क्षत्रिय

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

क्षत्रीय (पाली रूप : खत्तिय), क्षत्र, राजन्य एवं राजपूत - ये चारों शब्द सामान्यतया हिंदू समाज के द्वितीय वर्ण और जाति के अर्थ में व्यवहृत होते हैं किंतु विशिष्ठ एतिहासिक अथवा सामाजिक प्रसंग मे पारिपाश्वों से संबंध होने के कारण इनके अपने विशेष अर्थ और ध्वनियाँ हैं। 'क्षेत्र' (ऋग्वेद,१,१५७,२) का अर्थ मूलतः 'वीर्य' अथवा 'परित्राण शक्ति' था। किंतु बाद में यह शब्द उस वर्ग को अभिहित करने लगा जो शास्त्रास्त्रों के द्वारा अन्य वर्णों का परिरक्षण करता था ('क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्र, रघुवंश)। 'राजन्य' का यौगिक अर्थ है- 'राजकुल से संबद्ध वर्ग'। पूर्वमध्यकाल से 'राजपुत्र' शब्द का अपभ्रंश 'राजपूुत' शब्द द्वितीय वर्ण के अंतर्गत चौहान, परमार आदि वंशों के अर्थ में व्यवहृत होने लगा। क्षत्रीय शब्द इनमें सबसे अधिक व्यापक है। वेदों तथा ब्राह्मणों में क्षत्रीय शब्द राजवर्ग के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। जातकों (रीज़ डेविड्स, बुधिस्ट इंडिया, पृ. ५२, डायलाग्स् ऑव द बुद्ध, १.पृ. ९५ (और रामायण, महाभारत में (हाप्किंस, जरनल ऑव अमेरीकन औरियंटल सोसाइटी, १३, पृ. ७३) क्षत्रीय शब्द से सामंत वर्ग और अनेक युद्धरत जन अभिहित हुए हैं। स्मृतियों में कुछ युद्धपरक जनजातियाँ व्रात्य क्षत्रीय वर्ग के अंतर्गत अनुसूचित की गई।

परिचय[संपादित करें]

वैदिक साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि ब्राह्मण और क्षत्रीय वर्ण समाज में सर्वाधिक महत्वशाली थे। वैदिक परंपरा में ब्राह्मण का स्थान क्षत्रीय से उच्चतर है किंतु ब्राह्मण, उपनिषद्, (शतपथ ब्रा. १४,४,१,२३, तैत्तरीय, ३,१,१४) और पाली साहित्य में कुछ ऐसे उल्लेख हैं जिनसे ज्ञात होता है कि अवसरविशेष पर क्षत्रियों ने ब्राह्मणों से श्रेष्ठतर पद प्राप्त करने की चेष्टा की। यह भी सत्य है कि क्षत्रियों में जनक, प्रवाहण जैवलि (बृहदा. उप. ६,११),अश्वपति कैकेय (श. ब्रा.१०,६,१), अजातशत्रु (बृहद. उप. २,१,१) के समान ब्रह्मविद्या के ज्ञाता और उपदेष्टा थे। गार्वे (डायसन कृत फ़िलासफ़ी ऑव उपनिषद्, पृ. १७), ग्रियर्सन (एंसाइक्लोपीडिया ऑव रिलीजन ऐंड एथिक्स में भक्ति पर निबंध), रा. गो. भांडारकर (वैष्णविज्म ऐंड शैविज्म, पृ. ९) आदि विद्वानों का मत है कि ब्राह्मणों द्वारा अनुसासित वैदिक कर्मकांड की परंपरा के विरूद्ध क्षत्रियों ने ज्ञानपरक औपनिषद धारा का प्रवर्तन किया। ब्राह्मण क्षत्रीय के परस्पर संघर्ष का उल्लेख प्राचीन परंपरा में भी हुआ है :

धिग्वलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।
बलाबले विनिश्चित्य तप एव परं बलम्।।

प्राचीन एतिहासिक साहित्य में पग पग पर इस संघर्ष के प्रमाण मिलते हैं। बौद्ध साहित्य और जैन आगमों में बराबर यह कहा गया है कि धर्म प्रणेता सदैव क्षत्रीय परिवार में ही जन्म लेते हैं। फिर भी वैदिक परंपरा में ब्राह्मण वर्ण से सदैव निम्न माने जाते थे किंतु वैश्य शूद्रों के ऊपर उनकी प्रमुखता समाज में स्वीकृत थी (काठक सं. ३,३,१०,२२,१ ; ऐतरेय ब्राह्मण. ११-३-३)।

धर्मशास्त्रों में द्विजातिविहित धर्म- यज्ञ करना और दान देने के अतिरिक्त शस्त्र द्वारा जीविकोपार्जन तथा पृथिवी की रक्षा करना कहा गया है। विष्णु स्मृति के अनुसार क्षत्रीय का कर्तव्य प्रजापालन है। वस्तुत प्राचीन काल से ही शासन पर क्षत्रियों का ही अधिकार रहा। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि आपद्काल में क्षत्रिय चाहें तो वैश्यकर्म अपना सकते हैं। गुप्तकाल में क्षत्रिय वस्तुत वैश्यकर्म करने लगे थे। ऐसा इंदौर (बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश) से प्राप्त एक ताम्रलेख से ज्ञात होता है। साहित्य सूत्रों से यह भी ज्ञात होता है कि इस काल में वंश के आधार पर वर्गभेद होने लगे थे और वे लोग अपने को सूर्यवंशी, सोमवंशी, पुरुवंशी, क्रथकैशिक, नीपवंशी, आदि कहने लगे थे। गुप्तकाल से पूर्व ही यवन, शक, कुशाण, आदि विदेशी जातियाँ भारत आकर भारतीय जनसमाज में घुलमिल गई थी। लड़ाकू होने के कारण कदाचित् इनका समावेश क्षत्रीय समाज में हो गया था।

क्रमश पूर्वमध्यकाल और उत्तरमध्यकाल में क्षत्रियों के संबंध में दो महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रतिपादित हुए। प्रथम यह कि वसिष्ठ ने चौहान, परमार, प्रतिहार और सोलंकी राजवंशों को आबू के यज्ञकुंड से उत्पन्न किया और दूसरा यह कि कलि में क्षत्रियों एवं वैश्य जाति का लोप हो गया। अग्निकुंण्ड राजपूतों की उत्पत्ति की कहानी क्रमस परिवर्तित हुई और इस परिवर्तन के साथ ही साथ उसके परियोजन और अर्थ भी परिवर्तिन हुआ। नवसाहसांकचरित (११, ६४-७१), तिलकमंजरी (१.३९) और वसंतगढ़ में प्राप्त पूर्णपाल के वि. सं. १०४९ के अभिलेख में इसके प्राथमिक उल्लेख हैं। बाद में विभिन्न शिलालेखों, चारण कृतियों और चंदकृतपृथ्वीराजरासो’ में इसका विशेष पल्लवन हुआ है। इस कथा के आधार पर टॉड (एनल्स ऐंड ऐंन्टीक्विटीज ऑव राजस्थान, १९२०, पृ. १४४४-१४४५) और स्मिथ (द अर्ली हिस्ट्री ऑव इंडिया, १९२४, पृ. ४२८) आदि विद्वानों ने यह मत स्थिर किया कि अनार्य और अभारतीय जातियों का संस्करण कर पूर्वमध्ययुग में उन्हें राजपूत-क्षत्रिय वर्ग में स्वीकृत किया गया। तब के विविध जातियों के सम्मिश्रण से इस स्थिति का संभव हो जाना अनिवार्य था।

कलियुग में क्षत्रियों के लोप का सिद्धान्त शुद्धितत्व (पृ. २६८) शुद्र-कमलाकर और व्रात्यताप्रायश्चित्तनिर्णय आदि ग्रंथों में उपलब्ध होता है। किंतु यह मत १६-१७वीं शताब्दी में ही प्रतिपादित हुआ।