भारत का उच्चतम न्यायालय

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{{Infobox high court | court_name = भारत का उच्चतम न्यायालय | native_name = | image = Emblem of the Supreme Court of India.svg | imagesize = 150px | caption to ppabgfghbbbvv | established = 1 अक्टूबर 1937; 82 वर्ष पहले (1937-10-01)
(भारत_की_संघीय_अदालत के रूप में)
28 जनवरी 1950; 70 वर्ष पहले (1950-01-28)
(भारत के उच्चतम न्यायालय के रूप में)[1] | city = नई दिल्ली | state = दिल्ली | location = तिलक मार्ग, नई दिल्ली, दिल्ली | country = भारत | coordinates = 28°37′20″N 77°14′23″E / 28.622237°N 77.239584°E / 28.622237; 77.239584निर्देशांक: 28°37′20″N 77°14′23″E / 28.622237°N 77.239584°E / 28.622237; 77.239584 | type = भारत के सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम | authority = भारत का संविधान | appeals = | terms = 65 वर्ष की आयु में अनिवार्य सेवानिवृत्ति | positions = 34 (33+1; वर्तमान संख्या)[2] | website = www.sci.gov.in | motto = यतो धर्मस्ततो जयः॥ (IAST: Yato Dharmastato Jayaḥ)
Where there is righteousness (dharma), there is victory (jayah) | chiefjudgetitle = भारत के मुख्य न्यायाधीश | chiefjudgename = शरद अरविंद बोबडे |termstart = 18 नवम्बर 2019 }}

भारत का उच्चतम न्यायालय या भारत का सर्वोच्च न्यायालय या भारत का सुप्रीम कोर्ट भारत का शीर्ष न्यायिक प्राधिकरण है जिसे भारत का संविधान/भारतीय संविधान के भाग 5 अध्याय 4 के तहत स्थापित किया गया है। भारतीय संघ की अधिकतम और व्यापक न्यायिक अधिकारिता उच्चतम न्यायालय को प्राप्त हैं। भारत का संविधान/भारतीय संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय की भूमिका संघीय न्यायालय और भारत का संविधान/भारतीय संविधान के संरक्षक की है। भारत का संविधान/भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 तक में वर्णित नियम उच्चतम न्यायालय की संरचना और अधिकार क्षेत्रों की नींव हैं। उच्चतम न्यायालय सबसे उच्च अपीलीय अदालत है जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के उच्च न्यायालय/उच्च न्यायालयों के फैसलों के खिलाफ अपील सुनता है। इसके अलावा, राज्यों के बीच के विवादों या मौलिक अधिकारों और मानव अधिकारों के गंभीर उल्लंघन से सम्बन्धित याचिकाओं को आमतौर पर उच्च्तम न्यायालय के समक्ष सीधे रखा जाता है। भारत के उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को हुआ और उसके बाद से इसके द्वारा 24,000 से अधिक निर्णय दिए जा चुके हैं।

न्यान्यायाधीशों के वेतन और भत्ते- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 125 मे कहा गया कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन व भत्ते दिये जाए जो संसद (भारत की संचित) निधि निर्मित करे। न्यायाधीश के लिए वेतन भत्ते अधिनियम 1जनवरी 2009 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को 2,80,000 मासिक आय और न्यायाधीश को 2,50,000 मासिक आय प्राप्त हुए है। निःशुल्क आवास, मनोरंजन स्टाफ, कार और यातायात भत्ता मिलता है। इनके लिए वेतन संसद तय करती है जो कि संचित निधि से पारित होती है। कार्यकाल के दौरान वेतन मे कोई कटौती नही होती है। न्यायाधीश के कार्यकाल- 65 वर्ष की आयु। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायलाय के मुख्य न्यायधीश शरद अरविंद बोबडे है।

न्यायालय का गठन[संपादित करें]

भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सर्वोच्च न्यायालय का मध्य भाग जहाँ मुख्य न्यायधीश का न्यायकक्ष स्थित है।

28 जनवरी 1950, भारत के एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के दो दिन बाद, भारत का उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया। उद्घाटन समारोह का आयोजन संसद भवन के नरेंद्रमण्डल(चेंबर ऑफ़ प्रिंसेज़) भवन में किया गया था। इससे पहले सन् १९३७ से १९५० तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत की संघीय अदालत का भवन था। आज़ादी के बाद भी सन् १९५८ तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत के उच्चतम न्यायालय का भवन था, जब तक कि 1958 में उच्चतम न्यायालय ने अपने वर्तमान तिलक मार्ग, नई दिल्ली स्थित परिसर का अधिग्रहण किया।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने भारतीय अदालत प्रणाली के शीर्ष पर पहुँचते हुए भारत की संघीय अदालत और प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति को प्रतिस्थापित किया था।

28 जनवरी 1950 को इसके उद्घाटन के बाद, उच्चतम न्यायालय ने संसद भवन के चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस में अपनी बैठकों की शुरुआत की। उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन (एस. सी. बी. ए.) सर्वोच्च न्यायालय की बार है। एस. सी . बी. ए. के वर्तमान अध्यक्ष प्रवीण पारेख हैं, जबकि के. सी. कौशिक मौजूदा मानद सचिव हैं।<[3]

उच्चतम न्यायालय परिसर[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय भवन के मुख्य ब्लॉक को भारत की राजधानी नई दिल्ली में तिलक रोड स्थित 22 एकड़ जमीन के एक वर्गाकार भूखंड पर बनाया गया है। निर्माण का डिजाइन केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के प्रथम भारतीय अध्यक्ष मुख्य वास्तुकार गणेश भीकाजी देवलालीकर द्वारा इंडो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में बनाया गया था। न्यायालय 1958 में वर्तमान इमारत में स्थानान्तरित किया गया। भवन को न्याय के तराजू की छवि देने की वास्तुकारों की कोशिश के अंतर्गत भवन के केन्द्रीय ब्लाक को इस तरह बनाया गया है की वह तराजू के केन्द्रीय बीम की तरह लगे। 1979 में दो नए हिस्से पूर्व विंग और पश्चिम विंग को १९५८ में बने परिसर में जोड़ा गया। कुल मिलकर इस परिसर में १५[4] अदालती कमरे हैं। मुख्य न्यायाधीश की अदालत, जो कि ने केन्द्रीय विंग के केंद्र में स्थित है सबसे बड़ा अदालती कार्यवाही का कमरा है। इसमें एक ऊंची छत के साथ एक बड़ा गुंबद भी है।

उच्चतम न्यायालय की संरचना[संपादित करें]

न्यायालय का आकार[संपादित करें]

भारत के संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय के लिए मूल रूप से दी गयी व्यवस्था में एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों को अधिनियमित किया गया था और इस संख्या को बढ़ाने का जिम्मा संसद पर छोड़ा गया था। प्रारंभिक वर्षों में, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मामलों को सुनने के लिए उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ एक साथ बैठा करती थी। जैसे जैसे न्यायालय के कार्य में वृद्धि हुई और लंबित मामले बढ़ने लगे, भारतीय संसद द्वारा न्यायाधीशों की मूल संख्या को आठ से बढ़ाकर १९५६ में ग्यारह, 1960 में चौदह, 1978 में अठारह, 1986 में छब्बीस 2008 में इकत्तीस और 2019 में चौंतीस तक कर दिया गया। न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है, वर्तमान में वे दो या तीन की छोटी न्यायपीठों (जिन्हें 'खंडपीठ' कहा जाता है) के रूप में सुनवाई करते हैं। संवैधानिक मामले और ऐसे मामले जिनमें विधि के मौलिक प्रश्नों की व्याख्या देनी हो, की सुनवाई पांच या इससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ (जिसे 'संवैधानिक पीठ' कहा जाता है) द्वारा की जाती है। कोई भी पीठ किसी भी विचाराधीन मामले को आवश्यकता पड़ने पर संख्या में बड़ी पीठ के पास सुनवाई के लिए भेज सकती है।[5]

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति[संपादित करें]

संविधान में तैतीस (33) न्यायधीश तथा एक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान है। उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के परामर्शानुसार की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस प्रसंग में राष्ट्रपति को परामर्श देने से पूर्व अनिवार्य रूप से चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह से परामर्श प्राप्त करते हैं तथा इस समूह से प्राप्त परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति को परामर्श देते हैं।

अनु 124[2] के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह लेगा। वहीं अन्य जजों की नियुक्ति के समय उसे अनिवार्य रूप से मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी पडेगी
सर्वोच्च न्यायालय एडवोकेट्स आन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ वाद 1993 मे दिये गये निर्णय के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के जजों के तबादले इस प्रकार की प्रक्रिया है जो सर्वाधिक योग्य उपलब्ध व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सके। भारत के मुख्य न्यायाधीश का मत प्राथमिकता पायेगा। उच्च न्यायपालिका मे कोई नियुक्ति बिना उस की सहमति के नहीं होती है। संवैधानिक सत्ताओं के संघर्ष के समय भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करेगा। राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश को अपने मत पर फिर से विचार करने को तभी कहेगा जब इस हेतु कोई तार्किक कारण मौजूद होगा। पुनः विचार के बाद उसका मत राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होगा यद्यपि अपना मत प्रकट करते समय वह सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठम न्यायधीशों का मत जरूर लेगा। पुनःविचार की दशा मे फिर से उसे दो वरिष्ठम न्यायधीशों की राय लेनी होगी वह चाहे तो उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय के अन्य जजों की राय भी ले सकता है लेकिन सभी राय सदैव लिखित में होगी
बाद में अपना मत बदलते हुए न्यायालय ने कम से कम 4 जजों के साथ सलाह करना अनिवार्य कर दिया था। वह कोई भी सलाह राष्ट्रपति को अग्रेषित नहीं करेगा यदि दो या ज्यादा जजों की सलाह इसके विरूद्ध हो किंतु 4 जजों की सलाह उसे अन्य जजों जिनसे वो चाहे, सलाह लेने से नहीं रोकेगी।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ[संपादित करें]

  • व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  • कम से कम पांच साल के लिए उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या दो या दो से अधिक न्यायालयों में लगातार कम से कम पांच वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुका हो। अथवा
  • किसी उच्च न्यायालय या न्यायालयों में लगातार दस वर्ष तक अधिवक्ता रह चुका हो। अथवा
  • वह व्यक्ति राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होना चाहिए।
  • यहाँ पर ये जानना आवश्यक है की उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने हेतु किसी भी प्रदेश के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पांच वर्ष का अनुभव होना अनिवार्य है ,

और वह ६२ वर्ष की आयु पूरी न किया हो, वर्तमान समय में CJAC निर्णय लेगी। किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या फिर उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के एक तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।

कार्यकाल[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु ६५ वर्ष होती है। न्यायाधीशों को केवल (महाभियोग) दुर्व्यवहार या असमर्थता के सिद्ध होने पर संसद के दोनों सदनों द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव के आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।

पदच्युति[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों की राष्ट्रपति तब पदच्युत करेगा जब संसद के दोनों सदनों के कम से कम 2/3 उपस्थित तथा मत देने वाले तथा सदन के कुल बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव जो कि सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर लाया गया हो के द्वारा उसे अधिकार दिया गया हो। ये आदेश उसी संसद सत्र मे लाया जायेगा जिस सत्र मे ये प्रस्ताव संसद ने पारित किया हो। अनु 124[5] मे वह प्रक्रिया वर्णित है जिससे जज पदच्युत होते है। इस प्रक्रिया के आधार पर संसद ने न्यायधीश अक्षमता अधिनियम 1968 पारित किया था। इसके अन्तर्गत

  • (१) संसद के किसी भी सदन मे प्रस्ताव लाया जा सकता है। लोकस्भा मे 100 राज्यसभा मे 50 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है
  • (२) प्रस्ताव मिलने पर सदन का सभापति एक 3 सदस्य समिति बनायेगा जो आरोपों की जाँच करेगी। समिति का अध्यक्ष सप्रीम कोर्ट का कार्यकारी जज होगा दूसरा सदस्य किसी हाई कोर्ट का मुख्य कार्यकारी जज होगा। तीसरा सदस्य माना हुआ विधिवेत्ता होगा। इसकी जाँच-रिपोर्ट सदन के सामने आयेगी। यदि इस मे जज को दोषी बताया हो तब भी सदन प्रस्ताव पारित करने को बाध्य नहीं होता किंतु यदि समिति आरोपों को खारिज कर दे तो सदन प्रस्ताव पारित नही कर सकता है।

अभी तक सिर्फ एक बार किसी जज के विरूद्ध जांच की गयी है। जज रामास्वामी दोषी सिद्ध हो गये थे किंतु संसद मे आवश्यक बहुमत के अभाव के चलते प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका था।

न्यायालय की जनसांख्यिकी[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय ने हमेशा एक विस्तृत क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को बनाए रखा है। इसमें धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक वर्गों से संबंधित न्यायाधीशों का एक अच्छा हिस्सा है। उच्चतम न्यायालय में नियुक्त होने वाली प्रथम महिला न्यायाधीश 1987 में नियुक्त हुईं न्यायमूर्ति फातिमा बीवी थीं। उनके बाद इसी क्रम में न्यायमूर्ति सुजाता मनोहर, न्यायमूर्ति रूमा पाल और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा का नाम आता है। न्यायमूर्ति रंजना देसाई, जो सबसे हाल ही में उच्चतम न्यायालय की महिला जज नियुक्त हुईं हैं, को मिलाकर वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में दो महिला न्यायाधीश हैं, उच्चतम न्यायालय के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब दो महिलायें एक साथ न्यायाधीश हों।
2000 में न्यायमूर्ति के. जी. बालकृष्णन दलित समुदाय से पहले न्यायाधीश बने। बाद में, सन् २००७ में वे ही उच्चतम न्यायालय के पहले दलित मुख्य न्यायाधीश भी बने। 2010 में, भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद सँभालने वाले न्यायमूर्ति एस. एच. कपाड़िया पारसी अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की खण्डपीठ[संपादित करें]

अनु 130 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली मे होगा परन्तु यह भारत मे और कही भी मुख्य न्यायाधीश के निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति की स्वीकृति से सुनवाई कर सकेगा
क्षेत्रीय खंडपीठों का प्रश्न- विधि आयोग अपनी रिपोर्ट के माध्यम से क्षेत्रीय खंडपीठों के गठन की अनुसंशा कर चुका है न्यायालय के वकीलॉ ने भी प्राथर्ना की है कि वह अपनी क्षेत्रीय खंडपीठों का गठन करे ताकि देश के विभिन्न भागॉ मे निवास करने वाले वादियॉ के धन तथा समय दोनॉ की बचत हो सके, किंतु न्यायालय ने इस प्रश्न पे विचार करने के बाद निर्णय दिया है कि पीठॉ के गठन से
1. ये पीठे क्षेत्र के राज नैतिक दबाव मे आ जायेगी
2. इनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट के एकात्मक चरित्र तथा संगठन को हानि पहुँच सकती है
किंतु इसके विरोध मे भी तर्क दिये गये है।

सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय[संपादित करें]

क्र. सं. मामला उच्चतम न्यायालय का निर्णय
1. शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार, 1951 संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति है।
2. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार, 1965 संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति है।
3. गोलक नाथ बनाम पंजाब सरकार, 1967 संसद को संविधान के भाग III (मौलिक अधिकारों) में संशोधन करने का अधिकार नहीं है।
4. केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार, 1971 संसद के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन 'बुनियादी संरचना' को कमजोर नहीं कर सकती है।
5. इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण, 1975 सर्वोच्च न्यायालय ने बुनियादी संरचना की अपनी अवधारणा की भी पुष्टि की।
6. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार, 1980 बुनियादी विशेषताओं में 'न्यायिक समीक्षा' और 'मौलिक अधिकारों तथा निर्देशक सिद्धांतों के बीच संतुलन' को जोड़कर बुनियादी ढांचे की अवधारणा को आगे विकसित किया गया।
7. मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम , १९८५ भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ के अन्तर्गत स्त्री को भरण-पोषण पाने का अधिकार है क्योंकि यह एक अपराधिक मामला है न कि दीवानी (सिविल)।
8. कीहोतो होल्लोहन बनाम जाचील्लहु, 1992 'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव' को बुनियादी विशेषताओं में जोड़ा गया।
9. इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार, 1992 'कानून का शासन', बुनियादी विशेषताओं में जोड़ा गया।
10. एस.आर बोम्मई बनाम भारत सरकार, 1994 संघीय ढांचे, भारत की एकता और अखंडता, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सामाजिक न्याय और न्यायिक समीक्षा को बुनियादी विशेषताओं के रूप में दोहराया गया।

समालोचना[संपादित करें]

भ्रष्टाचार[संपादित करें]

वर्ष २००८ में सर्वोच्य न्यायालय विभिन्न विवादों में उलझा जिसमें न्यायप्रणाली के उच्चतम स्तर पर भ्रष्टाचार का मामला,[6] करदाताओं के पैसे से महंगी निजी छुटियाँ,[7] न्यायाधीशों की परिसम्पतियों को सार्वजनिक करने से मना करने का मामला,[8] न्यायाधीशों की नियुक्ति में गोपनीयता, सूचना के अधिकार के तहत सूचना को सार्वजनिकर करने से मना करना[9] जैसे सभी मामले शामिल रहे। मुख्य न्यायाधीश के॰ जी॰ बालकृष्णन ने अपने पद को जनसेवक का न होकर एक संवैधानिक प्राधिकारी का होने को लेकर काफी आलोचनाओं का सामना किया।[10] बाद में उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया।[11] न्यायव्यवस्था को अपनी धीमी प्रक्रिया के लिए पूर्व राष्ट्रपतियों प्रतिभा पाटिल और ए॰पी॰जे॰ अब्दुल कलाम से भी कठिन आलोचना झेलनी पड़ी।[12] पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि न्यायव्यवस्था का भ्रष्टाचार के दौर से गुजरना बहुत बड़ी समस्या है और सुझाव दिया कि इसको बहुत शीघ्र इससे उबारने की आवश्यकता है।[13]

भारत के कैबिनेट सचिव ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में राष्ट्रीय न्याय परिषद् का पैनल घटित करने के लिए संसद में न्यायाधीश जाँच (संशोधन) बिल २००८ प्रस्तुत किया। यह परिषद् उच्च न्यायालय और सर्वोच्य न्यायालय के न्यायाधीशों पर लगे भ्रष्टाचार और दुराचार के आरोपों की जाँच करेगी।[14]

नियमावली[संपादित करें]

भारत के संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को अपने क्रियाकलापों एवं प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए स्वयं के नियमों को लागू करने का अधिकार देता है (राष्ट्रपति के अनुमोदन के साथ)। तदनुसार, "सर्वोच्च न्यायालय की नियमावली (रूल्स), 1950" तैयार किए गए थे। इसके बाद १९६६ में इसमें संशोधन करके नयी नियमावली बनायी गयी। 2014 में, सर्वोच्च न्यायालय ने 1966 के नियमों को बदलकर 'सर्वोच्च न्यायालय नियमावली २०१३' अधिसूचित किया जो 19 अगस्त 2015 से प्रभावी हुई।[15]

जुलाई २०१९ से सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में भी निर्णय की प्रति उपलब्ध करायी जा रही है।[16]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. 26 January 1950 History of the Supreme Court of India Archived 28 जनवरी 2019 at the वेबैक मशीन.
  2. "Chief Justice & Judges". Supreme Court of India. मूल से 25 अक्टूबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 12 अक्टूबर 2017.
  3. >"वर्ष २०११-१२ के किये एस. सी. बी. ए. की एग्जीक्यूटिव कमेटी के दायित्वधारियों एयर सदस्यों की सूची". Supreme Court Bar Association of India. मूल से 12 मई 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 28 जून 2012.
  4. "संरचना". Supreme Court of India. 28 जनवरी 1950. मूल से 30 मार्च 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 18 सितम्बर 2012.
  5. "भारत का सर्वोच्च न्यायालय - इतिहास". Supreme Court of India. मूल से 27 मई 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 जून 2012.
  6. "Ex-CJI under corruption panel scanner" [भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश भ्रष्टाचार पैनल की निगरानी सूची में] (अंग्रेज़ी में). हिन्दुस्तान टाइम्स. 9 जून 2008. मूल से 20 अक्टूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  7. "Are judges holidaying at public expense?" [क्या न्यायाधीश जनता की राशी से छुटियाँ मना रहे हैं?] (अंग्रेज़ी में). मई 2008. मूल से 19 अक्टूबर 2013 को पुरालेखित.
  8. "Judges' asset declaration before CJI not for public eye: SC to CIC" [जजों की सम्पतियाँ से पहले सीजेआई सार्वजनिक निगरानी के लिए नहीं: सर्वोच्य न्यायालय से सीआईसी] (अंग्रेज़ी में). द इंडियन एक्सप्रेस. 6 नवम्बर 2008. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  9. "RTI Act does not apply to my office: CJI" [आरटीआई अधिनियम मेरे कार्यालय पर लागू नहीं होता: सीजेआई] (अंग्रेज़ी में). द टाइम्स ऑफ़ इंडिया. 20 एप्रिल 2008. मूल से 13 नवम्बर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  10. "Is the CJI a public servant?" [क्या सीजेआई जनता का नौकर है?] (अंग्रेज़ी में). द टाइम्स ऑफ़ इंडिया. 22 एप्रिल 2008. मूल से 13 नवम्बर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  11. "I am a public servant: CJI" [मैं जनता का नौकर हूँ: सीजेआई] (अंग्रेज़ी में). द टाइम्स ऑफ़ इंडिया. 6 मई 2008. मूल से 13 नवम्बर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  12. [न्याय में देरी सामूहिक हत्याओं को जन्म देती है: प्रतिभा] |trans-title= को |title= की आवश्यकता है (मदद) (अंग्रेज़ी में). द टाइम्स ऑफ़ इंडिया. 24 फ़रवरी 2008. नामालूम प्राचल |titile= की उपेक्षा की गयी (मदद); गायब अथवा खाली |url= (मदद); |access-date= दिए जाने पर |url= भी दिया जाना चाहिए (मदद)
  13. "Manmohan Singh calls for check on corruption in judiciary" [मनमोहन सिंह ने न्यायव्यवस्था में भ्रष्टाचार की जाँच की बात की] (अंग्रेज़ी में). थाइंडियन न्यूज़. 19 एप्रिल 2008. मूल से 20 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  14. "Bill for probe panel against errant judges cleared". iGovernment. 10 अक्टूबर 2008. मूल से 21 जुलाई 2011 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अक्टूबर 2018.
  15. "सर्वोच्च न्यायालय नियमावली २०१३" (PDF). मूल (PDF) से 3 एप्रिल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 एप्रिल 2019.
  16. "सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अब हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं में पढ़ें फैसले". मूल से 21 जुलाई 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 21 जुलाई 2019.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]