचीन राजतंत्रों में यह प्रचलन था कि कुछ गंभीर विषयों पर स्वयं निर्णय लेने के पूर्व राजा अपनी प्रजा की संमति प्राप्त करने के लिये उसे आमंत्रित करे। ऐसी सभाओं में मत प्रकट करने का ढंग मौखिक था। एथेंस में गुटिकापात के अतिरिक्त जहाँ मतदान की व्यवस्था थी वहाँ हाथ उठाकर मत प्रकट करने की प्रथा थी। परंतु किसी व्यक्ति के सामाजिक स्तर पर प्रभाव डालने वाले विषयों पर गुप्त मतदान की व्यवस्था थी। रोम में ईदृ पूदृ दूसरी शताब्दी तक मतदान का ढंग "विभाजन" का (अर्थात् एक मत के लोगों का दूसरे मत के लोगों से अलग हो जाना) था। परंतु अधिकतर मतदाताओं का सामंतों पर आर्थिक तथा सामाजिक अवलंब होने के कारण यह व्यवस्था स्वतंत्र मतदान के लिये उपयुक्त न हो सकी। अत: विधान द्वारा मतपरिपत्र की व्यवस्था की गई जिसके लिये मोमरंजित काष्ठशलाका प्रयुक्त होती थी।

महत्व[संपादित करें]

आधुनिक जनतंत्रों के मतदान के महत्व तथा उसकी प्रणाली के संबंध में विभिन्न सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं। इन सिद्धांतों के फलस्वरूप, आवश्यकता के समय संघर्ष निवारण की सामाजिक प्रविधि के रूप में; शासन सत्ता के प्रति अनुवृत्ति प्राप्त करने के ढंग के रूप में; सामाजिक संघर्ष के बीच सामंजस्य स्थापित करने के साधन के रूप में; ठीक परिस्थितियों में ठीक निर्णय प्राप्त करने की पद्धति के रूप में, सामाजिक आवश्यकताओं तथा असंतोषों को अनावृत्ति की व्यवस्था के रूप में; तथा अल्पसंख्यकों को राज्य के लाभों से वंचित रखने की व्यवस्था से बचाने के ढंग के रूप में, मतदान को मान्यता प्राप्त हुई है। हाल में, इस समस्या पर यथेष्ट ध्यान दिया जाने लगा है कि जिन्हें मताधिकार प्राप्त है वे किस सीमा तक इस अधिकार के प्रयोग में भाग लेने का कष्ट करते हैं। इस विषय में की गई खोज के अनुसार उन जनतंत्रात्मक देशों के लोग मतदान में अधिकतम संख्या में भाग लेते हैं जहाँ "अनिवार्य मतदान" की व्यवस्था अपनाई गई है। अनिवार्य मतदान का सिद्धांत सर्वप्रथम विस्तार के साथ स्विट्जरलैंड के सेंटगैलेन नामक कैंटन में व्यवहृत हुआ जिसके लिये सन् 1835 ईदृ में इसे कैंटन ने जिला परिषद् के चुनावों में अकारण भाग न लेनेवालों के लिये विधान द्वारा अर्थदंड की व्यवस्था की। यह व्यवस्था स्विस नागरिकों को मताधिकार के उत्तरदायित्व का अनुभव कराने में सफल हुई है। साथ ही, इस व्यवस्था के फलस्वरूप मतदाताओं को मतदान में संमिलित होने के लिये उन्हें घर से बाहर लाने का राजनीतिक संगठनों का कार्यभार भी हल्का हुआ है। इसी प्रकार बवेरिया ने सन् 1881 ईदृ में, बुलगेरिया ने सन् 1882 ईदृ तथा बेल्जियम ने सन् 1893 ईदृ अनिवार्य मतदान की व्यवस्था अपनाई। बवेरिया की व्यवस्था के अनुसार यदि मतदाताओं की पूरी संख्या के एक तिहाई से अधिक लोग मतदान में भाग नहीं लेते तो अनुपस्थित मतदाताओं को पुन: चुनाव कराने का पूरा व्यय वहन करना पड़ेगा। बेल्जियम ने अनुपस्थित मतदाताओं के लिये तीन दंड निर्धारित किए अंतर्विवेक पर—अर्थ दंड, सार्वजनिक भर्त्सना तथा मताधिकार अपहरण।

अनिवार्य मतदान के विपक्ष में सामान्यत: यह कहा जाता है कि यह व्यवस्था आधारित आपत्ति करनेवाले (conscientious objector) के लिये कोई स्थान नहीं छोड़ती, तथापि मतदान न करने वालों का चरित्र उतना महत्वपूर्ण विषय नहीं है जितना इस बात पर ध्यान देना कि मत प्राप्त करने के लिये किन साधनों का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी देश में अनुचित साधनों द्वारा केवल विशिष्ट उद्देश्यों एवं स्वार्थों की पूर्ति के लिये सचेष्ट राजनीतिक संगठन ही मतदाताओं को मतदान में संमिलित होने की प्रेरणा देते हैं, तथा इस प्रकार अपने पक्ष में उनके मत संग्रह करते हैं तो निश्चय ही निर्वाचन तथा मतदान का प्रबंध सरकार के हाथों सौपना अधिक श्रेयस्कर होगा ताकि यह कार्य अधिक उत्तरदायित्व के साथ संपन्न हो सके।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]