भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

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भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस
Flag of the Indian National Congress.svg
दल अध्यक्ष सोनिया गांधी
संसदीय दल अध्यक्ष सोनिया गांधी
नेता लोकसभा प्रणब मुखर्जी
नेता राज्यसभा मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री
गठन 1885
गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन
लोकसभा मे सीटों की संख्या 205
राज्यसभा मे सीटों की संख्या 70
विचारधारा लोकलुभावनवाद
अल्पसंख्यक तुष्टिकरण
जनतांत्रिक समाजवाद
सामाजिक लोकतंत्र
प्रकाशन कांग्रेस संदेश
जालस्थल www.aicc.org.in
भारत की राजनीति
राजनैतिक दल
चुनाव

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत का एक राजनैतिक दल है। इस दल की स्थापना १८८५ में हुई थी। श्री ए ओ ह्यूम[1] नें इस दल की स्थापना की थी। इस दल की वर्तमान नेता श्रीमती सोनिया गांधी है। यह दल कांग्रेस संदेश का प्रकाशन करता है। इस दल का युवा संगठन, भारतीय युवा काँग्रेस है। २००४ के संसदीय चुनाव में इस दल को १०३ ४०५ २७२ मत (२६.७%, १४५ सीटें) मिले थे। [2]

अनुक्रम

इतिहास [संपादित करें]

स्वतंत्रता संग्राम [संपादित करें]

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना, 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिती के साथ 28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। इसके प्रथम महासचिव(जनरल सेक्रेटरी) ऐ ओ ह्यूम थे एवं कोलकता के वोमेश चंद्र बैनर्जी प्रथम पार्टी अध्यक्ष थे। अपने शुरुवाती दिनों में कॉंग्रेस का दृष्टिकोण एक कुलीन वर्गीय संस्था का था। इसके शुरुवाती सदस्य मुख्य रूप से बॉम्बे और मद्रास प्रैज़िडेनसी से थे। स्वराज का लक्ष्य सबसे पहले बाल गंगाधर तिलक ने अपनाया था।[3]

1907 में काँग्रेस में दो दल बन चुके थे, गरम दल एवं नरम दल। गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं बिपिन चंद्र पाल(जिन्हें लाल-बाल-पाल भी कहा जाता है) कर रहे थे। नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोज़शाह मेहता एवं दादा भाई नौरोजी कर रहे थे। गरम दल पूर्ण स्वराज की मांग कर रहा था परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने के बाद सन 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गए और होम रूल आंदोलन की शुरुवात हुई जिसके तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिए अधिराज्य अवस्था(डॉमिनियन स्टेटस) की मांग की जा रही थी।

परंतु 1916 में गांधी जी के भारत आगमन के साथ काँग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चम्पारन एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन समर्थन से अपनी पहली सफलताएँ मिली। 1919 में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गांधी जी कॉंग्रेस के महासचिव बने। गांधीजी के मार्गदर्शन में कॉंग्रेस कुलीन वर्गीय संस्था से बदलकर एक जनसमुदाय संस्था बन गयी। तद्पश्चात राष्ट्रीय नेताओं की एक नयी पीढ़ी आई जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरु, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस शामिल थे। गांधीजी के नेतृत्व में प्रदेश कॉंग्रेस कमिटीयों का निर्माण हुआ, कॉंग्रेस में सभी पदों के लिए चुनाव की शुरुवात हुई, कॉंग्रेस के भीतर सभी भेद-भाव हटाए गए एवं कार्यवाहियों के लिए भारतीय भाषाओं का प्रयोग शुरू हुआ। कॉंग्रेस ने कई प्रांतों में सामाजिक समस्याओं को हटाने के प्रयत्न किये जिसमें छुआ-छूत, पर्दा एवं शराबीपन शामिल थे। [4]

स्वतंत्र भारत [संपादित करें]

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के मुख्य राजनैतिक दलों में से एक रही है। इस दल के कई प्रमुख नेता भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गाँधी एवं राजीव गाँधी इसी दल से थे। कांग्रेस भारत की वर्तमान गठबंधन सरकार का मुख्य दल है, एवं वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इसी दल से हैं।

विवाद एवं आलोचना [संपादित करें]

  • अंग्रेजभक्ति : ए.ओ. ह्यूम द्वारा कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्यों को गहनता से विश्लेषित करने से सिद्ध होता है कि ह्यूम कांग्रेस की स्थापना के जरिए एक ऐसी संस्था चाहते थे जो अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों की हो। कांग्रेस की सदस्यता के लिए अंग्रेजी में निपुणता और ब्रिटिश सरकार के प्रति भक्ति अनिवार्य थी। अपनी स्थापना के शुरुआती २० वर्ष तक कांग्रेस पूरी तरह निष्क्रिय, ब्रिटिश शासन के प्रति समर्पित उदारवादियों की नीतियों पर चलती रही। यही वजह थी कि उस कालखण्ड में कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन को बढ़ाने या स्वतंत्रता को प्राप्त करने की दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। हालांकि इसी दौरान राष्ट्रवादी नेताओं के कांग्रेस में प्रवेश ने स्थितियों में बदलाव किया। परिणामस्वरूप वैचारिक स्तर पर कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई। लगभग दस वर्ष तक दो भागों में विघटित कांग्रेस पुन: १९१६ में गांधीजी के प्रयासों से एकजुट हुई। [5]
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी जी द्वारा प्रस्तावित नए दल के गठन और कांग्रेस को पूर्णत: समाप्त करने के प्रस्ताव को कांग्रेसी नेताओं ने नहीं माना।
  • भ्रामक इतिहास शिक्षा : सन्‌ १८५७ से १९४७ तक चले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक दलों, संगठनों, समूहों और व्यक्तियों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। यह सही है कि ९० वर्ष तक चले इस आंदोलन में कुछ दलों की भूमिका प्रमुख रही लेकिन इसका यह मतलब निकालना कि सिर्फ उन्हीं की वजह से या उनके संघर्ष से ही देश स्वतंत्र हुआ, पूरी तरह असत्य और उन लाखों देशप्रेमियों के साथ धोखा है जिन्होंने अपने प्राण तक इस देश को आजाद कराने के लिए गंवा दिए।
  • भारत का विभाजन
  • मुसलमानों का तुष्टीकरण
  • आपातकाल लगाना
  • १९८४ के सिख दंगे
  • बोफोर्स दलाली कांड
  • सांसद रिश्वत काण्ड (नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में)
  • वोट के बदले नोट कांड
  • २-जी स्पेक्ट्रम घोटाला
  • राष्ट्रमंडल खेल घोटाला (२०११)
  • विदेशी बैंकों में जमा काले धन को स्वदेश लाने की दिशा में कांग्रेस रोडे अटका रही है जबकि सरकार में होने के कारण उसका पुनीत कर्तव्य है कि वह खुद इस दिशा में पहल करे। इससे इस आशंका को बल मिल रहा है कि विदेशी बैंको में भ्रष्टाचार से कमाया धन जमा करने वालों में कांग्रेस के नामी नेताओ का भी नाम शामिल है।

कांग्रेस एवं उसकी की नीतियों का विरोध का इतिहास [संपादित करें]

समय-समय पर विभिन्न नेताओ ने कांग्रेस की नीतियों का विरोध किया और उसे हटाने के लिये संघर्ष किया। इनमें राममनोहर लोहिया का नाम अग्रणी है जो जवाहरलाल नेहरू के कट्टर विरोधी थे। इसके अलावा जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड फेका। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स दलाली कांड को लेकर राजीव गांधी को सत्त्ता से च्युत किया।

लोहिया का 'कांग्रेस हटाओ' आन्दोलन [संपादित करें]

डा. राम मनोहर लोहिया लोगों को आगाह करते आ रहे थे कि देश की हालत को सुधारने में कांग्रेस नाकाम रही है। कांग्रेस शासन नये समाज की रचना में सबसे बड़ा रोड़ा है। उसका सत्ता में बने रहना देश के लिए हितकर नहीं है। इसलिए डा. लोहिया ने नारा दिया, ‘कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ’।

1967 के आम चुनाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ। देश के 9 राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकारें गठित हो गईं। डा. लोहिया इस परिवर्तन के प्रणेता और सूत्राधार बने।

जेपी आन्दोलन [संपादित करें]

सन १९७४ में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये 'सम्पूर्ण क्रान्ति' का नारा दिया। आन्दोलन को भारी समर्थन मिला। इससे निपटने के लिये इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया। इसका विरोध हुआ। जनता पार्टी की स्थापना हुई। सन १९७७ में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह हारी।

विश्वनाथ प्रताप सिंह का 'भ्रष्टाचार-विरोधी' आन्दोलन [संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]

संदर्भ [संपादित करें]