भारत में यूरोपीय आगमन

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भारत के सामुद्रिक रास्तों की खोज 15वीं सदी के अन्त में हुई जिसके बाद यूरोपीयों का भारत आना आरंभ हुआ । यद्यपि यूरोपीय भारत के अलावे भी बहुत स्थानों पर अपने उपनिवेश बनाने में कामयाब हुए पर इनमें से कइयों का मुख्य आकर्षण भारत ही था । सत्रहवीं सदी के अंत तक यूरोपीय कई एशियई जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुके थे और अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में वे कई जगहों पर काबिज़ हो गए थे । भारत पर उन्नासवीं सदी में जाकर ही अंग्रेजों का एकाधिकार हो पाया था ।

भारत की समृद्धि को देखकर पश्चिमी देशों में भारत के साथ व्यापार करने की इच्छा पहले से थी । यूरोपीय नाविकों द्वारा सामुद्रिक मार्गों का पता लगाना इन्हीं लालसाओं का परिणाम था । तेरहवीं सदी के आसपास मुसलमानों का अधिपत्य भूमध्य सागर और उसके पूरब के क्षेत्रों पर हो गया था और इस कारण यूरोपी देशों को भारतीय माल की आपूर्ति ठप्प पड़ गई । उस पर भी इटली के वेनिस नगर में चुंगी देना उनको रास नहीं आता था । कोलंबस भारत का पता लगाने अमरीका पहुँच गया और सन् 1487-88 में पेडरा द कोविल्हम नाम का एक पुर्तगाली नाविक पहली बार भारत के तट पर मालाबार पहुँचा । भारत पहुचने वालों में पुर्तगाली सबसे पहले थे इसके बाद डच आए और डचों ने पुर्तगालियों से कई लड़ाईयाँ लड़ीं । भारत के अलावा श्रीलंका में भी डचों ने पुर्तगालियों को खडेड़ दिया । पर डचों का मुख्य आकर्षण भारत न होकर दक्षिण पूर्व एशिया के देश थे । अतः उन्हें अंग्रेजों ने पराजित किया जो मुख्यतः भारत से अधिकार करना चाहते थे । आरंभ में तो इन यूरोपीय देशों का मुख्य काम व्यापार ही था पर भारत की राजनैतिक स्थिति को देखकर उन्होंने यहाँ साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक नीतियाँ अपनानी आरंभ की ।

पुर्तगाली[संपादित करें]

22 मई 1498 को पुर्तगाल का वास्को-द-गामा भारत के तट पर आया जिसके बाद भारत आने का रास्ता तय हुआ । उसने कालीकट के राजा से व्यापार का अधिकार प्राप्त कर लिया पर वहाँ सालों से स्थापित अरबी व्यापारियों ने उसका विरोध किया । 1499 में वास्को-द-गामा स्वदेश लौट गया और उसके वापस पहुँचने के बाद ही लोगों को भारत के सामुद्रिक मार्ग की जानकारी मिली ।

सन् 1500 में पुर्तगालियों ने कोचीन के पास अपनी कोठी बनाई । शासक सामुरी (जमोरिन) से उसने कोठी की सुरक्षा का भी इंतजाम करवा लिया क्योंकि अरब व्यापारी उसके ख़िलाफ़ थे । इसके बाद कालीकट और कन्ननोर में भी पुर्तगालियों ने कोठियाँ बनाई । उस समय तक पुर्तगाली भारत में अकेली यूरोपी व्यापारिक शक्ति थी । उन्हें बस अरबों के विरोध का सामना करना पड़ता था । सन् 1506 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अपना अधिकार कर लिया । ये घटना जमोरिन को पसन्द नहीं आई और वो पुर्तगालियों के खिलाफ हो गया । पुर्तगालियों के भारतीय क्षेत्र का पहला वायसऱय था डी-अल्मीडा । उसके बाद अल्बूकर्क पुर्तगालियों का वॉयसराय नियुक्त हुआ । उसने 1510 में कालीकट के शासक जमोरिन का महल लूट लिया ।

पुर्तगाली इसके बाद व्यापारी से ज्यादे साम्राज्यवादी नज़र आने लगे । वे पूरब के तट पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करना चाहते थे । अल्बूकर्क के मरने के बाद पुर्तगाली और क्षेत्रों पर अधिकार करते गए । सन् 1571 में बीजापुर, अहमदनगर और कालीकट के शासकों ने मिलकर पुर्तगालियों को निकालने की चेष्टा की पर वे सफल नहीं हुए । 1579 में वे मद्रास के निकच थोमें, बंगाल में हुगली और चटगाँव में अधिकार करने मे सफल रहे । 1580 में मुगल बादशाह अकबर के दरबार में पुर्तगालियों ने पहला ईसाई मिशन भेजा । वे अकबर को ईसाई धर्म में दीक्षित करना चाहते थे पर कई बार अपने नुमाइन्दों को भेजने के बाद भी वो सफल नहीं रहे । पर पुर्तगाली भारत के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार नहीं कर पाए थे । उधर स्पेन के साथ पुर्तगाल का युद्ध और पुर्तगालियों द्वारा ईसाई धर्म के अन्धाधुन्ध और कट्टर प्रचार के के कारण वे स्थानीय शासकों के शत्रु बन गए और 1612 में कुछ मुगल जहाज को लूटने के बाद उन्हें भारतीय प्रदेशों से हाथ धोना पड़ा ।

डच[संपादित करें]

पुर्तगालियों की समृद्धि देख कर डच भी भारत और श्रीलंका की ओर आकर्षित हुए । सर्वप्रथम 1598 में डचों का पहला जहाज अफ्रीका और जावा के रास्ते भारत पहुँचा । 1602 में प्रथम डच कम्पनी की स्थापना की गई जो भारत से व्यापार करने के लिए बनाई गई थी । इस समय तक अंग्रेज और फ्रांसिसी लोग भी भारत में पहुँच चुके थे पर नाविक दृष्टि से डच इनसे वरीय थे । सन् 1602 में डचों ने अम्बोयना पर पुर्तगालियों को हरा कर अधिकार कर लिया । इसके बाद 1612 में श्रीलंका में भी डचों ने पुर्गालियों को खदेड़ दिया । उन्होंने पुलीकट (1610), सूरत (1616), चिनसुरा (1653), क़ासिम बाज़ार, बड़ानगर, पटना, बालेश्वर (उड़ीसा), नागापट्टनम् (1659) और कोचीन (1653) में अपनी कोठियाँ स्थापित कर लीं । पर, एक तो डचों का मुख्य उद्येश्य भारत से व्यापार न करके पूर्वी एशिया के देशों में अपने व्यापार के लिए कड़ी के रूप में स्थापित करना था और दूसरे अंग्रेजों ओर फ्रांसिसियों ने उन्हें यहाँ और यूरोप दोनों जगह युद्धों में हरा दिया । इस कारण डचों का प्रभुत्व बहुत दिनों तक भारत में नहीं रह पाया था ।

अंग्रेज़ और फ्रांसिसी[संपादित करें]

इंग्लैँड के नाविको को भारत का पता कोई 1578 इस्वी तक नहीं लग पाया था । 1578 में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक अंग्रेज़ नाविक ने लिस्बन जाने वाले एक जहाज को लूट लिया । इस जहाज़ से उसे भारत जाने लावे रास्ते का मानचित्र मिला । 31 मई सन् 1600 को कुछ व्यापारियों ने इंग्लैँड की महारानी एलिज़ाबेथ को ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना का अधिकार पत्र दिया । उन्हें पूरब के देशों के साथ व्यापार की अनुमति मिल गई । 1601-03 के दौरान कम्पनी ने सुमात्रा में वेण्टम नामक स्थान पर अपनी एक कोठी खोली । हेक्टर नाम का एक अंग्रेज़ नाविक सर्वप्रथम सूरत पहुँचा । वहाँ आकर वो आगरा गया और जहाँगीर के दरबार में अपनी एक कोठी खोलने की विनती की । जहाँगीर के दरबार में पुर्तगालियों की धाक पहले से थी । उस समय तक मुगलों से पुर्तगालियों की कोई लड़ाई नहीं हुई थी और पुर्तगालियों की मुगलों से मित्रता बनी हुई थी । हॉकिन्स को वापस लौट जाना पड़ा । पुर्तगालियों को अंग्रेजों ने 1612 में सूरत में पराजित कर दिया और सर टॉमस रो को इंग्लैंड के शासक जेम्स प्रथम ने अपना राजदूत बनाकर जहाँगीर के दरबार में भेजा । वहाँ उसे सूरत में अंग्रेज कोठी खोलने की अनुमति मिली ।

इसके बाद बालासोर (बालेश्वर), हरिहरपुर, मद्रास (1633), हुगली (1651) और बंबई (1688) में अंग्रेज कोठियाँ स्थापित की गईं । पर अंग्रेजों की बढ़ती उपस्थिति और उनके द्वारा अपने सिक्के चलाने से मुगल नाराज हुए । उन्हें हुगली, कासिम बाज़ार, पटना, मछली पट्टनम्, विशाखा पत्तनम और बम्बई से निकाल दिया गया । 1690 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह औरंगजेब से क्षमा याचना की और अर्थदण्ड का भुगतानकर नई कोठियाँ खोलने और किलेबंदी करने की अनुमति प्राप्त करने में सफल रहे ।

इसी समय सन् 1611 में भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से एक फ्रांसीसी क्म्पनी की स्थापना की गई थी । फ्रांसिसियों ने 1668 में सूरत, 1669 में मछली पट्टणम् थथा 1674 में पाण्डिचेरी में अपनी कोठियाँ खोल लीं । आरंभ में फ्रांसिसयों को भी डचों से उलझना पड़ा पर बाद में उन्हें सफलता मिली और कई जगहों पर वे प्रतिष्ठित हो गए । पर बाद में उन्हें अंग्रेजों ने निकाल दिया ।

यह भी देखें[संपादित करें]