भारत के राष्ट्रपति

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भारत के राष्ट्रपति या भारतीय राष्ट्रपति राष्ट्रप्रमुख और भारत के प्रथम नागरिक हैं, साथ ही भारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी हैं। सिद्धांतः राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है। पर कुछ अपवादों के अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं।

राष्ट्रपति को भारत के संसद के दोनो सदनों (लोक सभा और राज्य सभा) तथा साथ ही राज्य विधायिकाओं (विधान सभाओं) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा पाँच वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। पदधारकों को पुनः चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गई है। वोट आवंटित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल किया गया है ताकि हर राज्य की जनसंख्या और उस राज्य से विधानसभा के सदस्यों द्वारा वोट डालने की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों और राष्ट्रीय सांसदों के बीच एक समानुपात बनी रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत प्राप्त नहीं होती है तो एक स्थापित प्रणाली है जिससे हारने वाले उम्मीदवारों को प्रतियोगिता से हटा दिया जाता है और उनको मिले वोट अन्य उम्मीदवारों को तबतक हस्तांतरित होता है, जबतक किसी एक को बहुमत नहीं मिलती। उपराष्ट्रपति को लोक सभा और राज्य सभा के सभी (निर्वाचित और नामजद) सदस्यों द्वारा एक सीधे मतदान द्वारा चुना जाता है।

भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने हीं इस पद पर दो कार्यकाल पूरा किया है।

प्रतिभा पाटिल भारत की 12वीं तथा इस पद को सुशोभीत करने वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं। [1] उन्होंने 25 जुलाई, 2007 को पद व गोपनीयता की शपथ ली थी।

इतिहास[संपादित करें]

15 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था और अन्तरिम व्यवस्था के तहत देश एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य बन गया। इस व्यवस्था के तहत भारत के गवर्नर जनरल को भारत के राष्ट्रप्रमुख के रूप में स्थापित किया गया, जिन्हें भारत के अन्तरिम राजा - जॉर्ज VI द्वारा ब्रिटिश सरकार के बजाय भारत के प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त करना था।

यह एक अस्थायी उपाय था, परन्तु भारतीय राजनीतिक प्रणाली में साझा राजा के अस्तित्व को जारी रखना सही मायनों में संप्रभु राष्ट्र के लिए उपयुक्त विचार नहीं था। आजादी से पहले भारत के आखरी ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन हीं भारत के पहले गवर्नर जनरल बने थे। जल्द ही उन्होंने सी.राजगोपालाचारी को यह पद सौंप दिया, जो भारत के इकलौते भारतीय मूल के गवर्नर जनरल बने थे। इसी बीच डा. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में संविधान सभा द्नारा 26 नवम्बर 1949 को भारतीय सविंधान का मसौदा तैयार हो चुका था और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से संविधान को स्वीकार किया गया था। इस तारीख का प्रतीकात्मक महत्व था क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन से पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को आवाज़ दी थी। जब संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति का पद सभांला तो उसी समय गवर्नर जनरल और राजा का पद एक निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा प्रतिस्थापित हो गया।

इस कदम से भारत की एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य की स्थिति समाप्त हो गया। लेकिन यह गणतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहा। क्योंकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने तर्क किया की यदि कोई भी राष्ट्र ब्रिटिश सम्राट को "राष्ट्रमंडल के प्रधान" के रूप में स्वीकार करे पर ज़रूरी नहीं है की वह ब्रिटिश सम्राट को अपने राष्ट्रप्रधान की मान्यता दे, उसे राष्ट्रमंडल में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय था जिसने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नए-स्वतंत्र गणराज्य बने कई अन्य पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों के राष्ट्रमंडल में रहने के लिए एक मिसाल स्थापित किया।

राष्ट्रपति का चुनाव[संपादित करें]

भारत के राष्ट्पति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनीधित्व प्रणाली के एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा होत है

राष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक योग्यता[संपादित करें]

भारत का कोई नागरिक जिसकी उम्र 35 साल या अधिक हो वो एक राष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार हो सकता है। राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार को लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता होना चाहिए और सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए। परन्तु निम्नलिखित कुछ कार्यालय-धारकों को राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने की अनुमति दी गई है:

राष्ट्रपति पर महाभियोग[संपादित करें]

अनु 61 राष्ट्रपति के महाभियोग से संबंधित है भारतीय संविधान के अंर्तगत मात्र राष्ट्रपति महाभियोजित होता है अन्य सभी पदाधिकारी पद से हटाये जाते है। महाभियोजन एक विधायिका संबंधित कार्यवाही है वही पद से हटाना एक कार्यपालिका संबंधित कार्यवाही है। महाभियोजन एक कडाई से पालित किया जाने वाला औपचारिक कृत्य है यह संविधान का उल्लघंन करने पर ही होता है। यह उल्लघंन एक राजानैतिक कृत्य है जिसका निर्धारण संसद करती है। वह तभी पद से हटेगा जब उसे संसद मे प्रस्तुत किसी ऐसे प्रस्ताव से हटाया जाये जिसे प्रस्तुत करते समय सदन के ¼ सदस्यॉ का समर्थन मिले, प्रस्ताव पारित करने से पूर्व उस को 14 दिन पहले नोटिस दिया जायेगा, प्रस्ताव सदन की कुल संख्या के 2/3 से अधिक बहुमत से पारित होगा। फिर दूसरे सदन मे जाने पर इस प्रस्ताव की जाँच एक समिति के द्वारा होगी इस समय राष्ट्रपति अपना पक्ष स्वंय अथवा वकील के माध्यम से रख सकता है दूसरा स्दन भी उसे उसी 2/3 बहुमत से पारित करेगा। दूसरे सदन द्वारा प्रस्ताव पारित करने के दिन से राष्ट्रपति पद से हट जायेगा

अपने आप मे अर्द्ध न्यायिक कार्यवाही होगी।

राष्ट्रपति की शक्तियाँ[संपादित करें]

  • न्यायिक शक्तियाँ --- संविधान का 72 वा अनु राष्ट्रपति को न्यायिक शक्तियाँ देता है कि वह दंड का उन्मूलन ,क्षमा, आहरण, परिहरण, परिवर्तन कर दे यह शक्ति सैन्य न्यायालय द्वारा दी गई सजाऑ के विरूद्ध अथवा सजा दंड जो ऐसी विधि के विरूद्ध मिली हो जिसे संसद ने पारित किया हो। इस के प्रकार
  • क्षमादान -- किसी व्यक्ति को मिली संपूर्ण सजा तथा दोष सिद्धि और उत्पन्न हुई निर्योग्यताऑ को समाप्त कर देना
    तथा उसे उस स्थिति मे रख देना मानो उअस्ने कोई अपराध किया ही नही था

यह लाभ पूर्णतः अथवा अंशत मिलता है तथा सजा देने के बाद अथवा उससे पहले भी मिल सकती है

  • लघुकरण – दंड की प्रकृति कठोर से हटा कर नम्र कर देना उदाहरणार्थ सश्रम कारावास को सामान्य कारावास में बदल देना
  • परिहार --- दंड की अवधि घटा देना परंतु उस की प्रकृति नही बदली जायेगी
  • विराम--- दंड मे कमी ला देना यह विशेष आधार पर मिलती है जैसे गर्भवती महिला की सजा मे कमी लाना
  • प्रविलंबन ---- दंड प्रदान करने मे विलम्ब करना विशेषकर मृत्यु दंड के मामलॉ मे

राष्ट्रपति की क्षमाकारी शक्तियां पूर्णतः उसकी इच्छा पर निर्भर करती है उन्हें एक अधिकार के रूप मे मांगा नही जा सकता है। ये शक्तियां कार्यपालिका प्रकृति की है तथा राष्ट्रपति इनका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करेगा न्यायालय मे इन को चुनौती दी जा सकती है। इनक लक्ष्य दंड देने मे हुई भूल का निराकरण करना है जो न्यायपालिका ने कर दी हो। शेरसिंह बनाम पंजाब राज्य 1983 मे सुप्रीमकोर्ट ने निर्णय दिया की अनु 72, अनु 161 के अंतर्गत दी गई दया याचिका जितनी शीघ्रता से हो सके उतनी जल्दी निपटा दी जाये। राष्ट्रपति न्यायिक कार्यवाही तथा न्यायिक निर्णय को नही बदलेगा वह केवल न्यायिक निर्णय से राहत देगा याचिकाकर्ता को यह भी अधिकार नही होगा कि वह सुनवाई के लिये राष्ट्रपति के समक्ष उपस्थित हो
राष्ट्रपति की वीटो शक्तियां – विधायिका की किसी कार्यवाही को विधि बनने से रोकने की शक्ति वीटॉ शक्ति कहलाती है संविधान राष्ट्रपति को तीन प्रकार के वीटो देता है

  • 1 पूर्ण वीटो--- निर्धारित प्रकिया से पास बिल जब राष्ट्रपति के पास आये [संविधान संशोधन बिल के अतिरिक्त ] तो वह् अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति की घोषणा कर सकता है किंतु यदि अनु 368 के अंतर्गत कोई बिल आये तो वह अपनी अस्वीकृति नही दे सकता है यधपि भारत मे अब तक राष्ट्रपति ने इस वीटो का प्रयोग बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के नही किया है माना जाता है कि वह ऐसा कर भी नही सकता[ब्रिटेन मे यही पंरपंरा है जिसका अनुसरण भारत मे किया गया है]
  • 2 निलम्बनकारी वीटो---- संविधान संशोधन अथवा धन बिल के अतिरिक्त राष्ट्रपति को भेजा गया कोई भी बिल वह संसद को पुर्नविचार हेतु वापिस भेज सकता है किंतु संसद यदि इस बिल को वापिस पास कर के भेज दे तो उसके पास सिवाय इसके कोई विकल्प नही है उस बिल को स्वीकृति दे दे। इस वीटो को वह अपने विवेकाधिकार से प्रयोग लेगा।

इस वीटो का प्रयोग अभी तक संसद सद्स्यॉ के वेतन बिल भत्ते तथा पेंशन नियम संशोधन 1991 मे किया गया था यह एक वित्तीय बिल था राष्ट्रपति वेंकट रमण ने इस वीटो का प्रयोग इस आधार पर किया कि यह बिल लोकसभा मे बिना उनकी अनुमति के लाया गया था।

  • 3 पाकेट वीटो --- संविधान राष्ट्रपति को स्वीकृति अस्वीकृति देने के लिये कोई समय सीमा नही देता है यदि राष्ट्रपति किसी बिल पे कोई निर्णय ना दे [सामान्य न कि धन या संविधान संशोधन ] तो माना जायेगा कि उस ने अपने पाकेट वीटो का प्रयोग किया है यह भी उसकी विवेकाधिकार शक्ति के अन्दर आता है पेप्सू बिल 1956 तथा भारतीय डाक बिल 1984 मे राष्ट्रपति ने इस वीटो का प्रयोग किया था।

राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति[संपादित करें]

राष्ट्रपति संसद का अंग हैI कोई भी बिल बिना उसकी स्वीकृति के पास नही हो सकता अथवा सदन मे ही नही लाया जा सकता हैI

राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ[संपादित करें]

1. अनु 74 के अनुसार
2. अनु 78 के अनुसार प्रधान मंत्री राष्ट्रपति को समय समय पर मिल कर राज्य के मामलॉ तथा भावी विधेयक़ो के बारे मे सूचना देगा ,इस तरह अनु 78 के अनुसार राष्ट्रपति सूचना प्राप्ति का अधिकार रखता है यह अनु प्रधान मंत्री पे एक संवैधानिक उत्तरदायित्व रखता है यह अधिकार राष्ट्रपति कभी भी प्रयोग ला सकता है इसके माध्यम से वह मंत्री परिषद को विधेयक़ो निर्णयॉ के परिणामॉ की चेतावनी दे सकता है
3. जब कोई राजनैतिक दल लोकसभा मे बहुमत नही पा सके तब वह अपने विवेकानुसार प्रधानम्ंत्री की नियुक्ति करेगा
4. निलंबन वीटो/पाकेट वीटो भी विवेकी शक्ति है
5. संसद के सदनो को बैठक हेतु बुलाना
6. अनु 75 (3) मंत्री परिषद के सम्मिलित उत्तरदायित्व का प्रतिपादन करता है राष्ट्रपति मंत्री परिषद को किसी निर्णय पर जो कि एक मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से लिया था पर सम्मिलित रूप से विचार करने को कह सकता है
7. लोकसभा का विघटन यदि मंत्रीपरिषद को बहुमत प्राप्त नही है तो लोकसभा का विघटन उसकी विवेक शक्ति के दायरे मे आ जाता है
किसी कार्यवाह्क सरकार के पास लोकसभा का बहुमत नही होता इस प्रकार की सरकार मात्र सामन्य निर्णय ही ले सकती है ना कि महत्वपूर्ण निर्णय यह राष्ट्रपति निर्धारित करेगा कि निर्णय किस प्रकृति का है

संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की स्थिति[संपादित करें]

रामजस कपूर वाद तथा शेर सिंह वाद मे निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसदीय सरकार मे वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद मे है। 42, 44 वें संशोधन से पूर्व अनु 74 का पाठ था कि एक मंत्रिपरिषद प्रधान मंत्री की अध्यक्षता मे होगी जो कि राष्ट्रपति को सलाह सहायता देगी इस अनु मे यह नही कहा गया था कि वह इस सलाह को मानने हेतु बाध्य होगा या नही केवल अंग्रेजी पंरपरा के अनुसार माना जाता था कि वह बाध्य है। 42 वे संशोधन द्वारा अनु 74 का पाठ बदल दिया गया राष्ट्रपति सलाह के अनुरूप काम करने को बाध्य माना गया 44वें संशोधन द्वारा अनु 74 मे फिर बद्लाव किया गया अब राष्ट्रपति दी गयी सलाह को पुर्नविचार हेतु लौटा सकता है किंतु उसे उस सलाह के अनुरूप काम करना होगा जो उसे दूसरी बार मिली हो।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

Prasanjeet chakravarty

संदर्भ[संपादित करें]

Educational Video - भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एवं निर्वाचन प्रक्रिया

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]