द्विपक्षीय राजनय

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द्विपक्षीय राजनय (Billateral Diplomacy या Bilateralism) का तात्पर्य है - 'दो पक्षों के मध्य सम्बन्ध'। दो राज्यों के बीच राजनय को द्विपक्षीय राजनय कहते हैं। राजनय के द्वारा दो राज्यों के बीच की समस्याओं को हल किया जाता है। यदि राष्ट्रीय समस्याएं जटिल हैं तो इनके समाधान के लिए दोनों राज्यों के बीच सम्मेलन द्वारा सुलझाया जा सकता है।

राजनय का सामान्य, सरल तथा सीध मार्ग यह है कि विदेश विभाग तथा इनके द्वारा नियुक्त राजदूत समस्याओं के समाधान आपस में बातचीत द्वारा कर लेते हैं। इस प्रकार राज्यों के सम्बन्ध सुचारु रूप से चलते रहते हैं। राज्यों के मध्य पारस्परिक व्यक्तिगत सम्पर्क दोनों के मध्य सम्बन्धों को मधुर बनाता है।

परिचय[संपादित करें]

राज्यों के मध्य राजनयिक सम्बन्ध अति प्राचीन काल से चले आ रहे हैं। ये उतने ही प्राचीन हैं जितने की राज्य। प्राचीन काल में राज्यों के मध्य मतभेद होने पर दोनों देशों के प्रतिनिधियों द्वारा समस्या का हल ढूंढा जाता था और मतभेदों को समाप्त करने का प्रयास किया जाता था। आधुनिक युग में भी ऐसा ही किया जाता है और इसे द्विपक्षीय राजनय का नाम दिया गया है।

प्रथम महायुद्ध से पूर्व राज्यों के बीच चतुर, योग्य तथा कुशल राजदूत ही सम्बन्धों को बनाते थे। राज्यों के मध्य मतभेदों अथवा समस्याओं को दूर करने के लिए कई बार दो राज्यों के राज्याध्यक्ष स्वयं बातचीत कर लेते थे। 1970 का ”शिमला समझौता“ इसका उदाहरण है। यह समझौता भारत द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय राजनय, स्थायी मिशन : कार्य एवं भूमिका 201 और पाकिस्तान के मध्य हुआ था। भारत की ओर से प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति श्री भुट्टो ने यह समझौता किया था। इसी प्रकार शीत युद्ध की समाप्ति करने के लिए अमेरिका तथा रूस की द्विपक्षीय वार्ता द्वारा यह सम्भव हुआ।

द्विपक्षीय राजनय के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क यह है कि राज्याध्यक्ष अथवा प्रधानमंत्री किसी भी स्थान पर पहुंच कर समस्या का हल निकाल सकते हैं। कई विद्वान इसके विषय में भी तर्क देते हैं कि द्विपक्षीय वार्ता से समस्या का हल नहीं हो पाता बल्कि समस्या और बढ़ती है। 15 वीं शताब्दी के विख्यात राजदूत फिलिप डी0 कोमाइन्स (Phillippe de Comines) ने कहा था कि “दो राजा जो मधुर व्यक्तिगत सम्बन्घ स्थापित करना चाहते हैं, उन्हें एक दूसरे से सीधा नहीं मिलना चाहिये। व्यक्तिगत प्रत्यक्ष वार्ता में इस बात का छर रहता है कि राज्याध्यक्ष कहीं एक दूसरे के विरोधी न हो जायें। हेनरी अष्टम और चार्ल्स पंचम द्विपक्षीय राजनय के कारण ही एक दूसरे से घृणा करने लगे थे।

द्विपक्षीय राजनय का उपभोग कभी-कभी प्राचार के लिए भी किया जाता है। ऐसी स्थिति में यह एक महत्वाकांक्षी नेता के हाथों में विजय प्राप्त का साधन बन जाता है न कि न्यायोचित समझौते का आधार। प्रायः यह देखा गया है कि इस प्रकार की वार्ता में न तो निर्णय पूरे लिये जाते हैं और जो निर्णय लिये जाते हैं उन्हें समय की कमी के कारण उनको अधीनस्थ अधिकारियों पर छोड़ दिया जाता है। रूस ओर अमरीका के मधुर सम्बन्ध न बन सकने का यही एक कारण है।

लाभ[संपादित करें]

द्विपक्षीय राजनय द्वारा कभी-कभी व्यक्तिगत सम्पर्क से दो देशों के मध्य मैत्री सम्बन्ध दृढ़ हो जाते हैं। इस प्रकार के सम्मेलन द्वारा प्रत्यक्ष तथा शीघ्र निर्णय लिए जा सकते हैं जो उस समय की समस्या के समाधान के लिए उचित हो। यदि निर्णय नहीं भी लिये जाते तो राजनयिक प्रत्यनों से समझौते का रूप ले सकता है। द्विपक्षीय सम्मेलन अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भली-भांति समझने, अपने व अन्य के दृष्टिकोण को समझने का अच्छा साधन है। इसके माध्यम से लोकप्रियता भी प्राप्त की जा सकती है।

दोष[संपादित करें]

द्विपक्षीय राजनय का एक दोष यह है कि इसके द्वारा निर्णय जल्दी लिये जाते हैं जिनमें पूर्ण व परिपक्व विचारों का अभाव होता है। हर पक्ष अपनी सुविधानुसार इन निर्णयों का अलग-अलग मतलब लगाता है। इनके निर्णय को लागू करने में भी टालमटोल की जाती है। आज के किसी भी अति व्यस्त राज्याध्यक्ष के पास इतना समय नहीं होता कि वह जटिल समस्याओं को समझ सके। इसका परिणाम यह निकलता है कि इस तरह के सम्मेलन असफल रहते हैं। नेहरू-लियाकत पैक्ट एक ऐसा ही सम्मेलन था जिसके परिणामस्वरूप भारत-पाक के सम्बन्ध मधुर होने के बजाय बिगड़े। 1960 के पेरिस सम्मेलन में भी रूस और अमरीका के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण होने के स्थान पर खराब हुये।

द्वितीय महायुद्ध के बाद द्विपक्षीय राजनय का आज के युग में महत्व कम होता जा रहा है। अब इसका स्थान बहुपक्षीय राजनय (Multilateral Diplomacy) ने ले लिया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]