भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

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भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस
Flag of the Indian National Congress.svg
दल अध्यक्ष सोनिया गांधी
संसदीय दल अध्यक्ष सोनिया गांधी
नेता लोकसभा मल्लिकार्जुन खड़गे (विपक्ष के नेता)
नेता राज्यसभा गुलाम नबी आजाद
(विपक्ष के नेता)
गठन 1885
गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग)
लोकसभा मे सीटों की संख्या
44 / 545
राज्यसभा मे सीटों की संख्या
70 / 245
विचारधारा लोकलुभावनवाद
अल्पसंख्यक तुष्टिकरण
जनतांत्रिक समाजवाद
सामाजिक लोकतंत्र
प्रकाशन काँग्रेस सन्देश
रंग आसमानी     
विद्यार्थी शाखा नेशनल स्टूडेंट यूनीयन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई)
युवा शाखा इंडियन यूथ कांग्रेस
महिला शाखा महिला कांग्रेस
श्रमिक शाखा इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक)
जालस्थल www.aicc.org.in
भारत की राजनीति
राजनैतिक दल
चुनाव

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत का एक राजनैतिक दल है। ब्रिटिश राज में इस दल की स्थापना[1] 28 दिसम्बर सन् 1885 को ए ओ ह्यूम[2] ने की थी। इस दल की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। यह दल काँग्रेस सन्देश नामक बुलेटिन का प्रकाशन भी करता है। इस दल का युवा संगठन भारतीय युवा काँग्रेस है। 2004 के संसदीय चुनाव में इस दल ने 10,34,05,272 मत (कुल मतों का 26.7%) प्राप्त करके 145 सीटें जीती थीं।[3]

इतिहास[संपादित करें]

स्वतन्त्रता संग्राम[संपादित करें]

काँग्रेस की स्थापना के समय सन् 1885 का चित्र

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसम्बर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। इसके संस्थापक महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) ए ओ ह्यूम थे जिन्होंने कलकत्ते के व्योमेश चन्द्र बनर्जी को अध्यक्ष नियुक्त किया था। अपने शुरुआती दिनों में काँग्रेस का दृष्टिकोण एक कुलीन वर्ग की संस्था का था। इसके शुरुआती सदस्य मुख्य रूप से बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी से लिये गये थे। काँग्रेस में स्वराज का लक्ष्य सबसे पहले बाल गंगाधर तिलक ने अपनाया था।[4]

1907 में काँग्रेस में दो दल बन चुके थे - गरम दल एवं नरम दल। गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें लाल-बाल-पाल भी कहा जाता है) कर रहे थे। नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता एवं दादा भाई नौरोजी कर रहे थे। गरम दल पूर्ण स्वराज की माँग कर रहा था परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने के बाद सन् 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गये और होम रूल आंदोलन की शुरुआत हुई जिसके तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिये अधिराज्य अवस्था (डॉमिनियन स्टेटस) की माँग की गयी।

परन्तु 1916 में गान्धी जी के भारत आगमन के साथ काँग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चम्पारन एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन समर्थन से अपनी पहली सफलता मिली। 1919 में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गान्धी जी काँग्रेस के महासचिव बने। उनके मार्गदर्शन में काँग्रेस कुलीन वर्गीय संस्था से बदलकर एक जनसमुदाय संस्था बन गयी। तत्पश्चात् राष्ट्रीय नेताओं की एक नयी पीढ़ी आयी जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल थे। गान्धीजी के नेतृत्व में प्रदेश काँग्रेस कमेटियों का निर्माण हुआ, काँग्रेस में सभी पदों के लिये चुनाव की शुरुआत हुई, सभी भेदभाव हटाये गये एवं कार्यवाहियों के लिये भारतीय भाषाओं का प्रयोग शुरू हुआ। काँग्रेस ने कई प्रान्तों में सामाजिक समस्याओं को हटाने के प्रयत्न किये जिनमें छुआछूत, पर्दाप्रथा एवं मद्यपान आदि शामिल थे।[5]

स्वतन्त्र भारत[संपादित करें]

1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के मुख्य राजनैतिक दलों में से एक रही है। इस दल के कई प्रमुख नेता भारत के प्रधानमन्त्री रह चुके हैं। जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, नेहरू की पुत्री इन्दिरा गान्धी एवं उनके नाती राजीव गान्धी इसी दल से थे। कांग्रेस भारत की वर्तमान गठबन्धन सरकार का मुख्य दल है। राजीव गान्धी की पत्नी सोनिया गान्धी कांग्रेस की अध्यक्ष होने के साथ यूपीए की चेयरपर्सन भी हैं। पूर्व भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इसी दल से ताल्लुक रखते हैं।

विवाद एवं आलोचना[संपादित करें]

  • अंग्रेज-भक्ति: ए.ओ. ह्यूम द्वारा काँग्रेस की स्थापना के उद्देश्यों को गहनता से विश्लेषित करने से सिद्ध होता है कि ह्यूम कांग्रेस की स्थापना के जरिये एक ऐसी संस्था चाहते थे जो अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों की हो। कांग्रेस की सदस्यता के लिये अंग्रेजी में निपुणता और ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति भक्ति अनिवार्य थी। अपनी स्थापना के शुरुआती बीस बरसों तक काँग्रेस पूरी तरह निष्क्रिय होकर ब्रिटिश शासन के प्रति समर्पित उदारवादियों की नीतियों पर चलती रही। यही वजह थी कि उस कालखण्ड में काँग्रेस ने राष्ट्रीय आन्दोलन को बढ़ाने या स्वतन्त्रता को प्राप्त करने की दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। हालांकि इसी दौरान राष्ट्रवादी नेताओं के कांग्रेस में प्रवेश ने स्थितियों में काफी बदलाव किया। इसके परिणामस्वरूप वैचारिक स्तर पर काँग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई। लगभग दस वर्ष तक दो भागों में विघटित कांग्रेस पुन: सन् 1916 में गांधीजी के प्रयासों से एकजुट हुई।[6]
  • परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद गान्धी जी द्वारा प्रस्तावित नये दल के गठन और कांग्रेस को पूर्णत: समाप्त करने के प्रस्ताव को काँग्रेसी नेताओं ने नहीं माना।
  • भ्रामक इतिहास शिक्षा: सन्‌ 1857 से 1947 तक चले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक दलों, संगठनों, समूहों और व्यक्तियों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। यह सही है कि 90 वर्ष तक चले इस आन्दोलन में कुछ दलों की भूमिका भी रही। बावजूद इसके यह मतलब निकालना कि सिर्फ़ काँग्रेस की वजह से या उसके संघर्ष से ही देश स्वतन्त्र हुआ; पूरी तरह असत्य और उन लाखों देशप्रेमियों के साथ धोखा है जिन्होंने अपने प्राण तक इस देश को आज़ाद कराने के लिये न्योछावर कर दिये।
  • भारत का विभाजन
  • मुसलमानों का तुष्टीकरण
  • आपातकाल लगाना
  • 1984 के सिख दंगे
  • बोफोर्स दलाली काण्ड
  • सांसद रिश्वत काण्ड (नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में)
  • वोट के बदले नोट काण्ड
  • टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला
  • राष्ट्रमंडल खेल घोटाला (2011)
  • विदेशी बैंकों में जमा काले धन को स्वदेश लाने की दिशा में काँग्रेस रोडे अटका रही है जबकि सरकार में होने के कारण उसका पुनीत कर्तव्य है कि वह खुद इस दिशा में पहल करे। इससे इस आशंका को बल मिल रहा है कि विदेशी बैंकों में भ्रष्टाचार से कमाया धन जमा करने वालों में कांग्रेस के नामी नेताओं के भी नाम शामिल हैं।

काँग्रेस की नीतियों का विरोध[संपादित करें]

समय-समय पर विभिन्न नेताओ ने काँग्रेस की नीतियों का विरोध किया और उसे हटाने के लिये संघर्ष किया। इनमें राममनोहर लोहिया का नाम अग्रणी है जो जवाहरलाल नेहरू के कट्टर विरोधी थे। इसके अलावा जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंका। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स दलाली काण्ड को लेकर राजीव गांधी को सत्ता से हटा दिया।

लोहिया का 'काँग्रेस हटाओ' आन्दोलन[संपादित करें]

राम मनोहर लोहिया लोगों को आगाह करते आ रहे थे कि देश की हालत को सुधारने में काँग्रेस नाकाम रही है। काँग्रेस शासन नये समाज की रचना में सबसे बड़ा रोड़ा है। उसका सत्ता में बने रहना देश के लिये हितकर नहीं है। इसलिये लोहिया ने नारा दिया - "काँग्रेस हटाओ, देश बचाओ।"

1967 के आम चुनाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ। देश के 9 राज्यों - पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में गैर काँग्रेसी सरकारें गठित हो गयीं। लोहिया इस परिवर्तन के प्रणेता और सूत्रधार बने।

जेपी आन्दोलन[संपादित करें]

सन् 1974 में जयप्रकाश नारायण ने इन्दिरा गान्धी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा दिया। आन्दोलन को भारी जनसमर्थन मिला। इससे निपटने के लिये इन्दिरा गान्धी ने देश में इमर्जेंसी लगा दी। सभी विरोधी नेता जेलों में ठूँस दिये गये। इसका आम जनता में जमकर विरोध हुआ। जनता पार्टी की स्थापना हुई और सन् 1977 में काँग्रेस पार्टी बुरी तरह हारी। पुराने काँग्रेसी नेता मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी किन्तु चौधरी चरण सिंह की महत्वाकांक्षा के कारण वह सरकार अधिक दिनों तक न चल सकी।

भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन[संपादित करें]

सन् 1987 में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कम्पनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में काँग्रेस की सरकार थी और उसके प्रधानमन्त्री राजीव गान्धी थे। स्वीडन रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स काण्ड के नाम से जाना जाता हैं। इस खुलासे के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन चलाया जिसके परिणाम स्वरूप विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधान मन्त्री बने।

विपक्ष के नेता[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. क्रान्त, मदनलाल वर्मा (2006) (Hindi में) स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास 1 (1 ed.) नई दिल्ली: प्रवीण प्रकाशन प॰ 13 आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7783-119-4 http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218. अभिगमन तिथि: 11 जनवरी 2014 "काँग्रेस की स्थापना से पूर्व देश में कुछ ऐसे तत्व विद्यमान थे जो यह सोचते थे कि जब अंग्रेजों को ही यहाँ शासन करना है तो फिर क्यों न उनसे मित्रता बनाकर और उनकी 'प्रशस्ति-स्तुति' या 'जी हुजूरी' करके अपने लिये कुछ विशेष अधिकार प्राप्त किये जायें। इन्हीं तत्वों ने मिलकर राजनीतिक पृष्ठभूमि को इस योग्य बनाया जिस पर विदेशी भावभूमि से आयातित काँग्रेस का संकर बीज बोया जा सका।" 
  2. http://www.escholarship.org/uc/item/73b4862g?display=all
  3. http://www.allianceofdemocrats.org/index.php?option=com_content&view=article&id=63&Itemid=26
  4. John F. Riddick (2006), The history of British India: a chronology, Greenwood Publishing Group, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0313322805, http://books.google.com/?id=Es6x4u_g19UC 
  5. http://books.google.co.in/books?id=LdvfAAAAMAAJ
  6. http://www.archive.org/details/TheHistoryOfTheIndianNationalCongress

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]