रूढ़िवाद

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रूढ़िवाद सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत व्यवहृत एक ऐसी विचारधारा है जो पारंपरिक मान्यताओं का अनुकरण तार्किकता या वैज्ञानिकता के स्थान पर केवल आस्था तथा प्रागनुभवों के आधार पर करती है। यह सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक मान्यताओं का समुच्चय है जो चिरकाल से प्रचलित मान्यताओं और व्यवस्था के प्रति सम्मान को बढ़ावा देती है। यह विचारधारा नए और बिना आज़माए हुए विचारों और संस्थाओं को अपनाने के बजाय पुराने और आज़माए हुए विचारों और संस्थाओं को क़ायम रखने का समर्थन करती है। डेविड ह्यूम और एडमंड बर्क रूढ़िवाद के प्रमुख उन्नायक माने जाते हैं। समकालीन विचारकों में माइकेल ओकशॉट को रूढ़िवाद का प्रमुख सिद्धांतकार माना जाता है।[1]

धर्मो के विचारधारा से कई उच्च प्रकृति नियम है जो सभी को प्रत्यक्ष है । जैसे सभी वनस्पति सूक्ष्मजीवों जीव जन्तु व मनुष्य जन्म लेकर जीवनयापन कर मृत्यु को प्राप्त करते है सभी भूख प्यास से बंधे है और सभी बचपन यौवन वृध्दावस्था को प्राप्त करते है इसी प्रकार प्रकृति नियम दिन रात ग्रह नक्षत्र सूर्य चन्द्र की स्थिति को निर्धारित करती है मौसम ऋतु प्रकृति के नियमों का ही पालन करती है इसी प्रकार सभी स्त्री व पुरुष एक दुसरे के प्रति आकर्षित होते है परन्तु धर्मो के इच्छा शक्ति के कारण कोई सभी जन्मों में एक ही से प्रेम प्रसंग से बंधा रहता है और कुछ दो तीन दस पांच सैकड़ों से जुड़े रहते है।

प्रकृति नियम स्वतः ही गति करती है परन्तु मानव समाज प्रकृति पर ध्यान ना देकर अपने राष्ट्र क्षेत्र के शासन प्रणाली धर्म संस्कृति परिवार के मान्यता के अनुसार रहन सहन खानपान पहनावा पूजा विधि विवाह विधि आदि संस्कार करता है कहा जाऐ तो हर एक मनुष्य अपने रहने के स्थान के मानव समाज के मान्यता के अनुसार जीवनयापन करने के लिए बाध्य है ।

मानव समाज के विचारधारा तीन प्रकार की है ____ रुढ़िवादी जो लोग अपने धर्म संस्कृति के मान्यता के अनुसार ही रहन सहन खानपान पहनावा पूजा विधि विवाह विधि आदि संस्कार करते है वे है । प्रायः विश्व के कट्टर धर्मवादी लोग व आदिवासी जो प्राचीन मूल सभ्यता में है ।

आधुनिक परिवेश जो लोग वर्तमान जन- जीवन के अनुसार रहन सहन खानपान पहनावा पूजा विधि विवाह विधि आदि संस्कार करते है । प्रायः विश्व के अधिकांश शहरी मनुष्य है ।

रूढ़िवादी और आधुनिक परिवेश जो मनुष्य रहन सहन खानपान पहनावा अपने धर्म संस्कृति व वर्तमान के समाज के अनुसार रहते है परन्तु विवाह विधि अपने संस्कृति के अनुसार करते है परन्तु अत्याधिक सम्पत्ति व प्रसिध्द पद को देखकर धर्म संस्कृति को भूल जाते है फिर मात्र भगवान एक है धर्म जाति तो लोगो ने बनाया है ।

धर्म व संस्कृति की मान्यता से उच्च कुछ भी नहीं परन्तु प्रकृति के नियम से कोई नहीं बचता है और मानव समाज के विचारधारा के अनुसार ही मनुष्य व्यवहार स्वभाव सोच विचार रखकर ही खुश रह सकता अन्यथा दुखी हो जाता है कहा जाऐ तो जिस प्रकार के समाज में मनुष्य रहता है उस परिवेश में रहना ही सुखी रहने का सीधा सरल उपाय है ।


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. राजनीतिक सिद्धांत की रूपरेखा, ओम प्रकाश गाबा, मयूर पेपरबैक्स, २0१0, पृष्ठ- २६, ISBN:८१-७१९८-0९२-९

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]