बहुपक्षीय राजनय

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जब कई देश किसी समस्या के समाधान के लिये एकसाथ काम करें तो उसे बहुपक्षीय राजनय (Multilateral Diplomacy या multilateralism) कहते हैं। रेगेला के मतानुसार, ”बहुपक्षीय राजनय राजनयिक संधि वार्ताओं की एक तकनीक है तथा राजनय के अन्य सभी पहलुओं की तरह प्रक्रिया में असंख्य जटिल नियमों से आबद्ध रहती है। (Multilateral Diplomacy is a technique of diplomatic negotiations and like all aspects of diplomacy is surrounded by numerous and complicated rules of procedure)"

आज राष्ट्रों के मध्य सम्बन्धों के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्वपूर्ण विकास द्विपक्षीय राजनय के स्थान पर बहुपक्षीय राजनय का विकास है। बहुपक्षीय राजनय, द्विपक्षीय राजनय के परम्परागत तरीकों से पूर्णतया भिन्न है। बहुपक्षीय राजनय को संयुक्त राजनय (Coalition Diplomacy) भी कहा जाता है। आज के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का बड़ा भाग बहुपक्षीय सम्मेलनों के माध्यम से ही पूरा होता है। बहुपक्षीय राजनय का प्रचलन और प्रभाव सदा एक सा नहीं रहता है वरन् परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।

परिचय[संपादित करें]

19वीं शताब्दी में अन्तर्राष्ट्रीय अधिसभाओं और सम्मेलनों के माध्यम से राजनय के प्रयोग का एक नया रूप ”बहुपक्षीय राजनय“ हमारे सामने आया है। आज के जटिल युग में अन्तर्राष्ट्रीय समस्यायें काफी जटिल हैं। अतः बहुपक्षीय सम्मेलनों के द्वारा ही अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् बहुपक्षीय राजनय का विस्तार अत्यधिक हुआ है। यह राजनय की मुख्य प्रक्रिया बन गया है। बहुपक्षीय राजनय आधुनिक युग के लिये एक नई राजनयिक प्रविधी है जो परिवर्तित जटिल समस्याओं का सामना करने के लिये निकाली गई है। इसने राजनय के परम्परागत स्वरूप द्विपक्षीय राजनय (Bilateral Diplomacy) के महत्त्व को कम महत्त्वपूर्ण बना दिया है। आज की जटिल अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं तथा राज्यों की बढ़ती हुई जनसंख्या से उत्पन्न समस्याओं ने बहुपक्षीय राजनय को जन्म देकर राजनय को एक नई क्रान्तिकारी तथा विश्वव्यापी संस्था बना दिया है। बहुपक्षीय राजनय का प्रारम्भ आधुनिक राज्य व्यवस्था के साथ हुआ है। आरम्भ में शान्ति स्थापना अथवा शान्ति सन्धि के लिए बुलाये जाते थे किन्तु बाद में अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान हेतु इनका प्रयोग किया जाने लगा। राज्यों के मध्य मतभेदों को दूर करने अथवा समस्याओं के समाधान के लिये कोई भी राज्य बहुपक्षीय सम्मेलन बुला सकता है।

बहुपक्षीय राजनय के माध्यम से विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के निदान और शान्ति तथा सुरक्षा का लगातार प्रयास किया जा रहा है। भिन्न देशों के बीच सहयोग और सद्भाव को निरन्तर बनाये रखने के लिए शत्रु राज्यों के साथ शत्रुता कम करके अच्छे सम्बन्ध बनाने का प्रयास, आपसी मतभेदों को दूर करने तथा शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की स्थापना के लिये बहुपक्षीय राजनय का उपयोग किया जा रहा है। आज विश्व की अनेक जटिल समस्याओं के समाधान एवं विचार-विमर्श में लगभग सभी राज्य हिस्सा लेते हैं। नये उदीयमान छोटे राज्यों द्वारा बहुपक्षीय सम्मेलन में भाग लेने तथा बड़े राज्यों के समान अपना स्थान पाने की इच्छा उनके आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक विकास तथा राज्यों की एक दूसरे पर आत्मनिर्भरता ने बहुपक्षीय सम्मेलनों के महत्व को बढ़ा दिया है।

लाभ[संपादित करें]

राजनय के प्रारम्भिक काल में राजनयिक औपचारिकतायें अधिक बरतते थे। परन्तु बहुपक्षीय राजनय में व्यक्तिगत सम्पर्क मित्रता में बदल जाता है। यह मित्रता किसी समस्या के शीघ्र हल निकालने के लिए काफी लाभकारी सिद्ध होती है। जटिल समस्यायें जो वर्षों से नहीं सुलझ पाती थीं, वे बहुपक्षीय सम्मेलन द्वारा सुलझ जाती हैं। बहुपक्षीय राजनय का एक महत्वपूर्ण योगदान राज्याध्यक्षों के मध्य व्यक्तिगत सम्पर्क व मित्रता की सम्भावना प्रस्तुत करना है। बहुपक्षीय राजनय युद्ध को रोकने का महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है। बहुपक्षीय राज्य में अनेक हितों के बीच सामंजस्य का प्रयास किया जाता है। इससे अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार के राजनय से समय की बचत होती है।

दोष[संपादित करें]

बहुपक्षीय राजनय के अनेक दोष भी हैं। बहुपक्षीय सम्मेलनों में बार-बार मिलने पर राजनयिज्ञों में ईर्ष्या, वैमनस्य की भावना बढ़ने की सम्भावना रहती है। इन सम्मेलनों में जो वायदे और संधियां की जाती हैं उनको व्यवहार में पूरा न कर पाने के कारण भी विभिन्न राज्यों में मतभेद बढ़ते हैं तथा बहुपक्षीय राजनय का महत्व घटता है। जहां बहुपक्षीय राजनय व्यक्तिगत मित्रता तथा विश्वास को बढ़ाता है वही व्यक्तिगत शत्रुता और अविश्वास को भी इससे जन्म मिलता है। निकलसन का मत है कि राजनय से समय और धन का अपव्यय होता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]