जैन धर्म
| जैन धर्म | |
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यह जैन धर्म की श्रेणी का लेख है। |
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| नवकार मंत्र • अहिंसा • | |
| ब्रह्मचर्य • सत्य • निर्वाण • | |
| आस्तेय • अपरिग्रह • अनेकांतवाद | |
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| केवल ज्ञान • ब्रह्माण्ड विज्ञान • संसार • | |
| कर्म • धर्म • मोक्ष • | |
| पुनर्जन्म • नवतत्त्व | |
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| २४ तीर्थंकर • ऋषभ देव • | |
| महावीर • आचार्य • गणधर • | |
| सिद्धसेन दिवाकर • हरिभद्र | |
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| भारत • पश्चिमी | |
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| श्वेतांबर • दिगंबर • तेरापंथी • | |
| प्रारंभिक विद्यालय • स्थानकवासी • | |
| बीसपंथ • डेरावासी | |
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| कल्पसूत्र • अग्मा • | |
| तत्तवार्थ सूत्र • सन्मति प्रकरण | |
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| समय रेखा • प्रमुख जैन तीर्थ • विषय सूची | |
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जैन धर्म प्रवेशद्वार |
जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है।
'जैन' कहते हैं उन्हें, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने-जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान् का धर्म।
जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र है-
- णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आइरियाणं।
- णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं॥
अर्थात अरिहंतो को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पाँच परमेष्ठी हैं।
अनुक्रम |
परिचय
'जैन धर्म' का अर्थ है - 'जिन का प्रवर्तित धर्म' । जैन धर्म भारत का एक धर्म संप्रदाय है जिसमें अहिंसा को परम धर्म माना जाता है और कोई ईश्वर या सृष्टिकर्ता नहीं माना जाता ।
जैन धर्म कितना प्राचीन है, ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । जैन ग्रंथो के अनुसार महावीर या वर्धमान ने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था । इसी समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं । उनके अनुसार यह धर्म बौद्ध धर्म के पीछे उसी के कुछ तत्वों को लेकर औऱ उनमें कुछ ब्राह्मण धर्म की शैली मिलाकर खडा़ किया गया । जिस प्रकार बौद्धों में २४ बुद्ध है उसी प्रकार जैनों में भी २४ तीर्थकार है। हिंदू धर्म के अनुसार जैनों ने भी अपने ग्रंथों को आगम, पुराण आदि में विभक्त किया है पर प्रो० जेकोबी आदि के आधुनिक अन्वेषणों के अनुसार यह सिद्ध किया गया है की जैन धर्म बौद्ध धर्म से पहले का है । उदयगिरि, जूनागढ आदि के शिलालेखों से भी जैनमत की प्राचीनता पाई जाती है।
ऐसा जान पड़ता है कि यज्ञों के हिंसा आदि देख जो विरोध का सूत्रपात बहुत पहले से होता आ रहा था उसी ने आगे चलकर जैन धर्म का रूप प्राप्त किया । भारतीय ज्योतिष में यूनानियों की शैली का प्रचार विक्रमीय संवत् से तीन सौ वर्ष पीछे हुआ । पर जैनों के मूल ग्रंथ अंगों में यवन ज्योतिष का कुछ भी आभास नहीं है । जिस प्रकार ब्रह्मणों की वेद संहिता में पंचवर्षात्मक युग है और कृत्तिका से नक्षत्रों की गणना है उसी प्रकार जैनों के अंग ग्रंथों में भी है । इससे उनकी प्राचीनता सिद्ध होती है ।
जैन लोग सृष्टिकर्ता ईश्वर को नहीं मानते, जिन या अर्हत् को ही ईश्वर मानते हैं । उन्हीं की प्रार्थना करते हैं और उन्हीं के निमित्त मंदिर आदि बनवाते हैं । जिन २४ हुए हैं, जिनकी नाम ये हैं—ऋषभदेव, अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांस- नाथ, वासुपूज्य स्वामी, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत स्वामी, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी । इनमें से केवल महावीर स्वामी ऐतिहासिक पुरुष है जिनका ईसा से ५२७ वर्ष पहले होना ग्रंथों से पाया जाया है । शेष के विषय में अनेक प्रकार की अलौकीक और प्रकृतिविरुद्ध कथाएँ हैं । ऋषभदेव की कथा भागवत आदि कई पुराणों में आई है और उनकी गणना हिंदुओं के २४ अवतारों में है । जिस प्रकार काल हिंदुओं में मन्वंतर कल्प आदि में विभक्त है उसी प्रकार जैन में काल दो प्रकार का है— उत्सिर्पिणी और अवसर्पिणी । प्रत्येक उत्सिर्पिणी और अवसर्पिणी में चौबीस चौबीस जिन तीर्थंकर होते हैं । ऊपर जो २४ तीर्थंकर गिनाए गए हैं वे वर्तमान अवसर्पिणी के हैं । जो एक बार तीर्थ कर हो जाते हैं वे फिर दूसरी उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में जन्म नहीं लेते । प्रत्येक उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में नए नए जीव तीर्थंकर हुआ करते हैं । इन्हीं तीर्थंकरों के उपदेशों को लेकर गणधर लोग द्वादश अंगो की रचना करते हैं । ये ही द्वादशांग जैन धर्म के मूल ग्रंथ माने जाते है । इनके नाम ये हैं—आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, भगवती सूत्र, ज्ञाताधर्मकथा, उपासक दशांग, अंतकृत् दशांग, अनुत्तोरोपपातिक दशांग, प्रश्न व्याकरण, विपाकश्रुत, हृष्टिवाद । इनमें से ग्यारह अंश तो मिलते हैं पर बारहवाँ हृष्टिवाद नहीं मिलता । ये सब अंग अर्धमागधी प्राकृत में है और अधिक से अधिक बीस बाईस सौ वर्ष पुराने हैं । इन आगमों या अंगों को श्वेताबंर जैन मानते हैं । पर दिगंबर पूरा पूरा नहीं मानते । उनके ग्रंथ संस्कृत में अलग है जिनमें इन तीर्थंकरों की कथाएँ है और २४ पुराण के नाम से प्रसिद्ध हैं।
यथार्थ में जैन धर्म के तत्वों को संग्रह करके प्रकट करनेवाले महावीर स्वामी ही हुए है । उनके प्रधान शिष्य इंद्रभूति या गौतम थे जिन्हें कुछ युरोपियन विद्वानों ने भ्रमवश शाक्य मुनी गोतम समझा था । जैन धर्म में दो संप्रदाय है — श्वेतांबर और दिगंबर । श्वेतांबर ग्यारह अंगों को मुख्य धर्म मानते हैं और दिगंबर अपने २४ पुराणों को । इसके अतिरिक्त श्वेतांबर लोग तीर्थंकरों की मूर्तियों को कच्छु या लंगोट पहनाते हैं और दिगंबर लोग नंगी रखते हैं। इन बातों के अतिरिक्त तत्व या सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है।
अर्हत् देव ने संसार को द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि बताया है । जगत् का न तो कोई हर्ता है और न जीवों को कोई सुख दुःख देनेवाला है । अपने अपने कर्मों के अनुसार जीव सुख दुःख पाते हैं। जीव या आत्मा का मूल स्वभान शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदमय है, केवल पुदगल या कर्म के आवरण से उसका मूल स्वरुप आच्छादित हो जाता है। जिस समय यह पौद्गलिक भार हट जाता है उस समय आत्मा परमात्मा की उच्च दशा को प्राप्त होता है । जैन मत 'स्याद्वाद' के नाम से भी प्रसिद्ध है । स्याद्वाद का अर्थ है अनेकांतवाद अर्थात् एक ही पदार्थ में नित्यत्व और अनित्यत्व, सादृश्य और विरुपत्व, सत्व और असत्व, अभिलाष्यत्व और अनभिलाष्यत्व आदि परस्पर भिन्न धर्मों का सापेक्ष स्वीकार । इस मत के अनुसार आकाश से लेकर दीपक पर्यंत समस्त पदार्थ नित्यत्व और अनित्यत्व आदि उभय धर्म युक्त है।
तीर्थंकर
जैन धर्म मे 24 तीर्थंकरों को माना जाता है।
| क्रमांक | तीर्थंकर |
| 1 | ऋषभदेव जी इन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है |
| 2 | अजितनाथ जी |
| 3 | सम्भवनाथ जी |
| 4 | अभिनंदन जी |
| 5 | सुमतिनाथ जी |
| 6 | पद्ममप्रभु जी |
| 7 | सुपाश्वॅनाथ जी |
| 8 | चंदाप्रभु जी |
| 9 | सुविधिनाथ जी इन्हें पुष्पदन्त भी कहा जाता है |
| 10 | शीतलनाथ जी |
| 11 | श्रेंयांसनाथ जी |
| 12 | वासुपूज्य जी |
| 13 | विमलनाथ जी |
| 14 | अनंतनाथ जी |
| 15 | धर्मनाथ जी |
| 16 | शांतिनाथ जी |
| 17 | कुंथुनाथ जी |
| 18 | अरनाथ जी |
| 19 | मल्लिनाथ जी |
| 20 | मुनिसुव्रत जी |
| 21 | नमिनाथ जी |
| 22 | अरिष्टनेमि जी इन्हें नेमिनाथ भी कहा जाता है जैन मान्यता में ये नारायण श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। |
| 23 | पाश्वॅनाथ जी |
| 24 | महावीर स्वामी जी इन्हें वर्धमान,सन्मति,वीर,अतिवीर भी कहा जाता है। |
सम्प्रदाय
तीर्थंकर महावीर के समय तक अविछिन्न रही जैन परंपरा ईसा की तीसरी सदी में दो भागों में विभक्त हो गयी : दिगंबर और श्वेताम्बर. मुनि प्रमाणसागर जी ने जैनों के इस विभाजन पर अपनी रचना 'जैनधर्म और दर्शन' में विस्तार से लिखा है कि आचार्य भद्रबाहु ने अपने ज्ञान के बल पर जान लिया था कि उत्तर भारत में १२ वर्ष का भयंकर अकाल पड़ने वाला है इसलिए उन्होंने सभी साधुओं को निर्देश दिया कि इस भयानक अकाल से बचने के लिए दक्षिण भारत की ओर विहार करना चाहिए.आचार्य भद्रबाहु के साथ हजारों जैन मुनि (श्रमण) दक्षिण की ओर वर्तमान के तमिलनाडु और कर्नाटक की ओर प्रस्थान कर गए और अपनी साधना में लगे रहे. परन्तु कुछ जैन साधु उत्तर भारत में ही रुक गए थे. अकाल के कारण यहाँ रुके हुए साधुओं का निर्वाह आगमानुरूप नहीं नहीं हो पा रहा था इसलिए उन्होंने अपनी कई क्रियाएँ शिथिल कर लीं, जैसे कटि वस्त्र धारण करना, ७ घरों से भिक्षा ग्रहण करना, १४ उपकरण साथ में रखना आदि. १२ वर्ष बाद दक्षिण से लौट कर आये साधुओं ने ये सब देखा तो उन्होंने यहाँ रह रहे साधुओं को समझाया कि आप लोग पुनः तीर्थंकर महावीर की परम्परा को अपना लें पर साधु राजी नहीं हुए और तब जैन धर्म में दिगंबर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदाय पैदा हो गए.
दिगम्बर
दिगम्बर मुनि (श्रमण) वस्त्र नहीं पहनते है। नग्न रहते हैं । तीर्थकरों की प्रतिमाएँ पूर्ण नग्न बनायी जाती हैं और उनका श्रृंगार नहीं किया जाता है, पूजन पद्धति में फल और फूल नहीं चढाए जाते हैं.
श्वेताम्बर
श्वेताम्बर संन्यासी सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं, तीर्थकरों की प्रतिमाएँ लंगोट और धातु की आंख, कुंडल सहित बनायी जाती हैं और उनका श्रृंगार किया जाता है.
श्वेताम्बर भी तीन भाग मे विभक्त है:
- मूर्तिपूजक
- स्थानकवासी
- तेरापंथी
धर्मग्रंथ
समस्त आगम ग्रंथो को चार भागो मैं बांटा गया है
१ प्रथमानुयोग्
२ करनानुयोग
३ चरणानुयोग
४ द्रव्यानुयोग
अन्य ग्रन्थ
षट्खण्डागम, धवला टीका, महाधवला टीका, कसायपाहुड, जयधवला टीका, समयसार, योगसार प्रवचनसार, पञ्चास्तिकायसार, बारसाणुवेक्खा, आप्तमीमांसा, अष्टशती टीका, अष्टसहस्री टीका, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, तत्त्वार्थसूत्र, तत्त्वार्थराजवार्तिक टीका, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक टीका, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, भगवती आराधना, मूलाचार, गोम्मटसार, द्रव्यसंग्रह, अकलंकग्रन्थत्रयी, लघीयस्त्रयी, न्यायकुमुदचन्द्र टीका, प्रमाणसंग्रह, न्यायविनिश्चयविवरण, सिद्धिविनिश्चयविवरण, परीक्षामुख, प्रमेयकमलमार्तण्ड टीका, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय भद्रबाहु संहिता
दर्शन
अनेकान्तवाद
स्याद्वाद
प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने ग्रंथ " भगवान महावीर एवं जैन दर्शन " में अनेकांतवाद एवं स्याद्वाद की सम्यग् अवधारणा को स्पष्ट किया है। लेखक ने सिद्ध किया है कि अनेकांत एकांगी एवं आग्रह के विपरीत समग्रबोध एवं अनाग्रह का द्योतक है। इसी प्रकार लेखक ने स्पष्ट किया है कि 'स्याद्वाद' का 'स्यात्' निपात शायद, सम्भावना, संशय अथवा कदाचित् आदि अर्थों का वाचक नहीं है। स्याद्वाद का अर्थ है- अपेक्षा से कथन करने की विधि या पद्धति।अनेक गुण-धर्म वाली वस्तु के प्रत्येक गुण-धर्म को अपेक्षा से कथन करने की पद्धति। विभिन्न शास्त्रों एवं ग्रन्थों का पारायण करते समय जिन बिन्दुओं पर व्यतिरेक/विरोधाभास प्रतीत होता है, उन्हें भी इस ग्रंथ में स्पष्ट किया गया है।
जीव और पुद्गगल
जैन आत्मा को मानते हैं । वो उसे "जीव" कहते हैं । अजीव को पुद्गगल कहा जाता है । जीव दुख-सुख, दर्द, आदि का अनुभव करता है और पुनर्जन्म लेता है ।
मोक्ष
जीवन व मरण के चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहते हैं।
चारित्र
छह द्रव्य
जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश, काल।
सात तत्त्व
जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष,
नौ पदार्थ
जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य, पाप।
चार कषाय
क्रोध, मान, माया, लोभ।
चार गति
देव गति, मनुष्य गति, तिर्यञ्च गति, नर्क गति, (पञ्चम गति = मोक्ष)।
चार निक्षेप
नाम निक्षेप, स्थापना निक्षेप, द्रव्य निक्षेप, भाव निक्षेप।
ईश्वर
जैन ईश्वर को मानते हैं। लेकिन ईश्वर को सत्ता सम्पन्न नही मानते ईश्वर सर्व शक्तिशाली त्रिलोक का ज्ञाता द्रष्टा है पर त्रिलोक का कर्ता नही |
पाँच महाव्रत
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
सम्यक्त्व के आठ अंग
निःशंकितत्त्व, निःकांक्षितत्त्व, निर्विचिकित्सत्त्व, अमूढदृष्टित्व, उपबृंहन / उपगूहन, स्थितिकरण, प्रभावना, वात्सल्य.
त्यौहार
जैन धर्म के प्रमुख त्यौहार इस प्रकार हैं ।
अहिंसा पर ज़ोर एवं युगीन प्रासंगिकता
अहिंसा और जीव दया पर बहुत ज़ोर दिया जाता है । सभी जैन शाकाहारी होते हैं । प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने ग्रंथ " भगवान महावीर एवं जैन दर्शन " में जैन धर्म एवं दर्शन की युगीन प्रासंगिकता को व्याख्यायित करते हुए यह मत व्यक्त किया है कि आज के मनुष्य को वही धर्म-दर्शन प्रेरणा दे सकता है तथा मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक समस्याओं के समाधान में प्रेरक हो सकता है जो वैज्ञानिक अवधारणाओं का परिपूरक हो, लोकतंत्र के आधारभूत जीवन मूल्यों का पोषक हो, सर्वधर्म समभाव की स्थापना में सहायक हो, अन्योन्याश्रित विश्व व्यवस्था एवं सार्वभौमिकता की दृष्टि का प्रदाता हो तथा विश्व शान्ति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का प्रेरक हो। लेखक ने इन प्रतिमानों के आधार पर जैन धर्म एवं दर्शन की मीमांसा की है।
इन्हें भी देखें
वाह्य सूत्र
- बुंदेलखंड के जैन तीर्थ (बुंदेलखंड दर्शन डोट कॉम)
- जेनैन्द्र सिद्धांत कोष - जैनधर्म एवं दर्शन की विकी
- जैनधर्म में विज्ञान (गूगल पुस्तक ; नारायण लाल कछारा)
- जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश (गूगल पुस्तक ; जिनेन्द्र वाणी)
- भगवान महावीर एवं जैन दर्शन (गूगल पुस्तक; लेखक - प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन)
- भगवान महावीर -प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन
- प्राणी मात्र के कल्याण -महावीर का संदेश:- प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन
- भगवान महावीर एवं जैन दर्शन: -प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन
- जैन धर्म की मुख्य बातें (वेबदुनिया)
- जैन धर्मग्रंथों का संक्षिप्त परिचय (वेबदुनिया)
- विश्व की दृष्टि में जैनधर्म - जैन धर्म के बारे में महापुरुषों के विचार
- जैन ज्ञान भंडार
- मूल जैन ग्रन्थ - हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी अनुवाद सहित
- जैन-जगत - जैन धर्म का वैश्विक पोर्टल; अनेक भाषाओं में सामग्री उपलब्ध
- Jaina Sutras, Translated from the Prakrit by Hermann Jacobi, 1884
- Jainstudy.org
- Jain and Indology group
- Jain-class group
- Jain Perceptions blog
- A complete jainism portal
- Jainfriends.com
- विद्यासागर_डॉट_नेट
- जैन धर्म से सम्बन्धित शैक्षिक सामग्री
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