आर्थिक अधिशेष

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आर्थिक अधिशेषअर्थशास्त्र के क्षेत्र में एक बहुत ही सुविधाजनक और व्यावहारिक विषय है। विशेष रूप से, यह कल्याणकारी अर्थशास्त्र की शाखा के अंतर्गत आता है। संसाधनों के एक कुशल आवंटन प्राप्त करने में उसके आवेदन के अलावा, यह डेविड रिकार्डो का 'आर्थिक किराया सिद्धांत' और कार्ल मार्क्स का 'अधिशेष मूल्य सिद्धांत' का अभिन्न अंग है।[1]

परिभाषा[संपादित करें]

किसी गतिविधि या लेनदेन से समाज में पाये गए कुल मूल्य को ही 'आर्थिक अधिशेष' कहते हैं। इस लेनदेन में शामिल लोगों को ही लाभ नही मिलता, परंतु कभी-कभार एक ही गतिविधि से कई लोगों को आर्थिक अधिशेष का लाभ मिलता है। दुसरे शब्दों में, आर्थिक अधिशेष 'उपभोक्ता अधिशेष' और 'उत्पादक अधिशेष' का कुल जोड़ है। अतः आर्थिक अधिशेष तभी उतपन्न होती है जब किसी उपभोक्ता को चाहत से कम दाम में कुछ चीज मिलती है या किसी उत्पादक को अपने माल के बदले में चाहत से ज्यादा दाम मिलती है।[2]

उपभोक्ता अधिशेष[संपादित करें]

अवलोकन[संपादित करें]

किसी चीज़ को खारीदते समय, एक उपभोक्ता एक निर्धारित राशि देने के लिये तैयार रेहता है, और अधिकांश समय वह एक अन्य ही राशि देता है। इन दोनो के अंतर को ही 'उपभोक्ता अधिशेष' कहलाया जाता है।[3]

इस परिभाषा को स्पष्ट करने के लिये, एक उदाहरण प्रस्तुत है। मान लीजिए कि अनिल बाजार से एक किताब खरीदना चाहता है, और वह इस किताब के लिए २०० रुपये देने के लिए तैयार है। बाजार पहुँचने पर उसे पता चलता है कि उस पुस्तक की वास्तविक कीमत केवल १५० रुपए है, और इसलिए वह उस पुस्तक को खुशी-खुशी खरीदता है। इस उदाहरण में उपभोक्ता २०० रुपये देने के लिए तैयार था, पर उसे सिर्फ १५० रुपये ही देने पडा। अत: इस उदाहरण में अनील को ५० रुपए की उपभोक्ता अधिशेष प्राप्त होती है।

मांग वक्र और उपभोक्ता अधिशेष[संपादित करें]

एक मांग वक्र बाजार में सभी उपभोक्ताओं के खर्च करने की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। कुल उपभोक्ता अधिशेष मांग वक्र के नीचे और मूल्य से ऊपर का क्षेत्र है।[4]

मांग वक्र द्वारा उपभोक्ता अधिशेष का प्रतिनिधित्व

उपभोक्ता अधिशेष पर कीमत का प्रभाव[संपादित करें]

उपभोक्ता अधिशेष पर कीमत का प्रभाव बहुत सीधा है। यहाँ दो परिदृश्यों संभव हैं: कीमत में वृद्धि और कीमत में घटाव। जब कीमत बढती है तब उपभोक्ता अधिशेष कम हो जाती है, और जब कीमत कम हो जाती है तब उपभोक्ता अधिशेष बढ जाती है। इस प्रकार कीमत और उपभोक्ता अधिशेष के बीच एक उलटा रिश्ता होता है।[5]

उपभोक्ता अधिशेष पर कीमत का प्रभाव का प्रतिनिधित्व

उत्पादक अधिशेष[संपादित करें]

अवलोकन[संपादित करें]

उत्पादक को दिया गया शोध और उत्पादक के खुद की खर्च के बीच के अंतर को 'निर्माता अधिशेष' कहा जाता है। निर्माता अधिशेष तभी उतपन्न होती है जब उत्पादक की उम्मीद की कीमत बाजार की कीमत से कम होता है।[6]

इस परिभाषा को स्पष्ट करने के लिये, एक उदाहरण प्रस्तुत है। मान लीजिए कि अनिल ने १५० रुपये खर्च करके एक पुस्तक छापा है। अब वह उस पुस्तक को बाजार में बेचना चाहता है। बाजार पहुँचने पर उसे पता चलता है कि उस पुस्तक की वास्तविक कीमत २०० रुपए है, और इसलिए वह उस पुस्तक को खुशी-खुशी बेचता है। इस उदाहरण में उत्पादक की खुद की खर्चा १५० रुपए है, पर बाजार कि कीमत २०० रुपए है। अत: इस उदाहरण में अनील को ५० रुपए की उत्पादक अधिशेष प्राप्त होती है।

आपूर्ति वक्र और उत्पादक अधिशेष[संपादित करें]

एक आपूर्ति वक्र बाजार में किसी भी वस्तु उपलब्ध करने में प्रत्येक उत्पादक की सीमांत लागत का प्रतिनिधित्व करता है। कुल उत्पादक अधिशेष मूल्य से नीचे और आपूर्ति वक्र के ऊपर का क्षेत्र है।[7]

आपूर्ति वक्र द्वारा उत्पादक अधिशेष का प्रतिनिधित्व

उत्पादक अधिशेष पर कीमत का प्रभाव[संपादित करें]

उपभोक्ता अधिशेष की तरह, उत्पादक अधिशेष पर भी कीमत का प्रभाव बहुत सीधा है। यहाँ भी दो परिदृश्यों संभव हैं: कीमत में वृद्धि और कीमत में घटाव। जब कीमत बढती है तब उत्पादक अधिशेष भी बढ जाती है, और जब कीमत कम हो जाती है तब उत्पादक अधिशेष भी कम हो जाती है। इस प्रकार कीमत और उत्पादक अधिशेष के बीच एक सीधा रिश्ता होता है।[8]

उत्पादक अधिशेष पर कीमत का प्रभाव का प्रतिनिधित्व

आर्थिक अधिशेष का सूत्र और प्रतिनिधित्व[संपादित करें]

उपभोक्ता अधिशेष = खरीददारों के लिए मूल्य - खरीदारों द्वारा भुगतान की गई राशि।

निर्माता अधिशेष = उत्पादकों द्वारा प्राप्त राशि - उत्पादकों के लिए लागत।

आर्थिक अधिशेष = उपभोक्ता अधिशेष + निर्माता अधिशेष = (खरीददारों के लिए मूल्य - खरीदारों द्वारा भुगतान की गई राशि) + (राशि विक्रेताओं द्वारा प्राप्त - विक्रेताओं के लिए लागत)।

अब, खरीदारों द्वारा भुगतान राशि और विक्रेताओं द्वारा प्राप्त राशि, दोनों बराबर हैं।

इसलिए, आर्थिक अधिशेष = खरीददारों के लिए मूल्य - विक्रेताओं के लिए लागत।[9]

मांग और आपूर्ति वक्र के ग्राफ में, मांग और आपूर्ति वक्रों के बीच के क्षेत्र (मांगी गयी मात्रा तक) आर्थिक अधिशेष का प्रतिनिधित्व करती है।[10]

मांग और आपूर्ति वक्रो द्वारा आर्थिक अधिशेष का प्रतिनिधित्व

संदर्भों[संपादित करें]

  1. Boulding, K. (1945). The Concept of Economic Surplus. American Economic Association, 35(5). Retrieved from http://www.jstor.org/stable/1812599
  2. Economic Surplus. (2014, June 22) Retrieved from http://market.subwiki.org/wiki/Economic_surplus
  3. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 137). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  4. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 138). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  5. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 139). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  6. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 141). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  7. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 143). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  8. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 144). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  9. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 145). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited
  10. Mankiw, G. (2012). Principles of Microeconomics (Pg 146). Patparganj, Delhi: Cengage Learning India Private Limited