शाहबानो प्रकरण
| मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम | |
|---|---|
| अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय |
| पूर्ण मामले का नाम | मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य |
| फैसला किया | 23 अप्रैल 1985 |
| उद्धरण(एस) | 1985 (1) SCALE 767; 1985 (3) SCR 844; 1985 (2) SCC 556; AIR 1985 SC 945 |
| व्यक्ति वृत्त | |
| Prior action(s) | आपराधिक पुनरीक्षण क्रमांक 320 वर्ष 1979, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय |
| मामले की राय | |
| एक महिला को भारतीय दंड संहिता के धारा 125 के अनुसार भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार है क्योंकि यह संहिता एक आपराधिक कानून है न कि दीवानी कानून। | |
| न्यायालय की सदस्यता | |
| जज बैठक | यशवंत विष्णु चंद्रचूड़, रंगनाथ मिश्रा, डीए देसाई, ओ चिन्नप्पा रेड्डी, ई एस वेंकटरमैय्या |
| द्वारा निर्णय | वाय॰ वी॰ चन्द्रचूड़ (मुख्य न्यायधीश) |
| Laws applied | |
| दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), मुसलमानी व्यक्तिगत कानून (शरियत) 1937, भारतीय दण्ड संहिता | |
मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो एवं अन्य (1985)[1] भारत में एक आपराधिक मुकदमा था जिसे आमतौर पर शाह बानो मामला के नाम से जाना जाता है। इसके परिणाम के तौर पर उच्चतम न्यायालय ने इंदौर की एक पीड़ित तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाह बानो बेगम को गुजारा भत्ता (एलिमनी) देने के पक्ष में फैसला सुनाया था। शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान ने सन् 1978 में उसे तलाक दे दिया था।[2]
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने इस फैसले को रद्द करवाने के लिए एक अभियान चलाया। इस मामले में महिला के पक्ष में आये फैसले की मुसलमानों ने आलोचना की जिनमें से कुछ ने क़ुरान का हवाला देकर दिखाया कि यह फैसला इस्लामी कानून के खिलाफ था।[3][4][5][4] इसने भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की सीमा के बारे में विवाद खड़ा कर दिया।[6][7] उस समाय भारत में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार थी। इस सरकार ने संसद में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया जिससे उच्चतम न्यायाल का फैसला कमजोर हो गया और मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं को अपने पूर्व पति से तलाक के बाद केवल 90 दिन (इस्लामी कानून में इसे इद्दत अवधि कहते हैं) तक गुजारा भत्ता पाने के अधिकार के रूप में सीमित कर दिया।[2][7][5] इस अधिनियम ने महिला के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसके रिश्तेदारों या वक़्फ़ परिषद् पर डाल दिया। इस कानून को भेदभावपूर्ण माना क्योंकि इसने मुस्लिम महिलाओं को धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत उपलब्ध बुनियादि भरण-पोषण के अधिकार से वंचित कर दिया था।[2] हालांकि बाद में डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ (2001) मामला और शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान (2015) जैसे मामलों में उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम की व्याख्या इस तरह से की कि मामले की वैधता सुनिश्चित हो सके एवं परिणामस्वरूप शाहबानो मामले के निर्णय को बरकरार रखा गया। मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 को रद्द कर दिया गया।[2][8] ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कुछ मुस्लिम समूहों ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को पूर्ण बनाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का समर्थन किया।[9][10][11]
पृष्ठभूमि
[संपादित करें]इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "Judgement Copy" (PDF). article51a.in.
- 1 2 3 4 "The Shah Bano legacy" [शाह बानो की विरासत]. द हिन्दू (अंग्रेज़ी भाषा में). 10 अगस्त 2003. 16 फ़रवरी 2024 को मूल से पुरालेखित.
- ↑ The politics of autonomy : Indian experiences 2005, p. 60-61.
- 1 2 Inscribing South Asian Muslim women 2008, p. 357.
- 1 2 On violence: a reader 2007, p. 262-265.
- ↑ T.P. Jindal 1995, p. 57.
- 1 2 "Flashback to Shah Bano case as Muslim woman wins alimony battle" [शाहबानो मामले की यादें ताज़ा हुईं, जब एक मुस्लिम महिला ने गुज़ारा भत्ता की लड़ाई जीती]. द इंडियन एक्सप्रेस (अंग्रेज़ी भाषा में). 23 सितम्बर 2009. अभिगमन तिथि: 7 मई 2013.
- ↑ "SC: Right to maintenance of a wife absolute, Section 125 of CrPC applicable on divorced women". The Times of India. 7 April 2015.
- ↑ "Need law to ensure minimum interference in minorities' affairs, says AISPLB" [अल्पसंख्यकों के मामलों में कम से कम दखलअंदाजी सुनिश्चित करने के लिए कानून की जरूरत है, एआईएसपीएलबी ने कहा]. द इंडियन एक्सप्रेस (अंग्रेज़ी भाषा में). 21 अप्रैल 2015.
- ↑ "Arif Mohammad Khan on Shah Bano case: 'Najma Heptullah was key influence on Rajiv Gandhi'" [शाह बानो मामले पर आरिफ मोहम्मद खान ने कहा: 'नजमा हेपतुल्ला का राजीव गांधी पर अहम असर था']. स्क्रॉल डॉट इन (अंग्रेज़ी भाषा में). 30 मई 2015.
- ↑ "Arif Mohammad Khan welcomes Supreme Court's ruling on Section 125" [आरिफ मोहम्मद खान ने धारा 125 पर उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत किया]. द इकॉनोमिक टाइम्स (अंग्रेज़ी भाषा में). 8 अप्रैल 2015. मूल से से 24 अप्रैल 2015 को पुरालेखित।.