भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
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महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी
गठन 26 दिसम्बर 1925
मुख्यालय नई दिल्ली, भारत
गठबंधन वाममोर्चा
लोकसभा मे सीटों की संख्या
1 / 545
राज्यसभा मे सीटों की संख्या
3 / 245
विचारधारा वामपंथी
प्रकाशन न्यू एज (अंग्रेजी),
मुक्ति संघर्ष (हिन्दी),
कालांतर (बंगाली),
जनयुगम दैनिक (मलयालम),
जनशक्ति दैनिक" (तमिल)
रंग लाल
विद्यार्थी शाखा ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन
युवा शाखा ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन
महिला शाखा नेशनल फ्रीडम ऑफ इंडियन वोमेन
श्रमिक शाखा ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस and भारतीय खेत मजदूर यूनियन
किसान शाखा ऑल इंडिया किसान सभा
जालस्थल communistparty.in
भारत की राजनीति
राजनैतिक दल
चुनाव

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) (अंग्रेज़ी: Communist Party of India) भारत का एक साम्यवादी दल है। इस दल की स्थापना 26 दिसम्बर 1925 को कानपुर नगर में हुई थी।[1] भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की स्थापना एम एन राय ने की। 1928 ई. में कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल ने ही भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की कार्य प्रणाली निश्चित की। इस दल के महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी है। यह भारत की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी है। चुनाव आयोग द्वारा इसे राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त है।

यह दल 'न्यू एज' (New Age) का प्रकाशन करता है। इस दल का युवा संगठन 'आल इंडिया यूथ फेडरेशन' है। २००४ के संसदीय चुनाव में इस दल को ५ ४३४ ७३८ मत (१.४%, १० सीटें) मिले। २००९ के संसदीय चुनाव में इस दल को मात्र ४ सीटें मिली। 2014 के संसदीय चुनाव में दल को मात्र 1 सीटें मिली।

परिचय एवं इतिहास[संपादित करें]

कम्युनिस्ट आंदोलन में भाकपा की स्थापना तिथि को लेकर कुछ विवाद है। ख़ुद भाकपा का मानना है कि उसका गठन 25 दिसम्बर 1925 को कानपुर में हुई पार्टी कांग्रेस में हुआ था। लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, जो 1964 में हुए पार्टी-विभाजन के बाद बनी थी, का मानना है कि पार्टी का गठन 1920 में हुआ था। माकपा के दावे के अनुसार भारत की इस सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 17 अक्टूबर 1920 को कम्युनिस्ट इंटरनैशनल की दूसरी कांग्रेस के तुरंत बाद हुआ था। बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि 1920 से ही पार्टी के गठन की प्रक्रिया चल रही थी और इस संबंध में कई समूह भी उभर कर सामने आये थे। लेकिन औपचारिक रूप से 1925 में ही पार्टी का गठन हुआ। इसके शुरुआती नेताओं में मानवेन्द्र नाथ राय, अबनी मुखर्जी, मोहम्मद अली और शफ़ीक सिद्दीकी आदि प्रमुख थे।

शुरुआती दौर में पार्टी की जड़ें मज़बूत करने की कोशिश में एम.एन. राय ने देश के दूसरे हिस्सों में सक्रिय कम्युनिस्ट समूहों से सम्पर्क किया। देश के कई शहरों में छोटे-छोटे कम्युनिस्ट समूह थे, लेकिन ये सभी भाकपा का अंग नहीं बने। 1920 और 1930 के दशक के दौरान पार्टी का संगठन कमज़ोर हालत में रहा। भाकपा के औपचारिक रूप से गठन होने से पहले ही अंग्रेजों ने कई सक्रिय कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ कानपुर बोल्शेविक षड़यंत्र के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया था। एम.एन. राय, एस.ए. डांगे सहित कई कम्युनिस्टों पर राजद्रोह के आरोप लगाये गये। इससे कम्युनिस्ट चर्चित हो गये और पहली बार भारत में आम लोगों को इनके बारे में पता चला। 20 मार्च 1929 को भाकपा से जुड़े बहुत से महत्त्वपूर्ण नेताओं को मेरठ षड़यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया। नतीजे के तौर पर पार्टी नेतृत्वविहीन हो गयी।

1933 में प्रमुख नेताओं के मेरठ षड़यंत्र केस से रिहा होने के बाद पार्टी का पुनर्गठन किया गया। इसकी केंद्रीय समिति बनी और 1934 में इसे कम्युनिस्ट इंटरनैशनल के भारतीय भाग के रूप में स्वीकार किया गया। 1934 में कांग्रेस के भीतर वामपंथी रुझान रखने वाले नेताओं ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) का गठन किया। इसके गठन के समय भाकपा के नेताओं ने इसे 'सामाजिक फ़ासीवाद' की संज्ञा दी। लेकिन कॉमिन्टर्न द्वारा उपनिवेशों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे दलों के प्रति दृष्टिकोण बदलने से भाकपा के कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण में भी बदलाव आया। अब भाकपा कांग्रेस की राजनीति को प्रगतिशील मानने लगी। इसके सदस्यों ने कांग्रेस की वामपंथी धारा अर्थात् सीएसपी की सदस्यता ग्रहण की। 1936-1937 के दौरान सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों के बीच में आपसी सहयोग काफ़ी बढ़ गया। जनवरी 1936 में सीएसपी की दूसरी कांग्रेस में यह थीसिस स्वीकार की गयी कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर एक संयुक्त भारतीय सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की आवश्यकता है। इसी तरह, सीएसपी की तीसरी कांग्रेस के बाद बनी राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति में कई कम्युनिस्टों को शामिल किया गया।

बहरहाल, यह नज़दीकी लम्बे समय तक नहीं चल पायी। 1940 में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में भाकपा ने 'प्रॉलिटेरियन पथ' शीर्षक से एक दस्तावेज़ जारी किया। इसमें युद्घ के कारण औपनिवेशिक राज्य की कमज़ोर हालत का हवाला देते हुए उसके ख़िलाफ़ सशस्त्र आंदोलन छेड़ने की बात की। भाकपा की इस इकतरफ़ा घोषणा से नाराज़ होकर सीएसपी ने कम्युनिस्ट सदस्यों को अपनी पार्टी से बाहर कर दिया। इस बीच, द्वितीय विश्व-युद्घ में सोवियत यूनियन और ब्रिटेन के संबंधों के अच्छे होने के कारण जुलाई, 1942 में इस पर लगी पाबंदी हटा दी गयी। इसने कांग्रेस की उपनिवेशवाद विरोधी रणनीति का विरोध करना शुरू कर दिया। इसने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की आलोचना की और सुभाष चंद्र बोस की तीखी निंदा की। इस दौर में भाकपा की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह भी रही कि उसने कांग्रेस के मजदूर संगठन आल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। भाकपा ने 1946 में हुए प्रांतीय चुनावों में भागीदारी की लेकिन इसे पूरे देश के 1585 प्रांतीय विधानसभा की सीटों में से कुल आठ सीटों पर जीत मिली।

अपने गठन के बाद से देश की आज़ादी तक भाकपा की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आये। इसने एक समय कांग्रेस और महात्मा गाँधी को प्रतिक्रियावादी की संज्ञा दी। फिर उनके साथ मिलकर काम भी किया और दुबारा उनसे अलग होकर उनकी राजनीति का विरोध किया। यह विरोध इस सीमा तक पहुँच गया कि उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के समय ब्रिटिश शासन का समर्थन कर डाला। इसके पीछे एक मुख्य कारण यह भी था कि भाकपा की राजनीति में भारतीय परिस्थितियों को कम अहमियत दी जाती थी। अधिकांश मौकों पर कम्युनिस्ट इंटरनैशनल या सोवियत यूनियन के निर्देशों ने पार्टी की रणनीति तय करने का काम किया। इसी कारण कई बार इसकी रणनीतियाँ उल्टी दिशा में आगे बढ़ीं।

इन गड़बड़ियों के बावजूद कांग्रेस के मज़दूर संगठन और देश के कुछ भागों में इसकी स्थिति काफ़ी मज़बूत हो गयी थी। बंगाल में हुए तेभागा आंदोलन और आंध्र प्रदेश में हुए तेलंगाना आंदोलन में भी कम्युनिस्टों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1946 में हुए तेभागा आंदोलन में बंगाल के जोतदारों ने इस बात के लिए संघर्ष किया कि उनके पास अपनी खेती के उत्पाद का दो-तिहाई भाग होना चाहिए। इस आंदोलन में भाकपा के किसान मोर्चे किसान सभा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। कुछ जगहों पर यह आंदोलन हिंसक भी हो गया। आंदोलन सफल रहा और राज्य की मुसलिम लीग सरकार ने यह कानून बनाया कि जमींदारों को कुल उत्पाद के एक- तिहाई से ज़्यादा हिस्सा नहीं दिया जाएगा। लेकिन यह कानून सही तरीके से लागू नहीं हुआ।

तेलंगाना आंदोलन हैदराबाद रजवाड़े में हुआ। यहाँ आंध्र महासभा के बैनर तले हैदराबाद के निज़ाम के ख़िलाफ़ पहले ही आंदोलन चल रहा था। आंध्र महासभा में कम्युनिस्टों की अच्छी-ख़ासी उपस्थिति थी। इन्होंने किसानों को निज़ाम और स्थानीय ज़मींदारों (जिन्हें 'देशमुख' के नाम से जाना जाता था) के ख़िलाफ़ जागरूक बनाया। नालगोंडा, वारंगल और खम्मम जिलों में किसानों ने कर्ज़ माफ़ी, बंधुआ मज़दूरी ख़त्म करने और भूमि पुनर्वितरण के लिए आंदोलन चलाया। यह आंदोलन 1945 में शुरू हुआ और 1946 आते-आते इसने काफ़ी ज़ोर पकड़ लिया। निज़ाम की सेनाओं और ज़मींदारों के लठैतों ने इसका क्रूरता से दमन किया। हज़ारों किसानों की हत्या कर दी गयी। लेकिन किसानों के सशस्त्र दस्तों ने जम कर इस दमन का मुकाबला किया। इन दस्तों का बहुत से गाँवों पर नियंत्रण हो गया और उन्होंने वहाँ भूमि सुधार की नीतियों पर अमल किया। 1948 तक उन्होंने 3,000 गाँवों की तकरीबन 16,000 वर्ग मील भूमि को मुक्त करा लिया और उसका गाँव के लोगों के बीच वितरण कर दिया। सितम्बर, 1948 में भारतीय सेना के दख़ल से निज़ाम के शासन का अंत हो गया। इसके बावजूद किसानों का विद्रोह जारी रहा। भारतीय सेना ने भी इसका हिंसक दमन किया। अन्ततः, 1951 में भाकपा द्वारा आधिकारिक रूप से यह आंदोलन वापस ले लिया गया। इसके बाद यह आंदोलन धीमा पड़ते हुए ख़त्म हो गया। तेभागा और तेलंगाना आंदोलन का भारतीय वामपंथ के इतिहास में काफ़ी महत्त्व है। इसने ज़मीनी स्तर पर कम्युनिस्टों के प्रभाव को दिखाया। वर्तमान में कम्युनिस्टों के सभी समूह इन आंदोलनों की विरासत का दावा करते हैं।

भारत की आज़ादी के समय आज़ादी और भारतीय राज्य की प्रकृति के बारे में भाकपा में गहन और रोचक वाद-विवाद हुआ। इसी कारण पार्टी ने संविधान सभा में भी भाग नहीं लिया। जब भारत को आज़ादी मिली उस समय पी.सी. जोशी भाकपा के महासचिव थे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सत्ता का हस्तांतरण वास्तविक है और नेहरू की सरकार से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वह साम्राज्यवाद-विरोधी ताकतों का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए उन्होंने आग्रह किया कि भाकपा को कांग्रेस के बारे में अपने विचारों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। लेकिन पार्टी के भीतर इसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। बी.टी. रणदिवे के नेतृत्व में एक ख़ेमे ने यह तर्क दिया कि भारत में जन-विद्रोह ज़ोर पकड़ रहा है। इसलिए भाकपा लोकतांत्रिक और समाजवादी चरणों को मिला कर पूरे राष्ट्र में मज़दूरों के सशस्त्र संघर्ष द्वारा सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर सकती है। पार्टी के भीतर कुछ लोगों ने तेलंगाना अनुभव की तुलना चीन में माओ के संघर्ष से की और भारतीय राज्य के ख़िलाफ़ लोक-युद्घ छेड़ने की वकालत की। इसे 'आंध्रा लाइन' कहा गया। 1948 की कलकत्ता कांग्रेस में रणदिवे लाइन की जीत हुई। लेकिन दूसरी ओर भारत में नेहरू सरकार द्वारा तेलंगाना आंदोलन के सशस्त्र दमन की इजाज़त देने और दूसरी ओर चीनी क्रांति के सफल होने के कारण पार्टी में 'आंध्रा लाइन' की स्थिति मज़बूत हो गयी। इसके चलते 1950 में आंध्र के नेता सी. राजेश्वर राव ने पार्टी का नेतृत्व सम्भाला। लेकिन पार्टी के भीतर पी.सी. जोशी ख़ेमे ने इस तरह के कदम को वामपंथी भटकाव की संज्ञा दी। इस ख़ेमे ने ‘आँख मूँदकर’ और कट्टर तरीके से चीनी रास्ते का अनुसरण करने की आलोचना की। जोशी ने नेहरू सरकार की देशी-विदेशी नीति का विश्लेषण करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि इसमें साम्राज्यवाद-विरोधी प्रवृत्ति है।

पार्टी के इस आंतरिक विवाद को सुलझाने के लिए पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता मास्को गये और वहाँ के कम्युनिस्ट पार्टी नेताओं से लम्बी चर्चा की। इसके बाद तीन दस्तावेज़ तैयार हुए। इन दस्तावेज़ों में यह स्पष्ट किया गया कि भारत एक निर्भर और अर्ध-औपनिवेशिक देश है और नेहरू सरकार ज़मींदारों, बड़े एकाधिकारवादी बूर्ज़्वा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हितों को पूरा कर रही है। भारतीय बूर्ज़्वा की प्रकृति स्पष्ट करते हुए यह कहा गया कि प्राथमिक रूप से साम्राज्यवादी बूर्ज़्वा पर निर्भर होने के बावजूद इसमें राष्ट्रवादी और अ-सहयोगी (नॉन- कोलैबॅरेटिव) तत्त्व मौजूद हैं। इसके बाद मध्यमार्गी नेता अजय घोष ने पार्टी की कमान सम्भाली। इस दौर में पार्टी ने भारत की आज़ादी को मान्यता दी और संविधान को स्वीकार करते हुए चुनावों में भाग लेने का फ़ैसला किया गया।

पहले आम चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बहुत शानदार नहीं माना जा सकता, लेकिन लोकसभा में 16 सीटों पर जीत हासिल करके यह मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाकपा ने ख़ासतौर पर संगठित क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों के बीच अपनी स्थिति मज़बूत करने पर ध्यान दिया। इसके मज़दूर संगठन ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की मज़दूरों के बीच में अच्छी पैठ थी। लेकिन उस समय देश की राजनीति में कांग्रेस और नेहरू के वर्चस्व को चुनौती देना मुश्किल था। फिर भी भाकपा ने कुछ राज्यों में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली। दूसरे आम चुनावों में फिर से कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन भाकपा की सीटों में भी बढ़ोतरी हुई। इन चुनावों में इसे 27 लोकसभा क्षेत्रों में जीत मिली। केरल में 1957 के विधानसभा चुनावों के बाद ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में भाकपा की सरकार बनी। यह विश्व की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार थी। लेकिन 1959 में नेहरू सरकार ने इसे बर्ख़ास्त कर दिया। इससे भाकपा के एक धड़े के भीतर नेहरू के प्रति काफ़ी नाराज़गी पैदा हो गयी। लेकिन इस समय भाकपा के कार्यकर्ता भ्रम की स्थिति में थे, क्योंकि नेहरू सरकार का सोवियत यूनियन के साथ काफ़ी अच्छा संबंध था। सोवियत पार्टी की यह अपेक्षा थी कि भाकपा नेहरू सरकार के प्रति नरम रवैया अपनाये। इस बीच अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी घटनाएँ घटीं जिसके कारण न सिर्फ़ अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट एकता प्रभावित हुई, बल्कि भाकपा का भी विभाजन हो गया।

साठ का दशक आते-आते तक सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच के संबंध ख़राब होने लगे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी पर आरोप लगाया कि वह संशोधनवादी हो कर मार्क्सवाद-लेनिनवाद के रास्ते से भटक चुकी है। इधर चीन और भारत के संबंध भी काफ़ी ख़राब हो गये। सीमा विवाद के कारण 1962 में भारत-चीन के बीच युद्घ भी हुआ। भाकपा के एक धड़े ने भारत सरकार की नीति का समर्थन किया। वहीं पार्टी के एक दूसरे धड़े ने यह दावा किया कि यह समाजवादी और पूँजीवादी राज्य के बीच टकराव है। असल में, भाकपा के इन धड़ों की रणनीति में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिस्टों के बीच चल रही तनातनी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। भाकपा के सोवियत समर्थक धड़े ने उस समय की सत्ताधारी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ सहयोग करने के विचार को आगे बढ़ाया। लेकिन भाकपा के एक दूसरे धड़े, जो आगे चलकर माकपा बनी, ने इसे 'वर्ग-सहयोग' के संशोधनवादी विचार की संज्ञा दी।

ग़ौरतलब है कि भारत के तीसरे आम चुनावों में भाकपा को 29 सीटों पर जीत मिली। भाकपा अब भी संसद में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन पार्टी के एक खेमे के भीतर यह विश्वास प्रबल हो गया था कि असल में नेहरू सरकार के प्रति ज़्यादा सख्त रवैया न रखने कारण ही भाकपा का प्रसार नहीं हो रहा है। एक समय के बाद यह टकराव काफ़ी बढ़ गया। 1964 में भाकपा का विभाजन हो गया और एक नयी पार्टी माकपा का उभार हुआ। भाकपा के कई जुझारू नेता मसलन नम्बूदरीपाद, ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत आदि माकपा में शामिल हो गये। इससे पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाकपा के आधार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। केरल में पार्टी के विभाजन के शुरुआती कुछ दशकों तक भाकपा का भी अच्छा-ख़ासा प्रभाव रहा। 1970-77 के बीच भाकपा ने कांग्रेस से गठजोड़ किया और उसके साथ मिलकर सरकार भी बनायी जिसमें भाकपा के सी. अच्युत मेनन राज्य के मुख्यमंत्री बने (4 अक्टूबर 1970-25 मार्च 1977)। इसके बाद, किसी राज्य में भाकपा को सत्ता में आने का मौका नहीं मिला। 1970-77 के दौर में कांग्रेस से गठजोड़ होने के कारण भाकपा ने इंदिरा गाँधी की कांग्रेस द्वारा लगाये गये आपातकाल का समर्थन किया। लेकिन अस्सी का दशक आते-आते माकपा ज़्यादा मज़बूत कम्युनिस्ट पार्टी बन गयी। देश के दूसरे कई भागों में भाकपा की अच्छी उपस्थिति रही, लेकिन कुछ क्षेत्रों में ज़्यादा मज़बूत उपस्थिति के कारण माकपा आगे निकल गयी। 1977 के बाद भाकपा ने माकपा और दूसरी छोटी कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ मिलकर वाम मोर्चे का गठन किया। व्यावहारिक तौर पर केरल सहित अधिकांश जगहों पर यह पार्टी माकपा के एक छोटे सहयोगी दल में बदल गयी। अधिकांश मौकों पर इसका प्रदर्शन वाम मोर्चे के प्रदर्शन पर निर्भर रहा।

नब्बे के बाद के दौर में भाकपा ने सेकुलर और ग़ैर-भाजपा, ग़ैर-कांग्रेस दलों की राजनीति को मज़बूती देने पर काफ़ी ध्यान दिया है। माकपा के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे के साथ मिलकर इसने कांग्रेस की नव-उदारवादी नीतियों का विरोध किया। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद किसी दल को बहुमत नहीं मिला। सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की सरकार लोकसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पायी। इसके बाद एच.डी. देवेगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी। भाकपा ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला लेते हुए इस सरकार में शामिल होने का फ़ैसला किया। यह फ़ैसला माकपा के फ़ैसले से काफ़ी अलग था जिसने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इस तरह वाम मोर्चे का भाग होते हुए भी इसने अपनी राजनीतिक स्वायत्ता प्रदर्शित की। संयुक्त मोर्चे की दोनों सरकारों (एच.डी. देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल) की सरकार में इसके नेता शामिल हुए और उन्होंने गृह मंत्रालय (इंद्रजीत गुप्त) और कृषि मंत्रालय (चतुरानन मिश्र) जैसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय सम्भाले। संयुक्त मोर्चे की सरकार के पतन के बाद केंद्र में राजग की सरकार बनी। इस सरकार के कार्यकाल (1998-2004) के दौरान भाकपा ने वाम मोर्चे के एक घटक के रूप में ज़िम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभायी। 2004 संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार को वाम मोर्चे ने समर्थन दिया। इसने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की यह सरकार अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अनुसार ही काम करे। इस दौरान भाकपा ने भी सरकार पर कई जनोन्मुखी कार्यक्रम अपनाने का दबाव बनाया। आमतौर प्रेक्षक यह मानते रहे हैं कि संप्रग-एक की सरकार के दौरान बने बहुत प्रगतिशील और जनोन्मुखी कानूनों के पीछे वाम मोर्चे के दबाव की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। 2008 में वाम मोर्चे ने संयुक्त राज्य अमेरिका से परमाणु समझौते के मुद्दे पर संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 2009 के आम चुनावों में वाम मोर्चे का प्रदर्शन 2004 के आम चुनावों की तुलना में काफ़ी ख़राब रहा। इसका कारण था कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के प्रदर्शन में आयी गिरावट। ख़ासतौर पर सिंगूर और नंदीग्राम जैसी जगहों में राज्य सरकार द्वारा ज़बरदस्ती भूमि अधिग्रहण की कोशिश और उसके विरोध का बल-प्रयोग द्वारा दमन करने जैसी घटनाओं ने वाम मोर्चे की छवि काफ़ी ख़राब की। इसका असर भाकपा के चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ा और इसे लोकसभा में 2004 की 10 की तुलना में सिर्फ़ 4 सीटों पर ही जीत मिली।

भाकपा की राजनीति की कई सीमाएँ अब स्पष्ट हो चुकी हैं : पहला, भाकपा ने वाम मोर्चे की राजनीति में ख़ुद का इस तरह समाहित कर लिया है कि कई गम्भीर मसलों पर भी इसने एक सीमा से ज़्यादा माकपा का विरोध नहीं किया है। सिर्फ़ कुछ मौकों पर ही इसने अपनी स्वायत्तता दिखाई है, लेकिन अधिकांश मसलों पर इसकी रणनीति वाम मोर्चे की रणनीति का भाग होती है। दूसरा, यद्यपि माकपा देश के तीन राज्यों में काफ़ी मज़बूत स्थिति में है, लेकिन भाकपा का विस्तार देश के दूसरे भागों में ज़्यादा रहा है। मसलन, बिहार, छत्तीसगढ़, और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी भाकपा की मज़बूत उपस्थिति रही है। लेकिन बिहार जैसे राज्यों में इसने अपना आधार काफ़ी हद तक खो दिया है, क्योंकि अब पहचान की राजनीति के सामने वह अपनी प्रासंगिकता साबित करने में नाकाम रही है। तीसरा, भाकपा दूसरे संसदीय वामपंथी दलों की तरह ही नये क्षेत्रों में अपना विस्तार करने में नाकाम रही है। यह एक तरह से ठहरी हुई पार्टी बन गयी है। या तो यह कुछ जगहों पर अपना आधार बचाने में सफल रही है, या उस आधार को भी खो रही है। नये क्षेत्रों में भाकपा का प्रसार नहीं हो रहा है। 1980 के बाद हुए लोकसभा के हर चुनाव में इसे 15 से कम सीटों पर ही जीत मिली। मसलन, 1980 के संसदीय चुनावों में 11, 1984 में 6, 1989 में 12, 1991 में 14, 1996 में 12, 1998 में 9, 1999 में 4, 2004 में 10 और 2009 में 4 सीटों पर जीत हासिल हुई। चौथा, यह भी आरोप लगाया जाता है कि भाकपा ने ज़मीनी स्तर पर संघर्ष की राजनीति से मुँह मोड़ लिया है। यद्यपि इस आलोचना को पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता, क्योंकि जिन क्षेत्रों में भाकपा का अस्तित्व है, वहाँ उसने राज्य दमन के ख़िलाफ़ काफ़ी संघर्ष किया है। मसलन, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में भाकपा ने राज्य प्रायोजित सलवा जुडूम अभियान का तीखा प्रतिरोध किया। पाँचवाँ, भाकपा की राजनीति की आलोचना का एक आधार यह भी रहा है कि इसने पूँजीवादी राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। अब यह राष्ट्रवादी रूपरेखा के भीतर ही काम कर रही है और पूँजीवादी राज्य को उखाड़ फेंकने जैसी रणनीति इसकी राजनीति का भाग नहीं है।

बहरहाल, इन आलोचनाओं के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय राजनीति में भाकपा के पास एक लम्बी विरासत है। भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति की अधिकांश धाराएँ इसी पार्टी से निकलीं। इसने संसदीय राजनीति मे वामपंथी दलों के बीच एकजुटता कायम करने के भी गम्भीर प्रयास किये हैं। इसकी कोशिश रही है कि भारत में ग़ैर-कांग्रेसी, ग़ैर-भाजपायी राजनीति को मज़बूती और आम लोगों के हितों को बढ़ावा मिले। भ्रष्टाचार जैसे आरोपों से भाकपा हर स्तर पर पूरी तरह से मुक्त रही है। असल में, भाकपा की मुख्य चुनौती यह है कि यह वाम मोर्चे का भाग होते हुए भी माकपा की ‘फ़ोटो कॉपी’ या छोटा सहयोगी होने से बचे और अपनी स्वायत्त राजनीति कायम करे। इसके अलावा, देश के विभिन्न भागों अपना प्रसार करना भी भाकपा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. समयांतर डैस्क (फ़रवरी 2013). "सिद्धांत और व्यवहार". समयांतर. http://www.samayantar.com/marxism-principles-and-practicality/. 
  • मनोरंजन मोहंती (1986) ‘आइडियॉलॅजी ऐंड स्ट्रैटेजी ऑफ़ कम्युनिस्ट मूवमेंट इन इण्डिया’,
  • थॉमस पैंथम और कैनेथ एल. ड्युश (सम्पा.), पॉलिटिकल थॉट इन मॉडर्न इण्डिया, सेज, नयी दिल्ली.
  • मोहन राम (1969), कम्युनिज़म : स्प्लिट विदिन अ स्प्लिट, विकास, नयी दिल्ली.
  • बिपन चंद्रा (1983), लेक्रट : अ क्रिटिकल अप्रेज़ल, विकास, नयी दिल्ली.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]