ऋषभदेव

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ऋषभदेव
प्रथम जैन तीर्थंकर
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ऋषभनाथ की प्रतिमा, लॉस एंजिल्स काउंटी कला संग्रहालय
विवरण
अन्य नाम: आदिनाथ, ऋषभनाथ, वृषभनाथ
परिवार
पिता: नाभिराय
माता: मरुदेवी
वंश: इक्ष्वाकु
स्थान
जन्म: अयोध्या
निर्वाण: कैलाश पर्वत
लक्षण
रंग: सुनहरा
चिन्ह: बैल
ऊंचाई: ५०० धनुष (१५०० मीटर)
आयु: ८,४००,००० पूर्व (५९२.७०४ × १०१८ वर्ष)
शासक देव
यक्ष: गौमुख
यक्षिणी: चक्रेश्वरी

ऋषभदेव प्राचीन भारत के एक सम्राट थे जो कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। इनके पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा।

जीवन चरित[संपादित करें]

  • जन्म -चैत्र कृष्ण ९
  • जन्म स्थान - अयोध्या
  • माता- महारानी मरूदेवी
  • पिता-महाराज नाभिराय
  • निर्वाण - माघ कृष्ण १४
  • निर्वाण स्थल - श्री कैलाश पर्वत्
  • निशान - वृषभ या बैल

ऋषभदेव जी को भगवान आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है। भगवान ऋषभदेव जी की विश्व की सबसे बडी प्रतिमा बडवानी (मध्यप्रदेश) (भारत) के पास बावनगजा मे है। यह ८४ फीट की है|

जैन ग्रन्थों में वर्णन[संपादित करें]

मूलनायक श्री आदिनाथ भगवान जी, रतलाम

जैन पुराणों के अनुसार अन्तिम कुलकर राजा नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव हुये जो कि महान प्रतापी सम्राट और जैन धर्म के प्रथम तीथर्कंर हुए। ऋषभदेव के अन्य नाम ऋषभनाथ, आदिनाथ, वृषभनाथ भी है। भगवान ऋषभदेव का विवाह यशस्वती (नन्दा) और सुनन्दा से हुआ। इससे इनके सौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनमें भरत सबसे बड़े एवं प्रथमचक्रवर्ती सम्राट हुए जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पडा। दुसरे पुत्र बाहुबली भी एक महान राजा एवं कामदेव पद से बिभूषित थे। इनके आलावा ऋषभदेव के वृषभसेन, अनन्तविजय, अनन्तवीर्य, अच्युत, वीर, वरवीर आदि ९९ पुत्र तथा ब्राम्ही और सुन्दरी नामक दो पुत्रियां भी हुई, जिनको ऋषभदेव ने सर्वप्रथम युग के आरम्भ में क्रमश: लिपिविद्या [अक्षरविद्या]और अंकविद्या का ज्ञान दिया। [1]

हिन्दु ग्रन्थों में वर्णन[संपादित करें]

शत्रुन्जय अवतारी श्री आदिनाथ भगवान, जालौर जिला

वैदिक धर्म में भी ॠषभदेव को एक अवतार के रूप में माना गया है। भागवत में अर्हन् राजा के रूप में इनका विस्तृत वर्णन है। इसमें भरत आदि 100 पुत्रों का कथन जैन धर्म की तरह ही किया गया है। अन्त में वे दिगम्बर (नग्न) साधु होकर सारे भारत में विहार करने का भी उल्लेख किया गया है। ॠग्वेद आदि प्राचीन वैदिक साहित्य में भी इनका आदर के साथ संस्तवन किया गया है।

हिन्दूपुराण श्रीमद्भागवत के पाँचवें स्कन्ध के अनुसार मनु के पुत्र प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुये जिनके पुत्र राजा नाभि (जैन धर्म में नाभिराय नाम से उल्लिखित) थे। राजा नाभि के पुत्र ऋषभदेव हुये जो कि महान प्रतापी सम्राट हुये। भागवतपुराण अनुसार भगवान् ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की पुत्री जयन्ती से हुआ। इससे इनके सौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनमें भरत सबसे बड़े एवं गुणवान थे।[2] उनसे छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक, विदर्भ और कीकट ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयों से बड़े एवं श्रेष्ठ थे। उनसे छोटे कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन ये नौ पुत्र राजकुमार भागवत धर्म का प्रचार करने वाले बड़े भगवद्भक्त थे। इनसे छोटे इक्यासी पुत्र पिता की की आज्ञा का पालन करते हुये पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करने से शुद्ध होकर ब्राह्मण हो गये।[3]

विष्णु पुराण के अनुसार इनके पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा:

ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात भरतो भवेत्
भरताद भारतं वर्षं, भरतात सुमतिस्त्वभूत्
— विष्णु पुराण (2, 1, 31)
ऋषभ मरुदेवी को पैदा हुए थे, भरत ऋषभ को पैदा हुए थे,
भारतवर्ष भरत से उगा, और सुमति भरत से उगी

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषुगीयते
भरताय यत: पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम
- विष्णु पुराण (2, 1, 32)
यह भूमि तब से भारतवर्ष के रूप में जानी जाती है
जब से पिता अपने पुत्र भरत को राज्य सौंप कर तपस्या के लिए जंगल में गए

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. आदिनाथपुराण और चौबीस तीर्थंकर-पुराण
  2. श्रीमद्धभागवत पञ्चम स्कन्ध, चतुर्थ अध्याय, श्लोक ९
  3. श्रीमद्धभागवत पञ्चम स्कन्ध, चतुर्थ अध्याय, श्लोक १३

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]