गोलमेज सम्मेलन (भारत)

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यह लेख आंग्ल-भारतीय गोलमेज सम्मेलन के बारे में है। डच-इन्डोनेशियाई गोलमेज सम्मेलन के लिए, डच-इन्डोनेशियाई गोलमेज सम्मेलन देखिये। गोलमेज के अन्य उपयोगों के लिए, कृपया गोलमेज (स्पष्टीकरण) देखें।

भारत में संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के लिए अंग्रेज़ सरकार द्वारा १९३०-३२ के बीच सम्मेलनों की एक श्रृंखला के तहत तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किये गए थे। ये सम्मलेन मई १९३० में साइमन आयोग द्वारा प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट के आधार पर संचालित किये गए थे। भारत में स्वराज, या स्व-शासन की मांग तेजी से बढ़ रही थी। १९३० के दशक तक, कई ब्रिटिश राजनेताओं का मानना था कि भारत में अब स्व-शासन लागू होना चाहिए। हालांकि, भारतीय और ब्रिटिश राजनीतिक दलों के बीच काफी वैचारिक मतभेद थे, जिनका समाधान सम्मलेनों से नही हो सका।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर १९३० - जनवरी १९३१)[संपादित करें]

पहले गोलमेज सम्मेलन का आधिकारिक तौर पर राजा वी जॉर्ज ने १२ नवम्बर १९३० को प्रारम्भ किया और इसकी अध्यक्षता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, रामसे मैकडॉनल्ड ने की। तीन ब्रिटिश राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व सोलह प्रतिनिधियों द्वारा किया गया। अंग्रेजों द्वारा शासित भारत से ५७ राजनीतिक नेताओं और रियासतों से १६ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। हालांकि, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और व्यापारिक नेताओं ने सम्मलेन में भाग नहीं लिया। उनमें से कई नेता नागरिक अवज्ञा आन्दोलन में भाग लेने के कारण जेल में थे।

सहभागी[संपादित करें]

  • मुस्लिम लीग: मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मोहम्मद शफी, आगा खान, मोहम्मद अली जिन्ना, मोहम्मद ज़फ़रुल्ला खान, ए के फजलुल हक.
  • हिंदू महासभा: बी एस मुंजे और एम. आर. जयकर
  • उदारवादी: तेज बहादुर सप्रू, सी. वाय. चिंतामणि और श्रीनिवास शास्त्री
  • सिख: सरदार उज्जल सिंह
  • केथोलिक (इसाई): ए. टी. पन्नीरसेल्वम
  • दलित वर्ग ("अछूत" लोग) : बी.आर.अम्बेडकर
  • रियासतें: अक़बर हैदरी (हैदराबाद के दीवान), मैसूर के दीवान सर मिर्ज़ा इस्माइल, ग्वालियर के कैलाश नारायण हक्सर, पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह, बड़ोदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ III, जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह, बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह, भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान, नवानगर के के. एस. रणजीतसिंहजी, अलवर के महाराजा जय सिंह प्रभाकर और इंदौर, रीवा, धौलपुर, कोरिया, सांगली और सरीला के शासक।

एक अखिल भारतीय महासंघ बनाने का विचार चर्चा का मुख्य बिंदु बना रहा। सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी समूहों ने इस अवधारणा का समर्थन किया। कार्यकारिणी सभा से व्यवस्थापिका सभा तक की जिम्मेदारियों पर चर्चा की गई और बी.आर. अम्बेडकर ने अछूत लोगों के लिए अलग से राजनीतिक प्रतिनिधि की मांग की।

दूसरा गोलमेज सम्मेलन (सितंबर - दिसंबर १९३१)[संपादित करें]

७ सितम्बर १९३१ को दूसरा सत्र प्रारम्भ हुआ। पहले गोलमेज सम्मलेन से दूसरा गोलमेज सम्मेलन तीन प्रकार से भिन्न था। दूसरे सम्मलेन के प्रारम्भ होने तक:

  • कांग्रेस प्रतिनिधित्व - गांधी-इरविन संधि की बदौलत इस सम्मेलन में कॉंग्रेस ने भी भाग लिया। भारत से महात्मा गांधी को आमंत्रित किया गया था और उन्होंने एकमात्र कॉँग्रेस प्रतिनिधि के रूप में सरोजिनी नायडू के साथ भाग लिया। इसके अलावा मदन मोहन मालवीय, घनश्याम दास बिरला, मोहम्मद इकबाल, सर मिर्ज़ा इस्माइल-मैसूर के दीवान, एस.के. दत्ता और सर सैयद अली इमाम ने भी भाग लिया। गांधीजी ने दावा किया कि एकमात्र कॉँग्रेस ही भारत का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करती है और अछूत लोग हिंदू लोग हैं और उन्हें "अल्पसंख्यक" के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए; और मुसलामानों या अन्य अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मतदाता अथवा अन्य किसी भी प्रकार के सुरक्षा उपाय नहीं होने चाहिए। अन्य भारतीय सहभागियों ने इन दावों को अस्वीकार कर दिया। गांधी-इरविन संधि के अनुसार, गाँधीजी को नागरिक अवज्ञा आंदोलन (सीडीएम) को बंद करने को कहा गया और यदि वे ऐसा करते हैं तो ब्रिटिश सरकार आपराधिक कैदियों को छोड़कर, अन्य कैदियों को मुक्त कर देगी। आपराधिक कैदियों से तात्पर्य उन कैदियों से था जिन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को मारा था। परिणामों से निराश और खाली हाथ, महात्मा गांधी भारत लौटे।
  • राष्ट्रीय सरकार - दो सप्ताह पूर्व लंदन में लेबर सरकार गिर गई थी। रामसे मैकडोनाल्ड अब कंजर्वेटिव पार्टी के प्रभुत्व वाली राष्ट्रीय सरकार की अध्यक्षता कर रहे थे।
  • वित्तीय संकट - सम्मेलन के दौरान, ब्रिटेन सरकार ने स्वर्ण मानक कि विनिमेयता रद्द कर दी जिससे राष्ट्रीय सरकार का ध्यान भी भंग हो गया।


सम्मेलन के दौरान, गांधीजी मुस्लिम प्रतिनिधित्व और सुरक्षा उपायों पर मुसलमानों के साथ कोई समझौता नहीं कर पाए। सम्मेलन के अंत में रामसे मैकडोनाल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के संबंध में एक सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की और उसमें यह प्रावधान रखा गया कि राजनीतिक दलों के बीच किसी भी प्रकार के मुक्त समझौते को इस निर्णय के स्थान पर लागू किया जा सकता है।

गांधी ने अछूतों को हिन्दू समुदाय से अलग एक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्ज़ा देने के मुद्दे का विशेष रूप से विरोध किया। उनका अछूतों के नेता बी.आर. अम्बेडकर के साथ इस मुद्दे पर विवाद हुआ। अंततः दोनों नेताओं ने इस समस्या का हल 1932 की पूना संधि द्वारा निकाला।

तीसरा गोलमेज सम्मेलन (नवंबर - दिसंबर १९३२)[संपादित करें]

तीसरा और अंतिम सत्र १७ नवम्बर १९३२ को प्रारम्भ हुआ। मात्र ४६ प्रतिनिधियों ने इस सम्मलेन में भाग लिया क्योंकि अधिकतर मुख्य भारतीय राजनीतिक प्रमुख इस सम्मलेन में मौजूद नहीं थे। ब्रिटेन की लेबर पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस सत्र में भाग लेने से इनकार कर दिया।

इस सम्मेलन में एक कॉलेज छात्र चौधरी रहमत अली ने विभाजित भारत के मुस्लिम भाग का नाम "पाकिस्तान" (जिसका अर्थ है "पवित्र भूमि") रखा। उसने पंजाब का 'पी' पंजाब, अफगान से 'ए', कश्मीर से 'कि', सिंध से "स" और बलूचिस्तान से "तान" लेकर यह शब्द बनाया। जिन्ना ने इस सम्मेलन में हिस्सा नही लिया।

सितंबर, १९३१ से मार्च, १९३३ तक, सैमुअल होअरे के पर्यवेक्षण में, प्रस्तावित सुधारों को लेकर प्रपत्र बनाया गया; जिसके आधार पर भारत सरकार का १९३५ का अधिनियम बना।

संदर्भ[संपादित करें]