बी आर अम्बेडकर

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डॉ॰ भीमराव आंबेडकर

सन 1939 में डॉ॰ भीमराव अंबेडकर
जन्म 14 अप्रैल 1891
महू, इंदौर जिला, मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु 6 दिसम्बर 1956(1956-12-06) (उम्र 65)
दिल्ली, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
अन्य नाम महान बोधिसत्व, भीमराव, युगपुरूष, आधुनिक बुद्ध
शिक्षा बीए., एमए., पीएच.डी., एम.एससी., डी. एससी., एलएल.डी., डी.लिट., बार-एट-लॉ (कुल ३२ डिग्रियाँ अर्जीत)
विद्यालय मुंबई विश्वविद्यालय, भारत
कोलंबिया विश्वविद्यालय, अमेरिका
लंदन विश्वविद्यालय, यु. के.
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, यु. के.
बर्लिन विश्वविद्यालय, जर्मनी
संस्था बहिष्कृत हितकारिणी सभा
समता सैनिक दल
डिप्रेस क्लास एज्युकेशन सोसायटी
पिपल्स एज्युकेशन सोसायटी
स्वतंत्र लेबर पार्टी
अनुसूचित जाति फेडरेशन
भारतीय बौद्ध महासभा
उपाधि आधुनिक भारत के निर्माता
मानव अधिकारों के महान नेता
भारतीय संविधान के निर्माता
विश्व के सबसे प्रतिभाशाली व्यक्ति
विश्व के सबसे महानतम भारतीय
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक - पुनरुत्थानी
भारत के प्रथम कानून मंत्री
भारतीय अर्थक्रांति के जनक
करोड़ो शोषित पिडीतों के मसिहा
भारत के सबसे शिक्षित व्यक्ति
राजनीतिक पार्टी भारतीय रिपब्लिकन पार्टी
राजनीतिक आंदोलन भारत के सामाजिक आन्दोलन
दलित बौद्ध आंदोलन
धर्म बौद्ध धर्म (मानवता और विज्ञानवाद)
जीवनसाथी रमाबाई आंबेडकर (विवाह १९०६)
डॉ॰ सविता आंबेडकर (विवाह १९४८)
पुरस्कार भारत रत्‍न (१९९०)
बोधिसत्व (१९५६)
‘पहले’ कोलंबियन अहेड ऑफ देअर टाईम (२००४)
‘चौथे’ द मेकर्स ऑफ दि युनिवर्स
दि ग्रेटेस्ट इंडियन (२०१२)

डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर ( १४ अप्रैल, १८९१६ दिसंबर, १९५६ )बाबा साहेब के नाम से लोकप्रिय , भारतीय विधिवेत्ता ,अर्थशास्त्री ,राजनीतिज्ञ और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। आप ने श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया।[1] वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री एवं भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे।[2][3][4][5] आंबेडकर विपुल प्रतिभा का छात्र था। उसने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उसने विधि ,अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञानं के शोध कार्य में ख्याति प्राप्त की [6]जीवन के प्रारम्भिक करियर में वह अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवम वकालत की। बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में बीता। वह भारत की स्वतंत्रता के अभियान निमित्त जर्नल्स का प्रकाशन ,राजनीतिक अधिकारों की पैरवी करते एवं दलितों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे।1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। 1990 में, भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान मरणोपरांत अम्बेडकर पर सम्मानित किया गया था। अंबेडकर की विरासत लोकप्रिय संस्कृति में कई स्मारकों और चित्रण भी शामिल है।

अनुक्रम

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

भीमराव डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर जी का जन्म ब्रिटिशों द्वारा केन्द्रीय प्रांत (अब मध्य प्रदेश में) में स्थापित नगर व सैन्य छावनी महू में हुआ था।[7] वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की १४ वीं व अंतिम संतान थे।[8] उनका परिवार मराठी था और वो आंबडवे गांव जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में है, से संबंधित था। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया।

कबीर पंथ से संबंधित इस परिवार में, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। हालांकी भीमराव कभी भी राम, कृष्ण, द्रोण से प्रभावित नहीं हुए उन्हें गौतम बुद्ध की शिक्षाओं ने प्रभावित किया, जब उन्होंने पहली बार बुद्ध चरित्र पढा। रामजी बाबा ने सेना में अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद डॉ॰ भीमराव आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय में अलग या बाहर बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने प‍र कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक भीमराव आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। १८९४ मे रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सब परिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, भीमराव की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी बुआ मीराबाई ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और तीन बेटियाँ मंजुला, गंगा और तुलसा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल भीमराव ही स्कूल की परीक्षा में सबसे अधिक सफल हुए और इसके बाद बड़े विश्वविद्यालय जाने में सफल हुये। रामजी सकपाल ने स्कूल में अपने बेटे भीमराव का उपनाम ‘सकपाल' की बजायं ‘आंबडवेकर' लिखवाया, क्योंकी कोकण प्रांत में लोग अपना उपनाम गांव के नाम से लगा देते थे, इसलिए भीमराव का मूल अंबाडवे गांव से अंबावडेकर उपनाम स्कूल में दर्ज किया। बाद में एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे, ने उनके नाम से ‘अंबाडवेकर’ हटाकर अपना सरल ‘आंबेडकर’ उपनाम जोड़ दिया। आज आंबेडकर नाम संपूर्ण विश्व में अमर हो चूकाँ है।

रामजी आंबेडकर ने सन १८९८ मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई (तब बंबई) चले आये। यहाँ डॉ॰ भीमराव आंबेडकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने।[9] पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद, छात्र भीमराव आंबेडकर लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से व्यथित रहे। सन १९०७ में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद भीमराव आंबेडकर ने मुंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारतीय महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये। मैट्रिक परीक्षा पास की उनकी इस बडी सफलता से उनके पूरे समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी, क्योंकि तब के समय में मैट्रिक परीक्षा पास होना बहूत बडी थी और अछूत का मैट्रिक परीक्षा पास होना तो आश्चर्यजनक एवं बहुत महत्त्वपूर्ण बात थी।इसलिए मैट्रिक परीक्षा पास होने पर उनका एक सार्वजनिक समारोह में सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृष्णाजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें अपनी लिखी हुई पुस्तक गौतम बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे। इस बुद्ध चरित्र को पढकर पहिली बार भीमराव बुद्ध की शिक्षाओं को जानकर बुद्ध से बहूत प्रभावित हुए। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर की सगाई एक साल पहले हिंदू रीति के अनुसार दापोली की, एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी।[9] सन १९०८ में, उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्ययन के लिये एक पच्चीस रुपये प्रति माह का वजीफा़ प्राप्त किया। १९१२ में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी बी.ए. की डिग्री प्राप्त की और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये। उनकी पत्नी रमाबाई ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष १२-१२-१९१२ में जन्म दिया। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर अपने परिवार के साथ बड़ौदा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता रामजी आंबेडकर की बीमारी के चलते मुंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु २ फरवरी १९१३ को हो गयी।

उच्च शिक्षा[संपादित करें]

सन 1922 में एक वकील के रूप में डॉ॰ भीमराव आंबेडकर

गायकवाड शासक ने सन १९१३ में संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये डॉ॰ भीमराव आंबेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक ११.५ डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, डॉ॰ भीमराव आंबेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। १९१६ में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पीएच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली, उत्पत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर सन १९१६ में डॉ॰ आंबेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रेज् इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये प्रथम विश्व युद्ध का काल था। बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से डॉ॰ भीमराव आंबेडकर निराश हो गये और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी आरंभ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार मुंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। १९२० में कोल्हापुर के महाराजा, अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। १९२३ में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा "डॉक्टर ऑफ साईंस" की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये डॉ॰ भीमराव आंबेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हें औपचारिक रूप से ८ जून १९२७ को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पीएच.डी. प्रदान की गयी।

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष[संपादित करें]

भारत सरकार अधिनियम १९१९, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका (separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। १९२० में, बंबई से , उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् १९२६ में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन १९२७ में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।

१ जनवरी १९२७ को डॉ अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। १९२७ में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। उन्हें बाँबे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन कमीशन १९२८ में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डॉ अम्बेडकर ने अलग से भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं।

पूना संधि[संपादित करें]

दूसरा गोलमेज सम्मेलन, १९३१

अब तक डॉ॰ भीमराव आंबेडकर जी आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास करमचंद गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। डॉ॰ आंबेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान डॉ॰ आंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है।

हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।[8]

इस भाषण में डॉ॰ भीमराव आंबेडकर जी ने कांग्रेस और मोहनदास गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। डॉ॰ आंबेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये "उदार" राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको १९३१ मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया।(डा॰ भीमराव अंबेडकर ने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था ) उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी। गांधी को लगता था की, सवर्णों को अस्पृश्यता भूलाने के लिए कुछ अवधि दी जानी चाहिए, यह गांधी का तर्क गलत सिद्ध हुआ जब सवर्णों हिंदूओं द्वारा पूना संधि के कई दशकों बाद भी अस्पृश्यता का नियमित पालन होता रहा।

१९३२ में जब ब्रिटिशों ने डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की,[10][11] तब मोहनदास गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। मोहनदास गांधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के दलिताधिकार विरोधी अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने डॉ॰ भीमराव आंबेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते डॉ॰ भीमराव अंबेडकर जी ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। मोहनदास गांधी ने अपने गलत तर्क एवं गलत मत से संपूर्ण अछूतों के सभी प्रमुख अधिकारों पर पानी फेर दिया। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी। गाँधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी सवर्ण भी पूना संधि का आदर कर, सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया।

आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उम्मीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उम्मीदवार चुनते। इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म \ जाति) द्वारा एक नेता चुना जाता। इस आधार पर सिर्फ एक बार सन १९३७ में चुनाव हुए। डॉ॰ आंबेडकर २०-२५ साल के लिये राजनैतिक आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण यह आरक्षण मात्र ५ साल के लिए ही लागू हुआ। पूना संधी के बारें गांधीवादी इतिहासकार ‘अहिंसा की विजय’ लिखते हैं, परंतु यहाँ अहिंसा तो डॉ॰ भीमराव आंबेडकर ने निभाई हैं।

पृथक निर्वाचिका में दलित दो वोट देता एक सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित (पृथक) उम्मीदवार को। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया। उनके अनुसार असली महात्मा तो ज्योतीराव फुले थे।

डॉ॰ आंबेडकर चाहते थे कि शूद्रों को, हरिजनों (दलितों) को अलग मताधिकार प्राप्त हो जाए। काश डॉ॰ आंबेडकर जीत गए होते तो जो बदतमीज़ी सारे देश में हो रही है वह नहीं होती…. लेकिन महात्मा गांधी ने उपवास कर दिया…. उन्होंने उपवास कर दिया कि मैं मर जाऊँगा, अनशन कर दूँगा…. उनका लंबा उपवास, उनका गिरता स्वास्थ्य, डॉ॰ आंबेडकर को आखिर झुक जाना पड़ा…. मत दे अलग मताधिकार। और इसको गाँधीवादी इतिहासकार लिखते हैं- अहिंसा की विजय…. अब यह हैरानी की बात है इसमें अहिंसक कौन है? डॉ॰ आंबेडकर अहिंसक है….. इसमें गाँधी हिंसक है। उन्होंने डॉ॰ आंबेडकर को मजबूर किया हिंसा की धमकी देकर कि मैं मर जाऊँगा…. एक आदमी तुम्हारी छाती पर छुरा रख देता है और कहता है जेब में जो कुछ हो- यह हिंसा। और एक आदमी अपनी छाती पर छुरा रख लेता है वह कहता है निकालो जो कुछ जेब में हो अन्यथा मैं मार लूँगा छुरा। तुम सोचने लगते हो कि दो रुपल्ली जेब में है, इसके पीछे इस आदमी का मरना। भला चंगा आदमी है, एक जीवन का खो जाना. तुमने दो रुपए निकाल कर दे दिए कि भइया, तू ले ले और जा…. इसमें कौन अहिंसक है? मैं कहता हूँ डॉ॰ आंबेडकर अहिंसक है, गांधी नहीं…..।"

- आचार्य रजनीश (ओशो)[12]

राजनीतिक जीवन[संपादित करें]

13 अक्टूबर 1935, को येओला नासिक मे अम्बेडकर एक रैली को संबोधित करते हुए.

13 अक्टूबर 1935 को, अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं।[13] इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया।[13] उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।

1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की।[13] अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।

1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। वॉट काँग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया।[14] उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।

हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?

[14]

अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिमो मे व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा,

बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।[15]

उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी कही अधिक सामाजिक बुराइयां है और मुसलमान उन्हें " भाईचारे " जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें " निचले दर्जे का " माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।[15]

"सांप्रदायिकता" से पीड़ित हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समूहों ने सामाजिक न्याय की माँग की उपेक्षा की है।[15]

हालांकि वे मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे पर उन्होने तर्क दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिये क्योकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए, जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष मे ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया।

उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये। कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान मे रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी||

संविधान निर्माण[संपादित करें]

संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों ना हो मगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे तो संविधान अंतत: बुरा साबीत होंगा।

- डॉ भीमराव आंबेडकर


अपने सत्य परंतु विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद डॉ भीमराव आंबेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।

संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है।

अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए धरा370व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :

मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।

1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

धर्म परिवर्तन (बौद्ध धर्म में )[संपादित करें]

दीक्षाभूमि, नागपुर; जहां भीमराव अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म में परिवर्तित हुए।

सन् 1950 के दशक में भीमराव अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, डॉ॰ अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे।[16] 1954 में अम्बेडकर ने म्यानमार का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने 'भारतीय बौद्ध महासभा' या 'बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया' की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम महान ग्रंथ, 'द बुद्ध एंड हिज़ धम्म' को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1957 में प्रकाशित हुआ। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। डॉ॰ अम्बेडकर ने श्रीलंका के एक महान बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार पहले दिन लगभग 5,00,000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया।[16] नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने विषमतावादी हिन्दू धर्म और हिन्दू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। भीमराव ने दुसरे दिन 15 अक्टूबर को नागपूर में अपने 2,00,000 अनुयायीओं को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी, फिर तिसरे दिन 16 अक्टूबर को भीमराव चंद्रपुर गये और वहां भी उन्होंने 3,00,000 समर्थकों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। इस तरह केवल तीन में भीमराव ने 10 लाख से अधिक लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया। डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर का बौद्ध धर्म परिवर्तन किया। इस घटना से बौद्ध देशों में से अभिनंदन प्राप्त हुए। में इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये। उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।

डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने दीक्षाभूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं जो बौद्ध धर्म का एक सार या दर्शन है। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर द्वारा 10,00,000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था। उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके। भीमराव की ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं। इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है। ये प्रतिज्ञाए बौद्ध धर्म का एक अंग है जिसमें पंचशील, मध्यममार्ग, अनिरीश्वरवाद, दस पारमिता, बुद्ध-धम्म-संघ ये त्रिरत्न, प्रज्ञा-शील-करूणा-समता आदी बौद्ध तत्व, मानवी मुल्य (मानवता) एवं विज्ञानवाद है।

मृत्यु[संपादित करें]

अन्नाल अम्बेडकर मनिमंडपम, चेन्नई
पुणे संग्रहालय में भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा।

1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर का महापरिनिर्वाण नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गया। 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। उनके अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी रखकर उनके करीब 10,00,000 अनुयायीओं ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, ऐसा विश्व इतिहास में पहिली बार हुआ।

मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी डॉ॰ सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं, तथा दलित बौद्ध आंदोलन में भीमराव के बाद (भीमराव के साथ) बौद्ध बनने वाली वह पहिली व्यक्ति थी। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम डॉ॰ शारदा कबीर था। डॉ॰ सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यशवंत अम्बेडकर, भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है।

कई अधूरे टंकलिपित और हस्तलिखित मसौदे अम्बेडकर के नोट और पत्रों में पाए गए हैं। इनमें वैटिंग फ़ोर ए वीसा जो संभवतः 1935-36 के बीच का आत्मकथानात्मक काम है और अनटचेबल, ऑर द चिल्ड्रन ऑफ इंडियाज़ घेट्टो जो 1951 की जनगणना से संबंधित है।

एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ॰ अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर, डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था। अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।

मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पंधरा लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल), पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्मचक्र परिवर्तन् दिन (14 अक्टूबर) नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं।

आंबेडकर जी के बाद[संपादित करें]

आंबेडकर का राष्ट्रवाद[संपादित करें]

भीमराव को जानने और समझने की सबसे बड़ी सीमा यह रही है कि या तो उनकी अनदेखी की गयी, या फिर उनकी पूजा की गयी. ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिन्होंने भीमराव के जीवन के किसी एक पहलू को उनका पूरा स्वरूप मान लिया और उस टुकड़े में ही वे भीमराव का समग्र चिंतन तलाशते रहे. भीमराव के लोकजीवन का विस्तार इतना बड़ा और विशाल है कि उसके किसी एक खंड की विशालता से विस्मित होना बिल्कुल मुमकिन है. कई लोग इस बात से चकित हैं कि अछूत परिवार में पैदा हुआ एक बच्चा अपने दौर का सबसे बड़ा विद्वान कैसे बन गया! कोई कहता है कि भीमराव संविधान निर्माता थे, जो कि वे थे.

कुछ लोगों की नजर में भीमराव अपने दौर के सबसे बड़े अर्थशास्त्री थे, जिनके अध्ययन के आलोक में भारतीय रिर्वज़ बैंक की स्थापना हुई, भारतीय मुद्रा और राजस्व का जिन्होंने विस्तार से अध्ययन किया. कई लोगों की नजरों में भीमराव दलित उद्धारक हैं, तो कई लोग हिंदू कोड बिल के रचनाकार के रूप में उन्हें ऐसे शख्स के रूप में देखते हैं, जिन्होंने पहली बार महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिलाने की पहल की और महिला समानता की बुनियाद रखी. श्रम कानूनों को लागू कराने से लेकर नदी घाटी परियोजनाओं की बुनियाद रखनेवाले शख्स के रूप में भी भीमराव को जाना जाता है. भीमराव के कार्यों और योगदानों की सूची बेहद लंबी है.

लेकिन, इन सबको जोड़ कर भीमराव की जो समग्र तसवीर बनती है, वह निस्संदेह एक राष्ट्र निर्माता की है. भीमराव का भारतीय राष्ट्र कैसा है? क्या वह राष्ट्र एक नक्शा है, जिसके अंदर ढेर सारे लोग हैं? क्या राष्ट्र किसी झंडे का नाम है, जिसे कंधे पर लेकर चलने से कोई राष्ट्रवादी बन जाता है? क्या राष्ट्र एक तस्वीर है, जिसमें एक महिला भगवा ध्वज लेकर शेर की पीठ पर बैठी है, जिसे राष्ट्रमाता मान कर उसकी जय-जयकार करना जरूरी है? क्या भूगोल ने, पहाड़ और नदियों ने अपनी प्राकृतिक सीमाओं से घेर कर जमीन के एक टुकड़े को राष्ट्र का रूप दे दिया है? या फिर, क्या हम इसलिए एक राष्ट्र हैं कि हमारे स्वार्थ और हित साझा हैं? भीमराव का राष्ट्र इन सबसे अलग है. धर्म, भाषा, नस्ल, भूगोल या साझा स्वार्थ को, या फिर इन सबके समुच्चय को, भीमराव राष्ट्र नहीं मानते. भीमराव का राष्ट्र एक आध्यात्मिक विचार है. वह एक चेतना है. हम एक राष्ट्र हैं, क्योंकि हम सब मानते हैं कि हम एक राष्ट्र हैं.

इस मायने में यह किसी स्वार्थ या संकीर्ण विचारों से बेहद ऊपर का एक पवित्र विचार है. इतिहास के संयोगों ने हमें एक साथ जोड़ा है, हमारा अतीत साझा है, हमने वर्तमान में साझा राष्ट्र जीवन जीना तय किया है और भविष्य के हमारे सपने साझा हैं, और यह सब है इसलिए हम एक राष्ट्र हैं. राष्ट्र की यह परिकल्पना भीमराव ने यूरोपीय विद्वान अर्नेस्ट रेनॉन से ली है, जिनका 1818 का प्रसिद्ध वक्तव्य ‘ह्वाट इज नेशन’ आज भी सामयिक दस्तावेज है.

संविधान सभा में पूछे गये तमाम सवालों का जवाब देने के लिए जब भीमराव 25 नवंबर, 1949 को खड़े होते हैं, तो वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत आजाद हो चुका है, लेकिन उसका एक राष्ट्र बनना अभी बाकी है. भीमराव कहते हैं कि ‘भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है. अगर भारत को एक राष्ट्र बनना है, तो सबसे पहले इस वास्तविकता से रूबरू होना आवश्यक है कि हम सब मानें कि जमीन के एक टुकड़े पर कुछ या अनेक लोगों के साथ रहने भर से राष्ट्र नहीं बन जाता. राष्ट्र निर्माण में व्यक्तियों का मैं से हम बन जाना बहुत महत्वपूर्ण होता है.’

वे चेतावनी भी देते हैं कि हजारों जातियों में बंटे भारतीय समाज का एक राष्ट्र बन पाना आसान नहीं होगा. सामाजिक व आर्थिक जीवन में घनघोर असमानता और कड़वाहट के रहते यह काम मुमकिन नहीं है. अपने बहुचर्चित, लेकिन कभी न दिये गये, भाषण ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में भीमराव जाति को राष्ट्र विरोधी बताते हैं और इसके विनाश के महत्व को रेखांकित करते हैं. भीमराव की संकल्पना का राष्ट्र एक आधुनिक विचार है. वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात करते हैं, लेकिन वे इसे पश्चिमी विचार नहीं मानते. वे इन विचारों को फ्रांसिसी क्रांति से न लेकर, बुद्ध की शिक्षा या बौद्ध परंपरा से लेते हैं. संसदीय प्रणालियों को भी वे बौद्ध भिक्षु संघों की परंपरा से लेते हैं.

स्वतंत्रता और समानता जैसे विचारों की स्थापना संविधान में नियम कानूनों के जरिये की गयी है. इन दो विचारों को मूल अधिकारों के अध्याय में शामिल करके इनके महत्व को रेखांकित भी किया गया है. लेकिन इन दोनों से महत्वपूर्ण या बराबर महत्वपूर्ण है बंधुत्व का विचार. क्या कोई कानून या संविधान दो या अधिक लोगों को भाईचारे के साथ रहना सिखा सकता है? क्या कोई कानून मजबूर कर सकता है कि हम दूसरे नागरिकों के सुख और दुख में साझीदार बनें और साझा सपने देखें? क्या इस देश में दलित उत्पीड़न पर पूरा देश दुखी होता है? क्या मुसलमानों या ईसाइयों पर होनेवाले हमलों के खिलाफ पूरा देश एकजुट होता है?

क्या आदिवासियों की जमीन का जबरन अधिग्रहण राष्ट्रीय चिंता का कारण हैं? दुख के क्षणों में अगर नागरिकों में साझापन नहीं है, तो जमीन के एक टुकड़े पर बसे होने और एक झंडे को जिंदाबाद कहने के बावजूद हम लोगों का एक राष्ट्र बनना अभी बाकी है. राष्ट्र बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम अतीत की कड़वाहट को भूलना सीखें. अमूमन किसी भी बड़े राष्ट्र के निर्माण के क्रम में कई अप्रिय घटनाएं होती हैं, जिनमें कई की शक्ल हिंसक होती है और वे स्मृतियां लोगों में साझापन पैदा करने में बाधक होती हैं. इसलिए जरूरी है कि खासकर विजेता समूह, उन घटनाओं को भूलने की कोशिश करे.

राष्ट्र जब लोगों की सामूहिक चेतना में है, तभी राष्ट्र है. भीमराव चाहते थे कि भारत के लोग, तमाम अन्य पहचानों से ऊपर, खुद को सिर्फ भारतीय मानें. राष्ट्रीय एकता ऐसे स्थापित होगी. वर्तमान विवादों के आलोक में, भीमराव के राष्ट्र संबंधी विचारों को दोबारा पढ़े जाने और आत्मसात किये जाने की जरूरत है.

भीमराव ने कहा था, अनूठे हैं भारत के राष्ट्रवादी और देशभक्त भारत एक अनूठा देश है. इसके राष्ट्रवादी एवं देशभक्त भी अनूठे हैं. भारत में एक देशभक्त और राष्ट्रभक्त वह व्यक्ति है जो अपने समान अन्य लोगों के साथ मनुष्य से कमतर व्यवहार होते हुए अपनी खुली आंखों से देखता है, लेकिन उसकी मानवता विरोध नहीं करती. उसे मालूम है कि उन लोगों के अधिकार अकारण ही छीने जा रहे हैं, लेकिन उसमें मदद करने की सभ्य संवेदना नहीं जगती.

उसे पता है कि लोगों के एक समूह को सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया गया है, लेकिन उसके भीतर न्याय और समानता का बोध नहीं होता. मनुष्य और समाज को चोटिल करनेवाले सैकड़ों निंदनीय रिवाजों के प्रचलन की उसे जानकारी है, लेकिन वे उसके भीतर घृणा का भाव पैदा नहीं करते हैं. देशभक्त सिर्फ अपने और अपने वर्ग के लिए सत्ता का आकांक्षी होता है.

मुझे प्रसन्नता है कि मैं देशभक्तों के उस वर्ग में शामिल नहीं हूं. मैं उस वर्ग में हूं, जो लोकतंत्र के पक्ष में खड़ा होता है और जो हर तरह के एकाधिकार को ध्वस्त करने का आकांक्षी है. हमारा लक्ष्य जीवन के हर क्षेत्र- राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक- में एक व्यक्ति-एक मूल्य के सिद्धांत को व्यवहार में उतारना है.

19वीं सदी और 20वीं सदी के पहले दो दशकों तक हुए सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि में भीमराव डॉ आंबेडकर का सार्वजनिक जीवन में प्रवेश भारतीय समाज में सामाजिक क्रांति के मार्ग को निर्णायक मोड़ देनेवाला महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत रहा है. डॉ. आंबेडकर प्रखर चिंतक, कानूनविद और सामाजिक न्याय की लड़ाई के योद्धा मात्र नहीं रहे, अपितु उनकी वैचारिक दृष्टि में अन्याय का प्रतिकार करने के साहस के साथ-साथ नैतिक पथ पर अविचल चलने की प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है, जो मूल्यों की पहचान ढूंढ़ते समाज को दिशा दिखाती है. भारतीय समाज में विविधता भी है और विषमता भी. विविधता स्वाभाविक होती है, परंतु विषमता नैसर्गिक नहीं है, इसलिए इस पर विचार आवश्यक है. भीमराव के नैतिक साहस ने अपने समाज की विषमतामूलक व्यवस्था का मात्र विरोध ही नहीं किया, उन्होंने इसके कारण, समाज और राष्ट्रीय एकता पर इसके दुष्प्रभाव और सत्य, अहिंसा तथा मानवता के विरुद्ध इसके स्वरूप को भी उजागर किया. आधुनिक भारत के निर्माणकर्ताओं में डॉ आंबेडकर की समाज पुनर्रचना की दृष्टि को मात्र वर्ण आधारित जाति व्यवस्था के विरोध एवं अछूतोद्धार तक ही सीमित करके देखा जाता है, जो उनके साथ अन्याय है. जाति व्यवस्था का विरोध एवं जाति आधारित वैमनस्य, छूआछूत का प्रतिकार मध्यकालीन संतों से लेकर आधुनिक विचारकों तक द्वारा किया गया, परंतु अधिकतर संतों, राष्ट्रनायकों ने वेद व उपनिषद् की द‍ृष्टि से सामाजिक पुनर्रचना के कार्य में सहयोग दिया, जबकि भीमराव ने महात्मा बुद्ध के संघवाद एवं धम्म के पथ से स्वयं को निर्देशित किया.

गौतम बुद्ध का कथन ‘आत्मदीपोभव’ को बोधिसत्व डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन में न सिर्फ उतारा, बल्कि इससे पूरे समाज के लिए नैतिकता, न्याय व उदारता का पथ आलोकित किया. भगवान बुद्ध का धम्म बुद्धिसंगत विचार एवं सदाचार परायण जीवन का पथ है, जो सभी धर्मों में स्वीकार्य शाश्वत जीवन मूल्य का तत्व है. धम्म का पालन किसी अलौकिक सत्ता में विश्वास पर आधारित नहीं है, यह व्यक्ति की अपनी संभावनाओं, सद्गुणों एवं सच्ची स्वतंत्रता प्राप्ति की अनुभव उपलब्धि का पथ है.

भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ ग्रंथ में डॉ. भीमराव आंबेडकर लिखते हैं कि जीवन की पवित्रता बनाये रखना ही धम्म है, अत: धम्म का संबंध नैतिकता से है, किसी धर्म या मजहब से नहीं. नैतिकता समाज या संघ का अपरिहार्य आधार है. जहां एक व्यक्ति का संबंध दूसरे से है, वहां नैतिकता का पालन आवश्यक है. भीमराव का मानना है कि जब हम किसी समुदाय या समाज में रहते हैं, तो जीवन के मापदंड एवं आदर्शों में समानता होनी चाहिए. यदि यह समानता नहीं हो, तो नैतिकता में पृथकता की भावना होती है और समूह जीवन खतरे में पड़ जाता है. यही चिंतन है, जिसके आधार पर उनका निष्कर्ष था कि हिंदू धर्म ने दलित वर्ग को यदि शस्त्र धारण करने की स्वतंत्रता दी होती, तो यह देश कभी परतंत्र न हुआ होता.

बात शस्त्र की ही नहीं, शास्त्रों की भी है, जिनके ज्ञान से वंचित कर हमने एक बड़े हिस्से को अपनी भौतिक एवं आध्यात्मिक संपदाओं से वंचित कर दिया और आज यह सामाजिक तनाव का एक प्रमुख कारण बन गया है. डॉ आंबेडकर जाति व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन चाहते थे, क्योंकि उनकी तीक्ष्ण बुद्धि देख पा रही थी कि हमने कर्म सिद्धांत को, जो व्यक्ति के मूल्यांकन एवं प्रगति का मार्गदर्शक है, भाग्यवाद, अकर्मण्यता और शोषणकारी समाज का पोषक बना दिया है. उनकी सामाजिक न्याय की दृष्टि यह मांग करती है कि मनुष्य के रूप में जीवन जीने का गरिमापूर्ण अधिकार समाज के हर वर्ग को समान रूप से मिलना चाहिए और यह सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र से प्राप्त नहीं हो सकता. इसके लिए आर्थिक व सामाजिक लोकतंत्र भी चाहिए. एक व्यक्ति एक वोट की राजनीतिक बराबरी होने पर भी सामाजिक एवं आर्थिक विषमता लोकतंत्र की प्रक्रिया को दूषित करती है, इसलिए आर्थिक समानता एवं सामाजिक भेदभाव विहीन जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति वे प्रतिबद्धता का आग्रह करते हैं. डॉ आंबेडकर की लोकतांत्रिक मूल्यों में अटूट अास्था थी. वे कहते थे ‘जिस शासन प्रणाली से रक्तपात किये बिना लोगों के आर्थिक व सामाजिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जाता है, वह लोकतंत्र है.’ वे मनुष्य के दुखों की समाप्ति सिर्फ भौतिक व आर्थिक शक्तियों के आधिपत्य से नहीं स्वीकारते थे. वे मार्क्सवादियों से कहते हैं- मनुष्य केवल रोटी के सहारे जिंदा नहीं रहता, उसके पास मन है, उस मन को विचारों की खाद चाहिए. धर्म मनुष्य के मन में आशा का निर्माण करता है. उसे काम करने के लिए प्रवृत्त करता है. उनके अनुसार धर्म सिर्फ पुस्तकों का वाचन या पराप्राकृतिक में विश्वास नहीं है, यह धम्म है, नीति है, जो सभी के लिए ज्ञान के द्वार खोलता है, जिसमें कोई भेदभाव या संकुचितता नहीं है.

डॉ. आंबेडकर ज्ञान आधारित समाज का निर्माण चाहते थे, इसलिए उनका आग्रह था शिक्षित बनो, संगठित होओ और संघर्ष करो. इस संघर्ष में धम्म का अनुसरण उनकी निष्ठा थी. भीमराव भगवान बुद्ध के जिस धम्म पथ को स्वीकारते हैं, उसमें प्रज्ञा या विचार-धम्म महत्वपूर्ण है, परंतु केवल ज्ञान खतरनाक है, यह शील के बिना अधूरा है, इसलिए शील या आचरण-धम्म भी महत्वपूर्ण माना है. प्रज्ञा, शील, करुणा और मैत्री भावों से संचालित समाज ही समरस समाज हो सकता है, जो सामाजिक क्रांति का नैतिक आदर्श है. यह आदर्श भीमराव ने हम सभी को दिया है.

राष्ट्रनिर्माताओं की अग्रणी पंक्ति में प्रतिष्ठित भीमराव डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर अर्थशास्त्री]], न्यायविद्, राजनेता और [[समाज सुधारक थे. उन्होंने भारतीय संविधान की रचना-प्रक्रिया की अगुवाई की और देश में दलित बौद्ध आंदोलन का सूत्रपात किया. दलित समुदाय के साथ होनेवाले सामाजिक भेदभाव को मिटाने और स्त्रियों व श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए वे जीवनपर्यंत सक्रिय रहे.

उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और ब्रिटेन के लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पी.एचडी और डी.एस.सी. की उपाधियां प्राप्त कीं. ब्रिटेन में ही उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की. शिक्षा पूरी कर वे मुंबई में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बने और कुछ समय के बाद साप्ताहिक पत्रिका ‘मूकनायक’ का प्रकाशन शुरू किया. शिक्षण के अलावा उनका संबंध वकालत के पेशे से भी रहा था. औपनिवेशिक शासन के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशासनिक प्रतिनिधि तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री के तौर पर उन्होंने समाज के वंचित वर्गों को अधिकार-संपन्न करने के लिए अनेक पहलें कीं. समाज, धर्म, अर्थव्यवस्था, कानून आदि विषयों पर उनकी कालजयी रचनाएं आज भी देश को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी अप्रतिम भूमिका इस बात से सिद्ध होती है कि उनके उल्लेख के बिना कोई भी समकालीन चर्चा पूरी नहीं हो सकती है. भीमराव लिखित कुछ प्रमुख किताबें -

  • हू वेर शुद्रा?
  • द बुद्धा एंड हिज धम्मा
  • थॉट्स ऑन पाकिस्तान
  • अनहिलेशन ऑफ कास्ट्स
  • आइडिया ऑफ ए नेशन
  • द अनटचेबल
  • फिलोस्फी ऑफ हिंदुइज्म
  • सोशल जस्टिस एंड पॉलिटिकल सेफगार्ड ऑफ डिप्रेस्ड क्लासेज
  • गांधी एंड गांधीइज्म
  • ह्वाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल
  • बुद्धिस्ट रेवोल्यूशन एंड काउंटर-रेवोल्यूशन इन एनशिएंट इंडिया
  • द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ बुद्धिइज्म इन इंडिया

महिलाधिकारी डॉ. आंबेडकर[संपादित करें]

महिलाओं को हक दिलाना चाहते थे डॉ. आंबेडकर

डॉ. आंबेडकर महिलाओं की उन्नति के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि उसमें महिलाओं की क्या स्थिति है? दुनिया की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए जब तक उनका समुचित विकास नहीं होता कोई भी देश चहुंमुखी विकास नहीं कर सकता। डॉ. आंबेडकर का महिलाओं के संगठन में अत्यधिक विश्वास था।

उनका कहना था कि यदि महिलाएं एकजुट हो जाएं तो समाज को सुधारने के लिए क्या नहीं कर सकती हैं? वे लोगों से कहा करते थे कि महिलाओं और अपने बच्चों को शिक्षित कीजिए। उन्हें महत्वाकांक्षी बनाइए। उनके दिमाग में यह बात डालिए कि महान बनना उनकी नियति है। महानता केवल संघर्ष और त्याग से ही प्राप्त हो सकती है। वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य रहते हुए डॉ. आंबेडकर ने पहली बार महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश (मैटरनल लिव) की व्यवस्था की।

संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में संविधान निर्माताओं में उनकी अहम भूमिका थी। संविधान में सभी नागरिकों को बराबर का हक दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14 में यह प्रावधान है कि किसी भी नागरिक के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। आजादी मिलने के साथ ही महिलाओं की स्थिति में सुधार शुरू हुआ। आजाद भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने महिला सशक्तीकरण के लिए कई कदम उठाए। सन् 1951 में उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' संसद में पेश किया।

डॉ. आंबेडकर का मानना था कि सही मायने में प्रजातंत्र तब आएगा जब महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिए जाएंगे। उनका दृढ़ विश्वास कि महिलाओं की उन्नति तभी संभव होगी जब उन्हें घर परिवार और समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा। शिक्षा और आर्थिक तरक्की उन्हें सामाजिक बराबरी दिलाने में मदद करेगी।

डॉ. आंबेडकर प्राय: कहा करते थे कि मैं हिंदू कोड बिल पास कराकर भारत की समस्त नारी जाति का कल्याण करना चाहता हूं। मैंने हिंदू कोड पर विचार होने वाले दिनों में पतियों द्वारा छोड़ दी गई अनेक युवतियों और प्रौढ़ महिलाओं को देखा। उनके पतियों ने उनके जीवन-निर्वाह के लिए नाममात्र का चार-पांच रुपये मासिक गुजारा बांधा हुआ था। वे औरतें ऐसी दयनीय दशा के दिन अपने माता-पिता, या भाई-बंधुओं के साथ रो-रोकर व्यतीत कर रही थीं।

उनके अभिभावकों के हृदय भी अपनी ऐसी बहनों तथा पुत्रियों को देख-देख कर शोकसंतप्त रहते थे। भीमराव का करुणामय हृदय ऐसी स्त्रियों की करुण गाथा सुनकर पिघल जाता था। कुछ लोगों के विरोध की वजह से हिंदू कोड बिल उस समय संसद में पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में अलग-अलग भागों में जैसे हिंदू विवाह कानून, हिंदू उत्तराधिकार कानून और हिंदू गुजारा एवं गोद लेने संबंधी कानून के रूप में अलग-अलग नामों से पारित हुआ जिसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए।

लेकिन डॉ. आंबेडकर का सपना सन् 2005 में साकार हुआ जब संयुक्त हिंदू परिवार में पुत्री को भी पुत्र के समान कानूनी रूप से बराबर का भागीदार माना गया। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पुत्री विवाहित है या अविवाहित। हर लड़की को लड़के के ही समान सारे अधिकार प्राप्त हैं। संयुक्त परिवार की संपत्ति का विभाजन होने पर पुत्री को भी पुत्र के समान बराबर का हिस्सा मिलेगा चाहे वो कहीं भी हो। इस तरह महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में डॉ.आंबेडकर ने बहुत सराहनीय काम किया।

वयस्क मताधिकार भी डॉ. आंबेडकर का ही विचार था जिसके लिए उन्होंने 1928 में साइमन कमिशन से लेकर बाद तक लड़ाई लड़ी। इसका उस समय विरोध किया गया था। उस समय यूरोप में महिलाओं और अमेरिका में अश्वेतों को मताधिकार देने पर बहस चल रही थी। आंबेडकर ने वोट डालने के अधिकार के मुद्दे को आगे बढ़ाया। उन्होंने निर्वाचन सभा के सदस्यों को चेताया था कि भारतीय राज्यों को एक जगह लाने की उत्सुकता में वह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से समझौता न करें। डॉ. आंबेडकर ने संरक्षण आधारित लोकतंत्र के बजाय नए भारत के लिए अधिकारों वाले लोकतंत्र को चुना।

आंबेडकर का स्त्रिवाद[संपादित करें]

महिलाओं के मसिहा थे डॉ. भीमराव आंबेडकर

डॉ. भीमराव आंबेडकर को कई नामों से जाना जाता है। उन्हें भारतीय संविधान का निर्माता, पददलितों का मसीहा, महान बुद्धिजीवी, प्रतिष्ठित विधिवेत्ता और असाधारण मेधा वाला अध्येता कहा जाता है। परंतु बहुत कम लोग, महिलाओं के अधिकारों और उनकी बेहतरी के प्रति डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की प्रतिबद्धता से वाकिफ हैं।

जो भी मंच उन्हें उपलब्ध हुआ, उसका उपयोग आंबेडकर ने लैंगिक दृष्टि से न्यायपूर्ण कानूनों के निर्माण की पैरवी के लिए किया। सन् 1928 में बंबई विधानपरिषद के सदस्य के रूप में, आंबेडकर ने उस विधेयक को अपना समर्थन दिया, जिसमें फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं को सवैतनिक मातृत्व अवकाश दिए जाने का Feminist Ambedkar प्रावधान था। उन्होंने कहा कि चूंकि नियोक्ता महिलाओं के श्रम से लाभ अर्जित करते हैं, इसलिए मातृत्व अवकाश के दौरान महिला कर्मियों को कम से कम आंशिक आर्थिक संबल प्रदान करना उनका कर्तव्य है। बाबा साहब ने कामकाजी महिलाओं द्वारा बच्चों को जन्म देने और उन्हें पालने-पोसने के आर्थिक और उत्पादक आयामों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया। यह इस बात का सुबूत है कि वे वर्गीय और लैंगिक, दोनों चेतनाओं से लैस थे। आंबेडकर का मानना था कि मातृत्व अवकाश के दौरान कामकाजी महिलाओं को दिए जाने वाले वेतन का आंशिक भार सरकार को वहन करना चाहिए, क्योंकि ”यह राष्ट्रहित में है कि प्रसव के पूर्व और उसके पश्चात, महिलाओं को आराम मिले।’’यह महिलाओं की मां के रूप में भूमिका के सामाजिक महत्व को मान्यता प्रदान करना था।

सन् 1938 में बंबई विधानमंडल के सदस्य बतौर आंबेडकर ने यह सिफारिस की कि महिलाओं को गर्भ-निरोधक उपायों का इस्तेमाल करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। उनका तर्क था कि अगर किसी भी कारणवश, कोई महिला गर्भधारण न करना चाहे, तो उसे उसकी पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनकी यह मान्यता थी कि गर्भधारण करने या न करने का निर्णय पूरी तरह से महिला पर छोड़ दिया जाना चाहिए। इस प्रकार, आंबेडकर ने गर्भधारण के मामले में, महिलाओं को चुनने की आजादी, पूर्ण नियंत्रण का अधिकार व अंतिम निर्णय लेने का हक देने की पैरवी की।

वाईसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य बतौर 1942 से 1946 के बीच आंबेडकर ने कई ऐसे प्रगतिशील कानूनों को पारित किया, जिनसे महिला श्रमिकों को कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं मिल सकीं। इनमें आकस्मिक अवकाश, अर्जित अवकाश, विशेष अवकाश, पेंशन व कार्य के दौरान दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे के प्रावधान संबंधी कानून शामिल थे। ये प्रावधान कुछ हद तक ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन’की 20 जुलाई 1942 को आयोजित परिषद में पारित किए गए प्रस्तावों पर आधारित थे। इन प्रस्तावों में कामकाजी महिलाओं के लिए ये सभी प्रावधान किए जाने की मांग की गई थी।

हिन्दू कोड बिल[संपादित करें]

स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री बतौर आंबेडकर ने 9 अप्रैल 1948 को संविधानसभा के समक्ष हिन्दू कोड बिल का मसविदा प्रस्तुत किया। इसमें बिना वसीयत किए मृत्यु को प्राप्त हो जाने वाले हिन्दू पुरूषों और महिलाओंं की संपत्ति के बंटवारे के संबंध में कानूनों को संहिताबद्ध किए जाने का प्रस्ताव था। यह विधेयक मृतक की विधवा, पुत्री और पुत्र को उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार देता था। इसके अतिरिक्त, पुत्रियों को उनके पिता की संपत्ति में अपने भाईयों से आधा हिस्सा प्राप्त होता।

हिन्दू कोड बिल दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देता था-सांस्कारिक व सिविल। उसमें हिन्दू पुरूषों द्वारा एक से अधिक महिलाओं से शादी करने पर प्रतिबंध और विवाह के विघटन संबंधी प्रावधान भी थे। किसी भी विवाहित व्यक्ति को विवाह की संविदा समाप्त करने के तीन रास्ते उपलब्ध थे-पहला, विवाह को शून्य घोषित करवाना, दूसरा, विवाह को अवैध घोषित करवाना और तीसरा, विवाह का विघटन। विधेयक में यह प्रावधान भी था कि किसी विवाह को अदालत द्वारा अवैध घोषित कर देने के बाद भी उससे उत्पन्न संतानों की वैधता प्रभावित नहीं होगी।

विवाह विच्छेद के लिए सात आधारों का प्रावधान था। 1- परित्याग, 2 – धर्मांतरण, 3 – रखैल रखना या रखैल बनना, 4 – असाध्य मानसिक रोग, 5 – असाध्य व संक्रामक कुष्ठ रोग, 6 – संक्रामक यौन रोग व 7- क्रूरता।

आंबेडकर द्वारा हिन्दू कोड बिल में जो प्रावधान किए गए उनसे दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली, वे पिछड़ी जातियों के राजनीतिक नेता थे और उनके हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। दो, जब उन्होंने हिन्दू कोड बिल तैयार किया तब तक उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि वे हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाएंगे। उसके बाद भी उन्होंने कठोर परिश्रम से ऐसे विधेयक का मसविदा तैयार किया, जिससे हिन्दू महिलाओं को लाभ होता और उनमें से भी ऊँची जातियों / वर्गों की महिलाओं को, जिनके परिवार के सदस्यों के पास संपत्ति होती। आंबेडकर को केवल किसी विशेष वर्ग या जाति की महिलाओं के हितों की चिंता नहीं थी। वे सभी जातियों व वर्गों की महिलाओं के हितों का संरक्षण चाहते थे।

इस तरह यह साफ है कि आंबेडकर ने उन्हें उपलब्ध हर मंच का इस्तेमाल लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए किया।

लैंगिक दृष्टिकोण[संपादित करें]

डॉ. आंबेडकर का लैंगिक परिप्रेक्ष्य क्या था? वे जाति को किस प्रकार देखते थे? वे इन दोनों के बीच क्या संबंध पाते थे? अपने मौलिक शोधपत्र ‘कॉस्ट्स इन इंडिया’ (1916) में आंबेडकर ने यह बताया है कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न समुदायों में वर्गीय अंतर किस प्रकार जाति में बदल गए। आंबेडकर जाति को एक ऐसा बंद वर्ग बताते हैं जिसका मुख्य लक्षण है जाति के अंदर ही विवाह। उनकी यह मान्यता थी कि सबसे पहले पुरोहित वर्ग ने स्वयं को बंद किया और अन्यों को बाहर कर दिया। फि र अन्य जातियों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया।

वर्चस्वशाली जाति में यह कैसे सुनिश्चित किया जाता था कि जाति के बाहर विवाह न हों? आंबेडकर के अनुसार इसके लिए पर कड़ी रोक लगाई जाती थी और महिलाओं पर कठोर नजर और नियंत्रण रखा जाता था। आंबेडकर की यह राय थी कि जाति के निर्माण, संरक्षण और पुनरूत्पादन के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता था। उनका कहना था कि नीची जातियों और महिलाओं के दमन के लिए जाति-लैंगिक गठजोड़ जिम्मेदार है और उसे उखाड़ फेकना आवश्यक है। इस प्रकार आंबेडकर जाति के साथ-साथ लैंगिक विभेद का भी उन्मूलन करना चाहते थे।

आंबेडकर की लैंगिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के तीन स्रोत थे:[संपादित करें]

  1. ‘अछूत’बतौर जातिगत दमन का उनका व्यक्तिगत अनुभव- उन्हें भेदभाव के अनेक अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा। सन् 1927 में महाड़ सत्याग्रह के दौरान महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया, ”तुम लोगों ने हम पुरूषों को जन्म दिया है। तुम लोग जानती हो कि कैसे अन्य लोग हमें जानवरों से भी कमतर मानते हैं। कुछ स्थानों पर लोग हमारी छाया भी उन पर नहीं पडऩे देना चाहते। दूसरे लोगों को अदालतों और कार्यालयों में सम्मानजनक कार्य मिलता है। परंतु तुम्हारे गर्भ से पैदा हुए पुत्रों को इतनी नीची नजरों से देखा जाता है कि हम पुलिस विभाग में चपरासी भी नहीं बन सकते। अगर हममें से कोई तुमसे पूछे कि तुमने हमें जन्म क्यों दिया तो तुम क्या उत्तर दोगी? हम लोगों और कायस्थ व अन्य ऊँची जातियों की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए संतानों में क्या फ र्क है….।’’ आंबेडकर के लिए अपनी जाति के निचले दर्जे और पितृसत्तातमक व्यवस्था में महिलाओं की दासता के पारस्परिक संबंध को समझना कठिन नहीं था।
  1. सैद्धांतिक समझ- उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता और विद्वता और संवेदनशीलता के चलते यह स्वाभाविक था कि उन्होंने जातिगत पदक्रम के सबसे नीचे के पायदान पर खड़े व्यक्ति की दृष्टि से जाति और लैंगिक मुद्दों के बीच सैद्धांतिक अंत:संबंध को समझा और उसकी व्याख्या की। अपने इस विश्लेषण को आंबेडकर ने अपने शोधपत्र ‘कॉस्टस इन इंडिया’में प्रस्तुत किया जिसकी चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं।
  1. मैदानी स्तर पर काम करने वाले महिला संगठनों का उनका नेतृत्व और उसका उनपर प्रभाव- आंबेडकर के नेतृत्व में चले महिला आंदोलन के तीन चरण थे। (१) सन् 1920 के दशक के अंत में आंदोलनों में पुरूषों के साथ महिलाओं की भी भागीदारी : इनमें शामिल थे विभिन्न मंदिर प्रवेश आंदोलन जिनमें महिलाओं ने उत्साहपूर्वक पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। (२) 1930 के दशक में महिलाओं के स्वायत्त संगठन: जनांदोलनों में भाग लेने का अनुभव हासिल करने के बाद महिलााओं को अपने अलग संगठन बनाने की आवश्यकता महसूस हुई जिससे उन्हें अपनी आवाज उठाने का मंच मिल सके। (३) सन् 1940 के दशक में महिलाओं के राजनीतिक संगठन: इनमें शामिल थी ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन जिसके देशभर में विभिन्न स्थानों पर सम्मेलन हुए जिनमें आंबेडकर के नेतृत्व में कई संकल्प पारित किए गए।

डॉ. आंबेडकर के भाषणों और उनके विचारों का महिलाओं पर काफी प्रभाव पड़ा। विशेषकर 1927 के महाड़ आंदोलन के दौरान उनके भाषणों से नीची जाति की महिलाओं के जीवन मे अभूतपूर्व परिवर्तन आया। उन्होंने महिलाओं को यह सलाह दी कि वे ऐसे कपड़े और गहने न पहनें जिनसे अछूत के रूप में उनकी पहचान हो सके, इससे महिलाओं में साहस का संचार हुआ और उन्होंने अलग ढंग से साड़ी बांधना शुरू कर दिया।

जब डॉ. आंबेडकर ने 1935 में यह घोषणा की कि वे अपना धर्म बदलेंगे तब महिलाओं ने अनेक बैठकें आयोजित कर उन्हें अपना समर्थन दिया। महिलाओं ने उनसे अपील की कि वे उन्हें ऐसे किसी धर्म में न ले जाएं जो उनपर पर्दा प्रथा लाद दे।

सन् 1938 में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा कि एक महिला एक व्यक्ति भी है और इस नाते उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त है। उसी वर्ष एक अन्य भाषण में उन्होंने महिलाओं से कम बच्चे पैदा करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा ”अगर बच्चे कम होंगे तो महिलाएं उन्हें पालने-पोसने के कठिन श्रम से बच जाएंगी और अपनी ऊर्जा व ताकत का इस्तेमाल अन्य कार्यों के लिए कर सकेंगी।’’

जनांदोलनों का नेतृत्व करते हुए भी आंबेडकर जमीनी हकीकत से दूर नहीं हुए। उनके अनुरोध पर उनकी महिला अनुयायियों ने कम खर्चीली शादियां करने का आंदोलन चलाया। महिलाएं इस बात से भी सहमत हुईं कि लड़कियों की शादी कम उम्र में नहीं होनी चाहिए और अंतरजातीय विवाह होने चाहिए। जिन महिलाओं को आंबेडकर ने नेतृत्व दिया वे तो उनसे प्रभावित हुईं ही,आंबेडकर भी उनसे प्रभावित हुए बगैर न रह सके। लैंगिक मुद्दों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का मुख्य स्रोत यही महिलाएं थी।

निष्कर्ष[संपादित करें]

आंबेडकर का हिन्दू समाज का विश्लेषण इस प्रकार है
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यह मूलत: जाति व ऊँच-नीच पर आधारित समाज है जिसमें विभिन्न जातियां सम्मान के बढते क्रम और तिरस्कार के घटते क्रम में श्रेणीबद्ध हैं।

यह महिलाओं की लैंगिकता, उनकी प्रजनन क्षमता व श्रम के नियंत्रण पर आधारित है।

मनु के धर्म के दो स्तंभों वर्णाश्रम धर्म और पतिव्रत धर्म पर यह जातिगत-लैंगिक गठजोड़ खड़ा है। बिना एक से छुटकारा पाए हम दूसरे से छुटकारा नहीं पा सकते।

डॉ. भीमराव आंबेडकर की इस समझ और उस पर उनकी भावनात्मक और बौद्धिक प्रतिक्रिया ने महिलाओं और दमितों को मुक्ति दिलाने के उनके मिशन का पथप्रदर्शन किया।

अभावुक इतिहासविद[संपादित करें]

आंबेडकर जी के सिद्धान्त[संपादित करें]

स्वतंत्र्यता[संपादित करें]

क्रांतिकारी देशभक्त डॉ. भीमराव आंबेडकर को ब्रिटीशों से मुक्त भारत के अलावा देश के ९ करोड़ो (आज ३५ करोड़) शोषित, पिडीत एवं दलित लोगों की धार्मिक गुलामी से मुक्ती चाहते थे। उन्हें भारत के साथ भारतीओं की स्वतंत्र्यता चाहिए थी। वे मनुष्य की स्वतंत्र्यता को सबसे बडी स्वतंत्र्यता मानते थे।

समानता[संपादित करें]

डॉ॰ भीमराव आंबेडकर जी को ‘समानता का प्रतिक’ कहाँ जाता है। भीमराव ने अपने पुरे जीवन काल में देश के शोषित, पिडीत, महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक क्षेत्र में समानता देने की बात कही है। भीमराव की वजह से ही आज सबको समान अधिकार है।

भाईचारा[संपादित करें]

भीमराव सच्चे अहिंसक थे, उन्होंने कभी कहीं भी अहिंसा नहीं की या अपने अनुयायीओं को इसका उपदेश किया। भीमराव भगवान बुद्ध के उपासक थे इसलिए वे समस्त मानवों के भाईचारा चाहते थे।

बौद्ध धर्म[संपादित करें]

बौद्ध धर्म द्वारा भीमराव ने करोड़ो के लिए मानवमुक्ती का रास्ता खोजा, क्योंकी बौद्ध धर्म मनुष्य की स्वतंत्र्यता, समानता, विज्ञानवाद, अहिंसा, प्रज्ञा एवं करूणा में विश्वास करता है। आज भारत के बौद्ध बने अनुयायी दलितों एवं हिंदुओं से साक्षरता, लिंग अनुपात, स्नातक, काम में आगे है।

विज्ञानवाद[संपादित करें]

भीमराव सत्यवादी थे, इसलिए उन्हें विज्ञान में विश्वास था।

मानवतावाद[संपादित करें]

सत्य[संपादित करें]

अहिंसा[संपादित करें]

भारतीय जीवन पर आंबेडकर बनाम गांधी[संपादित करें]

डॉ॰ भीमराव आंबेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे। उनके कई समकालीनों और कुछ आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है, तो कई आधुनिक विद्वान डॉ॰ आंबेडकर, उनके विचार, कार्य और आंदोलन को सही मानकर उन्हें गांधी से बडे और महानतम् महापुरूष मानते है।

गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होने उन्हें महज हरिजन कह कर पुकारा। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। भीमराव का दर्शन भारत के हर शोषित गरीब एवं दलित व्यक्ति ने स्विकार करके उनके बाताए हुए रास्ते पर चलकर सफलता पाई।

विरासत[संपादित करें]

अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह् सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है। एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है।

अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन के कारण बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ अस्तित्व मे आये है जो पूरे भारत में सक्रिय रहते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र में। उनके दलित बौद्ध आंदोलन को बढ़ावा देने से बौद्ध दर्शन भारत के कई भागों में पुनर्जागरित हुआ है। दलित कार्यकर्ता समय समय पर सामूहिक धर्म परिवर्तन के समारोह आयोजित उसी तरह करते रहते हैं जिस तरह अम्बेडकर ने 1956 मे नागपुर मे आयोजित किया था।

कुछ विद्वानों, जिनमें से कुछ प्रभावित जातियों से है का विचार है कि अंग्रेज अधिकतर जातियों को एक नज़र से देखते थे और अगर उनका राज जारी रहता तो समाज से काफी बुराईयों को समाप्त किया जा सकता था। यह राय ज्योतिबा फुले समेत कई थी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रखी है।


आधुनिक भारत में कुछ लोग, अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए आरक्षण को अप्रासांगिक और प्रतिभा विरोधी मानते हैं।

अम्बेडकर के बाद[संपादित करें]

पिछले वर्षों में लगातार बौद्ध समूहों और रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच हिंसक संघर्ष हुये है। 1994 में मुंबई में जब किसी ने अम्बेडकर की प्रतिमा के गले में जूते की माला लटका कर उनका अपमान किया था तो चारों ओर एक सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी थी और हड़ताल के कारण शहर एक सप्ताह से अधिक तक बुरी तरह प्रभावित हुआ था। जब अगले वर्ष इसी तरह की गड़बड़ी हुई तो एक अम्बेडकर प्रतिमा को तोड़ा गया। तमिलनाडु में ऊंची जाति के समूह भी बौद्धों के खिलाफ हिंसा में लगे हुए हैं।

विश्व के टॉप 100 विद्वानों में शीर्ष पर[संपादित करें]

कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्युयार्क, अमेरीका ने स्थापना वर्ष 1754, के 250 वर्ष (1754 से 2004) पूरे होने पर वर्ष 2004 में से, ऐसे 100 को कोलंबियन्स अहेड ऑफ देअर टाईम, (शॉर्टेड लीस्ट ऑफ नोटेबल पर्सन) नामक अपने सर्वेक्षण में अपने सौ ऐसे विद्वान छात्रों की एक लिस्ट जारी की, जिन्होंने दुनिया में महान कार्य किये और जो अपने-अपने क्षेत्र में महान एवं अद्वितीय रहे, जिसमें एक मात्र भारतीय भीमराव डॉ॰ भीमराव अंबेडकर शामील थे। इस सूची की खास बात यह हैं इस में अमेरिका के 3 राष्ट्रपति सहित विश्व के 6 अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री, 40 नोबेल पुरस्कार विजेताओं, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के पहले न्यायाधीश सहित 8 अन्य सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, 22 से अधिक अमेरिकी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शामिल हैं I इसके अलावे इस सूची में कई कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, विश्व के सर्वाधिक धनवान व्यक्ति वॉरेन बफे एवं कई दार्शनिक तथा विद्वान शामिल हैं I सूची में जो तीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, उनमें थॉडोर रूजवलेल्ट, फ्रेंकलिन रूजवेल्ट और डोविट एसनहॉवर सहित जर्जिया के राष्ट्रपति मिखैल साकाश्वीली और इथोपिया के राष्ट्रपति थॉमस हेनडिक, इटली के प्रधानमंत्री गियूलिनो अमाटो, अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री अब्दुल जहीर, चीन के प्रधानमंत्री तंगशोयी और पोलैंड के प्रधानमंत्री भी शामिल हैं I कोलंबिया विश्वविद्यालय ने एक स्मारक बनाया है जिस पर इन 100 महान विद्वान विभूतियों के नाम लिखे गये।[17][18][19][20]

इन सभी सम्मानित विभूतियों के नाम को सही क्रम से लगाने के लिए वहां विद्वानों की एक कमेटी बनाई गई। उस कमेटी ने भारतीय संविधान के रचियता भीमराव डॉ॰ बी. आर. अंबेडकर का नाम टॉप 100 में नम्बर वन (प्रथम) पर रखा। इस स्मारक का अनावरण राष्ट्राध्यक्ष एवं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता बराक ओबामा ने किया, यह स्मारक कोलंबिया विश्वविद्यालय के केम्पस में शास से खडा है। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने भीमराव को आधुनिक भारत के निर्माता, भारत के स्वतंत्रता के लिए लढनेवाले महान स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय संविधान निर्माता तथा भारत के करोड़ों शोषित, पिडित, दलित लोगों के मानव अधिकारों के लढनेवाले महान क्रांतिकारक बताकर उनके सम्मान में विश्वविद्यालय में विश्वभर के देशों के संविधानों और कानून की पढाई के उनके नाम से 'डॉ॰ भीमराव आंबेडकर अध्यासन' भी स्थापीत किया है। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनॅशनल अॅण्ड पब्लिक अफेअर के हॉल में भीमराव की शानदार पेन्टींग गर्व से लगवाई है। डॉ॰ आंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से डबल एम.ए. और पीएच.डी पढाई महज ढाई वर्ष में पुरी कि थी। डॉ॰ अंबेडकर द्वारा सामाजिक न्याय व समता के संबंध में भारतीय दलित समाज को हक दिलाने वाले संविधान निर्माण की उपलब्धि से प्रभावित होकर कोलंबिया विश्वविद्यालय न्यूयार्क, अमेरिका ने जून 1952 में उन्हें 'डॉक्टरेट्' (डॉक्टर ऑफ लॉज्) की मानद उपाधि प्रदान की थी I

'कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढते समय जीवन पहली बार मुझे सामाजित समानता का अनुभव आया' ऐसा भीमराव ने सन 1930 में न्युयार्क टाईम्स को दिये हुए अपने इंटरव्हूव में कहां था।

फिल्मे[संपादित करें]

युगपुरूष डॉ. भीमराव आंबेडकर

१९९३ में आई हुई एक मराठी फिल्म है।[21]

डॉ. भीमराव आंबेडकर

जब्बार पटेल ने सन २००० मे डॉ. भीमराव आंबेडकर नामक मुल अंग्रेजी फिल्म बनाई थी। इसमे डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका अभिनेता माम्मूटी ने निभाई थी। भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही। यह फिल्म हिंदी, मराठी, तेलुगू आदी भाषा में अनुवादीत हुई है।

ए रायजिंग लाइट

यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ॰ डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है। ए राएज़िग लाइट डॉ॰ बी आर आंबेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित है।

रमाबाई भीमराव आंबेडकर

यह मराठी भाषा की फिल्म डॉ. भीमराव आंबेडकर की पत्नी रमाबाई या रमाई के जीवन पर आधारित हैं। इसमें भीमराव की भी जीवनी है।[22]

नाटक[संपादित करें]

राजेश कुमार का भीमराव अम्बेडकर और गांधी नाटक[23]अरविन्द गौड़ के निर्देशन मे अस्मिता थियेटर ग्रुप द्वारा पूरे देश मे लगातार मन्चन।

भीमराव का संपूर्ण साहित्य एवं लेखन[संपादित करें]

डॉ॰ भीमराव आंबेडकर बहूत प्रतिभाशाली एवं जुंझारू लेखक थे। भीमराव को 6 भारतीय और 4 विदेशी ऐसे कुल दस भाषाओं का ज्ञान था, अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, पालि, संस्कृत, गुजराती, जर्मन, फारसी, फ्रेंच और बंगाली ये भाषाएं वे जानते थे। भीमराव ने अपने समकालिन सभी राजनेताओं की तुलना में सबसे अधिक लिखा है। सामाजिक संघर्ष में हमेशा सक्रिय और व्यस्त होने के बावजुद भी उनकी इतनी सारी किताबें, निबंध, लेख एवं भाषणों का इतना बडा यह संग्रह वाकई अद्भुत है। वे असामान्य प्रतिभा के धनी थे और यह प्रतिभा एवं क्षमता उन्होंने अपने कठीन परिश्रम से हासित की थी। वे बडे साहसी लेखक या ग्रंथकर्ता थे, उनकी हर किताब में उनकी असामान्य विद्वता एवं उनकी दुरदर्शता का परिचय होता है।

डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के ग्रंथ भारत में ही नहीं बल्की पुरे विश्व में बहुत प्रसिद्ध है, और पुरे विश्व में पढी जाती है। उन्होंने लिखे हुए महान भारतीय संविधान को भारत का राष्ट्रग्रंथ माना जाता है, भारतीय संविधान किसी भी धर्मग्रंथ से कम नहीं है तथा ओ विश्व के प्रमुख महानत् किताबों में एक है। भगवान बुद्ध और उनका धम्म यह उनका ग्रंथ भारतीय बौद्धों का धर्मग्रंथ है तथा बौद्ध देशों में बहूत मशहूर एवं महत्वपुर्ण है। उनके डि.एस.सी. प्रबंध रूपये की समस्या से भारत के केन्द्रिय बैंक यानी भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना हुई है। राजनिती, अर्थशास्त्र, मानवविज्ञान, धर्म, समाजशास्त्र, कानून आदी क्षेत्रों में उन्होंने किताबें लिखी है।[24]


ग्रंथकार डॉ॰ भीमराव आंबेडकर की समग्र लेखन सूची

{I} Books and Monograph

[1] Administration and finance of the East India Company (Thesis for MA Degree)

[2] The Evolution of Provincial Finance in British India (Thesis for PhD, 1917, published 1925)

[3] The problem of the Rupees: Its Origin and Its Solution (Thesis for DSc, Published 1923)

[4] Annihilation of Caste (May 1936)

[5] Which way to Emancipation? (May 1936)

[6] Federation versus Freedom (1936)

[7] Pakistan or the Partition of India / Thoughts on Pakistan (1940)

[8] Rande, Gandhi and Jinaah (1943)

[9] Mr. Gandhi and the Emancipation of the Untouchables (Sep 1943)

[10] What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables (June 1945)

[11] Communal Deadlock and a Way to Solve It (May 1946)

[12] Who Were the Shudras? (October 1946)

[13] A critique of The Proposals of Cabinet Mission for Indian Constitution changes in so far as they affect the Scheduled Castes (Untouchable) (1946)

[14] The Cabinet Mission and the Untouchables (1946)

[15] States and Minorities (1947)

[16] Maharashtra as a Linguist Province (1948)

[17] The Untouchables: Who Were They are Why The Become Untouchables (October 1948)

[18] Thoughts on Linguistic States: A critique of the Report of the States Reorganization Commission (Published 1955)

[19] The Buddha and His Dhamma (1957)

[20] Riddle's in Hinduism

[21] Dictionary of Pali Language (Pali-English)

[22] The Pali Grammar

[23] Waiting for a Wisa (Autobiography) (1935-1936)

[24] A people at Bay

[25] Untouchables or the Children of India's Ghetto

[26] Can I be a Hindu?

[27] What the Brahmins Have Done to the Hindus

[28] Essays of Bhagwat Gita

[29] India and Communism

[30] Revolution and Counter-revolution in Ancient India

[31] The Buddha or Karl Marx

[32] Constitution and Constitutionalism


{II} Memoranda, Evidence and Statement's

[33] On Franchise and Framing Constituencies (1919)

[34] Statement of Evidence to the Royal Commission of Indian Currency (1926)

[35] Protection of the Interests of the Depressed Classes (May 29, 1928)

[36] State of Education of the Depressed Classes in the Bombay Presidency (1928)

[37] Constitution of the Government of Bombay Presidency (May 17, 1929)

[38] A Scheme of Political Safeguards for the protection of the Depressed in the Future Constitution of a Self- governing India (1930)

[39] The Claims of the Depressed Classes for Special Represention (1931)

[40] Franchise and Tests of Untouchability (1932)

[41] The Cripps Proposals on Constitutional Advancement (July 18, 1942)

[42] Grievances of the Schedule Castes (Oct 29, 1942)


{III} Research Papers, Articles and Books Reviews

[43] Castes in India: Their Genius, Mechanism and Development (1918)

[44] Mr. Russel and the Reconstruction of Society (1918)

[45] Small Holding In India and Their Remedies (1918)

[46] Currency and Exchanges (1925)

[47] The Present Problem of Indian Currency (Apr 1925)

[48] Report of Taxation Enquiry Committee (1926)

[49] Thoughts on the Repform of Legal Education in the Bombay Presidency (1936)

[50] The Rise and Fall of Hindu Women (1950)

[51] Need for checks and Balances (Apr 23, 1953)

[52] Buddha Pooja Path (Marathi) (Nov 1956)


{IV} Preface and Forewords

[53] Forward to Untouchable Workers of Bombay City (1938)

[54] Forward to commodity Exchange (1947)

[55] Preface to the Essence of Buddhism (1948)

[56] Forward to Social Insurance and India (1948)

[57] Preface to Rashtra Rakshake Vaidik Sadhan (1948)

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. http://www.firstpost.com/politics/rescuing-ambedkar-from-pure-dalitism-he-wouldve-been-indias-best-prime-minister-2195498.html
  2. http://www.dnaindia.com/analysis/standpoint-do-we-really-respect-dr-ambedkar-or-is-it-mere-lip-service-2040352
  3. http://www.deccanchronicle.com/140415/nation-politics/article/now-dr-br-ambedkar-narendra-modi-quiver
  4. https://www.telegraphindia.com/1150216/jsp/frontpage/story_3660.jsp#.WKrDXmXbvIV
  5. http://www.freepressjournal.in/india/milestones-achieved-by-dr-babasaheb-ambedkar/823227
  6. http://www.hindustantimes.com/india/archives-released-by-lse-reveal-br-ambedkar-s-time-as-a-scholar/story-N2sq6Bm6OlxwQZkz6vBzvM.html
  7. Jaffrelot, Christophe (2005). Dr. Ambedkar and Untouchability: Fighting the Indian Caste System. New York: Columbia University Press. प॰ 2. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-231-13602-1. 
  8. Pritchett, Frances. "In the 1890s" (PHP). http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/timeline/1890s.html. अभिगमन तिथि: 2006-08-02. 
  9. Pritchett, Frances. "In the 1900s" (PHP). http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/timeline/1900s.html. अभिगमन तिथि: 2006-08-02. 
  10. Pritchett. "Rajah, Rao Bahadur M. C.". University of Columbia. http://ccnmtl.columbia.edu/projects/mmt/ambedkar/web/individuals/6750.html. अभिगमन तिथि: 2009-01-05. 
  11. Kothari, R. (2004). Caste in Indian Politics. Orient Blackswan. प॰ 46. ISBN 81-250-0637-0, ISBN 978-81-250-0637-4. 
  12. http://www.osho.com/iosho/library/read-book/online-library-untouchables-ambedkar-man-81c035e1-fee?p=650c5c242695b641379a54c1e34384b8
  13. Pritchett, Frances. "In the 1930s" (PHP). http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/timeline/1930s.html. अभिगमन तिथि: 2006-08-02. 
  14. Pritchett, Frances. "In the 1940s" (PHP). http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/timeline/1940s.html. अभिगमन तिथि: 2006-08-02. 
  15. Ambedkar, Bhimrao Ramji (1946). "Chapter X: Social Stagnation". Pakistan or the Partition of India. Bombay: Thackers Publishers. pp. 215–219. http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/ambedkar_partition/410.html. अभिगमन तिथि: 2009-10-08. 
  16. Pritchett, Frances. "In the 1950s" (PHP). http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/timeline/1950s.html. अभिगमन तिथि: 2006-08-02. 
  17. http://c250.columbia.edu/c250_celebrates/remarkable_columbians/bhimrao_ambedkar.html
  18. http://www.wikicu.com/250_Greatest_Columbia_Alumni
  19. http://archive.indianexpress.com/news/intellectuals-pay-rich-tribute-to-ambedkar-at-columbia-university/1188647/
  20. http://www.columbia.edu/cu/record/archives/vol21/vol21_iss9/record2109.21.html
  21. https://m.youtube.com/watch?v=9gqwORuDPfg
  22. https://m.youtube.com/watch?v=hF03tJMa54c
  23. http://mohallalive.com/2010/02/23/a-play-based-on-ambedkar-and-gandhi/
  24. डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के ग्रंथों की सूची [1]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]


बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]


साँचा:अम्बेडकर