मदनमोहन मालवीय

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मदन मोहन मालवीय
१८६१-१९४३
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मदन मोहन मालवीय
जन्मस्थल : इलाहाबाद
मृत्युस्थल: इलाहाबाद
आन्दोलन: भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
प्रमुख संगठन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता महामना पंडित मदन मोहन मालवीय इस युग के आदर्श पुरुष थे। अपने जीवन-काल में पत्रकारिता, वकालत, समाज-सुधार, मातृ-भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिए तैयार करने की थी, जो देश का मस्तक गौरव से ऊचा कर सकें। यह द्रष्टव्य है कि महामना मालवीय सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति तथा आत्म-त्याग में इस देश में अद्वितीय स्थान रखते थे। इस बात को दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि उपर्युक्त समस्त आचरण पर महामना सदैव उपदेश ही नहीं देते थे, परन्तु उसका सर्वथा पालन भी किया करते थे। अपने व्यवहार में महामना सदैव मृदुभाषी रहे। कर्म ही उनका जीवन था। ढेर सारी संस्थाओं के जनक एवं सफल संचालक के रूप में उनकी विधि-व्यवस्था का सुचारू सम्पादन करते हुए भी रोष अथवा कड़ी बोली का प्रयोग कभी नहीं किया।

अनुक्रम

[संपादित करें] परिचय

मदनमोहन मालवीय हृदय की महानता के कारण संपूर्ण भारत में 'महामना' के नाम से संपूजित मालवीय जी को संसार में सत्य, दया और न्याय पर आधारित सनातनधर्म सर्वाधिक प्यारा था। करुणामय हृदय, भूतानुकंपा, मनुष्यमात्र में अद्वेष, शरीर मन और वाणी के संयम, धर्म और देश के लिये सर्वस्व त्याग, उत्साह और धैर्य, नैराश्यपूर्ण परिस्थितियों मे आत्मविश्वासपूर्वक दूसरों को असंभव प्रतीत होनेवाले कर्मों का संपादन, वेशभूषा और आचार विचार में मालवीय जो भारतीय संस्कृति के प्रतीक तथा ऋषियों के प्राणवान्‌ स्मारक थे।

'सिर जाय तो जाय प्रभु मेरो धर्म न जाय' मालवीय जी का जीवन्व्रात था जिससे उनका वैयक्तिक और सार्वजनिक जीवन समान रूप से प्रभावित था। यह आर्दश उन्हें बचपन में पितामह प्रेमघर चतुर्वेदी के, जिन्होंने 108 दिन में निरंतर 108 बार श्रीमद्भागवत का परायण किया था, राधाकृष्ण की अनन्य भक्ति, और पिता ब्रजनाथ के भागवती कथा द्वारा धर्मप्रचार एवं माता मूनादेवी के दुखियों की सेवा में प्रत्यक्ष मिला, तथा धनहीन किंतु निर्लोभी परिवार में पलते हुए देश की दरिद्रता तथा अर्थार्थी छात्रों के कष्टनिवारण का स्वभाव एवं उनके जीवन में ओतप्रोत, आचार विचारों का निर्माण हुआ जिससे रेल में, जेल में, जलयान में भी सांयप्रात: संध्योपासना तथा श्रीमद्भागवत और महाभारत का स्वाध्याय उनके जीवन का अभिन्न अंग बना रहा।

मालवीय जी ने प्रयाग की धर्मज्ञानोपदेश तथा विद्या-धर्म-प्रवर्द्धिनी पाठशालाओं में संस्कृत का अध्ययन समाप्त करके म्योर सेंट्रल कालेज से 1884 ई0 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की बी0 ए0 की उपाधि ली। इस बीच उन्होंने अखाड़े के व्यायाम, और सितार पर शास्त्रीय संगीत की वह बराबर शिक्षा देते और साठ वर्ष की अवस्था तक व्यायाम करते रहे।

सात वर्ष के मदनमोहन को धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला के देवकीनंदन मालवीय माघ मेले में ले जाकर मोढ़े पर खड़ा करके व्याख्यान दिलाते थे। क्या आश्चर्य कि कांग्रेस केश् द्वितीय अधिवेशन में अंग्रेजी के प्रथम भाषण से ही प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर देने वाले 'सिलवर टंग्ड' मालवीय देश के सर्वश्रेष्ठ हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के व्याख्यान वाचस्पतियों में इतने प्रसिद्ध हुए। हिंदूधर्मोपदेश, मंत्रदीक्षा और सनातन धर्म प्रदीप ग्रथों में उनके धार्मिक विचार उपलब्ध हैं जो उनके देश की विभिन्न समस्याओं पर बड़ी कौंसिल से लेकर असंख्य सभा सम्मेलनों के हजारों व्याख्यानों में भावी पीढ़ियों के उपयोगार्थ प्रेरणा और ज्ञान का अमित भंडार सुरक्षित है। उनके बड़ी कौंसिल में रौलट बिल के विरोध में निरंतर साढ़े चार और अपराध निर्मोचन ( Indemnity) बिल पर पाँच घंटे के भाषण निर्भयता और गंभीरतापूर्ण दीर्घवक्तृता के लिए स्मरणीय हैं। उनके उद्घर्षण में ह्दय को स्पर्श करके रुला देने की क्षमता थी, परंतु वे अविवेकपूर्ण कार्य के लिये श्रोताओं को कभी उसकाते नहीं थे।

म्योर कालेज के मनसी गुरु महामहोपाध्याय पं0 आदित्यराम भट्याचार्य के साथ 1880 ई0 में स्थापित 'हिंदुसमाज' में मालवीय जी भाग ले ही रहे थे कि इन्हीं दिनों प्रयाग में वाइसराय लार्ड रिपन का आगमन हुआ, जो स्थानीय स्वायत्त शासन स्थापित करने के कारण भारतवासियों में जितने लोकप्रिय थे उतने ही अंग्रेजों के कोपभाजन जिससे प्रिसिपल हैरिसन ने उनका स्वागत संगठित करकेश् मालवीय जी ने प्रयाग वासियों के ह्दय में स्थान बना लिया।

कालाकाँकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर मालवीय जी ने उनके हिंदी अंग्रेजी हिन्दुस्तान का 1887 से संपादन करके दो ढाई साल तक जनता को जगाया। उन्होंने कांग्रेस के नेता पं0 अयोध्यानाथ का उनके इंडियन ओपीनियन के संपादन में भी हाथ बँटाया और 1907 ई0 में साप्ताहिक अभ्युदय को निकालकर कुछ समय तक संपादित किया, एवं सरकार समर्थक पायोनियर के समकक्ष 1909 में दैनिक लीडर को निकालकर लोकमत निर्माण का महान्‌ साधन जुटाया तथा दूसरे वर्ष मर्यादा पत्रिका भी प्रकाशित कराई। बाद में उन्होंने 1924 ई0 में दिल्ली के हिंदुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया तथा सनातन धर्म और लाहौर से विश्वबंध, पत्रों को प्रकाशित कराया।

हिंदी के उत्थान में मालवीय जी की भूमिका ऐतिहासिक है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के नेतृत्व में हिंदी गद्य के निर्माण में संलग्न मनीषियों में 'मकरंद' तथा 'झक्कड़सिंह' के उपनाम से विद्यार्थी जीवन में रसात्मक काव्यरचना के लिये ख्यातिलब्ध मालवीय जी ने देवनागरी लिपि और हिंदी भाषा की पश्चिमोत्तर प्रदेश व अवध के गवर्नर सर एंटोनी मैकडोनेल के सम्मुख 1898 ई0 में विविध प्रमाण प्रस्तुत करके कचहरियों में प्रवेश कराया। हिंदी साहित्यक संमेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी 1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिंदी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि 'उसे फारसी अरबी के बड़े बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूँथना भी अच्छा नहीं और भविष्यवाणी की कि एक दिन यह भाषा राष्ट्रभाषा हो सकेगी'। सम्मेलन के अधिवेशन (बंबई1919) के सभापतिपद से उन्होंने हिंदी उर्दू के प्रश्न को, धर्म का नहीं, राष्ट्रीयता का प्रश्न बतलाते हुए उद्घोष किया कि साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा द्वारा ही हो सकती है। और समस्त देश की प्रांतीय भाषाओं के विकास के साथ-साथ हिंदी को अपनाने के आग्रह के साथ इस भविष्यवाणी से कि 'कोई दिन आवेगा कि जिस भाँति अंग्रेजी जगत भाषा हो रही है उसी भाँति हिंदी का भी सार्वत्रिक प्रचार होगा' हिंदी जगत को अंतरराष्ट्रीय रूप का लक्ष्य दिया।

कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीय जी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता,1886 ) से लेकर अपनी अंतिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया। उसके प्रथम उत्थान में नरम और गरम दलों के बीच की कड़ी मालवीय जी गाँधी युग की कांग्रेस में हिंदू मुसलमानों एवं उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। एनी बेसेंट ने ठीक कहा था कि 'मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीय जी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं'। असहयोग आंदोलन के आरंभ तक नरम दल के नेताओं के कांग्रेस को छोड़ देने पर मालवीय जी उसमें डटे रहे और कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित करके सम्मानित किया -- लाहौर 1909, दिल्लीश् 1918 और 1931 तथा कलकत्ता 1933 - यद्यपि अंतिम दोनों बार वे सत्याग्रह के कारण पहले ही गिरफ्तार कर लिये गए। स्वतंत्रता के लिये उनकी तड़प और प्रयासों के परिचायक फैजपुर कांग्रेस (1936 ) में 'राष्ट्रीय सरकार और चुनाव प्रस्ताव के समर्थन में मालवीय जी के ये शब्द स्मरणीय हैं कि मैं पचास वर्ष से कांग्रेस के साथ हूँ। संभव है, मैं बहुत दिन न जिऊँ और अपने जी में यह कसक लेकर मरूँ कि भारत अब भी पराधीन है। किंतु फिर भी मैंश् आशा करता हूँ कि मैं इस भारत को स्वतंत्र देख सकूँगा'।

असहयोग आंदोलन की चतु:सूत्री में शिक्षासंस्थाओं के बहिष्कार का मालवीय जी ने विरोध किया और उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से हिंदू विश्वविद्यालय पर उसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। 1921 ई0 में कांग्रेस के नेताओं तथा स्वयंसेवकों से जेल भर जाने पर किंकर्तव्यविमूढ़ वाइसराय लॉर्ड रीडिंग को प्रांतों में स्वशासन देकर गांधी जी से संधि कर लेने को मालवीय जी ने सहमत कर लिया था परंतु 4 फरवरी, 1922 के चौरीचौरा कांड ने इतिहास को पलट दिया; गांधी जी ने बरदौली की कार्यकारिणी में सत्याग्रह को रोक दिया, और कांग्रेसजनों में असंतोष फैला कि बड़ील भाई के कहने में आकर गांधी जी ने भयंकर भूल की। गांधी जी भी पाँच साल के लिये जेल भेज दिए गए और चिलचिलाती धूप में बूढ़े मालवीय ने पेशावर से डिब्रूगढ़ तक तूफानी दौरा करके राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा। इस भ्रमण में उन्होंने बहुत बार कुख्यात धारा 144 का उल्लंघन किया जिसे सरकार पी गई। किंतु 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सरकार ने उन्हें बंबई में गिरफ्तार किया जिसकी महत्ता पर श्री भगवानदास (भारतरत्न ) ने कहा कि मालवीय जी का पकड़ा जाना राष्ट्रीय यज्ञ की पूर्णाहुति समझनी चाहिए। उसी साल दिल्ली में अवैध घोषित कार्यसमिति की बैठक में मालवीय जी को बंदी करके नैनी जेल भेज दिया गया जो उनकी जीवनचर्या तथा वृद्धावस्था के कारण यथार्थ तप था। परंतु सैद्धांतिक मतभेद के कारण हिंदु विश्वविद्यालय में प्रिंस ऑव वेल्स का स्वागत, कांग्रेस स्वराज्य पार्टी के समकक्ष कांग्रेस स्वतंत्र दल एवं रैमजे मैकडॉनल्ड के सांप्रदायिक निर्णय पर, जिसकी स्वीकृति को मालवीय जी ने राष्ट्रीय आत्महत्या माना, कांग्रेस कीश् न स्वीकृति न अस्वीकार नीति के कारण निर्णय विरोधी सम्मेलन और राष्ट्रीय कांग्रेस दल का संगठन उनके कांग्रेस विरोध के उदाहरण भी उल्लेखनीय हैं।

सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति की रक्षा और संवर्धन में मालवीय जी का योगदान अनन्य है। जनबल तथा मनोबल में नित्यश: क्षीयमान हिंदू जाति को विनाश से बचाने के लिये उन्होंने हिंदू संगठन का शक्तिशाली आंदोलन चलाया और स्वयं अनुदार सहधर्मियों के तीव्र प्रतिवाद झेलते हुए कलकत्ता, काशी, प्रयाग और नासिक में भंगियों को धर्मोपदेश और मंत्रदीक्षा दी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रनेता मालवीय जी ने, जैसा पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, अपने नेतृत्वकाल में हिंदु महासभा को राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रखा, और अनेक बार धर्मो के सहअस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया।

प्रयाग के भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिंदू छात्रालय और मिंटो पार्क के जन्मदाता, बाढ़, भूकंप, सांप्रदायिक दंगों और मार्शल ला इत्यादि के दु:खियों के आँसू पोछनेवाले मालवीय जी को ऋषिकुल हरिद्वार,गोरक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति ब्वॉय स्काउट तथा अन्य कई संस्थाओं को स्थापित अथवा प्रोत्साहित करने का श्रेय है, किंतु उनका अक्षय-र्कीति-स्तंभ काशी हिंदु विश्वविद्यालय है जिसमें उनकी विशाल बुद्धि और संकल्प, देशप्रेम और क्रियाशक्ति तथा तप और त्याग मूर्तिमान हैं। विश्वविद्यालय के उद्देश्यों हिंदू समाज और संसार के हित के लिये भारत की प्राचीन सभ्यता और महत्ता की रक्षा और संस्कृत विद्या के विकास और पाश्चात्य विज्ञान के साथ भारत की विविध विद्याओं और कलाओं की शिक्षा को प्राथमिकता दी गई। उसके विशाल तथा भव्य भवनों एवं विश्वनाथ मंदिर में भारतीय स्थापत्य कला के अलंकरण भी मालवीय जी के आदर्श के ही फ ल हैं।

[संपादित करें] संदर्भ ग्रंथ

  • महमना पं0 मदनमोहन मालवीय : जीवनचरित्‌ : 75 वीं वर्षगाँठ का अभिनंदन ग्रंथ 1936 (मालवीय जीवन चरित समिति, काशी ),
  • जवाहरलाल नेहरू : ऐन आटोबायोग्रैफी ( रिबॉडले हेड लंदन )
  • महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ( संस्मरण ) 1957 चंद्रबली त्रिपाठी, ( प्र0 दुर्गावती त्रिपाठी, मदन मोहन मालवीय मार्ग,बस्ती ),
  • इंडिया विंस फ्रीडम : मौलाना अबुल कलाम आजाद, 1959, ओरिएंट लॉगमैंस लिमिटेड कलकत्ता,
  • नेहरू जी अपनी ही भाषा में, 1962, रामनारायण चौधरी ( नवजीवन प्रकाशन मंदिर अहमदाबाद-14)

[संपादित करें] इन्हें भी देखें

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