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[संपादित करें] अंग्रेज़ी अंकों का प्रयोग

अनुक्रम

क्या सर्व सहमति से इंग्लिश के ही अंको का उपयोग करना सही होगा ?

सभी को नमस्कार, में आप सभी की नज़र में यह बात लाना चाहता हूँ की हिंदी विकिपीडिया में और उसके पन्नो में हम या सिस्टम खुद हिंदी के अंको का प्रयोग करते/करता है. आज जहा हिंदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है, भारत के सभी राज्य उसका इस्तेमाल नहीं करते, अधिकतर दस्तावेज इंग्लिश में होते है और इन्टरनेट की तो मात्रभाषा इंग्लिश है ही, हमें क्या हिंदी के अंको का प्रयोग करना चाहिए?

कुछ समय पहले मैंने एक प्रसिद्ध कवी के साक्षात्कार में उनके विचार पड़े की हिंदी जो इतनी लोकप्रिय नहीं है वोह है अपने कठिन शब्दावली और हिंदी के अलग अंको की वजह से. बैंक का ही उदहारण ले, पैसे जमा करने वाले स्लिप पर "हस्तारंकर्ता का नाम" लिखा होता हैं, क्या "जमा करने वाले का नाम" नहीं लिख सकते. यह रोज मररा के शब्द है और इन्हें समजने के लिए हिंदी का विशेष ज्ञान होना आवश्यक नहीं.

लगभग हर भारतीय को जो की हिंदी भाषी हैं व जो की हिंदी विकिपीडिया का उपयोग करता हैं उसे हिंदी पड़नी आती हैं, व वोह हिंदी विकिपीडिया कंप्यूटर पर देख रहा है तो उसे इंग्लिश का प्रारंभिक ज्ञान तो है ही. हिंदी के अंको/नम्बरों को हर कोई हिंदी भाषी नहीं समज सकता, हमें स्कूलों में हिंदी पदाई जाती है और किसी भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में हिंदी के अंक नहीं पदाए जाते.

आखिर में मेरा अनुरोध है के क्या यह सही होगा की हम सर्व सहमति से इंग्लिश के ही अंको का उपयोग करे. आप के सुजाव व विचारों की प्रतीक्षा में! --सिद्धार्थ गौड़ १७:३०, ३ नवंबर २००९ (UTC)

सिद्धार्थ जी आपने पूछा तो प्रस्तुत है-
  • हिंदी विकिपीडिया में हिंदी अंको के प्रयोग का निर्णय विचार विमर्श और मतदान के बाद लिया गया था।
  • हिंदी विकि विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो लोग अँग्रेजी नहीं जानते, हिंदी पढ़ना अँग्रेजी पढ़ने से अधिक सुविधाजनक समझते हैं या हिंदी पर गर्व करते हैं। इसलिए उन सभी के लिए यहाँ हिंदी अंकों का प्रयोग अधिक उपयुक्त है।
  • अंग्रेजी माध्यम के ऐसे लोग जिन्हें हिंदी अंकों की पहचन नहीं है, हिंदी विकि में आकर हिंदी अंक सीखने का अवसर मिलता है, साथ ही जिस अंक प्रणाली का जन्म भारत में हुआ था उसकी पारंपरिक लिपि का संरक्षण भी होता है।
  • अंग्रेजी माध्यम के लोग जिन्हें हिंदी अंक समझने नहीं आते हैं और जिनकी सीखने में भी रुचि नहीं है, उनके लिए पहले ही अँग्रेजी विकी की व्यवस्था है। इसलिए हिंदी विकि में अँग्रेजी अंकों का कोई औचित्य नहीं है।

अंत में एक बात और ध्यान से समझ लें- 'हस्ताक्षरकर्ता का नाम' और 'जमाकरने वाले का नाम' इन दोनो बातों में अंतर है। बैंक में सब जगह 'हस्ताक्षरकर्ता के नाम' की जगह 'जमा करनेवाले का नाम' नहीं लिखा जा सकता इसलिए यह व्यवस्था है। इंटरनेट की भाषा हिंदी नहीं है यह आपका भ्रम है अब तो एम एस ऑफिस का हिंदी संस्करण भी हजारों लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके साथ ही गूगल, एम एस एन अपने सभी अभिकल्पों में हिंदी का प्रयोग करते हैं। आवश्यक चीज़ें हमें मेहनत कर के सीखनी चाहिए आखिर आप अनेकों अंग्रेजी के शब्द सीखते ही है जो आसान नहीं होते। कोई भी प्रसिद्ध हिंदी कवि अपने साक्षात्कार में यह नहीं कह सकता कि हिंदी लोकप्रिय नहीं है या उसकी शब्दावली कठिन है या हिंदी के ९ अंकों को सीखा या समझा नहीं जा सकता। किसी भी भाषा के ९ अंकों को सीखने में ९ मिनट से भी कम समय लगता है फिर ये तो हिंदी है। हमारी अपनी भाषा।--सुरुचि २३:१४, ३ नवंबर २००९ (UTC)

सुरूचि जी, आपके विचार जानकर खुशी हुई. आपकी बात में दम है की आज बड़े इन्टरनेट सेवा प्रदाता जैसे की गूगल, याहू आदि हिंदी में सेवा दे रहे है. जहा तक की बात माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस की है, तो आप मेरी इस बात से इतेफाक रखती होंगी की इसी माइक्रोसॉफ्ट के ऑपरेटिंग सिस्टम पूर्णतः हिंदी में काम नहीं करते. इन्टरनेट पे जहा आप सीधे हिंदी के url नहीं लिख सकते वही मोबाइल फोनों पर तो हिंदी के वेब पन्ने पड़ना अत्यंत मुश्किल है. यह सब मेरे खुद के अनुभव पर आधारित है.

आप की राय भी खूब भाई की क्यों ना में थोडा ध्यान दू और हिंदी अंक सीखने की कोशिश करू. और हां, वोह हिंदी कवी अशोक चक्रधर है और यह बात उन्होंने हिंदी दिवस पर NDTV पर कही थी. उनका उदहारण ढीक से याद नहीं रहा पर वोह इसी बात पर था, और आप गलत समझी, मेने हस्ताक्षरकर्ता नहीं लिखा.

आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद और हिंदी प्रेम के लिए साधुवाद. --सिद्धार्थ गौड़ ०६:४०, ४ नवंबर २००९ (UTC)

आपके सुंदर विचारों के लिए धन्यवाद।--सुरुचि १६:२५, ४ नवंबर २००९ (UTC)

इस विषय पर बहस पहले भी हो चुकी है, और आज भी हो रही है, यह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। चूंकि सुझाव सिद्धार्थ जी ने रखा है, इसलिए अपने सुझाव को फिर से दोहरा रहा हूं।

  • अन्य विकिपीडिया की तरह हिन्दी विकिपीडिया भी हिन्दी भाषा की समझ रखने वाले लोगों को कमोबेश विशेषज्ञ और तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराना है, गौर करने वाली बात यहां जानकारी/ज्ञान है, न कि भाषा में पारंगत करने का। फिर खालिस हिन्दी की अंक हों या फिर सहज, सरल और आम प्रचलन में बने अंग्रेजी के, क्या फर्क पड़ता है। कहने का मतलब यह कि हमें उपयोगकर्ता को ध्यान में रखते हुए लेख बनाना चाहिए, न कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए। इस लिहाज से हिन्दी के बजाए अंग्रेजी के अंको का उपयोग ज्यादा श्रेयस्कर होगा।

वैसे मुझे बहुमत का उत्तर पहले ही मालूम है, और वर्तमान स्थिति में इतना बड़ा परिवर्तन संभव भी नहीं (शायद सौरभ के बोट से काम बन भी जाए)। मेरे ख्याल से इस विषय पर फिर से वोटिंग हो जाए, यदि पहले कभी हुई हो तो --Charu १०:१८, ५ नवंबर २००९ (UTC)

  • हर बार कोई नया सदस्य आएँ और हम लोग वोटिंग कराते रहे तो फिर तो चला चुके हिन्दी विकिपीडिया। यह निर्णय बहुत पहले ही लिया जा चुका है कि हिन्दी के ही अंक प्रयोग किए जाएँगें। सुरूचि जी ने इस बात को बहुत ही खूबसूरत तरीके से कहा इसके बाद भी जिनके समझ में नहीं आ रहा है उनके लिए अंग्रेजी विकि के द्वार खुले हैं। बेकार की चर्चा को बढ़ा कर हम अपना वक्त एवं ऊर्जा खर्च नहीं कर सकते हैं।--Munita Prasadवार्ता १३:३४, ५ नवंबर २००९ (UTC)
हिन्दी विकि पर केवल हिन्दी के ही अंको का उपयोग किया जाना चाहिए क्योंकि यदि हम लोग इस विकि पर भी हिन्दी अंको का उप्योग ना करें तो एक दिए ऐसा आएगा जैसा अभी मुझे कुछ दिन पूर्व सुनने को मिला। मैं किसी इन्टरनेट फोरम पर था। वहाँ पर एक तमिल महाश्य तमिल का रोना रो रहे थे की एक बार जब वे महाशय मुम्बई गए तो वहाँ वे कुछ तमिलों से मिले होंगे जो अब वहीं रहते थे और मराठी का ही उपयोग करते थे और उन्हें उसपर गर्व भी था। इस बाबत जब उन्होंने अपने उन तमिल बन्धुओं से पूछा की क्यों उन्होंने तमिल को त्याग दिया है तो स्वयं उन तमिलों ने ही कहा की देखों मराठी के पास अपनी अंक प्रणाली है (मराठी हिन्दी जैसी ही देवनागरी लिपि में लिखी जाती है) जबकि तमिल में तो अंग्रेजी के अंको का प्रयोग होता है। उन महाशय का कहना था की यह तमिल शिक्षा नीति का ही दोष है की अंग्रेजी अंको का उपयोग किया जाता है जबकि तमिल में भी अंक लिखे जा सकते है। इसलिए हम नहीं चाहते की एक दिन हिन्दी भाषीयों के बच्चे भी कहें की हिन्दी की अपनी तो कोई अम्क प्रणली है ही नहीं। और ऐसी बात नहीं है की हिन्दी के अंक उपयोग में है ही नहीं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तरान्चल आदि राज्यों में हिन्दी अंक उपयोग में हैं। वो तो दिल्ली में काले अंग्रेजो की संख्या अधिक है इसलिए ऐसा लगता है। रोहित रावत १३:४८, ५ नवंबर २००९ (UTC)

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मुनिता व रोहित जी,
में आप लोगो के द्बारा दिए गए उदहारणो से सहमत हूँ और इस बहस को आगे न बड़ाते हुए हिंदी के अंक सिखने की कोशिश करूंगा. जहा तक चारू जी ने कहा वो आप देखे कि आप को दूबारा वोट कराना सहि लगेगा कि नहि, मुछे नहीं पता था की आप सभी पुराने उप्योगक्रताओ ने इस बारे में पहले ही वोट कर लिए है. आप के फैसले का आदर करता हूँ. उम्मीद है आप सबका सहयोग मिलता रहेगा. में तो खुद राजस्थान से हूँ रोहित भाई. धन्यवाद --सिद्धार्थ गौड़ १५:३१, ५ नवंबर २००९ (UTC)

वैसे तो ये वाता शायद समाप्त होने के कगा पर है, किन्तु फिर भी लिखता हूं। पहले तो सिद्धार्थ जी से निवेदन करूंगा कि हिन्दी विकी के नियमों के अनुसार ये तय हुआ हुआ है, कि नवीनतम वाता चौपाल में सबसे नीचे लिखी जाये, न कि जैसे यहां सबसे ऊपर लिखी हुई है, और शयद इसी कारण ये पढ़ने में नहीं आयी।
उसके बाद कहूंगा कि सुरुचि जी ने बड़े ही सुंदर शब्दों में बात पहले ही कह दी है। उसके बाद वही दोहराना होगा, कि ये बहुत पहले ही बहुमत से तय किया जा चुका है, कि हिन्दी अंकों का प्रयोग ही किया जाये। यहां ये बता दूं, कि मैंने तब अंग्रेज़ी अंकों के प्रयोग पर समर्थन दिया था, किन्तु पूर्णिमा जी ने समझाया और मेरी समझ में भी आया, और आज अनुभाव से मैं भी कह सकता हूं, कि हमें हिन्दी अंकों का प्रयोग अधिक सरल भी होगा, संपादन आदि करने में, अन्यथा बार बार पाठ हिन्दी और अंक अंग्रेज़ी में लिखने के लिए भाशा बदलनी होगी। अभी भी प्रोग्रामिंग सीक्वेन्सेज़ के लिये ये करना ही होता है, पाइप यानि | लगाने के लिए भी यही करना पड़ता है। ये ही परेशान करता है। हां पढ़ने के लिए शायद अंग्रेज़ी अंक अधिक लोग पढ़ पायेंगे, किन्तु वे लोग फिर अंग्रेज़ी पाठ भी पढ़ सकते हैं, और अंततः अंग्रेज़ी विकी भी जा सकते हैं। अपनी समृद्ध भाषा को छोड़कर हम क्यों किसी दूसरी बैसाखी पर चलें, अन्यथा कुछ समय बाद भी किसी अन्य विखी में कोई उदाहरण दे रहा होगा, कि हां हिन्दी भाषा में भि अंक नहीं हैं, तभी हिन्दी विकी पर अम्घ्रेज़ी का प्रयोग होता है, जैसे कि ऊपर तमिल वाला उदा० दिया गया है।--आशीष भटनागर  वार्ता  १०:०९, ६ नवंबर २००९ (UTC)
लगता है इस विषय ने मुनिता जी को जरा ज्यादा ही उत्तेजित कर दिया इसलिए शायद उन्होंने 'अंग्रेजी विकि के द्वार खुले हैं' जैसे कठोर शब्दों का प्रयोग किया है। खैर, मुनिता जी, आपकी सलाह को मैने स्वीकार कर लिया है, अब आगे से वहीं काम करने का प्रयास करूंगा। वैसे, इतना जरूर कहना चाहूंगा कि एक प्रबंधन के लिए इतना दंभ दिखाना हिन्दी विकिपीडिया जैसी साइट पर, जहां आपको हर लेख पर मदद की जरूरत है, ठीक बात नहीं। धन्यवाद --Charu ११:२७, ६ नवंबर २००९ (UTC)
चारु जी! किसी भी सलाह, संदेश या अभिव्यक्ति से इतने भावुक न हों, और कोई ऐसा निर्णय न लें, जिससे हानि हिन्दी विकीपीडिया को और अन्ततः हम सभी को हो। शायद आपका भी मन वहां उतना न लगे। मुझसे भि बहुत से ऐसे वार्तालाप हुए हैं, लोंगों के जो इससे कहीं अधिक स्तर के थे, किन्तु मेरी कार्य शैली में कोई अंतर नहीं आया। इसी प्रकार आप भी इन सब बातों से ऊपर उठ कर सोचें, और हमारी संगति को अपने सान्निध्य का लाभ दें। हां प्रबंधकों को खासकर उन गणों को जो दूसरों को सभ्य रहने का निर्देश देते हों, इस प्रकार के शब्द अवश्य शोभा नहीं देते हैं, क्योंकि द्वार तो सभी के लिए समान खुले हैं। हमें तो चाहिये कि औरों को हिन्दी विकी का प्रवेशद्वार दिखायें।--आशीष भटनागर  वार्ता  १२:३०, ६ नवंबर २००९ (UTC)
आशीष जी का बहुत बहुत धन्यवाद सही रहा दिखाने के लिए परन्तु आपने अपनी बात बीच में डाल कर पूराने जख्मो को हरा ही किया है और कुछ नहीं। सही कहा आपने एवं चारू जी ने भी मुझे वाकई वो वाक्य प्रयोग नहीं करना चाहिए था। जिन्हें भी दुःख लगा हो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। सिद्धार्थ जी का विशेष धन्यवाद जिन्होंने इसको सही रूप में लिया। रोहित जी ने छोटी परन्तु बहुत ही सूंदर कहानी से सही बात कही उनका भी बहुत धन्यवाद।--Munita Prasadवार्ता ०४:५६, ७ नवंबर २००९ (UTC)
नमस्कार मुनिता जी, आप जैसे पुराने व सक्रिय विकिपीडिया उपयोगकर्ताओ से मुझे अभी बहुत सिखाना है व सहयोग लेना है, आप द्बारा कही गयी कोई भी बात का मैंने बुरा नहीं माना. हिंदी विकिपीडिया पर काम करने वाले सभी लोग एक परिवार के जैसे है वह मै इसका एक नया हिस्सा, तो फिर परिवारजन से मतभेद काहे का. श्याद चारू जी को ठेस पहुची, निवेदन है इन्हें समझाए व मनाये, मुझे ज्ञात हुआ वह यहाँ के एक निरंतर सदस्य है, उनको खोना हामारे लिए बड़ी शती होगी. धन्यवाद --सिद्धार्थ गौड़ १६:३२, ७ नवंबर २००९ (UTC)
हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है किन्तु अंक अंतर्राष्ट्रीय ही स्वीकारे गए हैं। कारण स्पष्ट है कि हिन्दी को अपंग बनाए रखो........ यह हमारे यहाँ की स्वार्थी राजनीति का परिचायक है। ...... परन्तु विकि पर जब यह निर्णय आप लोगों ने लिया कि अंक हिन्दी के ही प्रयुक्त होंगे..... सही मानिए कि ये निर्णय हिन्दी के लिए एक बड़ी क्रांतिकारी पहल हुई है...... इस पर अडिग रहिए ........ अरे ! जो हिन्दी सीखना या पढ़ना चाहेगा क्या वह मात्र नौ अंक नहीं सीख सकेगा ? ........ यदि कोई विकि पर हिन्दी की जगह अंग्रेजी अंकों के लिए आग्रह करता है तो कृपया उसे विनम्रता से अस्वीकार कर दें और व्यर्थ के तर्क और कुतर्क या वोटिंग में समय खाराब न करें, यह मेरा अनुरोध है जो विकि के हित में है।--आलोचक ०५:३९, ८ नवंबर २००९ (UTC)


[संपादित करें] मुख्य पृष्ठ शीर्षकों में विभक्त क्यों नहीं

मुख्य पृष्ठ संपादन अधिकार प्राप्त लोगों से मैं सचमुच जानना चाहता हूँ कि उस पर पहले से ही बने हुए लिंक

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आदि को शीर्षक (हेडिंग) के रूप में क्यों नहीं बदला जा सकता है? अनिरुद्ध  वार्ता  २१:३७, ७ नवंबर २००९ (UTC)


[संपादित करें] अनुक्रमणिका

[संपादित करें] शब्दों के बहाने भटकाव

हर जीवित भाषा में नए नए शब्द बनते रहते हैं परन्तु प्रचलन में वही शब्द स्वीकार्य होते हैं जिन्हे जन मानस या लोकमानस स्वीकारता है। बीस बिसवां भी ऐसा ही शब्द है। लेकिन ट्वेंटी-ट्वेंटी का स्थानापन्न नहीं हो सकता। "बिसवा" जैसे शब्द का प्रयोग लोक जीवन में दो रूप में होता है- एक तो भूमि की माप (एक बीघे में बीस बिसवा होते हैं, और दूसरा ब्राह्मणौं की उपजाति जैसे बीस बिसवा, आठ बिसवा का ब्राह्मण आदि......) इसलिए इस शब्द का प्रयोग क्रिकेट के लिए करना नितान्त बेमानी है। इसे कोई स्वीकार नहीं करेगा। दूसरी बात यह कि शब्द निर्माण सामूहिक रूप से होता है..... कोई व्यक्ति इसका निर्माता नहीं होता है पूरा समाज निर्माता होता है...... यही नए शब्दों के बनने व स्वीकार होने की प्रक्रिया होती है। आप लोग जिस तरह के तर्क और कुतर्क विकि पर लिख कर समय खराब कर रहे हैं वह ठीक नहीं है और भाषा विषयक अनुभव का अभाव इसके मूल में झलकता है। देबाशीष और अनुनाद दोनों विद्वान हैं पर अभी धैर्य की दोनों में कमी है, आप किसी शब्द को जोर देकर लोक जीवन में स्वीकृत नहीं करवा सकते हैं....... क्योंकि लोक मानव भाषा का डिक्टेटर होता है उसे जो शब्द ठीक लगता है उसी को स्वीकारता है और जो ठीक नहीं लगता है उसे एक झटके में अस्वीकार कर देता है। भाषा की पहचान उसके परसर्ग चिह्नों से होती है। यदि हिन्दी का विभक्ति चिह्न लगा है तो माना जाएगा कि उस शब्द विशेष का हिन्दीकरण कर लिया गया है। चाहे वह- रेल, स्टेशन, कालेज, तौलिया, चाकू जैसे विदेशी शब्द ही क्यों न हों प्रयोग के अनुसार ये सब हिन्दी के शब्द मान लिए गए हैं। अंग्रेजी शब्दों के लिए हिन्दी शब्द खोजना बहुत ही अच्छी बात है किन्तु किसी शब्द को स्वीकार कराने के लिए जोर देना वह भी इसलिए कि "अमुक शब्द मैंने गढ़ा है" उतनी ही बुरी बात है। इसलिए मेरी राय है कि शब्द गढ़ो और विकि पर लिख दो, किसने लिखा है, किसने गढ़ा है यह नाम मत दो ..... स्वीकार हो जाए तो बहुत अच्छा अन्यथा भूल जाइए उसे। कई बार जब किसी नए शब्द के साथ किसी का नाम आ जाता है तो उस व्यक्ति विशेष के प्रति दुराग्रह रखने वाले लोग विरोध करना शुरू कर देते हैं ...... इसीलिए लोकसाहित्य, लोकगीत, लोकशब्द अमर हैं क्योंकि उनका कोई ज्ञात रचयिता नहीं होता। विकि पर काम करने वाले बड़े हृदय के ही हो सकते हैं जैसे कि आप लोग हैं...... नहीं तो तमाम हिन्दी प्रेम का दम्भ भरने वाले अपनी जेबें भरने के चक्कर में दिन रात लगे हुए हैं..... विकि के लिए वे अपना समय खराब करना मूर्खता मानते हैं....... हाँ हिन्दी के लिए जो काम हो रहा है उसे अपने स्वार्थ में प्रचारित करके लाभ जरूर उठा रहे हें..... चाहे वे अशोक चक्रधर हों या अन्य कोई. ..... इसलिए आप जो कर रहे हैं वह बहुत त्याग का हिन्दी प्रेम है...... इसका वक्त मूल्यांकन करेगा।--आलोचक ०४:०४, ८ नवंबर २००९ (UTC)

आलोचक जी, आपकी अधिकांश बातें कमोबेश मानते हुए आपसे निम्नम्लिखित बिन्दुओं पर और प्रकाश डालने की प्रार्थना करता हूँ-

१) "शब्द निर्माण सामूहिक रूप से होता है..... कोई व्यक्ति इसका निर्माता नहीं होता है पूरा समाज निर्माता होता है" - कृपया इसकी व्याख्या कीजिये। मेरा मत इससे बहुत भिन्न है।

२) इतिहास में बहुत से शब्द गढ़े गये हैं। कभी इसके लिये कोई 'संगीति', 'महासभा' या 'कानफरेंस' बुलायी गयी हो तो कृपया बतायें

३) क्या व्यक्ति समाज से बाहर है? मेरा तो खयाल यह है कि एक-एक व्यक्ति मिलकर ही समाज बनता है। बड़े-बड़े काम समाज नहीं करता (गतानुगतिको लोक:) एक व्यक्ति या बहुत थोड़े व्यक्ति ही अच्छे-अच्छे कामों के मूल में होते हैं। मानव बोली का ही उदाहरण लें - क्या आपको लगता है कि एक दिन उस समय जीवित सारे स्त्री-पुरुषों ने 'एक-साथ' (समवेत) बोलना शुरू कर दिया होगा? ऐसा नहीं हुआ है जी। यही तो क्रमिक विकास (इवोलूशन) का सारांश है कि सब कुछ धीरी-धीरे, एक-एक करके, क्रमिक, सरल-से-जटिल, जड़-से-चेतन, एक-कोशिकीय से बहुकोशिकीय आदि करके हुआ है। -- अनुनाद सिंहवार्ता ०६:४७, ८ नवंबर २००९ (UTC)

[संपादित करें] Harihar Natu का अनुवाद

मैं अंग्रेजी विकिपीडिया से एक प्रयोक्ता हूँ| मुझे मिल गया है एक पृष्ठ नाम Harihar Natu है और मैं यहाँ उपयोगकर्ताओं के किसी भी अनुरोध करता हूं कि यह अंग्रेजी में अनुवाद करेगा| मुझे माफ कर के रूप में मैं ज्यादा हिंदी नहीं जानते हूँ| अंग्रेजी विकिपीडिया पर मेरा प्रयोक्ता नाम Srinivas है|

(English:I am a user on English Wikipedia and I have found a page on it named Harihar Natu and I would request any of the users on this wikipedia to translate that page into English. My username on English Wikipedia is Srinivas. Thank you,) Srinivas ०६:३०, ८ नवंबर २००९ (UTC)