भारत का उच्चतम न्यायालय

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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
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स्थापना २८ जनवरी १९५०
अधिकार क्षेत्र भारत
स्थान नई दिल्ली
निर्देशांक 28°37′20″N 77°14′23″E / 28.622237°N 77.239584°E / 28.622237; 77.239584Erioll world.svgनिर्देशांक: 28°37′20″N 77°14′23″E / 28.622237°N 77.239584°E / 28.622237; 77.239584
निर्वाचन पद्धति कार्यपालक निर्वाचन (योग्यता लागु)
प्राधिकृत भारतीय संविधान
निर्णय पर अपील हेतु भारत के राष्ट्रपति क्षमा (क्लीमेन्सी)/दण्ड पूर्ण
न्यायाधीश कार्यकाल ६५ वर्ष आयु
पदों की संख्या ३१
जालस्थल supremecourtofindia.nic.in
भारत के मुख्य न्यायाधीश
वर्तमान न्यायमूर्ति श्री एच॰ एल॰ दत्तू
कार्यारंभ २९ सितम्बर २०१४
मुख्य पद समाप्ति २६ दिसम्बर २०१५
भारत
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भारत का उच्चतम न्यायालय या भारत का सर्वोच्च न्यायालय भारत का शीर्ष न्यायिक प्राधिकरण है जिसे भारतीय संविधान के भाग ५, अध्याय ४ के तहत स्थापित किया गया है। भारतीय संघ की अधिकतम और व्यापक न्यायिक अधिकारिता उच्चतम न्यायालय को प्राप्त हैं। भारतीय संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय की भूमिका संघीय न्यायालय और भारतीय संविधान के संरक्षक की है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद १२४ से १४७ तक में वर्णित नियम उच्चतम न्यायालय की संरचना और अधिकार क्षेत्रों की नींव हैं। उच्चतम न्यायालय सबसे उच्च अपीलीय अदालत है जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के उच्च न्यायालयों के फैसलों के खिलाफ अपील सुनता है। इसके अलावा, राज्यों के बीच के विवादों या मौलिक अधिकारों और मानव अधिकारों के गंभीर उल्लंघन से सम्बन्धित याचिकाओं को आमतौर पर उच्च्तम न्यायालय के समक्ष सीधे रखा जाता है। भारत के उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को हुआ और उसके बाद से इसके द्वारा 24,000 से अधिक निर्णय दिए जा चुके हैं।

न्यायालय का गठन[संपादित करें]

28 जनवरी 1950, भारत के एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के दो दिन बाद, भारत का उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया। उद्घाटन समारोह का आयोजन संसद भवन के चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस भवन में किया गया था। इससे पहले सन् १९३७ से १९५० तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत की संघीय अदालत का भवन था। आज़ादी के बाद भी सन् १९५८ तक चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस ही भारत के उच्चतम न्यायालय का भवन था, जब तक कि 1958 में उच्चतम न्यायालय ने अपने वर्तमान तिलक मार्ग, नई दिल्ली स्थित परिसर का अधिग्रहण किया।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने भारतीय अदालत प्रणाली के शीर्ष पर पहुँचते हुए भारत की संघीय अदालत और प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति को प्रतिस्थापित किया था।

28 जनवरी 1950 को इसके उद्घाटन के बाद, उच्चतम न्यायालय ने संसद भवन के चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस में अपनी बैठकों की शुरुआत की। उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन (एस. सी. बी. ए.) सर्वोच्च न्यायालय की बार है। एस. सी . बी. ए. के वर्तमान अध्यक्ष प्रवीण पारेख हैं, जबकि के. सी. कौशिक मौजूदा मानद सचिव हैं।<[1]

उच्चतम न्यायालय परिसर[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय भवन के मुख्य ब्लॉक को भारत की राजधानी नई दिल्ली में तिलक रोड स्थित 22 एकड़ जमीन के एक वर्गाकार भूखंड पर बनाया गया है। निर्माण का डिजाइन केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के प्रथम भारतीय अध्यक्ष मुख्य वास्तुकार गणेश भीकाजी देवलालीकर द्वारा इंडो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में बनाया गया था। न्यायालय 1958 में वर्तमान इमारत में स्थानान्तरित किया गया। भवन को न्याय के तराजू की छवि देने की वास्तुकारों की कोशिश के अंतर्गत भवन के केन्द्रीय ब्लाक को इस तरह बनाया गया है की वह तराजू के केन्द्रीय बीम की तरह लगे। 1979 में दो नए हिस्से पूर्व विंग और पश्चिम विंग को १९५८ में बने परिसर में जोड़ा गया। कुल मिलकर इस परिसर में १५[2] अदालती कमरे हैं। मुख्य न्यायाधीश की अदालत, जो कि ने केन्द्रीय विंग के केंद्र में स्थित है सबसे बड़ा अदालती कार्यवाही का कमरा है। इसमें एक ऊंची छत के साथ एक बड़ा गुंबद भी है।

उच्चतम न्यायालय की संरचना[संपादित करें]

भारत का सर्वोच्च न्यायालय

अदालत का आकार[संपादित करें]

भारत के संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय के लिए मूल रूप से दी गयी व्यवस्था में एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों को अधिनियमित किया गया था और इस संख्या को बढ़ाने का जिम्मा संसद पर छोड़ा गया था। प्रारंभिक वर्षों में, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मामलों को सुनने के लिए उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ एक साथ बैठा करती थी। जैसे जैसे न्यायालय के कार्य में वृद्धि हुई और लंबित मामले बढ़ने लगे, भारतीय संसद द्वारा न्यायाधीशों की मूल संख्या को आठ से बढ़ाकर १९५६ में ग्यारह, 1960 में चौदह, 1978 में अठारह, 1986 में छब्बीस और 2008 में इकत्तीस तक कर दिया गया। न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है, वर्तमान में वे दो या तीन की छोटी न्यायपीठों (जिन्हें 'खंडपीठ' कहा जाता है) के रूप में सुनवाई करते हैं। संवैधानिक मामले और ऐसे मामले जिनमें विधि के मौलिक प्रश्नों की व्याख्या देनी हो, की सुनवाई पांच या इससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ (जिसे 'संवैधानिक पीठ' कहा जाता है) द्वारा की जाती है। कोई भी पीठ किसी भी विचाराधीन मामले को आवश्यकता पड़ने पर संख्या में बड़ी पीठ के पास सुनवाई के लिए भेज सकती है।[3]

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति[संपादित करें]

संविधान में 30 न्यायधीश तथा 1 मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान है। उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के परामर्शानुसार की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस प्रसंग में राष्ट्रपति को परामर्श देने से पूर्व अनिवार्य रूप से चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह से परामर्श प्राप्त करते हैं तथा इस समूह से प्राप्त परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति को परामर्श देते हैं।

अनु 124[2] के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह लेगा। वहीं अन्य जजों की नियुक्ति के समय उसे अनिवार्य रूप से मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी पडेगी
सर्वोच्च न्यायालय एडवोकेट्स आन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ वाद 1993 मे दिये गये निर्णय के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के जजों के तबादले इस प्रकार की प्रक्रिया है जो सर्वाधिक योग्य उपलब्ध व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सके। भारत के मुख्य न्यायाधीश का मत प्राथमिकता पायेगा। उच्च न्यायपालिका मे कोई नियुक्ति बिना उस की सहमति के नहीं होती है। संवैधानिक सत्ताओं के संघर्ष के समय भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करेगा। राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश को अपने मत पर फिर से विचार करने को तभी कहेगा जब इस हेतु कोई तार्किक कारण मौजूद होगा। पुनः विचार के बाद उसका मत राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होगा यद्यपि अपना मत प्रकट करते समय वह सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठम न्यायधीशों का मत जरूर लेगा। पुनःविचार की दशा मे फिर से उसे दो वरिष्ठम न्यायधीशों की राय लेनी होगी वह चाहे तो उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय के अन्य जजों की राय भी ले सकता है लेकिन सभी राय सदैव लिखित में होगी
बाद में अपना मत बदलते हुए न्यायालय ने कम से कम 4 जजों के साथ सलाह करना अनिवार्य कर दिया था । वह कोई भी सलाह राष्ट्रपति को अग्रेषित नहीं करेगा यदि दो या ज्यादा जजों की सलाह इसके विरूद्ध हो किंतु 4 जजों की सलाह उसे अन्य जजों जिनसे वो चाहे, सलाह लेने से नहीं रोकेगी।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ[संपादित करें]

  • व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  • कम से कम पांच साल के लिए उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या दो या दो से अधिक न्यायालयों में लगातार कम से कम पांच वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुका हो। अथवा
  • किसी उच्च न्यायालय या न्यायालयों में लगातार दस वर्ष तक अधिवक्ता रह चुका हो। अथवा
  • वह व्यक्ति राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होना चाहिए।

किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या फिर उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के एक तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।

कार्यकाल[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु ६५ वर्ष होती है। न्यायाधीशों को केवल (महाभियोग) दुर्व्यवहार या असमर्थता के सिद्ध होने पर संसद के दोनों सदनों द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव के आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।

पदच्युति[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों की राष्ट्रपति तब पदच्युत करेगा जब संसद के दोनों सदनों के कम से कम 2/3 उपस्थित तथा मत देने वाले तथा सदन के कुल बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव जो कि सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर लाया गया हो के द्वारा उसे अधिकार दिया गया हो। ये आदेश उसी संसद सत्र मे लाया जायेगा जिस सत्र मे ये प्रस्ताव संसद ने पारित किया हो। अनु 124[5] मे वह प्रक्रिया वर्णित है जिससे जज पदच्युत होते है। इस प्रक्रिया के आधार पर संसद ने न्यायधीश अक्षमता अधिनियम 1968 पारित किया था। इसके अंतर्गत

1. संसद के किसी भी सदन मे प्रस्ताव लाया जा सकता है। लोकस्भा मे 100 राज्यसभा मे 50 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है
2. प्रस्ताव मिलने पर सदन का सभापति एक 3 सदस्य समिति बनायेगा जो आरोपों की जाँच करेगी। समिति का अध्यक्ष सप्रीम कोर्ट का कार्यकारी जज होगा दूसरा सदस्य किसी हाई कोर्ट का मुख्य कार्यकारी जज होगा। तीसरा सदस्य माना हुआ विधिवेत्ता होगा। इसकी जाँच-रिपोर्ट सदन के सामने आयेगी। यदि इस मे जज को दोषी बताया हो तब भी सदन प्रस्ताव पारित करने को बाध्य नहीं होता किंतु यदि समिति आरोपों को खारिज कर दे तो सदन प्रस्ताव पारित नही कर सकता है।
अभी तक सिर्फ एक बार किसी जज के विरूद्ध जांच की गयी है। जज रामास्वामी दोषी सिद्ध हो गये थे किंतु संसद मे आवश्यक बहुमत के अभाव के चलते प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका था।

न्यायालय की जनसांख्यिकी[संपादित करें]

उच्चतम न्यायालय ने हमेशा एक विस्तृत क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को बनाए रखा है। इसमें धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक वर्गों से संबंधित न्यायाधीशों का एक अच्छा हिस्सा है। उच्चतम न्यायालय में नियुक्त होने वाली प्रथम महिला न्यायाधीश 1987 में नियुक्त हुईं न्यायमूर्ति फातिमा बीवी थीं। उनके बाद इसी क्रम में न्यायमूर्ति सुजाता मनोहर, न्यायमूर्ति रूमा पाल और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा का नाम आता है। न्यायमूर्ति रंजना देसाई, जो सबसे हाल ही में उच्चतम न्यायालय की महिला जज नियुक्त हुईं हैं, को मिलाकर वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में दो महिला न्यायाधीश हैं, उच्चतम न्यायालय के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब दो महिलायें एक साथ न्यायाधीश हों।
2000 में न्यायमूर्ति के. जी. बालकृष्णन दलित समुदाय से पहले न्यायाधीश बने। बाद में, सन् २००७ में वे ही उच्चतम न्यायालय के पहले दलित मुख्य न्यायाधीश भी बने। 2010 में, भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद सँभालने वाले न्यायमूर्ति एस. एच. कपाड़िया पारसी अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ[संपादित करें]

अनु 130 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली मे होगा परन्तु यह भारत मे और कही भी मुख्य न्यायाधीश के निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति की स्वीकृति से सुनवाई कर सकेगा
क्षेत्रीय खंडपीठों का प्रश्न- विधि आयोग अपनी रिपोर्ट के माध्यम से क्षेत्रीय खंडपीठों के गठन की अनुसंशा कर चुका है न्यायालय के वकीलॉ ने भी प्राथर्ना की है कि वह अपनी क्षेत्रीय खंडपीठों का गठन करे ताकि देश के विभिन्न भागॉ मे निवास करने वाले वादियॉ के धन तथा समय दोनॉ की बचत हो सके, किंतु न्यायालय ने इस प्रश्न पे विचार करने के बाद निर्णय दिया है कि पीठॉ के गठन से
1. ये पीठे क्षेत्र के राज नैतिक दबाव मे आ जायेगी
2. इनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट के एकात्मक चरित्र तथा संगठन को हानि पहुँच सकती है
किंतु इसके विरोध मे भी तर्क दिये गये है।

वर्तमान न्यायधीश[संपादित करें]

  1. न्यायमूर्ति श्री एच॰ एल॰ दत्तू -- मुख्य न्यायाधीश [1]
  2. न्यायमूर्ति श्री डी॰ के॰ जैन
  3. न्यायमूर्ति श्री जी॰ एस॰ सिंघवी
  4. न्यायमूर्ति श्री आफताब आलम
  5. न्यायमूर्ति श्री बलबीर सिंह चौहान
  6. न्यायमूर्ति श्री ए॰ के॰ पटनायक
  7. न्यायमूर्ति श्री टी॰ एस॰ ठाकुर
  8. न्यायमूर्ति श्री के॰ एस॰ पी॰ राधाकृष्णन
  9. न्यायमूर्ति श्री सुरिंदर सिंह निज्जर
  10. न्यायमूर्ति श्री स्वतंत्र कुमार
  11. न्यायमूर्ति श्री चंद्रमौली कुमार प्रसाद
  12. न्यायमूर्ति श्री हेमंत गोखले
  13. न्यायमूर्ति श्री ज्ञान सुधा मिश्रा
  14. न्यायमूर्ति श्री अनिल रमेश दवे
  15. न्यायमूर्ति श्री सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय
  16. न्यायमूर्ति श्री रंजना प्रकाश देसाई
  17. न्यायमूर्ति श्री जगदीश सिंह खेहर
  18. न्यायमूर्ति श्री दीपक मिश्रा
  19. न्यायमूर्ति श्री जस्ती चेलामेस्वर
  20. न्यायमूर्ति श्री एफ. एम. इब्राहिम कलीफुल्ला
  21. न्यायमूर्ति श्री रंगन गोगोई
  22. न्यायमूर्ति श्री मदन भीमराव लोकुर

भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश[संपादित करें]

  1. न्यायमूर्ति श्री एच. जे. कनिया
  2. न्यायमूर्ति श्री एम॰ पी॰ शास्त्री
  3. न्यायमूर्ति श्री मेहरचंद महाजन
  4. न्यायमूर्ति श्री बी॰ के॰ मुखरीजा
  5. न्यायमूर्ति श्री एस॰ आर॰ दास
  6. न्यायमूर्ति श्री बी॰ पी॰ सिन्हा
  7. न्यायमूर्ति श्री ए॰ के॰ सरकार
  8. न्यायमूर्ति श्री के॰ एन॰ वान्चू
  9. न्यायमूर्ति श्री एम॰ हिदायतुल्ला
  10. न्यायमूर्ति श्री जे॰ सी॰ शाह
  11. न्यायमूर्ति श्री एस॰ एम॰ सिकरी
  12. न्यायमूर्ति श्री एन॰ एन॰ रे
  13. न्यायमूर्ति श्री मिर्जा हमीदुल्ला बेग
  14. न्यायमूर्ति श्री वाई॰ वी॰ चंद्रचूड़
  15. न्यायमूर्ति श्री पी॰ एन॰ भगवती
  16. न्यायमूर्ति श्री आर॰ एस॰ पाठक
  17. न्यायमूर्ति श्री ई॰ एस॰ वेंकटरमैय्या
  18. न्यायमूर्ति श्री एस॰ मुखर्जी
  19. न्यायमूर्ति श्री रंगनाथ मिश्र
  20. न्यायमूर्ति श्री के॰ एन॰ सिंह
  21. न्यायमूर्ति श्री एम॰ एच॰ कनिया
  22. न्यायमूर्ति श्री एल॰ एम॰ शर्मा
  23. न्यायमूर्ति श्री एम॰ एन॰ वेंकटचेलैय्या
  24. न्यायमूर्ति श्री ए॰ एम॰ अहमदी
  25. न्यायमूर्ति श्री जे॰ एस॰ वर्मा
  26. न्यायमूर्ति श्री एम॰ एम॰ पुंछी
  27. न्यायमूर्ति श्री ए॰ एस॰ आनंद
  28. न्यायमूर्ति श्री एस॰ पी॰ भरुचा
  29. न्यायमूर्ति श्री बी॰ एन॰ कृपाल
  30. न्यायमूर्ति श्री जी॰ बी॰ पटनायक
  31. न्यायमूर्ति श्री वी॰ एन॰ खरे
  32. न्यायमूर्ति श्री राजेन्द्र बाबू
  33. न्यायमूर्ति श्री आर॰ सी॰ लहोटी
  34. न्यायमूर्ति श्री योगेश कुमार सभरवाल
  35. न्यायमूर्ति श्री के॰ जी॰ बालकृष्णन
  36. न्यायमूर्ति श्री एस॰ एच॰ कपाड़िया
  37. न्यायमूर्ति श्री अल्तमस कबीर
  38. न्यायमूर्ति श्री राजेंद्र मल लोढ़ा [2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

यह भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]