भारत के विदेश संबंध

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██ भारत ██ भारतीय राजनयिक मिशन की मेजबानी करने वाले राष्ट्र

किसी भी देश की विदेश नीति इतिहास से गहरा सम्बन्ध रखती है। भारत की विदेश नीति भी इतिहास और स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्ध रखती है। ऐतिहासिक विरासत के रूप में भारत की विदेश नीति आज उन अनेक तथ्यों को समेटे हुए है जो कभी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन से उपजे थे। शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व व विश्वशान्ति का विचार हजारों वर्ष पुराने उस चिन्तन का परिणाम है जिसे महात्मा बुद्धमहात्मा गांधी जैसे विचारकों ने प्रस्तुत किया था। इसी तरह भारत की विदेश नीति में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवादरंगभेद की नीति का विरोध महान राष्ट्रीय आन्दोलन की उपज है।

भारत के अधिकतर देशों के साथ औपचारिक राजनयिक सम्बन्ध हैं। जनसंख्या की दृष्टि से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक व्यवस्था वाला देश भी है और इसकी अर्थव्यवस्था विश्व की बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।[1]

चित्र:G-8 34th Summit.png
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ रूसी राष्ट्रपति डिमीट्री मेडवेडेव , 34वाँ जी-8 शिखर सम्मेलन

प्राचीन काल में भी भारत के समस्त विश्व से व्यापारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक सम्बन्ध रहे हैं। समय के साथ साथ भारत के कई भागों में कई अलग अलग राजा रहे, भारत का स्वरूप भी बदलता रहा किंतु वैश्विक तौर पर भारत के सम्बन्ध सदा बने रहे। सामरिक सम्बन्धों की बात की जाए तो भारत की विशेषता यही है कि वह कभी भी आक्रामक नहीं रहा।

1947 में अपनी स्वतंत्रता के बाद से, भारत ने अधिकांश देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा है। वैश्विक मंचों पर भारत सदा सक्रिय रहा है। 1990 के बाद आर्थिक तौर पर भी भारत ने विश्व को प्रभावित किया है। सामरिक तौर पर भारत ने अपनी शक्ति को बनाए रखा है और विश्व शान्ति में यथासंभव योगदान करता रहा है। पाकिस्तानचीन के साथ भारत के संबंध कुछ तनावपूर्ण अवश्य हैं किन्तु रूस के साथ सामरिक संबंधों के अलावा, भारत का इजरायल और फ्रांस के साथ विस्तृत रक्षा संबंध है।

भारत की विदेश नीति के निर्माण की अवस्था को निम्न प्रकार से समझा जा सकता हैः-

स्वतन्त्रता से पहले भारत की विदेश नीति का निर्माण[संपादित करें]

यद्यपि स्वतन्त्रता से पहले भारत की विदेश नीति का विकास भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में ही हुआ, लेकिन इससे पहले भी भारतीय चिन्तन में शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व, अहिंसा जैसे सिद्धान्तों के साथ-साथ कौटिल्य के चिन्तन में कूटनीतिक उपायों का भी वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान तो आज भी यह मानते हैं कि विदेश नीति के कुछ उपकरण व साध्य कौटिल्य की ही देन है।

भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में अंगरेजों ने भारत की विदेश नीति का निर्धारण अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा व उसकी वृद्धि को ध्यान में रखकर किया था। अंग्रेजों ने चीन, अफगानिस्तान तथा तिब्बत को बफ़र स्टेट माना। उन्होनें चीन में भी विशेष रुचि ली और भारत-चीन सीमा का निर्धारण किया। अंग्रेजों ने नेफा (अरुणाचल प्रदेश) को भारतीय सीमा में ही रखा और भूटानसिक्किम भारत की विदेश नीति के निर्माण की अवस्था व ऐतिहासिक विकास को विशेष महत्व दिया। उन्होंने अपने व्यापारिक शर्तों के लिए इस क्षेत्र में सुरक्षा का उत्तरदायित्व स्वयं संभाला।

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन व विदेश नीति[संपादित करें]

भारत की विदेश नीति के आधानिक सिद्धान्तों का निर्माण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना होने के बाद ही हुआ। 1885 से ही कांग्रेस ने अंग्रेजों की दमनकारी नीति का विरोध करना शुरु कर दिया और कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धान्तों की नींव डाली जो आज भी भारत की विदेश नीति का आधार हैं।

1885 में पारित एक प्रस्ताव द्वारा कांग्रेस ने उत्तरी बर्मा को अपने क्षेत्र में मिला लेने के लिये ब्रिटेन की निन्दा की। इसी तरह 1892 में एक अन्य प्रस्ताव द्वारा भारत ने अपने आपको अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों से स्वयं को स्वतन्त्र बताया। इसी दौरान कांग्रेस ने भारत को बर्मा, अफगानिस्तान, ईरान, तिब्बत आदि निकटवर्ती राज्यों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही हेतु प्रयोग किये जाने पर असंतोष जताया गया। यह भारत की असंलग्नता की नीति की ही पृष्ष्ठभूमि थी। प्रथम विश्वयुद्ध तक कांग्रेस का अंग्रेजों के प्रति दृष्ष्टिकोण-असंलग्नता की नीति का पालन अर्थात् ब्रिटिश नीतियों से स्वयं को दूर रखना ही रहा। इस दौरान कांग्रेस ने अंग्रेजों की साम्राज्यवादी व उपनिवेशवादी तथा दक्षिण अफ्रीका में लाई जा रही रंगभेद की नीति का विरोध किया जो आगे चलकर आधुनिक भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण उद्देश्य व सिद्धान्त बनी।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1921 में कांग्रेस ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार की नीतियां भारत की नीतियां नहीं हैं और न ही वे किसी तरह भारत की प्रतिनिधि हो सकती। कांग्रेस ने यह भी घोषणा की कि भारत को अपने पड़ोसी देशों से कोई खतरा व असुरक्षा की भावना नहीं है। इसी कारण 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध में कांग्रेस ने अंग्रेजी हितों के लिए शामिल होने से मना कर दिया था। 1920 में चलाए गए खिलाफत आन्दोलन में भी भारत ने मुसलमानों का साथ दिया जो आज भी भारत की अरब समर्थक विदेश नीति का द्योतक है। भारत ने हमेशा ही अरब-इजराइल संकट में अरबों का ही पक्ष लिया है। इसी दौरान कांग्रेस ने उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद विरोधी सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और उपनिवेशवाद के शिकार देशों के साथ मिलकर अंग्रेजों की नीतियों की निन्दा की।

वैश्विक मंच पर भारत[संपादित करें]

1947 से 1990: गुटनिरपेक्ष आंदोलन[संपादित करें]

जवाहरलाल नेहरू के साथ हरमन जोसेफ ऐब्स (1956)

1950 के दशक में, भारत ने पुरजोर रूप से अफ्रीका और एशिया में यूरोपीय उपनिवेशों की स्वतंत्रता का समर्थन किया और गुट निरपेक्ष आंदोलन में एक अग्रणी की भूमिका निभाई।[2]

1990 के बाद[संपादित करें]

हाल के वर्षों में, भारत ने क्षेत्रीय सहयोग और विश्व व्यापार संगठन के लिए एक दक्षिण एशियाई एसोसिएशन में प्रभावशाली भूमिका निभाई है। [3] भारत ने विभिन्न बहुपक्षीय मंचों, सबसे खासकर पूर्वी एशिया के शिखर बैठक और जी-8 5 में एक सक्रिय भागीदारी निभाई है। आर्थिक क्षेत्र में भारत का दक्षिण अमेरिका, एशिया, और अफ्रीका के विकासशील देशों के साथ घनिष्ठ संबंध है।[4]

प्रत्यर्पण संधियाँ[संपादित करें]

जनवरी 2014 तक भारत 37 देशों के साथ अपराधि‍यों के प्रत्‍यार्पण की संधि‍ कर चुका है,[5] जिनकी सूची इस प्रकार है[6] -

सीमावर्ती/पड़ोसी देश[संपादित करें]

2014 में भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्तों में नई जान फूँक दी। इस घटना को वृहत "प्रमुख राजनयिक घटना" के रूप में भी देखा गया।[7][8]

चीन[संपादित करें]

चीनी जनवादी गणराज्यभारत

मनमोहन सिंह और वेन जियबाओ
अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, 2014

दोनो देशों के बीच व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, आदि सम्बंध होने के बावजूद पतले-से पथ पर डगमगाते हुए चलेते आ रहे है। 1950 का दशक भारत और तिब्बत सम्बंध का स्वर्णिम युग था, जबतक कि चीन ने तिब्बत को चामडो के जंग के बाद अपने क्षेत्र में मिला लिया। भारत फिर धीरे-धीरे तिब्बत से दूर होता गया। दलाई लामा तिब्बत छोड़ भारत एक शरणार्थी बन कर आए थे, यह विषय भी चीन के साथ विवादित है।

भारत-चीनी रिश्ते तबतक ठीक थे, जबतक भारत ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा तब उस समय सुरक्षा परिषद की अद्यक्षता का प्रस्ताव ठुकरा कर चीन को सौंप दिया। लेकिन रिश्ते सबसे ज़्यादा पहली बार बीसवीं सदी में ख़राब हुए थे, जब भारत और चीन के बीच में अक्साई चिन को लेकर 1962 का युद्ध हुआ था, जिसमें चीन ने भारत को शिकस्त दी थी। तब एक समझौते के तहत इस निष्कर्ष पर दोनो पक्षों ने सहमति रखी, जिन्मे से एक यह थी कि जतनी ज़ीम चीन ने जंग में हासिल की, उतनी उस ज़मीन के सीमा को "वास्तविक नियंत्रण रेखा" कहा जाएगा। यह रेखा अक्साई चिन, लद्दाख़ से होते हुए, अरुणाचल प्रदेश के विवादित "मैकमहोन रेखा" तक जाती है।

साल 1967 में ना-थुला में एक सैन्य झड़प हुई थी, जिसमें भारत ने चीन को हरा दिया था। हालाँकि उसके 2 साल पहले भारत-पाकिस्तान का 1965 युद्ध हुआ था और भारत ने पाकिस्तान को शिकस्त दी थी। 2 साल में हालात थोड़े नाज़ुक थे, लेकिन भारत उससे जल्द ही उभर आया।

1950-70 में भारत के सम्बंध ताइवान के साथ भी थे, लेकिन भारत ने उससे भी दूरी बनने की शुरुआत धीरे की, और कहा कि वह चीन की मुख्य भूमि को ही मानता है। हालां की अब दोनो के रिश्ते सुधर रहे है।

चीन-भारत के रिश्ते सुधरते हुए एक नए मुक़ाम पर पहुचे, जब साल 2004 से दोनो के बीच आर्थिक सम्बंध सुधरे और वह एक-दूसरे के क़रीब आने लगे। लेकिन फिर दो ऐसी घटनाओं से स्तिथि फिर बिगड़ी। 2017 में डोक़लम विवाद हुआ, जब चीन ने भूटान के सीमा-निकट इस क्षेत्र पर सैन्य निर्माण करने की कोशिश की। भूटान ने इसका विरोध किया, और भारत से मदद माँगी, जिसके बाद भारत ने अपनी तरफ़ से सेना को भेजा। डेढ़-दो महीने के भारत और चीन के सैन्य गतिरोध पर पूर्ण विराम लगा, और एक सैनय विराम पर दोनो सेना-अद्यक्षो ने अपने हस्ताक्षर किए। लेकिन साल 2020 की गलवान घाटी में झड़प ने बन रहे रिश्तों को और बिगाड़ दिया; लेकिन वर्ष 2021 के मध्य जनवरी को ख़बर आई की दोनो देशों के बीच मध्यसत्ता हुई, और दोनो ही अपने-अपने पूर्व सैन्य स्थानो में लौट आए। भारत में कोरोना-19 की महामारी ने भी रिश्तों में दरार डाली है, क्योंकि वह चीन के वुहान शहर से ये विषाणु फैला था, जिसने बाद में पूरे विश्व में संक्रमित हुआ, और, अमरीका के बाद दूसरे स्थान पर भारत को खड़ा कर दिया।

चीन के साथ सम्पर्क इसलिए भी बिगड़े हुए, क्योंकि चीन पाकिस्तान की ओर ज़्यादा तरफ़दारी करता है, कश्मीर मुद्दे पर भी वह उसका समर्थन करता है। संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के पाँचो अद्यक्षो में से एक होने के कारण, चीन हर बार पाकिस्तान पर कड़ी कार्यवाही के प्रस्ताव पर उसे बचा लेता है। पाकिस्तान चीन के कई बड़े परियोजना कार्यों का आर्थिक लाभ उठाने की कोशिश करता है, जिसमें से चीन-पाक आर्थिक गलियारा एक महत्वपूर्ण परियोजना है। भारत इसका कड़ा विरोध करता है, क्योंकि जो अंतरष्ट्रीय राज्यमार्ग चीन से हो कर पाकिस्तान में दाख़िल होती है, वह पाकिस्तान द्वारा अधिकृत कश्मीर से हो कर गुज़रती है, जिसको लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच ताना-तानी है।

अभी संबंधो में नाजुकता है।

पाकिस्तान[संपादित करें]

पाकिस्तानभारत

उनके बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जातीय संबंधों के बावजूद, भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध 1947 में भारत के विभाजन के बाद से अविश्वास और संदेह के वर्षों से त्रस्त रहे हैं। भारत और उसके पश्चिमी पड़ोसी के बीच विवाद का प्रमुख स्रोत कश्मीर संघर्ष रहा है। पश्तून आदिवासियों और पाकिस्तानी अर्धसैनिक बलों के आक्रमण के बाद, जम्मू और कश्मीर के डोगरा साम्राज्य के हिंदू महाराजा, हरि सिंह और उसके मुस्लिम प्रधान मंत्री, शेख अब्दुल्ला ने नई दिल्ली के साथ एक विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। पहला कश्मीर युद्ध भारतीय सेना द्वारा राज्य की राजधानी श्रीनगर में प्रवेश करने के बाद शुरू हुआ, ताकि क्षेत्र को हमलावर बलों से सुरक्षित किया जा सके। दिसंबर 1948 में नियंत्रण रेखा के साथ युद्ध समाप्त हो गया, जिसमें तत्कालीन रियासत को पाकिस्तान (उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्रों) और भारत (दक्षिणी, मध्य और उत्तरपूर्वी क्षेत्रों) द्वारा प्रशासित क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। डोगरा साम्राज्य ने इसके साथ एक ठहराव समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद से पाकिस्तान ने विलय के साधन की वैधता का विरोध किया। 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध पाकिस्तान के ऑपरेशन जिब्राल्टर की विफलता के बाद शुरू हुआ, जिसे भारत द्वारा शासन के खिलाफ विद्रोह को भड़काने के लिए जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। पांच सप्ताह के युद्ध में दोनों पक्षों के हजारों हताहत हुए। यह संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा अनिवार्य युद्धविराम और ताशकंद घोषणा के बाद जारी होने में समाप्त हुआ। 1971 में भारत और पाकिस्तान फिर से युद्ध के लिए गए, इस बार संघर्ष पूर्वी पाकिस्तान को लेकर हो रहा है। पाकिस्तान सेना द्वारा वहां किए गए बड़े पैमाने पर अत्याचारों के कारण लाखों बंगाली शरणार्थी भारत में आ गए। भारत ने मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर पाकिस्तान को हराया और पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी मोर्चे पर आत्मसमर्पण कर दिया। युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ।


जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना गवर्नमेंट हाउस, शिमला, ब्रिटिश भारत के मैदान में टहलते हुए। 1998 में, भारत ने पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षण किया, जिसके बाद पाकिस्तान का छगई-I परीक्षण किया गया। फरवरी 1999 में लाहौर घोषणा के बाद, संबंधों में कुछ समय के लिए सुधार हुआ। हालांकि, कुछ महीने बाद, पाकिस्तानी अर्धसैनिक बलों और पाकिस्तानी सेना ने भारतीय कश्मीर के कारगिल जिले में बड़ी संख्या में घुसपैठ की। इसने घुसपैठियों को सफलतापूर्वक खदेड़ने के लिए भारत के हजारों सैनिकों के जाने के बाद कारगिल युद्ध की शुरुआत की। हालांकि इस संघर्ष के परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध नहीं हुआ, लेकिन दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट 814 के अपहरण में पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के शामिल होने के बाद दोनों के बीच संबंध अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए। जुलाई 2001 में आयोजित आगरा शिखर सम्मेलन जैसे संबंधों को सामान्य करने के प्रयास विफल रहे। दिसंबर २००१ में भारतीय संसद पर हुए हमले, जिसके लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया गया था, जिसने हमले की निंदा की थी, दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध का कारण बना, जो लगभग एक साल तक चला, जिससे परमाणु युद्ध की आशंका बढ़ गई। हालाँकि, 2003 में शुरू की गई एक शांति प्रक्रिया ने बाद के वर्षों में संबंधों में सुधार किया।

शांति प्रक्रिया की शुरुआत के बाद से, भारत और पाकिस्तान के बीच कई विश्वास-निर्माण-उपायों (सीबीएम) ने आकार लिया है। समझौता एक्सप्रेस और दिल्ली-लाहौर बस सेवा इन सफल उपायों में से दो हैं जिन्होंने दोनों देशों के बीच लोगों से लोगों के संपर्क को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2005 में श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा की शुरुआत और 2008 में नियंत्रण रेखा के पार एक ऐतिहासिक व्यापार मार्ग का उद्घाटन संबंधों को बेहतर बनाने के लिए दोनों पक्षों के बीच बढ़ती उत्सुकता को दर्शाता है। हालांकि मार्च 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, लेकिन 2010 तक इसके 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद है। 2005 के कश्मीर भूकंप के बाद, भारत ने पाकिस्तानी कश्मीर और पंजाब के साथ-साथ भारतीय कश्मीर में प्रभावित क्षेत्रों में सहायता भेजी। .

2008 के मुंबई हमलों ने दोनों देशों के बीच संबंधों को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। भारत ने पाकिस्तान पर अपनी धरती पर आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप लगाया, जबकि पाकिस्तान ने इस तरह के दावों का जोरदार खंडन किया।

भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया अध्याय तब शुरू हुआ जब 2014 के चुनाव में जीत के बाद नई एनडीए सरकार ने दिल्ली में कार्यभार संभाला और शपथ ग्रहण समारोह में सार्क सदस्यों के नेताओं को आमंत्रित किया। इसके बाद 25 दिसंबर को भारतीय प्रधान मंत्री की अनौपचारिक यात्रा पाकिस्तानी प्रधान मंत्री नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन पर बधाई देने और उनकी बेटी की शादी में भाग लेने के लिए। यह आशा की गई थी कि पड़ोसी के बीच संबंध सुधरेंगे लेकिन १८ सितंबर २०१६ को पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा भारतीय सेना के शिविर पर हमले और बाद में भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक ने राष्ट्रों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को बढ़ा दिया।

इस्लामाबाद में होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन को भारत और अन्य सार्क सदस्यों द्वारा बहिष्कार के बाद रद्द कर दिया गया था।

फरवरी 2019 में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े एक आतंकवादी द्वारा सीआरपीएफ पर एक और हमले के बाद इस संबंध ने और भी अधिक तोड़ दिया, जब आतंकवादी ने पुलवामा, कश्मीर में सीआरपीएफ सैनिकों को ले जा रही एक बस के खिलाफ विस्फोटक से भरे अपने वाहन को टक्कर मार दी। , 40 की हत्या। भारत ने पाकिस्तान को दोषी ठहराया जिसे पाकिस्तानी प्रतिष्ठान ने नकार दिया। भारत ने बालाकोट पर एक हवाई हमले के साथ जवाबी कार्रवाई की, एक क्षेत्र जिसका दावा और नियंत्रण पाकिस्तान द्वारा किया गया था।

शांति में एक नया अध्याय प्रज्वलित हुआ, जब यह अचानक घोषित किया गया कि दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच एलओसी के पार सीमा पार से गोलीबारी को रोकने के लिए एक पिछले दरवाजे पर शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, और देशों के एक साथ आने में एक स्थिर वृद्धि देखी गई थी। .

अफ़गानिस्तान[संपादित करें]

अफ़ग़ानिस्तानभारत

हामिद करज़ई के साथ नरेंद्र मोदी

भारत और अफगानिस्तान ऐतिहासिक पड़ोसी रहे हैं, और बॉलीवुड और क्रिकेट के माध्यम से सांस्कृतिक संबंध साझा करते हैं।

1980 के दशक में सोवियत समर्थित लोकतांत्रिक गणराज्य अफगानिस्तान को मान्यता देने वाला भारत गणराज्य एकमात्र दक्षिण एशियाई देश था, हालांकि 1990 के दशक के अफगान गृहयुद्ध और तालिबान सरकार के दौरान संबंध कम हो गए थे। भारत ने तालिबान को उखाड़ फेंकने में सहायता की और अफगानिस्तान के वर्तमान इस्लामी गणराज्य को मानवीय और पुनर्निर्माण सहायता का सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रदाता बन गया। अफगानिस्तान में भारत के पुनर्निर्माण प्रयासों के तहत भारतीय विभिन्न निर्माण परियोजनाओं में काम कर रहे हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ पाकिस्तान को बदनाम करने और विद्रोहियों को प्रशिक्षित करने और समर्थन देने के लिए कवर में काम कर रही है, एक दावा भारत द्वारा दृढ़ता से खारिज कर दिया गया।

तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई के एक चचेरे भाई ने 2007 में कहा था कि भारत "अफगानिस्तान का सबसे पोषित भागीदार है।" [10] अप्रैल 2017 में भारत में अफगानिस्तान के राजदूत शाइदा मोहम्मद अब्दाली ने बताया कि भारत "अफगानिस्तान का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दाता है।" और 3 बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता के साथ विश्व स्तर पर पांचवां सबसे बड़ा दानदाता। भारत ने 200 से अधिक सार्वजनिक और निजी स्कूलों का निर्माण किया है, 1,000 से अधिक छात्रवृत्तियों को प्रायोजित किया है, 16,000 से अधिक अफगान छात्रों की मेजबानी की है।" काबुल में 2008 में भारतीय दूतावास की बमबारी के बाद, अफगान विदेश मंत्रालय ने भारत को "भाई देश" के रूप में उद्धृत किया और दोनों के बीच के रिश्ते को "कोई दुश्मन बाधा नहीं डाल सकता"। अफगानिस्तान और भारत के बीच संबंधों को 2011 में एक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर के साथ एक बड़ा बढ़ावा मिला, जो 1979 के सोवियत आक्रमण के बाद अफगानिस्तान का पहला था।

२०१० के गैलप पोल के अनुसार, जिसमें १,००० वयस्कों का साक्षात्कार हुआ, ५०% अफगानों ने भारत के नेतृत्व के काम के प्रदर्शन को मंजूरी दी और ४४% ने जवाब देने से इनकार कर दिया। यह एशिया के किसी अन्य देश द्वारा भारत की उच्चतम अनुमोदन रेटिंग थी। सर्वेक्षण के अनुसार, चीनी या अमेरिकी नेतृत्व की तुलना में अफगान वयस्कों द्वारा भारत के नेतृत्व को स्वीकार करने की अधिक संभावना है।

यह भी देखें:

  • गाँधारी, शकुनि
  • तक्षशिला
  • कन्धार विमान अपहरण
  • 2014 में हेरात में भारतीय दूतावास पर हमला

नेपाल[संपादित करें]

नेपालभारत

भारत और नेपाल अच्छे पड़ोसी है। भारत और नेपाल अपने सम्बंध को साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध मानते है। इस बात का उदाहरण उस समय देखने को मिला था जब नेपाल में भारी भूकम्प आया था तब सर्वप्रथम भारत ने वहाँ पर रहात व बचाव कार्य शुरू किया था बल्कि नेपाल को फिर से बसाने के लिये भारत ने कई योजना चलाई।

भूटान[संपादित करें]

भूटानभारत

भूटान भारत का सबसे विश्वसनीय व शांतिरक्षक पड़ोसी देश है। भूटान के रक्षा का प्रभार भारत पर है। भूटान की विदेश नीति भारत तय करता है। भारतीय फौज मे भूटान और नेपाल के लोग भी शामिल होते है।

बांग्लादेश[संपादित करें]

बांग्लादेशभारत

तीस्ता जल समझौता 1971 मे भारत की मदद से बांग्लादेश को आजादी मिली।

म्यांमार[संपादित करें]

म्यान्मारभारत

भारत और म्यांमार दोनों पड़ोसी हैं। इनके संबन्ध अत्यन्त प्राचीन और गहरे हैं और आधुनिक इतिहास के तो कई अध्याय बिना एक-दूसरे के उल्लेख के पूरे ही नहीं हो सकते। आधुनिक काल में 1937 तक बर्मा भी भारत का ही भाग था और ब्रिटिश राज के अधीन था। बर्मा के अधिकतर लोग बौद्ध हैं और इस नाते भी भारत का सांस्कृतिक सम्बन्ध बनता है। पड़ोसी देश होने के कारण भारत के लिए बर्मा का आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक महत्व भी है।

श्रीलंका[संपादित करें]

श्रीलंकाभारत

1980 के दशक में भारत दो पड़ोसी देशों के निमंत्रण पर, सेना के द्वारा संक्षिप्त सैन्य हस्तक्षेप किया, एक श्रीलंका में और दुसरा मालदीव में।

मालदीव[संपादित करें]

मालदीवभारत

1980 के दशक में भारत दो पड़ोसी देशों के निमंत्रण पर, सेना के द्वारा संक्षिप्त सैन्य हस्तक्षेप किया, एक श्रीलंका में और दुसरा मालदीव में। मालदीव को भारत का दक्षिण का प्रहरी कहा जाता है।

अमीरिकी महाद्वीप (उत्तर और दक्षिण)[संपादित करें]

अमरीका[संपादित करें]

संयुक्त राज्यभारत

भारत में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के साथ राष्ट्रपति निक्सन की बैठक
मोरारी देसाई, भारतीय अधिकारियों द्वारा अमीरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और उनकी पत्नी रॉस्लीन कार्टर का नई दिल्ली में स्वागत समारोह
अटल विहरी वाजपेयी और अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश, व्हाइट हाउस में।

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान, राष्ट्रपति रूजवेल्ट के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका ने ब्रिटेन के सहयोगी होने के बावजूद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत समर्थन दिया। भारतीय स्वतंत्रता के बाद भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध मधुर थे, क्योंकि भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अग्रणी स्थान प्राप्त किया और सोवियत संघ से समर्थन प्राप्त किया। 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को समर्थन प्रदान किया। अधिकांश शीत युद्ध के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ गर्म संबंध बनाए, मुख्य रूप से सोवियत-अनुकूल भारत को शामिल करने और अफगानिस्तान के सोवियत कब्जे के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन का समर्थन करने के लिए पाकिस्तान का उपयोग करने के लिए। 1971 में हस्ताक्षरित एक भारत-सोवियत मैत्री और सहयोग संधि ने भी भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ खड़ा कर दिया।

भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद, भारत ने अपनी विदेश नीति में काफी बदलाव किए। इसने सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित किए और यूएसएसआर से बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरण और वित्तीय सहायता प्राप्त करना शुरू कर दिया। इसका भारत-अमेरिका संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान को सोवियत समर्थक भारत के प्रतिकार के रूप में देखा और पूर्व सैन्य सहायता देना शुरू कर दिया। इससे भारत और अमेरिका के बीच संदेह का माहौल बन गया। सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया और भारत ने सोवियत संघ का खुलकर समर्थन किया जब भारत-अमेरिका संबंधों को काफी झटका लगा।

1970 के दशक की शुरुआत में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गए थे। पूर्वी पाकिस्तान में अत्याचारों की रिपोर्ट के बावजूद, और कहा जा रहा है, विशेष रूप से रक्त तार में, पाकिस्तानी सेना, अमेरिका द्वारा नरसंहार गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। राज्य के सचिव हेनरी किसिंजर और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान और पाकिस्तानी सेना को हतोत्साहित करने के लिए कुछ नहीं किया। किसिंजर विशेष रूप से दोस्ती की एक संधि है कि हाल ही में भारत और सोवियत संघ के बीच हस्ताक्षर किया गया था की वजह से दक्षिण एशिया में सोवियत विस्तार के बारे में चिंतित था, और चीन जनवादी गणराज्य के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक मौन गठबंधन के मूल्य को प्रदर्शित करने की मांग की . 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, भारतीय सशस्त्र बलों, मुक्ति वाहिनी के साथ, पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त करने में सफल रहे, जिसने जल्द ही स्वतंत्रता की घोषणा की। निक्सन को डर था कि पश्चिमी पाकिस्तान पर भारतीय आक्रमण का अर्थ होगा इस क्षेत्र पर पूर्ण सोवियत प्रभुत्व, और यह कि यह संयुक्त राज्य अमेरिका की वैश्विक स्थिति और अमेरिका के नए मौन सहयोगी, चीन की क्षेत्रीय स्थिति को गंभीर रूप से कमजोर कर देगा। चीन को एक सहयोगी के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका की सद्भावना का प्रदर्शन करने के लिए, और पाकिस्तान पर कांग्रेस द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के सीधे उल्लंघन में, निक्सन ने पाकिस्तान को सैन्य आपूर्ति भेजी, उन्हें जॉर्डन और ईरान के माध्यम से भेज दिया, जबकि चीन को अपने हथियार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।

मेक्सिको[संपादित करें]

देखें: भारत–मेक्सिको संबंध

मेक्सिकोभारत
मेक्सिको के राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

मेक्सिको भारत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रमुख आर्थिक भागीदार है। नोबेल पुरस्कार विजेता और भारत में राजदूत ऑक्टेवियो पाज़ ने इन लाइट ऑफ़ इंडिया नामक पुस्तक लिखी है जो भारतीय इतिहास और संस्कृति का विश्लेषण है। दोनों देश क्षेत्रीय शक्तियां हैं और जी-20 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सदस्य हैं। दोनो के बीच बहुत गहरे और अच्छे सम्बंध है। मेक्सिको में भारतीय समुदाय अपेक्षाकृत छोटा है और लगभग ५,५०० होने का अनुमान है; इसमें ज्यादातर भारतीय आईटी कंपनियों के सॉफ्टवेयर इंजीनियर शामिल हैं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में कई कार्यकारी, स्थानीय विश्वविद्यालयों में शिक्षाविद/प्रोफेसर और कपड़ा और परिधान व्यवसाय में कुछ निजी व्यवसायी हैं। ज्यादातर भारतीय शिक्षाविद और व्यवसायी मेक्सिको के स्थायी निवासी हैं, बाकी 2-3 साल के अल्पकालिक कार्य असाइनमेंट पर हैं और उसके बाद उन्हें बदल दिया जाता है।

1947 में, मेक्सिको यूनाइटेड किंगडम से भारत की स्वतंत्रता को मान्यता देने वाला पहला लैटिन अमेरिकी राष्ट्र बन गया। पहले 1 अगस्त 1950 को, दोनों देशों ने राजनयिक संबंध स्थापित किए और अगले वर्ष, मेक्सिको ने दिल्ली में एक दूतावास खोला। दोनों देशों के बीच नए संबंधों के महत्व को दिखाने के लिए, भारत में पहले मैक्सिकन राजदूत पूर्व मैक्सिकन राष्ट्रपति एमिलियो पोर्ट्स गिल थे। 1962 में, नोबेल पुरस्कार विजेता ऑक्टेवियो पाज़ को भारत में राजदूत नामित किया गया था।

भूखंडल के आर-पार[संपादित करें]

रूस[संपादित करें]

रूसभारत

व्लादिमीर पुतिन के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, पीछे अदत्याधिक बायीं ओर खड़े हैं नरेंद्र मोदी

रूसी संघ के साथ भारत के संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं और निरंतरता, विश्वास और आपसी समझ पर आधारित हैं। भारत-रूस संबंधों को बनाए रखने और मजबूत करने और दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की आवश्यकता पर दोनों देशों में राष्ट्रीय सहमति है। अक्टूबर 2000 में वर्तमान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पूर्व भारतीय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच सामरिक साझेदारी पर एक घोषणा पर हस्ताक्षर किए गए थे, इस साझेदारी को "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" भी कहा जाता है।

रूस और भारत ने 1971 की भारत-सोवियत शांति और मैत्री संधि को नवीनीकृत नहीं करने का फैसला किया है और दोनों ने अधिक व्यावहारिक, कम वैचारिक संबंध के रूप में वर्णित का पालन करने की मांग की है। जनवरी 1993 में रूसी राष्ट्रपति येल्तसिन की भारत यात्रा ने इस नए रिश्ते को मजबूत करने में मदद की। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 2004 की यात्रा के साथ संबंध मजबूत हुए हैं। उच्च स्तरीय यात्राओं की गति तब से बढ़ गई है, जैसा कि प्रमुख रक्षा खरीद की चर्चा है। रूस, कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विकास के लिए काम कर रहा है, जो 1000 मेगावाट बिजली का उत्पादन करने में सक्षम होगा। Gazprom, तेल और प्राकृतिक गैस के विकास के लिए काम कर रहा है, बंगाल की खाड़ी में। भारत और रूस ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर व्यापक सहयोग किया है। सहयोग के अन्य क्षेत्रों में सॉफ्टवेयर, आयुर्वेद आदि शामिल हैं। भारत और रूस ने व्यापार को 10 अरब डॉलर तक बढ़ाने का संकल्प लिया है। दोनों देशों के वस्त्र निर्माताओं के बीच सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। भारत और रूस ने दोनों देशों में कपड़ा उद्योग में निवेश और व्यापार की मात्रा बढ़ाने के संयुक्त प्रयासों पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने में वस्त्र और प्रकाश उद्योग परिषद के उद्यमियों के रूसी संघ और भारत के परिधान निर्यात (AEPC) के प्रतिनिधि शामिल थे। एक सहयोग समझौता, अन्य बातों के साथ, कपड़ा उत्पादन में प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान और जानकारी प्रदान करता है। इस प्रयोजन के लिए, वस्त्र मामलों पर एक विशेष आयोग (वस्त्र संचार समिति)। रूस और भारत के बीच आतंकवाद विरोधी तकनीक भी मौजूद है। २००७ में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन २६ जनवरी २००७ को गणतंत्र दिवस समारोह में सम्मानित अतिथि थे। २००८ को दोनों देशों द्वारा रूस-भारत मैत्री वर्ष के रूप में घोषित किया गया है। बॉलीवुड फिल्में रूस में काफी लोकप्रिय हैं। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ओएनजीसी ने 2008 में इंपीरियल एनर्जी कॉर्पोरेशन को खरीदा। दिसंबर 2008 में, राष्ट्रपति मेदवेदेव की नई दिल्ली की यात्रा के दौरान, भारत और रूस ने परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। मार्च 2010 में, रूसी प्रधान मंत्री व्लादिमीर पुतिन ने भारत के साथ एक अतिरिक्त 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिसमें नागरिक परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और सैन्य सहयोग और मिग -29 के लड़ाकू जेट के साथ एडमिरल गोर्शकोव (विमान वाहक) की अंतिम बिक्री शामिल थी। 2014 के क्रीमियन संकट के दौरान भारत ने रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों का समर्थन करने से इनकार कर दिया था और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों में से एक शिवशंकर मेनन ने कहा था कि "इसमें वैध रूसी और अन्य हित शामिल हैं और हमें उम्मीद है कि उन पर चर्चा और समाधान किया जाएगा।" 7 अगस्त 2014 को भारत और रूस ने चीन और मंगोलिया के साथ मास्को सीमा के पास एक संयुक्त आतंकवाद विरोधी अभ्यास किया। इसमें टैंक और बख्तरबंद वाहनों का उपयोग शामिल था।

भारत और रूस ने अब तक INDRA अभ्यास के तीन दौर आयोजित किए हैं। पहला अभ्यास 2005 में राजस्थान में किया गया था, उसके बाद रूस में प्रशकोव किया गया था। तीसरा अभ्यास अक्टूबर 2010 में कुमाऊं की पहाड़ियों के चौबटिया में आयोजित किया गया था। यह भी देखें:

यूरोप[संपादित करें]

यूरोप के कई देशों के साथ भारत के अच्छे संबंध हैं। प्रमुखों में से कुछ फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विट्सर्लंड, पुर्तगाल, बेलज़ियम, आदि है।

एशिया-प्रशांत[संपादित करें]

ऑस्ट्रेलिया[संपादित करें]

ऑस्ट्रेलियाभारत

सितंबर 2014 में ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री टोनी एबॉट भारत की यात्रा पर आए। भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में किसी भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की यह प्रथम राजकीय यात्रा थी। इस यात्रा में दोनों देशों के बीच असैन्य नाभिकीय उर्जा सहयोग समझौता हुआ जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम निर्यात करेगा।[9][10] इस दौरान एक महत्वपूर्ण व्यक्तव्य में उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी को 2002 के दंगों के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए।[11]

जापान[संपादित करें]

जापानभारत

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे की चाय पर चर्चा, सितंबर 2014

भारत और जापान के सम्बन्ध हमेशा से काफ़ी मजबूत और स्थिर रहे हैं। जापान की संस्कृति पर भारत में जन्मे बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी जापान की शाही सेना ने सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज को सहायता प्रदान की थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद से भी अब तक दोनों देशों के बीच मधुर सम्बन्ध रहे हैं। जापान की कई कम्पनियाँ जैसे कि सोनी, टोयोटा और होंडा ने अपनी उत्पादन इकाइयाँ भारत में स्थापित की हैं और भारत की आर्थिक विकास में योगदान दिया है। इस क्रम में सबसे अभूतपूर्व योगदान है वहाँ की मोटर वाहन निर्माता कंपनी सुज़ुकी का जो भारत की कंपनी मारुति सुजुकी के साथ मिलकार उत्पादन करती है और भारत की सबसे बड़ी मोटर कार निर्माता कंपनी है। होंडा कुछ ही दिनों पहले तक हीरो होंडा (अब हीरो मोटोकॉर्प) के रूप में हीरो कंपनी के पार्टनर के रूप में कार्य करती रही है जो तब दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल विक्रेता कंपनी थी।

जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के आर्क ऑफ फ्रीडम सिद्धांत के अनुसार यह जापान के हित में है कि वह भारत के साथ मधुर सम्बन्ध रखे ख़ासतौर से उसके चीन के साथ तनाव पूर्ण रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो। इसके लिये जापान ने भारत में अवसंरचना विकास के कई प्रोजेक्ट का वित्तीयन किया है और इनमें तकनीकी सहायता उपलब्ध करायी है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण रूप से उल्लेखनीय है दिल्ली मेट्रो रेल का निर्माण।

भारत की ओर से भी चीन के साथ रिश्तों और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जापान को काफ़ी महत्व दिया गया है। मनमोहन सिंह की सरकार की पूर्व की ओर देखो नीति ने भारत को जापान के साथ मधुर और पहले से बेहतर सम्बन्ध बनाने की ओर प्रेरित किया है। दिसंबर २००६ में भारतीय प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के दुरान हस्ताक्षरित भारत-जापान सामरिक एवं वैश्विक पार्टनरशिप समझौता इसका ज्वलंत उदहारण है। रक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच २००७ से लगातार सहयोग मजबूत हुए हैं[12] और दोनों की रक्षा इकाइयों और सेनाओं ने कई संयुक्त रक्षा अभ्यास किये हैं। अक्टूबर २००८ में जापान ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत वह भारत को कम ब्याज दरों पर ४५० अरब अमेरिकी डालर की धनराशि दिल्ली-मुम्बई हाईस्पीड रेल गलियारे के विकास हेतु देगा। विश्व में यह जापान द्वारा इकलौता ऐसा उदाहरण है जो भारत के साथ इसके मजबूत आर्थिक रिश्तों को दर्शाता है।

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने जनवरी २०१४ में भारत की सपत्नीक यात्रा की जिसके दौरान वे इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गये थे। इसके बाद मनमोहन सिंह जी के साथ हुई शिखर बैठक दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच २००६ की शुरुआत के बाद आठवीं शिखर बैठक थी।[13] इस बैठक में जापान ने भारत को विभिन्न परियोजनाओं के लिये २०० अरब येन (लगभग १२२ अरब रुपये) का ऋण देने की पेशकश की और हाई स्पीड रेल, रक्षा, मेडिकल केयर, औषधि निर्माण और कृषि तथा तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की भी पेशकश की। भारत जापान श्रीलंका के पूर्वी भाग में त्रिंकोमाली में तापीय विद्युत संयत्र निर्माण में भी भागीदारी करने वाले हैं। इससे पहले नवंबर-दिसंबर २०१३ में जापानी सम्राट आकिहितो और महारानी मिचिको ने भारत की यात्रा संपन्न की थी। प्रोटोकाल के विपरीत सम्राट को हवाईअड्डे पर लेने स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गये थे जो भारत जापान रिश्तों की प्रगाढ़ता दर्शाता है।

वर्तमान समय में भारत जापान द्विपक्षीय व्यापर लगभग १४ अरब डालर का है जिसे बढ़ा का २५ अरब डालर करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही जापान का भारत में लगभग १५ अरब डालर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी है।[14]

अफ्रीका[संपादित करें]

दक्षिण अफ्रीका[संपादित करें]

दक्षिण अफ़्रीका-भारत

भारत और द. अफ्रीका के संबंध ब्रिटिश राज के दौरान स्थापित हुए थे, जब दोनो देश ब्रिटेन के शासन काल में एक-दूसरे के ग़ुलाम भेजे जाते थे। उस वक़्त दोनो देशों में व्यापार की वजह और एक बाहरी देश की ग़ुलामी ने दोनो को एक साथ होने के सहानुभूति का रिश्ता हुआ। बहुत से भारतीय तब वहाँ बस गए थे।

मध्य-पूर्व[संपादित करें]

ईरान[संपादित करें]

ईरानभारत

ईरान और भारत के सम्बंध 15 मार्च 1950 को स्थापित किए गए थे। दोनो के बीच पारम्परिक और ऐतिहासिक सम्बंध हैं।

इजराइल[संपादित करें]

इज़राइलभारत

भारत और इज़राइल के सम्बंध बहुत पुराने है। दोनो के बीच कई अहम मुद्दों पर संधि भी हुएँ है।

वैश्विक संगठन[संपादित करें]

संयुक्त राष्ट्र[संपादित करें]

संयुक्त राष्ट्र - भारत

भारत ने 100,000 सैन्य और पुलिस कर्मियों को चार महाद्वीपों भर में संयुक्त राष्ट्र के पैंतीस शांति अभियानों में सेवा प्रदान की है।[15]

यूरोपीय संघ[संपादित करें]

देखें: भारत-यूरोपीय संघ संबंध

यूरोपीय संघ - भारत

भारत के संबंध यूरोप के और भी देशों के साथ अच्छे है। भारत यूरोपीय संघ में भी अपना दायित्व निभाता है।

दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन[संपादित करें]

दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन - भारत

भारत दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के संगठन का भले ही सदस्य ना हो, लेकिन यह हमेशा से उन्हें अपना मित्र मानते हुए उनके साथ विकास करने का प्रण किया है।

अफ्रीकी संघ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: अफ्रीकी संघ

[[File:|23x15px|border |alt=अफ्रीकी संघ|link=अफ्रीकी संघ]] - भारत

भारत के कई अफ्रीकी देशों के साथ सम्बंध है, कुछ के साथ संबंध ब्रिटिश काल के दौरान तक पाए जाते हैं, जब वो देश ब्रिटेन समेत और बाक़ी यूरोपीय देशों के दद्वारा नियंत्रित हुआ करते थे। वर्तमान स्थिथि में, भारत अफ्रीकी संघ में भी सभी देशों के विकास और उत्तपत्ति के लिए प्रतिबद्ध है।

ब्रिक्स[संपादित करें]

ब्राज़ील - रूस - भारत - चीनी जनवादी गणराज्य - दक्षिण अफ़्रीका

भारत ने ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर ब्रिक्स समूह की स्थापना की है। यह विकसित देशों के समूह G-8, G-20 के विश्व पर प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास है। ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। ये राष्ट्र क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। वर्ष २०१३ तक, पाँचों ब्रिक्स राष्ट्र दुनिया के लगभग 3 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और एक अनुमान के अनुसार ये राष्ट्र संयुक्त विदेशी मुद्रा भंडार में ४ खरब अमेरिकी डॉलर का योगदान करते हैं। इन राष्ट्रों का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद १५ खरब अमेरिकी डॉलर का है।[16]

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन[संपादित करें]

[[File:|23x15px|border |alt=SAARC|link=SAARC]] - भारत

सार्क में भारत एक मुख्य देश होने साथ, अपने पड़ोसियों के साथ विकास की राह पर सबको साथ लेकर चलता है।

विश्व व्यापार संगठन[संपादित करें]

भारत हमेशा से अंतरष्ट्रीय मंच पर व्यापारिक नियमो में नरमी और नए नियमो में संशोधन पर ज़ोर देता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

अगर आप भारत के और विदेश संबंधो के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप मूल विकिपीडिया के भारत के विदेश संबंध के पृष्ठ पर जानकारी प्राप्त कर सकते है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

https://web.archive.org/web/20200702193407/https://www.nytimes.com/2020/06/26/international-home/china-military-india-taiwan.html [1][2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Indian economic growth rate eases" [भारत की आर्थिक विकास दर संतोषपरक] (अंग्रेज़ी में). बीबीसी न्यूज़. ३० नवम्बर २००७. मूल से 25 दिसंबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २४ जून २०१४.
  2. "The Non-Aligned Movement: Description and History", nam.gov.za, The Non-Aligned Movement, 21 सितंबर 2001, मूल से 21 अगस्त 2011 को पुरालेखित, अभिगमन तिथि 23 अगस्त 2007
  3. India's negotiation positions at the WTO (PDF), November 2005, मूल (PDF) से 13 सितंबर 2011 को पुरालेखित, अभिगमन तिथि 23 अगस्त 2010
  4. Analysts Say India'S Power Aided Entry Into East Asia Summit. | Goliath Business News, Goliath.ecnext.com, 29 जुलाई 2005, मूल से 9 अगस्त 2011 को पुरालेखित, अभिगमन तिथि 21 नवम्बर 2009
  5. "भारत की 37 देशों के साथ प्रत्‍यार्पण संधि‍ है". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. 12 फ़रवरी 2014. मूल से 22 फ़रवरी 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 फ़रवरी 2014.
  6. "ndia has Extradition Treaties in operation with 37 countries". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. 12 फ़रवरी 2014. मूल से 22 फ़रवरी 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 फ़रवरी 2014.
  7. "From potol dorma to Jaya no-show: The definitive guide to Modi's swearing in" (अंग्रेज़ी में). फर्स्टपोस्ट. २६ मई २०१४. मूल से 28 मई 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २६ मई २०१४.
  8. उप्पुलुरी, कृष्ण (२५ मई २०१४). "Narendra Modi's swearing in offers a new lease of life to SAARC" (अंग्रेज़ी में). नई दिल्ली: डीएनए इण्डिया. मूल से 27 मई 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २६ मई २०१४.
  9. "ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री की भारत यात्रा". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. 5 सितंबर 2014. मूल से 6 सितंबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 सितंबर 2014.
  10. "ऑस्ट्रेलिया से न्यूक्लियर डील पर बन गई बात". नवभारत टाईम्स. 5 सितंबर 2014. मूल से 6 सितंबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 सितंबर 2014.
  11. "दंगों के लिए मोदी जिम्मेदार नहीं: ऑस्ट्रेलियाई PM". नवभारत टाईम्स. 5 सितंबर 2014. मूल से 6 सितंबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 सितंबर 2014.
  12. भारत जापान का समुद्री सहयोग Archived 2014-09-03 at the Wayback Machine रेडियो दायेच विले (जर्मन रेडियो प्रसारण सेवा)।
  13. आर्चिस मोहन - प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे की यात्रा : भारत - जापान संबंधों की पराकाष्‍ठा Archived 2018-09-12 at the Wayback Machine विदेश मंत्रालय, भारत सरकार
  14. भारत-जापान व्यापार 2014 तक 25 अरब डॉलर Archived 2014-09-03 at the Wayback Machine - Indo Asian News Service, Last Updated: दिसम्बर 29, 2011
  15. "संग्रहीत प्रति". मूल से 4 मई 2006 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 13 फ़रवरी 2014.
  16. "Amid BRICS' rise and 'Arab Spring', a new global order forms" Archived 2011-10-20 at the Wayback Machine. Christian Science Monitor. 18 अक्टूबर 2011. Retrieved 2011-10-20.