दिगम्बर

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गोम्मटेश्वर बाहुबली (श्रवणबेळगोळ में)

दिगम्बर जैन धर्म के दो सम्प्रदायों में से एक है। दूसरा सम्प्रदाय है - श्वेताम्बर। दिगम्बर= दिक् + अम्बर अर्थात दिशायें हि जिनके वस्त्र है। दिगम्बर मुनि निर्वस्त्र होते हैं, पड्गाहन करने पर एक बार खडे होकर हाथ मे ही आहार लेते है मात्र पिछी कमण्ड्लु रखते है पैदल चलते है।

परिचय[संपादित करें]

दिगंबर जैनधर्म में दो मुख्य संप्रदाय हैं, एक दिगंबर और दूसरा श्वेतांबर। दिगंबर (दिशा ही जिसका अंबर अर्थात् वस्त्र हो) का अर्थ 'नग्न' होता है। दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी मोक्ष प्राप्त करने के लिए नग्नतत्व को मुख्य मानते हैं और स्त्रीमुक्ति का निषेध करते हैं। श्वेतांबरों के ४५ आगम ग्रंथों को भी वे स्वीकार नहीं करते। उनका कथन है कि जिन भगवान द्वारा भाषित आगम काल-दोष से नष्ट हो गए हैं। महावीर भगवान के पश्चात् इंद्रभूति गौतम, सुधर्मा और जंबूस्वामी तक जैनसंघ में विशेष मतभेद के चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं होते। परतु जंबूस्वामी के पश्चात् दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय की आचार्य परंपराएँ भिन्न पड़ जाती हैं।

दिगंबरों के अनुसार विष्णु, नंदी, अपराजित गोवर्धन और भद्रबाहु नामक पाँच श्रुतकेवली हुए, जबकि श्वेतांबर परंपरा में प्रभव, शय्यंभव, यशोभद्र, संभूतविजय और भद्रवाहु श्रुतकेवली माने गए हैं। भद्रबाहु दोनों संघों में सामान्य हैं, इससे मालूम होता है कि भद्रबाहू के समय तक जैन संघ में दिगंबर श्वेतांबर का मतभेद नहीं हुआ था। श्वेतांबर संप्रदाय के अनुसार महावीर निर्वाण के ६०९ वर्ष बाद (ईसवी सन् ८३) रथवीपुर में शिवभूति द्वारा बोटिक मत (दिगंबर) की स्थापना हुई। कोंडिन्य और कोट्टिवीर शिवभूति के दो प्रधान शिष्य थे।

दिगंबर मान्यता के अनुसार उज्जैन में चंद्रगुप्त के राज्यकाल में आचार्य भद्रबाहु की दुष्काल संबंधी भविष्यवाणी सुनकर उनके शिष्य विशाखाचार्य अपने संघ को लेकर पुन्नाट चले गए, कुछ साधु सिंधु में विहार कर गए। जब साधु उज्जैनी लौटकर आए तो वहाँ दुष्काल पड़ा हुआ था। इस समय संघ के आचार्य ने नग्नत्व ढाँकने के लिए साधुओं को अर्धफालक धारण करने का आदेश दिया; आगे चलकर कुछ साधुओं ने अर्धफालक का त्याग नहीं किया, ये श्वेतांबर कहलाए। मथुरा के जैन शिलालेखों से भी यही प्रमाणित होता है कि दोनों संप्रदाय ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी के आसपास एक दूसरे से पृथक् हुए। गुजरात और काठियावाड़ में अधिकतर श्वेतांबर तथा दक्षिण भारत और उत्तरप्रदेश में अधिकतर दिगंबर पाए जाते हैं।

दिगम्बर मुनि (एनीमेशन)

२८ मूल गुण[संपादित करें]

दिगम्बर मुनि को अट्ठाईस मूल गुणों का पालन करना होता है |

# दिगम्बर मुनि के २८ मूल गुण
पांच महाव्रत अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य, ब्रह्मचर्य, अचौर्य
६-१० पाँच ईर्या समिति (गमन में सावधानी)
११-१५ पाँच इंद्रियों पर संयम
छह आवश्यक (१६-२१) सामायिक, चतुविंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान (त्याग) और कायोत्सर्ग (देह में ममत्व का त्याग)
२२ केशलोंच करना
२३ नग्न रहना
२४-२५ स्नान और दातौन नहीं करना
२६ जमीन पर सोना
२७ खड़े-खड़े त्रिशुद्ध आहार लेना
२८ दिन में एक बार भोजन करना

[1]

ईर्या समिति[संपादित करें]

दिगम्बर मुनि पाँच ईर्या (गमन में सावधानी) समितियों का पालन करते हैं, जो है भाषा, एषणा (भोजन शुद्धि), आदाननिक्षेप (धार्मिक उपकरण उठाने रखने में सावधानी) और प्रतिष्ठापना (मल मूत्र के त्याग में सावधानी)| [2]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

संदर्भग्रंथ सूची[संपादित करें]

  1. https://en.wikipedia.org/wiki/Digambara
  2. www.jainkosh.org/wiki/दर्शनपाहुड़_गाथा_11