गांधीवाद

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गांधीवाद मोहनदास करमचंद गांधी (जिन्हे ज्यादातर महात्मा गांधी के नाम से जाना जाता है) के आदर्शों, विश्वासों एवं दर्शन से उदभूत विचारों के संग्रह को कहा जाता है, जो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बडे राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेताओं में से थे। यह ऐसे उन सभी विचारों का एक समेकित रूप है जो गांधीजी ने जीवन पर्यंत जिया एवं किया था। जब किसी व्यक्ति या संस्थान को गांधीवादी कहकर संबोधित करते हैं तो उसका तात्पर्य होता है गांधीजी द्वारा स्थापित मूल्यों एवं आदर्शों का अनुपालन करनेवाला होता है।

सत्याग्रह[संपादित करें]

सत्य एवं आग्रह दोनो ही संस्कृत भाषा के शब्द हैं, जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान प्रचलित हुआ था, जिसका अर्थ होता है सत्य के प्रति सत्य के माध्यम से आग्रही होना।

सत्य[संपादित करें]

गांधीजी का कहना था “मेरे पास दुनियावालों को सिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं है। सत्य एवं अहिंसा तो दुनिया में उतने ही पुराने हैं जितने हमारे पर्वत हैं।”[तथ्य वांछित] गांधीवाद के बुनियादी तत्वों में से सत्य (जिसका अर्थ सच्चाई है) सर्वोपरि है; और सत्य ही किसी भी राजनैतिक संस्था, सामाजिक संस्थान इत्यादि की धुरी होनी चाहिए। वे अपने किसी भी राजनैतिक निर्णय को लेने से पहले सच्चाई के सिद्धांतो का परिपालन अवश्य करते थे। सत्य, अहिंसा, मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय पर उनकी निष्ठा को उनकी निजी जिंदगी के उदाहरणों से बखूबी समझा जा सकता है।

कहा जाता है कि सत्य की व्याख्या अक्सर वस्तुनिष्ठ नहीं होती। गांधीवाद के अनुसार सत्य के पालन को अक्षरशः न आत्मिक सत्य को मानने की सलाह दी गयी है। यदि कोई ईमानदारीपूर्वक मानता है कि अहिंसा आवश्यक है तो उसे सत्य की रक्षा के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जब गांधीजी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्वदेश लौटे थे तो उन्होंने कहा था कि वे शायद युद्ध में ब्रिटिशों की ओर से भाग लेने में कोई बुराई नहीं मानते। गांधीजी के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा होते हुए भारतीयों के लिए समान अधिकार की मांग करना और साम्राज्य की सुरक्षा में अपनी भागीदारी न निभाना उचित नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ द्वतीय विश्वयुद्ध के समय जापान द्वारा भारत की सीमा के निकट पहुंच जाने पर गांधीजी ने युद्ध में भाग लेने को उचित नहीं माना बल्कि वहां अहिंसा का सहारा लेने की वकालत की है।

ब्रम्हचर्य एवं अहिंसा[संपादित करें]

यह भी देखें: ब्रम्हचर्य, अहिंसा, लियो टॉल्सटॉय

खादी[संपादित करें]

उपवास[संपादित करें]

धर्म[संपादित करें]

यह भी देखें: भगवद गीता, धर्म, हिंदु धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म

नेहरू का भारत[संपादित करें]

यह भी देखें: सर्वोदय


स्वतंत्रता[संपादित करें]

यह भी देखें: रंगभेद, तियननमेन चौक का प्रदर्शन १९८९, अफ्रीकी-अमरीकी नागरिक अधिकार आंदोलन


"बिना सत्य कुछ भी नहीं"[संपादित करें]

वर्तमान गांधीवादी[संपादित करें]

आलोचना एवं विवाद[संपादित करें]

यह भी देखें: भारत विभाजन, महात्मा गांधी की हत्या


विभाजन की अवधारणा[संपादित करें]

सैद्धांतिक रूप से गांधीजी भारत के विभाजन के खिलाफ रहे क्योंकि इससे उनके धार्मिक एकता की भावना को चोट पहुंचती थी[1] उन्होंने भारत के विभाजन के बारे में ६ अक्टूबर १९४६ को अपने पत्र हरिजन में लिखा था:

[पाकिस्तान की मांग] जैसा कि मुस्लीम लीग द्वारा रखी गयी है पूर्ण रूप से गैर-इस्लामी है एवं मुझे इसे पापपूर्ण कहते हुए भी कोई संकोच नहीं। इस्लाम पूरी मानवता के भाईचारे एवं एकता के पक्ष में रहा है इसलिए जो भारत के टुकडे करके दो आपस में लडने वाले समूह पैदा करना चाहते हैं वे सही मायनों में न सिर्फ भारत बल्कि इस्लाम के भी दुश्मन हैं। चाहे वे मेरे टुकडे टुकडे ही क्यों न कर दें लेकिन वे मुझे किसी गलत चीज को सही मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकते[...] हमें अपनी दृष्टि छोडने की बजाय सभी मुसलमान भाइयों का दिल प्यार से जीतना होगा[2]


यह भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ सूची[संपादित करें]

टीका-टिप्पणी[संपादित करें]

  1. रीप्रिंट द इसेंशियल गांधी: एन एन्थॉलजी ऑफ हिज राइटिंग्स ओन हिज लाइफ, वर्क ऐंड आइडियाज., लुइस फिशर, संपा., २००२ (रिप्रिंट संस्करण) पृ. १०६–१०८.
  2. रीप्रिंट द इसेंशियल गांधी: एन एंथॉलजी ऑफ हिज राइटिंग्स ओन हिज लाइफ, वर्क ऐंड आइडियाज.लुई फिशर, संपा., २००२ (रीप्रिंट संस्करण) पृ. ३०८–९.

बाहरी सूत्र[संपादित करें]